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कृषि जगत राजनीति

किसान और सरकार मिलकर राष्ट्रहित में लें निर्णय

 

यदि भीड़ और सभा में अंतर किया जाए तो पता चलता है कि भीड़ भावना प्रधान होती है ,जबकि सभा व्यवस्था प्रधान होती है ? व्यवस्था में सब कुछ सिस्टमैटिक होता है, जबकि भीड़ में सब कुछ अव्यवस्थित होता है । यदि एक तरफ दो-चार आदमी भागना आरंभ कर दें तो सारी भीड़ बिना किसी कारण पर विचार किए उस ओर को ही भागने लगती है । जबकि सभा में 10 – 20 लोगों के भागने पर भी आयोजक ,संयोजक और संचालक व्यवस्था को बनाए रखने में अधिकतर सफल हो जाते हैं ।


जैसे एक भीड़ के कुछ लोग यदि किसी व्यक्ति के बारे में यह कहने लगें कि ‘मारो – मारो’ तो भीड़ के शेष व्यक्ति भी ‘मारो – मारो’ का ही शोर मचाने लगते हैं। कोई यह नहीं कहता कि क्यों मार रहे हो? क्या कारण है ? किसको मार रहे हो ? इसने क्या अपराध किया है?
यदि वर्तमान में किसानों के चल रहे आंदोलन पर विचार करें तो इस विषय में मैं एक निवेदन करूंगा कि जब सरकार ने यह कह दिया है कि उसके द्वारा बनाए गए कानूनों की प्रत्येक धारा पर अलग-अलग विचार कर लिया जाए और यदि उसमें कुछ ऐसा है जो किसानों के हित में नहीं है तो वह उस पर खुले दिल से विचार करने को तैयार है। तब किसानों की ओर से भी यह संकेत और संदेश जाना चाहिए कि वह भी राष्ट्रहित में किसी भी प्रकार के बवाल को मचाने के पक्ष में नहीं हैं और वे खुले दिल से सरकार के साथ सहयोग कर राष्ट्र में शांति व्यवस्था बनाए रखने के पक्षधर हैं।
सरकार किसानों के हित में काम करने का संकल्प बार-बार दोहरा रही है और यह पूछ रही है कि उनकी समस्या या शिकायत क्या है तो किसान संगठनों को अपनी समस्या और शिकायतों को ही बताना चाहिए, ना कि देशद्रोही शक्तियों के हाथों का खिलौना बनकर अपनी गरिमा के विरुद्ध कोई कार्य करना चाहिए । यह नहीं होना चाहिए कि किसान संगठन जिद करके बैठ जाएं और अपनी गरिमा के विरुद्ध ऐसा आचरण करते हुए दिखाई दें कि उन्हीं के लोग मीडिया के सामने आकर कहने लगें कि कुछ लोग हैं जो सरकार से समझौता नहीं होने देना चाहते, जबकि हम सरकार के साथ मिलकर काम करने को तैयार हैं ।
जबकि सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य अर्थात एमएसपी की बात को स्वीकार कर लिया है तो किसानों को भी अपनी ओर से उदारता दिखानी चाहिए । यह नहीं दीखना चाहिए कि सारा आंदोलन केवल राजनीति से प्रेरित है और स्वार्थी लोगों के हाथों का खिलौना बनकर रह गया है। किसानों को महेंद्र सिंह टिकैत के स्वाभिमान को याद रखना चाहिए जिन्होंने किसानों का सम्मान देशद्रोही लोगों के हाथों नहीं बेचा था बल्कि अपने बलबूते पर और अपने आत्मबल पर अपने आप धरने के लिए बैठे थे। धरना प्रदर्शन करना हमारा संवैधानिक अधिकार है, परंतु साथ ही साथ राष्ट्रीय एकता ,अखंडता ,शांति और व्यवस्था को बनाए रखना भी हमारा संवैधानिक मौलिक कर्तव्य है उस और भी हमें ध्यान देना चाहिए।
यह नहीं होना चाहिए कि हमारे मंचों पर राष्ट्र विरोधी लोग आकर कब्जा कर लें और हमारी आवाज में ऐसे बेसुरे सुर मिलाने लगें जो लोगों को चुभते हों या जिन से देश की एकता और अखंडता को खतरा दिखाई देता हो।
सरकार ने किसानों को यह सुविधा दी है कि वह अपनी फसल को चाहे मंडी में बेच लें और चाहे किसी प्राइवेट व्यक्ति को बेच दें । इस व्यवस्था के पीछे सरकार का एक ही उद्देश्य है कि किसानों को उनकी उपज का या फसल का अधिक से अधिक मूल्य प्राप्त होना चाहिए । वह जिस भाव पर चाहे और जहां चाहे वहां अपनी फसल को बेच सकता है ।
वास्तव में वर्तमान में हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर की सरकार है। वहां एक जाति विशेष हरियाणा में अपना एकाधिकार मानती है उस एकाधिकार का हनन मनोहर लाल खट्टर के मुख्यमंत्री होते हुए दिखाई पड़ रहा है, यही कारण है कि यह लोग कोई ना कोई अवरोध मनोहर लाल खट्टर की सरकार के लिए पैदा करते रहते हैं । अब अपनी इसी हीनभावना से प्रेरित होकर मनोहर लाल खट्टर सरकार का विरोध करते हुए ये लोग किसान विरोधी आंदोलन में आकर बैठ गए हैं ।
पंजाब में कांग्रेस नीत सरकार है। पंजाब में बादल परिवार की बहुत सारी प्राइवेट मंडी है। तथा बादल परिवार का सारा कारोबार किसानों के आधार पर आधारित है। बादल परिवार सबसे बड़े आढ़तियों में से है। इसीलिए बादल परिवार की केंद्रीय मंत्री श्रीमती हरसिमरत कौर ने इन कानूनों का विरोध करते हुए तुरंत त्यागपत्र केंद्रीय मंत्रिमंडल से दिया था ।वह इसलिए नहीं दिया था कि ये कानून किसानों के विरोध में थे बल्कि वह बादल परिवार के विरोध में थे लिए त्यागपत्र दिया था बादल परिवार ने फिर इन सबको किसानों को गुमराह करके आंदोलन के रास्ते भेज दिया। कैप्टन अमरेंद्र सिंह मुख्यमंत्री पंजाब वह भी यह चाहते थे कि केंद्र की सरकार कमजोर हो। लिहाजा उनका भी समर्थन हुआ । पंजाब में भी वह सिख हैं जो एक जाति विशेष के लोग हैं।वही हरियाणा के जाति विशेष के लोगों से मिलकर के आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं।
पश्चिम उत्तर प्रदेश में भी एक जाति विशेष के लोग ही अपने आप को किसान मानते हैं ।वही इस आंदोलन में समर्थन दे रहे हैं। इसी प्रकार राजस्थान में कांग्रेस नीत सरकार वह भी केंद्र को कमजोर करना चाहती है। दिल्ली में आप की सरकार है वह भी केंद्रीय सरकार के विरुद्ध आवाज उठा रही है।
कनाडा के प्रधानमंत्री ने जिस तरीके से आंदोलन को आर्थिक सहायता दी है और समर्थन किया है इससे साफ झलकता है कि कनाडा में अधिकतर सिख परिवार हैं, उनके दबाव में ही और प्रभाव में ही यह समर्थन और पैसा कनाडा से प्राप्त हो रहा है। कनाडा उग्रवादियों की कर्म स्थली रहा है। इसको सारी दुनिया जानती है। वहां आज भी खालिस्तान के पक्ष में काम करने वाले लोगों का वर्चस्व है । उन्हीं लोगों की पीठ थपथपाते हुए कनाडा सरकार भारत में अस्थिरता पैदा करना चाहती है।
यह बहुत ही दुखद तथ्य है कि किसान आंदोलन में पाकिस्तान व खालिस्तान समर्थन के नारे लग रहे हैं।
किसी भी किसान का भारत के शत्रु देश पाकिस्तान से या भारत के टुकड़े करने की मंशा रखने वाले खालिस्तानियों से क्या संबंध हो सकता है?


किसानों के मंच पर सरजील इमाम को एक हीरो के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है । इस प्रकार देश विरोधी गतिविधियों में संलिप्त चेहरे या संगठन किसान मंच पर दिखाई दे रहे हैं, जिनका किसानों से दूर-दूर का भी कोई संबंध नहीं है।
किसी भी सरकार से या सरकार के मुखिया से असहमत होना किसी भी लोकतांत्रिक देश के नागरिकों के लिए प्रतिबंधित नहीं है । वह अपना विरोध व्यक्त कर सकता है और सरकार के प्रति संविधानिक सीमाओं में रहते हुए अपना आक्रोश भी व्यक्त कर सकता है । परंतु शब्दों की और प्रदर्शन की गरिमा बनाए रखना भी उतना ही संविधानिक है जितना विरोध प्रदर्शन करना संविधानिक है। प्रधानमंत्री मोदी को अपशब्दों के साथ-साथ उनको मार देने तक की बातें करना असंवैधानिक तो है ही अनैतिक और अवैधानिक भी है ।
इस आंदोलन के संदर्भ में हमें यह भी समझना चाहिए कि यहां पर जितने लोग इकट्ठा हो रहे हैं और वह जिस स्तर का खाना – पीना, रहना – सहना अपना प्रकट कर रहे हैं , वह सब भी यह बताता है कि वह मौलिक रूप से किसान नहीं है । शराब ,मांस, अंडा, कपड़ा, रजाई, खाने पीने की तमाम सुविधाएं यह कहां से प्राप्त हो रही हैं। यदि देश का किसान आर्थिक रूप से कमजोर है तो यह इतनी सुविधाएं कौन दे रहा है?
हमें कांग्रेस जैसी पार्टियों के दोगले चरित्र पर भी इस समय विचार करना चाहिए। क्योंकि यही पार्टी रही है जो इसी प्रकार के सुधारों की वकालत देर से करती चली आ रही है। आज यदि इसी प्रकार के सुधारों को केंद्र की मोदी सरकार ने लागू कर दिया है तो इसमें कौन सी बड़ी आफत आ गई ? निश्चित रूप से यूपीए सरकार के समय में जिन बातों को उस समय की सरकार केवल कहती रही थी उनको मोदी सरकार ने करके दिखा दिया है, मात्र इतना अंतर है ।
यदि मोदी सरकार ने कुछ वैसा ही किया है जैसा कांग्रेस चाहती थी तो आज कांग्रेस को इन कानूनों को असंवैधानिक और किसान विरोधी कहने का अधिकार नहीं है। वैसे भी कांग्रेस की सरकारें देश में लंबे काल तक रही हैं। यदि देश के किसानों की स्थिति आज दयनीय है तो उन्हें इस दयनीय अवस्था में पहुंचाने में कांग्रेस का बड़ा योगदान रहा है ।
हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि केवल पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश ,राजस्थान और हरियाणा में ही किसान नहीं हैं। किसान तो सारे देश में पाया जाता है सारे देश की 70 – 80 करोड़ से अधिक की आबादी खेती पर निर्भर रहती है। यह बात विचारणीय है कि इतनी बड़ी जनसंख्या में से कितने लोग हैं जो धरना प्रदर्शन पर बैठे हैं? माना कि सारे देश के किसान दिल्ली नहीं आ सकते ,लेकिन यदि उनमें असंतोष है तो वह अपने अपने क्षेत्रों में किसानों के लिए आंदोलन कर सकते थे । पर उन्होंने ऐसा नहीं किया तो इसका अभिप्राय यही है कि वह सरकार की नीयत, नीति ,सोच और कानून से सहमत हैं ।
हममें से बहुत से लोग यह जानते हैं कि जब महेंद्र सिंह टिकैत इसी प्रकार के एक आंदोलन का नेतृत्व दिल्ली में कर रहे थे तो उस समय राजेश पायलट जैसे सुलझे हुए नेता ने हस्तक्षेप कर बहुत शीघ्र ही महेंद्र सिंह टिकैत को मनाने में सफलता प्राप्त कर ली थी और स्थिति को संभाल लिया था । महेंद्र सिंह टिकैत की भी यह समझदारी ही थी कि उन्होंने भी देश के कानून को हाथ में लेना उचित नहीं माना था। उन्होंने भी सरकार के सही प्रस्ताव को सही समय पर स्वीकार कर अपनी समझदारी का ही परिचय दिया था । आज भी जब केंद्र सरकार की ओर से सही प्रस्ताव आ रहा है तो उसे किसान नेतृत्व को स्वीकार करना चाहिए और सरकार के साथ बैठकर कानूनों की एक एक धारा पर नहीं बल्कि एक -एक शब्द पर विचार करना चाहिए।
किसानों के मंच से यह आवाज आना कि हम सर्वोच्च न्यायालय की बात भी नहीं मानेंगे स्थिति को बहुत अधिक निराशाजनक बनाता है। ऐसी बातों को कहने वाले लोग देश में अराजकता का माहौल बनाना चाहते हैं और सरकार को किसानों पर आक्रामक रुख अपनाने के लिए बाध्य करना चाहते हैं । जिससे किसान और सरकार में टकराव हो और फिर यह लोग अपनी राजनीतिक रोटियां सेक सकें। इसलिए किसान नेतृत्व को भी राजनीतिक रोटियां सेकने वाले राजनीतिक दलों और देश विरोधी शक्तियो से अपने आप को पूर्णतया दूर कर लेना चाहिए। किसानों की देशभक्ति सदा असंदिग्ध रही है। इसलिए उनकी देशभक्ति को संदिग्ध बनाने वाले लोगों की पहचान इस समय की जानी बहुत आवश्यक हो गई है।
देश के किसानों के बारे में यह भी सत्य है कि वास्तव में यदि कोई धरतीपुत्र है तो वह किसान है। मां भारती से प्यार करने वाला कोई है तो वह किसान है। अतः देश की धरती का दर्द यदि कोई समझ सकता है तो वह किसान ही समझ सकता है। ऐसे में सरकार का यह फर्ज है कि वह भी धरतीपुत्र और धरती के हित में जितनी भी अधिक सहानुभूति दिखा सकती है वह दिखाएं और उन्हें उनके अनुकूल कानून बना कर दे। जिद किसी भी पक्ष से नहीं होनी चाहिए। पूर्ण सदाशयता और अपनेपन के भाव के साथ समस्या का समाधान खोजना ही राष्ट्रहित में है।

देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन : उगता भारत

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