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प्रमुख समाचार/संपादकीय

आज का चिंतन-07/05/2014

नौकरों के भरोसे

बिगड़ेगी ही संतत

– डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

 

जो काम हमारे खुद के लिए निर्धारित हैं उन्हें हमेंं ही करना चाहिए, औरों के भरोसे कभी नहीं छोड़ना चाहिए। यह बात जितनी कहने में सरल और सटीक है उतनी अनुकरण करने में कठिन है। हममें से अधिकांश लोग ऎसे हैं जो अपने जिम्मे के कामों में भी दूसरों की सहायता लेने को हमेशा तत्पर रहते हैं और मेहनत से जी चुराते हैं।

इनमें हमारे वे काम भी शामिल हैं जिन्हें नितान्त वैयक्तिक माना गया है। बाहरी कामों में तो हम हमेशा इसी तलाश में लगे रहते हैं कि कोई न कोई मिल जाए और हमारे काम कर ले ताकि हम हमेशा मुक्त रहें। हममें से खूब सारे लोग ऎसे हैं जो खुद सारे काम करने में सक्षम हैं लेकिन हमारी इच्छा नहीं होती कि अपने काम भी करें।

हम हर काम के लिए दूसरों को तलाशते हैं। किसी पर निशाना साधने  और बंदूक रखने के लिए औरों के कंधे तलाशते हैं, और दूसरे कामों के लिए भी किसी न किसी की तलाश हमें हमेशा बनी रहती है। हम लोग खुद कुछ करना नहीं चाहते, हर मामले में हमारी मानसिकता ऎसी ही हो गई है कि हमें कुछ न करना पड़े, बैठे-बैठे खाये रहें, सोयें रहें और टीवी-कम्प्यूटर चलाते रहें।

हम दूसरों से यह अपेक्षा तो हर क्षण करते हैं कि हम  वे चुपचाप न बैठे रहें बल्कि हर पल कुछ न कुछ काम करते रहें, मगर खुद द्रष्टा होकर देखते रहते हैं। कई लोग तो द्रष्टा भाव से भी दो कदम आगे चलकर मूल्यांकनवादी हो जाते हैं।

जो इंसान खुद का कर्तव्य कर्म छोड़कर दूसरों का मूल्यांकन करने लग जाता है तब यह समझ लेना चाहिए कि वो इंसान बहुत कुछ हो गया है। ऎसा इंसान कुतर्की, बार-बार टोकने वाला, विश्लेषणकर्ता, मनचाहे निष्कर्ष तलाशने वाला और रह-रहकर उपदेश देने वाला हो जाता है।

ऎसे इंसान घर-परिवार, दफ्तर से लेकर हर स्थान और क्षेत्र के लोगों के लिए माथाखाऊ व बोझा हो जाते हैं और समझदार लोग इन्हें सरदर्द मानकर उपेक्षित कर देने के तमाम यत्नों में लगे रहते हैं। हमारी स्थिति यह हो गई है किहम  शरीर को तनिक हिलाना-डुलाना भी नहीं चाहते और यही कारण है कि हम इंसानी जिस्म की बजाय भारी-भरकम बोरियों के स्वरूप में इतने बेड़ौल हो चुके हैं कि कुछ कहा नहीं जा सकता।

अब हम चाहे कितने ब्यूटी, स्पॉ और मसाज पॉर्लरों का रास्ता नापें, बड़े सवेरे और शाम को कितनी ही दौड़ लगाएं, चाहे जितनी दवाइयां खाते रहें और योग के नाम पर चाहे जो कुछ करते रहें, कोई असर नहीं दिख पा रहा है सिवाय समय गुजरने के।

हम जैसे भी हों, समय निकलता जा रहा है लेकिन हमारी इस कमजोरी का खामियाजा हमारी संतति को भुगतना पड़ रहा है जो हमारा ही अनुकरण करते हुए उन कामों से भी दूर भाग रही है जो उन्हें स्वयं को करने चाहिए।

इसका सीधा प्रभाव उनके मानसिक स्वास्थ्य और शारीरिक संरचनाओं पर अच्छी तरह देखा जा सकता है। कई परिवार तो ऎसे हैं जिनमें माँ सिर्फ जच्चा की भूमिका में ही होती है, उसके बाद सारा काम नौकर-चाकरों के भरोसे होता है और यही कारण है कि हम बच्चों से अपने प्रति आदर-सम्मान और श्रद्धा की अपेक्षा करते हैं और हमें मिलता है अनादर।

कारण यह कि हमारे स्पर्श, दुलार और प्यार की जो ऊर्जा संतति को मिलनी चाहिए, उनसे वे सदैव दूर ही रहते हैं। कई बार हम रुपए-पैसों, समृद्ध होने व दिखाने के शौक तथा कई बार मौज-शौक के लिए संतति की ओर ध्यान नहीं देकर उन्हें नौकरों के भरोसे छोड़ दिया करते हैं।

यह तय मानकर चलना चाहिए कि जो लोग बच्चों को पैदा करते हैं उनसे ज्यादा संस्कार उन लोगों के होते हैं जो बच्चों को पालते हैं।  यही कारण है कि हमारी संतति अपनी पढ़ाई और नौकरी की तरफ भागती है और ऎसे में माँ-बाप तथा परिजनों व समाज के प्रति आदर और प्रेम भाव के सारे नाते-रिश्ते जाने कहाँ पीछे छूट जाया करते हैं।

कड़वा सच यही है कि हम सारे लोग प्रोफेशनल हो गए हैं, अपने बारे में भी, और बच्चों के बारे में भी। आत्मीयता का स्थान व्यवसाय ने ले लिया है और इस वजह से हम अपने आपको तथा बच्चों को भी संस्कारों, इंसानियत और आदर्शों की बजाय जमीन-जायदाद और प्रतिष्ठा से जोड़ते हैं।

जो लोग अपनी संतति का सुनहरा भविष्य चाहें, उन्हें चाहिए कि भौतिकता का पागलपन कुछ हद तक छोड़ें और अपनी संतति की ओर ध्यान दें वरना संपत्ति तो खूब जमा हो जाएगी मगर बुढ़ापे में न कोई सहारा देने वाला मिलेगा, और न ठीक ढंग से पिण्डदान हो पाएगा, फिर बरसों तक यहीं जमे रहना होगा कुण्डली मारकर।

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