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भारत में चल रही है पुनरुत्थानवाद की हवा

 

हम आज ऐसी बातों पर लड़ रहे हेैं जो लड़ाई के मुद्दे हो ही नहीं सकते। वैचारिक लचीलेपन का दावा करने के बावजूद हम हर पचास सौ सालों में पैदा होने वाले पंथों के बीच ऐसी अभेद्य दीवारें खड़ी कर रहे हैें कि हजारों मील दूर विकसित धर्मों और पंथों के साथ संवाद करना आसान है लेकिन आपस में करना कठिन होता जा रहा है। आज बौद्धिक स्तर पर हम अपने ही इतिहास से इतने डरे हुए हेैं कि पुराणों में ऐतिहासिक तथ्य खोजने की कुछ लोगों की सामान्य सी कोशिश से भी हमारे कथित बौद्धिक लोग भयभीत होने लगते हेैं। उन्हें डर लगता कि कहीं उस इतिहास को कोई गम्भीर चुनौती न दे डाले जो हमारे आक्रांताओं ने हमारे बारे में लिखा है। विश्व की प्राचीनतम सभ्यता का दम भरने के बावजूद हम नहीं जानते कि हमारी उस सभ्यता में क्या प्रासंगिक है और कितना अप्रासंगिक हो चुका है। विश्व में विज्ञान और टेैक्नोलॉजी के साम्राज्य में हम अपने जीवन को दिन प्रतिदिन जटिल बना रहे हैं। ऐसा लगने लगा है कि जैसे हमारे सांस्कृतिक आचरण और धार्मिक कर्मकांडों का विज्ञान और तर्क से सीधा टकराव हो। हमें यह समझ में नहीं आता कि हम उस सभ्यता और सांस्कृतिक विरासत का क्या करें जो लगातार हमारे जीवन से छूट रही है। उससे चिपके रहें या उसे पूरी तरह त्याग दें? हजार साल की विदेशी दासता और सैंकड़ों विदेशी आक्रमणों के बावजूद हमारी संस्कृति बची रही। सभ्यताएं बराबर आक्रमणों से लुप्त नहीं होतीं, लेकिन समकालीन ज्ञानविज्ञान से पिछड़ कर विलुप्त हो सकती हैं।

प्राय: कहा जाता है कि हमें भी एक रैनेसाँ यानी सांस्कृतिक पुनर्जागरण की आवश्यकता है। यूरोप में चौदहवीं सदी तक अंधकार युग ही था। अगली दो सदियों में इस अंधेरे से निकलनें की तड़प पैदा होने लगी थी। प्रकाश की किरण यूरोप को प्राचीन ग्रीस और रोम से मिली। प्राचीन ग्रीक और रोमन साहित्य के साथ साथ उन्होंने ने भारत जैसे पूर्वी देशों की प्राचीन कला और विज्ञान के अरबी अनुवाद भी खंगाल डाले। इस प्राचीन खजाने से प्राप्त जानकारियां उन्हें चमत्कृत करने वाली थीं। लेकिन जानकारियां ही पर्याप्त नहीं थीं, इस के लिए एक संास्कृतिक पहचान की भी आवश्यकता थी। इसलिए यूरोप ने अपने आप को ग्रीको-रोमन सभ्यता से जोड़ दिया, उसे अपना लिया या अपने आप को उसी सभ्यता की उपज मान लिया। आज जिसे हम पश्चिमी सभ्यता कहते हैें उस के मूल में वही यूनानी और रोमन सभ्यता ही है। ज्ञान चक्षु खुल गए तो यह भी समझ में आ गया कि ईसा से कई सौ साल पहले के ज्ञान को ईसा के पंद्रह सौ साल बाद कैसे लागू किया जा सकता है। अनुसंधान ओैर विज्ञान ने उन्हें नए आविष्कारों और नई मंजिलों की ओर अग्रसर कर दिया। औद्यौगिक क्रांति ओैर नई टेक्नोलाजी का नया दौर आरम्भ हो गया। क्या हमारे देश में ऐसी स्थितियां हैं कि रैनेसाँ हो ? एक आकांक्षा है कि कुछ नया और असाधारण हो, एक इच्छा है कि अपने अतीत को हम पुन:स्पष्ट कर सकें। हमारी पहचान का संकट ऐसा गहरा नहीं है जैसा पश्चिम के सामने था और जैसा हमारे बारे में मीडिया के आलेखों ओैर संवादों से लगता हेै। मूलत: हमे मालूम है हम कौन हेैं,अक्सर कह नहीं पाते लेकिन महसूस अवश्य करते हेैं। किसी आपात स्थिति में उस पहचान की अभिव्यक्ति भी हो जाती है। हमारी जातीय पहचान कुछ कुछ हनुमान जैसी हो गई है जिन्हें समय आने पर याद ही नहीं आता था कि उस में कितनी क्षमता है, वे क्या कर सकते हैें। उन्हें याद दिलाना पड़ता था कि वे असल में कौन हैं। हम कहते तो हैें कि हम महान सभ्यता के धनी हंै लेकिन वह धन समय और ऐतिहासिक परिस्थितियों की धूल में दबा पड़ा हेेै। हम उसे टुकड़ों में देख पाते हेैं , समग्र रूप में नहीं। इन टुकड़ों के बीच भी हम कोई सार्थक तारतम्य नही बैठा पाते और अलग अलग दिशाओं में भागते रहते हेैं। पश्चिम को अपनी पहचान बनाने के लिए दो हजार साल पुरानें युग में जाना पड़ा था ताकि वह अपनी विरासत की घोषणा करे। हमें केवल क्रमबद्ध तरीके से धूल झाडऩे की कोशिश करनी होगी।

जब भारत के पुनर्जागरण की बात छिड़ जाती है तो अनेक प्रश्न भी खड़े हो जाते हैें। सब से पहले यही पूछा जाता हेै कि पुनर्जागरण किसी क्रांति की तरह अचानक आकर पूरे देश और यहां की जनता को बदल देगा ? यह विराट बदलाव केवल उन प्राचीन नियमों, सिद्धांतों के आधार पर ही कैसे संभव है जिन में से आज बहुत सारे प्रासंगिक ही नहीं रहे हों ? जिन भौतिक उपलब्धियों की हम बातें करते हेैं वे समय की दौड़ में पीछे रह गईं हेैं, कुछ अधूरी रह गईं हेैें तो कुछ क्षेत्रों में टेक्नोलाजी एकदम उलट दिशा में चली गईं है। हमारा चिकित्सा विज्ञान आयुर्वेद, वास्तुशास्त्र, ज्योर्तिशास्त्र,राजनीति अर्थशास्त्र जैसे ज्ञान भण्डारों के स्वाभाविक विकास में कम से कम हजार साल का व्यवधान पड़ गया है। तो फिर हम आज इन ज्ञान विधाओं के आधार पर आधुनिक देश का निर्माण करने की कैसे आशा कर सकते हैें जिन का विकास गम्भीर रूप से बाधित रहा है? फिर यह भी पूछा जाता है कि क्या हम एक टापू की तरह अपनी ही सीमाओं में बंधे रहें, क्या विश्व के और देशों, ज्ञानियों के अनुभवों और उनकी उपलब्धियों का हमारे विकास में पूरी तरह बहिष्कार ही होना चाहिए? क्योंकि हम पुनर्जागरण की बात प्राय: पश्चिमी रैनेसाँ के संदर्भ में करते हैें तो हमें उस परिवर्तन के दौर को समझने की कोशिश करनी चाहिए। हालांकि फ्र ेंच शब्द का अर्थ पुनर्जागरण नही पुनर्जन्म है, लेकिन यह पुनर्जन्म साल दो साल में नहीं हुआ, दो चार दशकों में भी नहीं। चौदहवीं सदी में अगर इस का आरम्भ मान लिया जाए तो सोलहवीं सदी तक भी यह प्रक्रिया चलती ही रही । कुछ लोग तो मानते हैें कि इस का आरम्भ तो और पहले हुआ था। इसलिए उनके अनुसार बारहवीं शताब्दी का रैनेसाँ भी था। स्वयं रैनेसाँ शब्द सत्रहवीं सदी के बाद ही प्रचलित हुआ। व्यापार के कारण लोग अपने देशों से बाहर दूर दूर तक जाने लगे थे औेर नई जानकारियां प्राप्त करते रहे, नईं धारणाओं से परिचित हुए । मसलन तेरहवीं सदी में एक यूरोपीय व्यापारी लियोनार्डों पिसान ने अरब देशों में व्यापार करते हुए गणित के कुछ ऐसे नियम सीख लिए जिन के कारण वह जोड़ घटा ही नहीं लाभ हानि के भी नियम सीख गया। उसे यह भी पता चला कि यह ज्ञान अरबों ने हिंदुओं से सीखा था । हिंदसा यानी गणना के अंक तो पहले ही भारत से अरब गए थे । इसीलिए उन्हें आज भी अरबी में हिंदसा ही कहते हेैं । यह ज्ञान वह यूरोप ले गया । अरब साहित्य के माध्यम से पूर्व के प्राचीन ज्ञान को पाने की जिज्ञासा ऐसी ही कुछ घटनाओं से हो गई हो । इसी बीच ग्रीक साहित्य का अध्ययन आरम्भ हो गया था । राजनीति, समाजशास्त्र, भौेतिक विज्ञान और व्यक्ति की स्वतंत्रता की धारणएं फैलने लगीं और लोगों का दिमाग खुलने लगा जो साहित्य सृजन के रूप में सामने आया। शैक्सपीयर का युग इसी का परिणाम था। रैनेसाँ कोई रूसी क्रांति या फ्रेंच क्रंाति नहीं जो आंधी की तरह आए और सब कुछ पुराना उड़ा कर ले जाएं। दरअसल ये क्रांतियां भी एक लम्बे कशमकश का ही नतीजा होती हेैं । संस्कृतियां या सभ्यताएं इस मायने मे देशज होती हैं क्यों उन का विकास कुछ भौगोलिक सीमाओं के अंदर ही होता हेै। लेकिन वे कभी टापू बन कर नहीं रह सकतीं हैं, कालांतर में अपनी मूल परिधि से बाहर भी जातीं हेैं, पांव पसारती हेैं। कभी कभी बहुत दूर दूर तक भी अपना प्रभाव डालतीं हैं। साथ ही अपने आसपास की अन्य संस्कृतियों के सम्पर्क में आने पर कुछ आदान प्रदान भी होता ही रहता हेै। यूरोपीय रैनेसाँ केवल यूरोपीय स्रोतों पर आधारित नहीं था । अरबी साहित्य के माध्यम से नई जागृति को रूप देने में अरब से लेकर भारत, चीन जैसी कई सभ्यताओं का भी हाथ रहा है।
(साभार)

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