Manmmराकेश कुमार आर्य

नई दिल्ली। भारत में लोकसभा चुनावों का ‘महाभारत’ अपने चरमोत्कर्ष पर है। धृतराष्ट्र बने डा. मनमोहन सिंह अपने राजभवन में आराम फरमा रहे हैं। उनके पास वक्त तो खूब है, पर उनकी अपनी ‘वक्त’ समाप्त हो चुकी है। फुरसत में बैठे मनमोहन चुनावी समर की सूचना लेने का प्रयास कर रहे हैं। तब उन्हें आज का टी.वी. महाभारत के संजय की शैली में संवाद सुनाता है।

संजय कहता है कि-”महाराज! भारतीय राजनीति के लिए 16वीं लोकसभा के चुनाव विराट नरेश के सुपुत्र उत्तर कुमार के उस दृश्य को दोहरा रहे हैं, जिसमें उत्तर कुमार गो-हरण करके ले जा रहे दुर्याेधन के सैन्य दल का सामना करने तो चला गया था, परंतु जब उसने दुर्योधन के विशाल सैन्य दल को देखा तो उसका सामना न करके उल्टे पैरों भागने लगा था। उसका सारथी उस समय अर्जुन था, जब अर्जुन ने राजुकमार उत्तर का वापिस लौटने का आग्रह नही माना तो वह उतरकर रथ से भाग लिया। भागते हुए राजकुमार को सारथी अर्जुन ने रथ से उतरकर दौड़कर पकड़ा और रथ पर लाकर फिर बैठाकर युद्घ करने व पीठ न दिखाने का आग्रह राजकुमार उत्तर कुमार से करने लगा। ”

महाराज! अर्जुन को उस समय पता नही था-

छोटे दिल से कोई बड़ा नही होता,

टूटे दिल से कोई खड़ा नही होता।

जब यह दृश्य दुर्योधन की सेना ने देखा तो महाराज, हमारी सेना में उस समय उपहास के फव्वारे फूटने लगे थे।

यही स्थिति महाराज! इस समय हमारे दल कांग्रेस की हो रही है। राजकुमार राहुल गांधी उत्तर कुमार की तरह अनमने मन से युद्घ कर रहे हैं। उनके साथी उन्हें छोड़ छोड़कर भाग रहे हैं। हस्तिनापुर के निकट मयराष्ट्र में स्थित गौतमबुद्घ नगर नामक जनपद में हमारे प्रत्याशी रमेश चंद्र तोमर ने  तो गद्दारी की सारी सीमायें ही तोड़ दी हैं, और आराम से वह अर्जुन बने मोदी की गोदी में जाकर बैठ गये हैं। महाराज! हमारे कई मंत्री, अमात्य, महामात्य चुनाव लडऩे को तैयार नही हैं।

महाराज! आपकी ही तरह किसी भी मंत्री को हमारा कोई भी प्रत्याशी चुनावी सभाओं में नही बुला रहा है। हर-हर मोदी का नारा चाहे हटवा दिया गया है, पर अपना जादुई असर वह फिर भी दिखा गया है। हमारी सेना में चारों ओर निराशा और हताशा छायी हुई है। ऐसी निराशा और हताशा हमारे शिविर में अब से पहले कभी नही देखी गयी।

अब कहा जा  रहा है कि श्रीमती सोनिया गांधी चुनावों के बाद स्वैच्छिक अवकाश लेने जा रही हैं।  कुशल शिल्पकारों को राजाज्ञा जारी कर दी गयी है, कि वे आपके लिए आपके अवकाश उपरांत भवन निर्माण का कार्य संपन्न करें। क्योंकि हम निर्णायक युद्घ की ओर बढ़ रहे हैं और हमारी सेनायें निरंतर पराजित होती जा रही हैं। सचमुच हमारे शिविर में वैसी ही भगदड़ मच रही है जैसी किसी बिल्ली को देखकर चूहों में मच जाती है। सारा देश हमारे कमीशन खोर मंत्रियों की हास्यास्पद स्थिति देखकर खूब मजे ले रहा है। कौरवदल के रूप में उतरी कांग्रेस निरंतर घिसटती जा रही है और जैसे-तैसे अपनी प्रतिष्ठा कुछ सीटों पर बचाये रखने के लिए अपनी अंतिम लड़ाई लड़ रही है।

महाराज! अभी दिल्ली सहित देश के पांच प्रांतों में हुए चुनावों में दिल्ली में भाजपा के अश्वमेध घोड़े को रोकने का काम हमारी सहायता से ‘आप’ ने किया था। परंतु उसे सत्ता का ऐसा मद चढ़ा कि वह सत्ता संचालन का सूत्र ही भूल गयी और जनता को ही अराजकता का पहाड़ा पढ़ाने लगी। उसके अधिराज महामहिम केजरीवाल ने शीघ्रता दिखाते हुए अपने पद से त्याग पत्र दे दिया। तब अधिराज को लगता था कि वह अर्जुन के रथ को रोककर महायुद्घ में हमें सहायता पहुंचा सकेगा। कूटनीति के अर्थों को समझकर तब हमने भी अधिराज की पीठ थपथपाने का कार्य किया था। परंतु अब ‘आप’ की स्थिति भी अच्छी नही रही है। एक गुप्तचर की सूचना के अनुसार अधिराज को दिल्ली में भी अब कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है और उनका सैन्य दल एक दो सीटों से आगे बढ़ता नही दीख रहा है। उसके नेताओं ने ‘जूतों में दाल’ बांटने का परिणाम क्या होता है, ये भली भांति समझ लिया है। बड़बोले अधिराज केजरीवाल और उनके वेदव्यास बने कुमार विस्वास की हवा धीरे धीरे निकलती जा रही है और दिल्ली अधिराज के हाथों से छूटती जा रही है। अधिराज की यह स्थिति हमारे लिए भी भयावह साबित हो सकती है। दिल्ली के युवा वर्ग में इस पार्टी के प्रति रोष बढ़ रहा है और यह रोष ”अर्जुन” के प्रति लोगों के विश्वास में दिनानुदिन वृद्घि ही करता जा रहा है। घटती लोकप्रियता को देखकर दिल्ली के पूर्व अधिराज के होश उड़ गये हैं, और वह सिमटते जनाधार को देखकर महाराज लगभग मूच्र्छित हो गये हैं।

महाराज! भाजपा के मोदी दिन पर दिन हम पर कस-कसकर वार कर रहे हैं। उन्होंने हमारे पक्ष को ही नही अपितु सारे पक्षों को रक्षात्मक मुद्रा में ला दिया है, और पहली बार है कि जब विपक्ष के कई दल और सत्ता पक्ष भी मिलकर एक विपक्षी महारथी को कैसे भी चक्रव्यूह में फंसाने के असफल  प्रयास कर रहे हैं। पर यह महारथी महाराज, अभिमन्यु नही लगता। सचमुच यह महारथी अर्जुन ही है जिसे हमारे पक्ष ने अभिमन्यु समझ लिया है। यह महारथी चक्रव्यूह में घुसना ही नही बल्कि निकला भी जानता है।

कांग्रेस और ‘आप’ की तरह ही अन्य गैर भाजपाई दलों की स्थिति है। मायावती और ममता बनर्जी अपने बड़बोले पन के लिए जानी जाती रही हैं।  लेकिन चुनाव बाद के परिदृश्य को अपने अनुकूल न देखकर उनकी जबान की कमान बड़ी सधी सधाई चल रही है। जो कि बहुत ही आश्चर्य पैदा कर रही है। चीन के शल्य के उत्तराधिकारी साम्यवादी दलों की ओर भी यदि दृष्टि डाली जाय तो इनका ”विदेशी बाजा” भी जहां बज रहा है वहां उपस्थित लोगों का मनोरंजन भी नही कर पा रहा है। महाराज! इनकी वीणा के तार टूट रहे हैं और  लोग ढीली वीणा से निकले सुरों को सुनने को तैयार नही हैं। उन्हें देशी वीणा लेकर चल रहा अर्जुन इस समय अच्छा लगा रहा है।

महाराज! कश्यप भूमि (कश्मीर) की स्थिति भी हमारे अनुकूल नही है। यहां के शासक परंपरा से हमारे अनुकूल रहे हैं, पर इतिहास यह भी बताता है कि समय आने पर वह पाला भी बदलते रहे हैं। ‘अर्जुन’ के अश्वमेध के घोड़े को रोकने में वह असमर्थता दिखा रहे हैं और स्पष्ट संकेत वहां से मिल रहे हैं कि समय आने पर ये फिर पाला बदल सकते हैं। जबकि पंजाब की गुरूभूमि,  जिससे महाराज आपका भी संबंध है,  इस समय भगवे रंग में रंग चुकी है। जिससे हमारे शिविर में वहां निराशा छायी हुई है। कुरूक्षेत्र और उससे लगते संपूर्ण क्षेत्र में ‘अर्जुन’ की जय-जयकार के स्वर गूंज रहे हैं।

महाराज! पूर्वोत्तर में हमारी ‘विदेशी विधवा महारानी’ ने कुछ अपने विचार के लोगों को बसाने का और बढ़ाने का काम किया है और दक्षिण भारत ने भी कुछ आशा की किरण पैदा की है, परंतु मध्य भारत, पश्चिम और उत्तर भारत में ‘अर्जुन’ का घोड़ा निरंतर दौड़ रहा है, जिससे हमारी सत्ता में लौटने की संभावनाएं क्षीण होती जा रही हैं।

संजय के द्वारा युद्घ के मैदान का ऐसा वर्णन सुनकर महाराज धृतराष्ट्र को जोर का झटका लगा। पड़ोस के कक्ष से राजवैद्य दौड़कर उनके कक्ष में आया, और उन्हें गहन मूच्र्छा अवस्था में उठाकर चिकित्सा कक्ष में ले गया। खबर लिखे जाने तक ‘महाराज धृतराष्ट्र’ चिकित्साधीन थे। उनके राजवैद्य ने बताया कि महाराज की स्थिति ‘तनावूपर्ण लेकिन नियंत्रण’ में है।

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