Categories
महत्वपूर्ण लेख

टूटना शाख से एक सुर्ख गुलाब का

जब सत्ताधीशों के अपनी गलत नीतियों के कारण मस्तिष्क सठिया जाते हैं और जब देश किन्हीं भी कारणों से सामाजिक, आर्थिक राजनीतिक और धार्मिक आदि मोर्चों पर मार्गदर्शन की मांग करने लग जाता है, तब एक राष्ट्रसाधक लेखक अपनी लेखनी से नवसृजन की नींव रखता है और भटके हुए राजनीतिज्ञों को सही राह दिखाकर अपनी तपस्या और साधना से देश में नये संस्कारों की फसल उगाता है। हर देश का इतिहास इसी परम सत्य की साक्षी देता है। भारत का इतिहास भी इसका अपवाद नही है। यहां भी लेखनी के अनेकों दिव्य दिवाकरों ने समय-समय पर अपना प्रकाश उत्कीर्ण कर देश को नई राह दिखायी है।

ऐसे दिव्य दिवाकरों की परंपरा के राष्ट्रवादी चिंतनधारा के यशस्वी लेखक शिवकुमार गोयल अब हमारे बीच नही रहे हैं। रह गयी हैं उनकी स्मृतियां, जो अब अमर होकर मूल्यवान मोतियों के रूप में मां भारती के गले की माला में अपना स्थान पा गयी हैं। निश्चय ही मां भारती अपने सपूत की स्मृतियों को अपने गले में इस प्रकार पड़ा देखकर धन्य हो उठी है।

श्री शिवकुमार गोयल जी का जन्म पिलखुवा में संत साहित्य के प्रख्यात लेखक भक्त रामशरण दास के घर 31 अक्टूबर 1938 को हुआ था। घर में पिताश्री के चरणों में बैठकर बालक शिवकुमार को राष्ट्रवाद के संस्कार घुट्टी में मिलने लगे। पिता ने अपने पुत्रों में ज्येष्ठ पुत्र रहे शिवकुमार गोयल को मानो अपने विशाल वैचारिक साम्राज्य का उत्तराधिकारी बनाने का संकल्प ले लिया। क्योंकि पिता भक्त रामशरण दास स्वयं भी एक उच्चकोटि के लेखक और राष्ट्रवादी विचारक थे। संस्कृति के मर्मज्ञ और धर्म के प्रति अतीव जिज्ञासु भाव से भरे हुए पिता भक्त रामशरण दास ने अपने पुत्र के मानस को विशाल बनाने के लिए उसके विचारों को पैनापन देना आरंभ कर दिया।

फलस्वरूप जब शिवकुमार गोयल केवल 17 वर्ष के हुए तो उनके भीतर पिता के दिये गये विचारों ने एक प्रतिभा का रूप लेना आरंभ कर दिया और वह प्रतिभा उन्हें भीतर से ‘कुछ नया’ करने के लिए प्रबलता से प्रेरित करने लगी। अत: 1955 में उनकी पहली रचना प्रकाशित हुई इसके पश्चात उन्हेंाने पीछे मुड़कर नही देखा। उनके लेख और रचनाएं निरंतर कल्याण, धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादम्बिनी, साहित्य अमृत, नवनीत, राष्ट्रधर्म, नंदन, पांचजन्य, सन्मार्ग, नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान, जनसत्ता, गाण्डीव, पंजाब केसरी, अमर उजाला, दैनिक जागरण, प्रभात, प्रलयंकर, उगता भारत (साप्ताहिक) सत्यचक्र आदि प्रमुख समाचार पत्र, पत्रिकाओं में छपने लगीं।

श्री शिवकुमार गोयल जी के लेखन में राष्ट्र के ज्वलंत मुद्दों पर जहां सटीक टिप्पणी या उनसे निपटने के लिए देश को सही मार्गदर्शन मिलता रहा, वहीं वह अक्सर देश के महापुरूषों की जयंतियों, पुण्यतिथियों या बलिदान दिवसों पर लिखकर भी देश के युवा वर्ग में अपने बलिदानी महापुरूषों के प्रति श्रद्घा भाव उत्पन्न करने का सराहनीय प्रयास करते रहे। जिससे बहुत से युवा साहित्यकारों को प्रेरणा मिली और श्री गोयल जी ऐसे अनेकों युवा साहित्यकारों के लिए प्रेरणा पुंज हो गये।

सन 1967 में हिन्दुस्तान समाचार (संवाद समिति) के सम्पादकीय विभाग में वह नियुक्त हुए। अनेकों वर्षों तक आपने संसद की कार्यवाही की रिपोर्टिंग की। आकाशवाणी तथा दूरदर्शन से संसद समीक्षा, सामयिकी तथा साक्षात्कार प्रकाशित होते रहे। आपने हिंदुस्तान वार्षिकी (संदर्भ ग्रंथ) तथा युगवार्ता (फीचर सर्विस) का वर्षों तक संपादन किया। 1962 में चीन ने जब देश पर आक्रमण किया तो उस समय राष्ट्ररक्षा के लिए बलिदान हुए शहीदों पर कुछ लिखने के लिए आपका लेखक हृदय मचल उठा। अत: 1964 में ‘हिमालय के प्रहरी’ पुस्तक प्रकाशित कराई। जिसकी भूमिका सुप्रसिद्घ राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने लिखी। इसके पश्चात आपने 1971 के भारत पाक युद्घ की रिपोर्टिंग भी की। दैनिक अमर उजाला में सन 1999 से ‘धर्म क्षेत्रे’ तथा ‘अंर्तयात्रा’ नामक स्तंभ से नियमित लेखन करते रहे।

आपने 1959 में श्री काशी विश्वनाथ मंदिर मुक्ति आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया। जिस कारण आपको छह माह का कारावास भी भोगना पड़ा। 1984 में राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह जी के साथ मॉरीशस की यात्रा भी की। आपने अपने गौरवमयी यशस्वी जीवन में 60 से अधिक पुस्तकों का सृजन किया। यह सचमुच बहुत बड़े पुरूषार्थ और उद्यम का फल था, जो सहजता से किसी को प्राप्त नही हो सकता। आपकी पुस्तकों में ‘हिमालय के प्रहरी, धर्मक्षेत्रे, हमारे वीर जवान, प्रेरणा की गंगोत्री, माटी है बलिदान की, शहीदों की गाथायें, जवानों की गाथाएं, क्रांतिकारी आंदोलन, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, क्रांतिकारी वीर सावरकर, हनुमान प्रसाद पोद्दार, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, स्वामी विवेकानंद, अटल बिहारी वाजपेयी (जीवनी) कारगिल के वीर, आजादी के द्वीप, न्याय की कहानियां, 201 प्रेरक नीति कथायें, शाह आयोग के आमने-सामने आदि सम्मिलित हैं।

उत्कृष्ट लेखन कार्य के लिए आपको अनेकों पुरस्कार भी मिले। जिनमें प्रमुख हैं :-

-सन 2000 में बड़ा बाजार लाइब्रेरी (कलकत्ता) का भाई हनुमान प्रसाद पोद्दार राष्ट्रसेवा सम्मान राज्यपाल आचार्य विष्णुकांत शास्त्री तथा श्री सुंदर सिंह भंडारी के कर कमलों द्वारा प्रदत्त।

-सन 2001 में कुशल संपादन के लिए प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा ‘स्वर्ण पदक’ से अलंकृत किया गया।

-सन 2002 में राष्ट्रपति डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने केन्द्रीय हिंदी संस्थान के गणेश शंकर विद्यार्थी पत्रकारिता सम्मान से अलंकृत किया।

-प्रसिद्घ क्रांतिकारी दुर्गा भाभी द्वारा मातृश्री पुरस्कार से अलंकृत।

-उपराष्ट्रपति बी.डी. जत्ती द्वारा ‘हिमालय के प्रहरी’ के लिए सम्मानित।

-सन 2006 में अग्रोहा विकास ट्रस्ट का सेठ द्वारका प्रसाद सर्राफ पुरस्कार हरियाणा के मुख्यमंत्री श्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने प्रदान किया।

-सन 1987 में श्यामसुंदर चौधरी साहित्य पुरस्कार गाजियाबाद।

-सन 1987 में ला. जगतनारायण सम्मान से अलंकृत।

-सन 2004 में इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती दिल्ली द्वारा साहित्य भारती सम्मान से अलंकृत।

-सन 2009 में साहित्य मंडल नाथ द्वारा सम्मानित।

-वीर सावरकर पुस्तक शकुंतला सिरोठिया बालसाहित्य पुरस्कार।

-सन 1981 में आराधकश्री पुरस्कार से अलंकृत।

-सन 2008 में वृंदावन में स्वामी मेघश्याम स्मृति सम्मान।

-बाल साहित्य मर्मज्ञ डा. राष्ट्रबंधु जी द्वारा सम्मानित।

-सन 1986 में साहित्यप्रेमी मंडल   शाहदरा द्वारा मालवीय पुरस्कार।

-सन 2000 में आचार्य क्षेमचंद सुमन स्मृति सम्मान से अलंकृत।

-विश्वंभरसहाय प्रेमी स्मृति सम्मान से मेरठ में अलंकृत।

-सन 2011 में भानुप्रताप शुक्ल स्मृति राष्ट्रधर्म सम्मान से अलंकृत।

अब आप पिछले कुछ समय से अस्वस्थ अनुभव कर रहे थे। परंतु इसके उपरांत भी लेखक जब भी आपसे मिला तभी एक नई ऊर्जा और नई प्रेरणा लेकर लौटा। आपका सान्निध्य और प्रोत्साहन निरंतर ‘उगता भारत’ को मिलता रहा। राष्ट्रवादी चिंतन धारा को और भी अधिक बलवती करने के लिए आप सदा लेखक को प्रेरित करते रहे। ‘उगता भारत’ के लिए आप जिस प्रेरणास्पद शैली में पत्र लिखते थे वह अब उसके लिए प्रेरणास्रोत बनकर काम करते रहेंगे।

29 अप्रैल 2013 को आपने-अपने भौतिक जीवन व्यापार का मेला समेटा और मां भारती के अध्यात्म संसार में विलीन होकर स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ गये। मैं नही कह सकता कि ये आपकी मृत्यु थी क्योंकि ऐसी मृत्यु बड़े सौभाग्य से मिलती है। आप मां भारती के आंगन की बगीची के सुर्ख गुलाब थे। और यह सौभाग्य हर किसी को नही मिलता कि वह बगीची का सुर्ख गुलाब बन जाए। आप कहीं सूक्ष्म में समाहित हो गये हैं पर हम संसार वालों को सुर्ख गुलाब का बगीची में अब न रहना साल रहा है। सालेगा भी क्यों नही? जिस गुलाब से सालों तक हमें नई लाली मिलती रही-वह अचानक गायब हो जाए और हम अपने दुख की अभिव्यक्ति में दो शब्द भी न कहें, या दो आंसू भी न बहायें यह कृतघ्नता भला कैसे हो सकती है? इसलिए यह आलेख आप जैसी गुलाब की सुर्खी के अचानक विलुप्त हो जाने से उपजे दुख की अभिव्यक्ति है।

आपके लिए यही एक सुंदर श्रद्घांजलि भी है। संपूर्ण ‘उगता भारत’ परिवार आपको श्रद्घानत होकर अपनी भावांजलि अर्पित करता है। भाई धर्मेन्द्र गोयल जी से अपेक्षा है कि वह आपकी विरासत को आगे बढ़ाएंगे।

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
holiganbet güncel giriş
holiganbet güncel
holiganbet giriş
bettilt giriş
betpark giriş
klasbahis giriş
klasbahis giriş
holiganbet güncel
imajbet güncel
holiganbet güncel giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betyap güncel
betpark giriş
betpark giriş
betyap giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
vaycasino giriş
bettilt giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
casinolevant giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpuan giriş
betpuan giriş
matbet giriş
matbet giriş
betpuan giriş
betpuan giriş
matbet giriş
matbet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
holiganbet giriş