मनुष्य को अपने लाभ के लिए ईश्वर की उपासना करनी चाहिए

images (59)

ओ३म्
==========
मनुष्य मननशील प्राणी है। वह अपनी रक्षा एवं हित के कार्यों में संलग्न रहता है। अपनी रक्षा के लिए वह अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देता है तथा सज्जन पुरुषों से मित्रता करता है जिससे असुरक्षा एवं विपरीत परिस्थितियों में वह उसके सहायक हो सकें। मनुष्य अपनी सुख सुविधाओं का भी ध्यान रखता है। इसके लिये वह अपने ज्ञान को बढ़ाता व उस ज्ञान से ऐसे कार्यों को करता है जिससे उसे उचित मात्रा में धन व सुख सुविधायें प्राप्त हो सकें। ऐसा करने से वह सुरक्षित एवं कुछ मात्रा में सुखी होता है। मनुष्य को अपने हित के लिए अनेक अन्य उपाय भी करने होते हैं जिनका ज्ञान हमें वैदिक साहित्य वा ऋषि दयानन्द के सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों के स्वाध्याय करने से होता है। इनमें से एक साधन ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना है। ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना से मनुष्य को विशेष लाभ प्राप्त होते हैं। सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में ऋषि दयानन्द ने ईश्वर की उपासना आदि कार्यों से प्राप्त होने वाले लाभों की चर्चा की है। यहां हम स्तुति, प्रार्थना व उपासना से होने वाले लाभों की चर्चा कर रहे हैं।

ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना में प्रवेश करने से पूर्व मनुष्य को ईश्वर के विषय में यथोचित ज्ञान होना चाहिये। ईश्वर क्या है व उसके ऐसे कौन से काम हैं जिनसे हमें लाभ होता है? वह किस प्रकार से ज्ञान प्राप्ति सहित हमारे सुखों की वृद्धि में सहायक हो सकता है। उपासना में प्रवेश से पूर्व हमें ईश्वर के विषय में संक्षिप्त ज्ञान अवश्य होना चाहिये। इसके लिए हमें सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ के सातवें समुल्लास में ऋषि दयानन्द ने पांच वेदमन्त्रों के अर्थ करके इस आवश्यकता की पूर्ति की है। हम ऋषि दयानन्द के दिये वेदार्थ को यहां प्रस्तुत कर रहे हैं। पाठक इस पर विचार करें तो इसे सर्वथा सत्य तथा मनुष्य के लिए आवश्यक पायेंगे। ऋषि वेदार्थ करते हुए लिखते हैं कि ईश्वर सब दिव्य गुण, कर्म, स्वभाव, विद्यायुक्त और उसमें पृथिवी, सूर्यादि लोक स्थित हैं और वह आकाश के समान व्यापक सब देवों का देव परमेश्वर है। उस को जो मनुष्य न जानते, न मानते और उस का ध्यान नहीं करते, वे नास्तिक मन्दमति सदा दुःखसागर में डूबे ही रहते हैं। इसलिये सर्वदा उसी को जानकर सब मनुष्य सुखी होते हैं। ऋषि यह भी बताते हैं कि वेदों में एक ही परमेश्वर का वर्णन है। वह कहते हैं कि चारों वेदों में ऐसा कहीं नहीं लिखा है जिससे अनेक ईश्वर होना सिद्ध होता हो।

मनुष्यों को ईश्वर व देवता शब्द का अन्तर पता नहीं है। इसका प्रकाश भी ऋषि दयानन्द जी ने किया है। वह बताते हैं कि देवता दिव्य गुणों से युक्त होने के कारण कहाते हैं जैसी की पृथिवी, परन्तु इस को वेदों में कहीं ईश्वर वा उपासनीय नहीं माना है। वह कहते हैं कि वेदमन्त्र में कहा है कि जिस में सब देवता स्थित हैं, वह जानने और उपासना करने योग्य ईश्वर है। जिस सच्चिदानन्दस्वरूप सत्ता में सब देवता स्थित है वह उन देवताओं से निश्चय ही भिन्न सत्ता है। ऋषि कहते हैं कि यह उन मनुष्यों की भूल है जो देवता शब्द से ईश्वर का ग्रहण करते हैं। परमेश्वर देवों का देव होने से महादेव इसीलिये कहाता है कि वही सब जगत् की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलयकर्ता, न्यायाधीश, अधिष्ठाता है। वेदों में वर्णित तेंतीस देवताओं का उल्लेख कर वह बताते हैं कि यह तेंतीस देव अर्थात् पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चन्द्रमा, सूर्य और नक्षत्र सब सृष्टि के निवास स्थान होने से आठ वसु कहलाते हैं। प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान, नाग, कूम्र्म, कृकल, देवदत्त, धनंजय और जीवात्मा ये ग्यारह रुद्र इसलिये कहलाते हैं कि जब शरीर को छोड़ते हैं तब रोदन कराने वाले होते हैं। संवत्सर के बारह महीने बारह आदित्य इसलिये हैं कि ये सब की आयु को लेते जाते हैं। बिजली का नाम इन्द्र इस हेतु से है कि परम ऐश्वर्य का हेतु है। यज्ञ को प्रजापति कहने का कारण यह है कि जिस से वायु, वृष्टि जल, ओषधी की शुद्धि, विद्वानों का सत्कार और नाना प्रकार की शिल्पविद्या से प्रजा का पालन होता है। ये तेंतीस गुणों के योग से देव या देवता कहाते हैं। इन का स्वामी और सब से बड़ा होने से परमात्मा चैंतीसवां उपास्यदेव शतपथ ब्राह्मण ग्रन्थ के चैदहवें काण्ड में स्पष्ट लिखा है। इसी प्रकार अन्यत्र भी उल्लेख मिलता है। जो मनुष्य इन सब शास्त्रों को देखते व पढ़ते तो वह वेदों में अनेक ईश्वर मानने रूप भ्रमजाल में गिरकर क्यों बहकते? इस प्रकार ऋषि दयानन्द ने ईश्वर व देवता में भेद व अन्तर को स्पष्ट कर दिया है और बताया है कि सच्चिदानन्दस्वरूप ईश्वर पूरे जगत में एक ही सत्ता है और33 देवता ईश्वर से सर्वथा भिन्न व इतर सत्तायें हैं।

ऋषि दयानन्द ने वेदमन्त्रों के आधार पर ईश्वर के स्वरूप व गुण-कर्म-स्वभाव पर भी प्रकाश डाला है। वह वेदार्थ करते हुए लिखते हैं कि हे मनुष्य! जो कुछ इस संसार में जगत् है उस सब में व्याप्त होकर जो नियन्ता है वह ईश्वर कहाता है। उस से डर कर तू अन्याय से किसी के धन की आकांशा मत कर। उस अन्याय के त्याग और न्यायाचरणरूप धर्म से अपने आत्मा से आनन्द को भोग। ऋग्वेद के मन्त्र10.48.1 में निहित उपदेश को प्रस्तुत कर वह बताते हैं कि ईश्वर सब को उपदेश करता है कि हे मनुष्यों! मैं ईश्वर सब के पूर्व विद्यमान सब जगत् का पति अर्थात् स्वामी हूं। मैं सनातन जगत्कारण और सब धनों का विजय करनेवाला और दाता हूं। मुझ ही को सब जीव जैसे पिता को सन्तान पुकारते हैं वैसे पुकारें। मैं सब को सुख देनेहारे जगत् के लिये नाना प्रकार के भोजनों का विभाग पालन के लिये करता हूं। ऋग्वेद के मन्त्र 10.48.5 को प्रस्तुत कर ऋषि कहते हैं कि परमेश्वर उपदेश करता है कि मैं परमैश्वर्यवान् सूर्य के सदृश सब जगत् का प्रकाशक हूं। कभी पराजय को प्राप्त नहीं होता ओर न कभी मृत्यु को प्राप्त होता हूं। मैं ही जगत् रूप धन का निर्माता हूं। सब जगत् की उत्पत्ति करने वाले मुझ ही को जानों। हे जीवो! ऐश्वर्य प्राप्ति के यत्रन करते हुए तुम लोग विज्ञानादि धन को मुझ से मांगों और तुम लोग मेरी मित्रता से अलग मत होओं। ऋग्वेद मन्त्र10.49.1 में उपदेश है कि हे मनुष्यों! मैं सत्यभाषणरूप स्तुति करनेवाले मनुष्य को सनातन ज्ञानादि धन को देता हूं। मैं ब्रह्म अर्थात् वेद का प्रकाश करनेहारा ओर मुझ को वह वेद यथावत् कहता, उस से सब के ज्ञान को मैं बढ़ाता, मैं सत्पुरुष का प्रेरक, यज्ञ करनेवालों को फलप्रदाता और इस विश्व में जो कुछ है उस सब कार्य का बनाने और धारण करने वाला हूं। इसलिये तुम लोग मुझ को छोड़ किसी दूसरे को मेरे स्थान में मत पूजो, मत मानो और मत जानो।

उपर्युक्त वेदोपदेश से ईश्वर के सत्यस्वरूप व गुण, कर्म व स्वभाव का आवश्यक बोध हो जाता है। ऋषि ने यह भी कहा है कि मनुष्यों को ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना तथा उपासना अवश्य करनी चाहिये। वह बताते हैं कि स्तुति करने से ईश्वर में प्रीति, उस के गुण, कर्म, स्वभाव से अपने गुण, कर्म, स्वभाव का सुधारना, प्रार्थना से निरभिमानता, उत्साह और सहाय का मिलना, उपासना से परब्रह्म से मेल(सगति व मित्रता आदि) और उसका साक्षात्कार होना लाभ होते हैं। ईश्वर की स्तुति में उसके यथार्थ गुणों आदि का स्मरण व कथन किया जाता है। वह परमात्मा सब में व्यापक, शीघ्रकारी और अनन्त बलवान् जो शुद्ध, सर्वज्ञ, सब का अन्तर्यामी, सर्वोपरि विराजमान, सनातन, स्वयंसिद्ध, परमेश्वर अपनी जीवरूप सनातन अनादि प्रजा को अपनी सनातन विद्या से यथावत् अर्थों का बोध वेद द्वारा कराता है। ईश्वर की स्तुति करने के लिए ऋषि दयानन्द की आर्याभिविनय पुस्तक का पाठ भी किया जा सकता है। स्तुति का क्या फल या लाभ होता है, इस पर प्रकाश डालते हुए ऋषि लिखते हैं कि जैसे परमेश्वर के गुण हैं वैसे गुण, कर्म, स्वभाव अपने भी करने चाहियें। जैसे वह परमेश्वर न्यायकारी है तो हम भी न्यायकारी होवें। और जो मनुष्य केवल भांड के समान परमेश्वर के गुण-कीर्तन करता जाता और अपने चरित्र को नहीं सुधारता उसका स्तुति करना व्यर्थ होता है।

ईश्वर की प्रार्थना पर भी ऋषि दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश के सातवें समुल्लास में विस्तार से प्रकाश डाला है। हम नमूने के रूप में ईश्वर से प्रार्थना के कुछ वाक्य प्रस्तुत कर रहे हैं। प्रार्थना इस प्रकार से करनी चाहिये। हे अग्ने! अर्थात् प्रकाशस्वरूप परमेश्वर आप की कृपा से जिस बुद्धि की उपासना विद्वान्, ज्ञानी और योगी लोग करते हैं उसी बुद्धि से युक्त हम को इसी वर्तमान समय में आप बुद्धिमान कीजिये। आप प्रकाशस्वरूप हैं, कृपा कर मुझ में भी प्रकाश स्थापित कजिये। आप अनन्त पराक्रम युक्त हैं इसलिये मुझ में भी कृपाकटाश से पूर्ण पराक्रम धरिये। आप अनन्त बलयुक्त हैं इसलिये मुझ में भी बल धारण कीजिये। आप अनन्त सामर्थ्ययुक्त हैं, मुझ को भी पूर्ण सामर्थ्य दीजिये। आप दुष्ट काम और दुष्टों पर क्रोधकारी हैं, मुझ को भी वैसा ही कीजिये। आप निन्दा, स्तुति और स्व-अपराधियों का सहन करने वाले हैं, कृपा करके मुझ को भी वैसा ही कीजिये। इस प्रकार से हमें प्रार्थना करनी होती है। प्रार्थना में हम परमात्मा से जो मांगते हैं वह हमें प्राप्त होता है, इसका हमें विश्वास रखना चाहिये। यह भी जानना चाहिये कि ईश्वर को हमारी सभी आवश्यकताओं तथा हितों का ध्यान है। अतः ईश्वर की भक्ति व स्तुति-प्रार्थना-उपासना करने पर वह हमारे हित में जो, जब व जितना उचित होगा हमें प्रदान करेंगे। हमें यह भी ज्ञात होना चाहिये कि हम जो अनुचित कर्म करेंगे उसका फल भी परमात्मा हमें अपने सर्वोत्तम व्यवस्थानुसार समय समय पर प्रदान करते रहेंगे, अतः दुःख आने पर हमें विचिलित नही होना है क्योंकि इसमें कहीं न कही हमारा ही दोषपूर्ण कर्म होता है। उस दोष निवारण के लिए ही हमें दुःख मिलता है। परमात्मा जो दुःख देते हैं वह सुधार के लिये देते हैं। जिस प्रकार माता अपनी सन्तानों पर हितकारी होती है, वह सन्तानों के हित के लिए उनके दोषों को दूर करने हेतु ताड़ना करती है, तो फिर परमात्मा की ताड़ना को भी हमें प्रसाद के रूप में ही ग्रहण करना चाहिये।

ईश्वर की उपासना पर भी ऋषि ने सत्यार्थप्रकाश में विस्तार से लिखा है। हम उपासना विषयक कुछ शब्द ही यहां प्रस्तुत कर रहे हैं। वह लिखते हैं कि जिस पुरुष के समाधियोग से अविद्यादि मल नष्ट हो गये हैं, आत्मस्थ होकर परमात्मा में चित्त जिस ने लगाया है उस को जो परमात्मा के योग का सुख होता है, वह वाणी से कहा नहीं जा सकता क्योंकि उस आनन्द को जीवात्मा अपने अन्तःकरण से ग्रहण करता है। उपासना शब्द का अर्थ समीपस्थ होना है। अष्टांग योग से परमात्मा के समीपस्थ होने और उस को सर्वव्यापी, सर्वान्तर्यामीरूप से प्रत्यक्ष करने के लिये जो-जो काम करना होता है वह-वह सब करना चाहिए। उपासना का फल यह होता है कि जब मनुष्य वेद व योग दर्शन के अनुसार उपासना करता है तब उस का आत्मा और अन्तःकरण पवित्र होकर सत्य से पूर्ण हो जाता है। नित्यप्रति ज्ञान विज्ञान बढ़ाकर मुक्ति तक पहुंच जाता है। जो आठ पहर में एक घड़ी भर भी इस प्रकार ध्यान करता है वह सदा उन्नति को प्राप्त हो जाता है। वहां सर्वज्ञादि गुणों के साथ परमेश्वर की उपासना करनी सगुण और द्वेष, रूप, रस, गन्ध, स्पर्शादि गुणों से पृथक् मान, अतिसूक्ष्म आत्मा के भीतर बाहर व्यापक परमेश्वर में दृढ़ स्थित हो जाना निर्गुणोपासना कहाती है। इस उपासना का फल यह होता है कि जैसे शीत से आतुर पुरुष का अग्नि के पास जाने से शीत निवृत्त हो जाता है वैसे परमेश्वर के समीप प्राप्त होने से सब दोष दुःख छूट कर परमेश्वपर के गुण, कर्म, स्वभाव के सदृश जीवात्मा के गुण, कर्म, स्वभाव पवित्र हो जाते हैं। इसलिये परमेश्वर की स्तुति, प्रार्थना ओर उपासना अवश्य करनी चाहिये। इस से इस उपासना का फल पृथक् होगा परन्तु आत्मा का बल इतना बढ़ेगा, कि पर्वत के समान दुःख प्राप्त होने पर भी न घबरायेगा और सब को सहन कर सकेगा। क्या यह छोटी बात है? और जो परमेश्वर की स्तुति, प्रार्थना ओर उपासना नही करता वह कृतघ्न और महामूर्ख भी होता है। क्योंकि जिस परमात्मा ने इस जगत् के सब पदार्थ जीवों को सुख के लिये दे रक्खे हैं, उस का गुण भूल जाना, ईश्वर ही को न मानना, कृतघ्नता और मूर्खता है।

ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना और उपासना करने से मनुष्यों को अनेकानेक एवं महनीय लाभ होते हैं। इस विषय को हमने यहां संक्षेप में प्रस्तुत किया है। पाठक मित्रों को इसके लिये सत्यार्थप्रकाश का सातवां समुल्लास एवं ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका सहित आर्याभिविनय एवं वेदभाष्य का अध्ययन करना चाहिये। इससे वह ईश्वर के सच्चे स्वरूप को जानने में समर्थ होंगे और अच्छे उपासक बन सकेंगे। इससे वह धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को भी प्राप्त हो सकेंगे। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

Comment:

hititbet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
Betgaranti Giriş
betgaranti girş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
meritking giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
hiltonbet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
hiltonbet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
bettilt giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
hiltonbet giriş
hiltonbet giriş
meritking giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
meritking giriş
meritking giriş
betorder giriş
betorder giriş
betorder giriş
betorder giriş
imajbet giriş
hiltonbet giriş
roketbet giriş
betnano giriş
betnano
betnano giriş
holiganbet giriş
betnano
betpark giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
betorder giriş
betorder giriş
bettilt giriş
vdcasino giriş
betpark
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
elexbet giriş
betgaranti giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
bets10 giriş
betnano giriş
betnano giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
betpark giriş
holiganbet giriş
roketbet giriş
roketbet giriş
roketbet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
galabet giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
vdcasino
vdcasino giriş
vaycasino giriş
noktabet giriş
betgaranti
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
noktabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
bettilt giriş
roketbet giriş
roketbet giriş
betnano giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
bettilt giriş
vaycasino
vdcasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt giriş
Safirbet giriş
Safirbet güncel adresi
betgaranti giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
bettilt giriş
bettilt
bettilt
vaycasino giriş
betnano giriş
Safirbet giriş
Safirbet güncel adresi
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
madridbet giriş
madridbet giriş
madridbet giriş
Safirbet giriş
madridbet giriş
norabahis giriş
madridbet giriş
maritbet giriş
maritbet giriş
betnano giriş
romabet giriş
romabet giriş
betnano giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
maritbet giriş
maritbet giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
mavibet giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
mavibet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
romabet giriş
romabet giriş