महापुरूष संसार में, परमपिता के फूल
गतांक से आगे….
आप प्रसन्न हैं तो संसार का धन वैभव ऐश्वर्य तो स्वत: ही मेरे पीछे पीछे दौड़ा आएगा और यदि आप किसी बात पर नाराज हो गये तो सब कुछ मिल हुआ भी छिन जाएगा। जैसे कोई पिता अपने पुत्र के आचरण से प्रसन्न होता है तो वह सहज भाव से अपना सब कुछ अपने पुत्र को दे देता है और यदि पिता पुत्र के आचरण से रूष्टï हो जाए तो अपना नाम तक छीन लेता है और समाचार पत्रों में यह सूचना प्रसारित करा देता है कि अमुक व्यक्ति से मेरा कोई लेना देना अथवा संबंध नही है। इसलिए प्रभु मैं तो आपसे यही प्रार्थना करता हूं कि मुझे सामथ्र्य के साथ-साथ ऐसी सोच देना कि मेरा मन सदैव आपके चरणों में रमे, मैं कभी भी इनसे विमुख न होऊं, अपितु आपके अभिमुख रहूं। आपके अभिमुख रहना अमृत है और विमुख होना तो मृत्यु है। आपकी प्रसन्नता का प्रसाद मेरे लिए सबसे बड़ी दौलत है, वरदान है। अत: हर हाल में मैं आपको प्रसन्न रख सकंू, मुझे ऐसी सोच और सामथ्र्य देना।
महापुरूष संसार में,
परमपिता के फूल।
सांई के हस्ताक्षर,
ज्ञानी करै ना भूल ।। 612 ।।
भाव यह है कि महापुरूष संसार में चाहे किसी कोने अथवा देश में पैदा हों, जाति, धर्म, संप्रदाय में उत्पन्न हों, वे तो परम पिता परमात्मा की उत्कृष्टïतम कृति हैं, इतना ही नही अपितु सुंदर, सुकोमल, सुरभित पुष्प हैं। जैसे गुलशन की शोभा में सुंदर पुष्प चार चांद लगाते हैं ठीक इसी प्रकार महापुरूष जहां भी उत्पन्न होते हैं, वहीं प्रभु की रचायी इस सृष्टिï की शोभा बढा़ते हैं। अपने दिव्य गुणों और आध्यात्मिक तेज पुंज से मानवता का प्रकाश और इस धरती का गौरव कहलाते हैं। सच पूछो तो महापुरूष प्रकृति की दिव्य दौलत हैं, अनमोल उपहार हैं, उस परमपिता परमात्मा के दिव्य हस्ताक्षर होते हैं। इन्हें ज्ञानी पुरूष पहचानने में कभी भूल नही करते, जबकि मूर्ख व्यक्ति इनकी सर्वदा अवहेलना और उपेक्षा करते हैं। जैसे भगवान कृष्ण को महाभारत में पितामह भीष्म ने पहचान लिया था , जबकि कंस और दुर्योधन ने उनकी उपेक्षा और अपमान करके भयंकर भूल की थी।
आंखू बनकै ढुलकता,
हर अहंकार का अंत।
धरती पर रहता नही,
पूरे वर्ष बसंत।। 613 ।।

हर शौहरत का अंत तो,
गुमनानी में होय।
सूरज दमकै अंत तक,
ऐसा बिरला कोय ।। 614 ।।

प्राय: देखा जाता है कि संसार में ऐसे लोग भी हैं जिनका जब कोई पूर्व जन्म का पुण्य उदय होता है तो वे उत्कर्ष पर पहुंचते हैं किंतु जैसे ही प्रारब्ध का प्रभाव घटता है तो वे हमेशा के लिए गुमनामी के अंधेरे में चले जाते हैं, कोई पूछता तक नही है। यदि आप परमपिता परमात्मा की सृष्टि में सूर्य पर दृष्टि डालें तो सूर्य में एक अदभुत विशिष्टता है कि वह प्रकाश और ऊर्जा तो देता ही है किंतु ध्यान से देखो, पूर्व दिशा में जब प्रात:काल पौ फटती है तो सूर्य अपनी तेजस्विता के साथ और अरूणाई के साथ लाली के साथ उदित होता है। क्रमश:

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