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इतिहास के पन्नों से

भारत हितैषी भारत रत्न सीमांत गांधी

24 दिसम्बर/जन्म-दिवस

 

आज जैसा कटा-फटा भारत हमें दिखाई देता है, किसी समय वह ऐसा नहीं था। तब हिमालय के नीचे का सारा भाग भारत ही कहलाता था; पर मुस्लिम आक्रमण और धर्मान्तरण के कारण इनमें से पूर्व और पश्चिम के अनेक भाग भारत से कट गये। अफगानिस्तान से लगे ऐसे ही एक भाग पख्तूनिस्तान के उतमानजई गाँव में 24 दिसम्बर, 1880 को अब्दुल गफ्फार खाँ का जन्म हुआ। उन दिनों इसे भारत का नार्थ वेस्ट या फ्रण्टियर क्षेत्र कहा जाता था।

इस क्षेत्र के लोग स्वभाव से विद्रोही एवं लड़ाकू थे। अंग्रेज शासकों ने इन्हें बर्बर और अपराधी कहकर यहाँ ‘फ्रंटियर क्राइम्स रेगुलेशन ऐक्ट’ लगा दिया और इसके अन्तर्गत यहाँ के निवासियों का दमन किया। अब्दुल गफ्फार खाँ का मत था कि शिक्षा के अभाव में यह क्षेत्र पिछड़ा है और लोग मजबूरी में अपराधी बन रहे हैं। इसलिए 17 वर्ष की अवस्था में इन्होंने मौलवी अब्दुल अजीज के साथ मिलकर अपने गाँव में एक विद्यालय स्थापित किया, जहाँ उनकी मातृभाषा में ही शिक्षा दी जाती थी।

थोड़े समय में ही इनके विद्यालय की ख्याति हो गयी। इससे प्रेरित होकर और लोगों ने भी ऐसे ही मदरसे खोले। 1921 में इन्होंने अंजुमन इस्लाह अल् अफशाना आजाद हाईस्कूल की स्थापना की। इस प्रकार इनकी छवि शिक्षा के माध्यम से समाज सेवा करने वाले व्यक्ति की बन गयी। हाईस्कूल करने के बाद ये अलीगढ़ आ गये, जहाँ इनकी भेंट अनेक स्वतन्त्रता सेनानियों से हुई। वहाँ ये गांधी जी के विचारों से अत्यधिक प्रभावित हुए।

पेशावर की खिलाफत समिति के अध्यक्ष पद पर रहकर इन्होंने सीमा प्रान्त में शिक्षा का पर्याप्त विस्तार किया। इसके बाद ये सेना में भर्ती हो गये। एक बार ये अपने एक सैनिक मित्र के साथ अंग्रेज अधिकारी से मिलने गये। वहाँ एक छोटी सी भूल पर इनके मित्र को उस अधिकारी ने बहुत डाँटा। अब्दुल गफ्फार खां के मन को इससे भारी चोट लगी और इन्होंने सेना छोड़ दी। अब इन्होंने एक संस्था ‘खुदाई खिदमतगार’ तथा उसके अन्तर्गत ‘लाल कुर्ती वालंटियर फोर्स’ बनाई। इसके सदस्य लाल रंग के कुर्ते पहनते थे।

खान अब्दुल गफ्फार खाँ ने सदा अहिंसात्मक तरीके से अंग्रेजों का विरोध किया। प्रतिबन्ध के बावजूद ये जनसभाओं का नेतृत्व करते रहे। इस कारण इन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। एक बार जब इन्हें पकड़कर न्यायालय में प्रस्तुत किया गया, तो न्यायाधीश ने व्यंग्य से पूछा – क्या तुम पठानों के बादशाह हो ? तब से ये ‘बादशाह खान’ के नाम से प्रसिद्ध हो गये। गांधीवादी रीति के समर्थक होने के कारण इन्हें ‘सीमान्त गांधी’ भी कहा जाता है।

इन्होंने 1942 में ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ में उत्साहपूर्वक भाग लिया और जेल गये। देश विभाजन की चर्चा होने पर इन्हें बहुत कष्ट होता था। पाकिस्तान कैसा मजहबी, असहिष्णु और अलोकतान्त्रिक देश होगा, इसकी इन्हें कल्पना थी। इसलिए ये बार-बार कांग्रेस के नेताओं और अंग्रेजों से प्रार्थना करते थे उन्हें भूखे पाकिस्तानी भेड़ियों के सामने न फेंके। उनके क्षेत्र को या तो भारत में रखें या फिर स्वतन्त्र देश बना दें; पर यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी। 15 अगस्त, 1947 को पख्तूनिस्तान पाकिस्तान का अंग बन गया।

बादशाह खान भारत में भी अत्यधिक लोकप्रिय थे। शासन ने 1987 में उन्हें ‘भारत रत्न’ देकर सम्मानित किया। 20 जनवरी, 1988 को 98 वर्ष की आयु में भारत के इस घनिष्ठ मित्र का देहान्त हुआ।
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24 दिसम्बर/जन्म-दिवस

कर्तव्यनिष्ठ व सेवाभावी श्रीकृष्णचंद्र भारद्वाज

संघ के प्रचारक का अपने घर से मोह प्रायः छूट जाता है; पर 24 दिसम्बर, 1920 को पंजाब में जन्मे श्रीकृष्णचंद्र भारद्वाज के एक बड़े भाई नेत्रहीन थे। जब वे वृद्धावस्था में बिल्कुल अशक्त हो गये, तो श्रीकृष्णचंद्र जी ने अंतिम समय तक एक पुत्र की तरह लगन से उनकी सेवा की। इस प्रकार उन्होंने संघ और परिवार दोनों के कर्तव्य का समुचित निर्वहन किया।

श्री कृष्णचंद्र जी अपनी शिक्षा पूर्ण कर 1942 में प्रचारक बने। प्रारम्भ में उन्होंने पंजाब, दिल्ली और फिर उत्तर प्रदेश के उन्नाव में संघ कार्य किया। 1963 में उ.प्र. और बिहार के प्रचारकों की एक बैठक काशी में हुई थी। वहां से जिन कई प्रचारकों को बिहार भेजा गया, उनमें श्रीकृष्णचंद्र जी भी थे। बिहार में भोजपुर और फिर भागलपुर में वे जिला प्रचारक रहे। आपातकाल में भूमिगत रहकर वे जन-जागरण एवं सत्याग्रह के संचालन में लगे रहे। पुलिस और कांग्रेसी मुखबिरों के भरपूर प्रयास के बाद भी वे पकड़ में नहीं आये।

1977 में आपातकाल समाप्त होने पर जब ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ के कार्य का पूरे देश में विस्तार किया गया, तो उन्हें बिहार में इसका संगठन मंत्री बनाया गया। उनके लिए यह काम बिल्कुल अपरिचित और नया था; पर उन्होंने इस दायित्व पर रहते हुए वर्तमान झारखंड तथा बिहार के अन्य वनवासी क्षेत्रों में सघन संपर्क कर संगठन की सुदृढ़ नींव रखी।

कुछ वर्ष बाद उन्हें बिहार क्षेत्र का बौद्धिक प्रमुख बनाया गया। व्यवस्थित काम के प्रेमी होने के कारण बौद्धिक पुस्तिका तथा अन्य बौद्धिक पत्रक ठीक से छपकर निर्धारित समय से पूर्व सब शाखाओं तक पहुंच जाएं, इसकी ओर उनका विशेष ध्यान रहता था। सेवाभावी होने के कारण बीमार प्रचारक तथा अन्य कार्यकर्ताओं की देखभाल में वे बहुत रुचि लेते थे। समय से दवा देने से लेकर कपड़े और कमरे को धोने तक में वे कभी संकोच नहीं करते थे।

नित्य शाखा को श्रद्धा का विषय मानकर वे इसके प्रति अत्यधिक आग्रही रहते थे। निर्णय करने के बाद उसे निभाना उनके स्वभाव में था। नब्बे के दशक में जब श्रीराम मंदिर आंदोलन ने गति पकड़ी, तो उन्हें बिहार में विश्व हिन्दू परिषद का संगठन मंत्री बनाया गया। इस दौरान हुए सब कार्यक्रमों में बिहार की भरपूर सहभागिता में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा।

हिन्दी भाषा से उन्हें बहुत प्रेम था। यदि कोई उनसे बात करते समय अनावश्यक रूप से अंग्रेजी का शब्द बोलता, तो वे उसे तुरन्त सुधार कर उसका हिन्दी अनुवाद बोल देते थे। इससे सामने वाला व्यक्ति समझ जाता था और फिर सदा हिन्दी बोलने का ही निश्चय कर लेता था।

श्रीकृष्णचंद्र जी पाइल्स के मरीज थे। अतः वे मिर्च और मसाले वाले भोजन से परहेज करते थे; पर प्रवास में सब तरह के परिवारों में भोजन के लिए जाना पड़ता है। अतः कई बार मिर्च वाला भोजन सामने आ जाता था। ऐसे में वे दूसरी बार बनवाने की बजाय उसी सब्जी को अच्छी तरह धोकर खा लेते थे। उनके कारण किसी को कष्ट हो, यह उन्हें अच्छा नहीं लगता था।

जालंधर में रहने वाले उनके बड़े भाई भी अविवाहित थे। एक दुर्घटना में वे काफी घायल हो गये। ऐसे में श्रीकृष्णचंद्र जी उनकी सेवा के लिए वहीं आ गये। उनके देहांत के बाद वे कई वर्ष लुधियाना कार्यालय पर रहे। जब वृद्धावस्था के कारण उनका अपना स्वास्थ्य खराब रहने लगा, तो वे जालंधर कार्यालय पर ही रहने लगे। वहां पर ही 16 फरवरी, 2012 को उनका देहांत हुआ।

(संदर्भ : पांचजन्य 26.2.2012/वीरेन्द्र जी एवं ओमप्रकाश जी)
………………………इस प्रकार के भाव पूण्य संदेश के लेखक एवं भेजने वाले महावीर सिघंल मो 9897230196

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