रानी नायकी देवी जिससे थर्राया था मोहम्मद गौरी

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मनीषा सिंह

भारत माता की कोख से एक से बढ़कर एक महान वीर ही नहीं बल्कि कई वीरांगनाओं ने भी जन्म लिया है जिन्होंने भारत माता की रक्षा के लिए अपने सर्वस्व सुखों का त्याग कर अपनी मातृभूमि कि पूरे मनोयोग के साथ रक्षा की। ऐसी महान वीरांगनाओं की श्रेणी में नाम आता है। रानी नायिकी देवी सोलंकी, यह एक ऐसी वीरांगना थी जिससे मोहम्मद गोरी थर्राता था और इस वीरांगना ने युद्ध में गोरी को रणभूमि छोड़ भागने को मजबूर कर दिया था।


आधुनिक इतिहासकारों द्वारा भारत की इस वीरांगना का उल्लेख कभी नहीं किया गया जबकि महिला सशक्तिकरण अभियान के प्रतीक के रूप में रानी नायिकी देवी सोलंकी जैसी वीरांगनाओं का नाम प्रथम अध्याय में होना चाहिए था। रानी नायिकी देवी गोवा के महाराजा शिवचित्ता परमर्दि की पुत्री थी। रानी में बाल्यकाल से ही विलक्षण प्रतिभा और असाधारण व्यक्तित्व की छाप दिखाई देती थी। रानी नायिकी देवी युद्धकला में निपुण होने के साथ साथ एक कुशल कूटनीतिज्ञ भी थी।
नायिकी देवी का विवाह गुजरात प्रदेश के शासक चालुक्य वंशीय राजपूत महाराजा कुमारपाल सोलंकी के सुपुत्र अजयपाल सोलंकी से हुआ था। गुजरात प्रदेश पर चालुक्य वंश का शासन था तब के समय में अन्हिलवाड़ा प्राचीन गुजरात की महिमामयी राजधानी थी, इस जगह को राजधानी बनाने का कारण यह था कि अन्हिलवाड़ा संपूर्ण गुजरात की क्षेत्र को स्पर्श किये हुए था।
महाराजा अजयपाल का शासनकाल केवल चार वर्ष 1171 से 1175 ईसवी तक का था। महाराजा की असमय मृत्य के बाद शत्रु राष्ट्र एवं धर्म पर गिद्ध की तरह नजर गड़ाए बैठे थे, तुर्की आक्रमणकारी जिस समय के लिए घात लगाए बैठे थे, वो समय उनके हाथ लग गया गुजरात उस समय धन धान्य से सम्पन्न था एवं वहाँ की जनता भी धन धान्य वैभव से परिपूर्ण थी।
महारानी नायिकी देवी एवं महाराजा अजयपाल के दो पुत्र थे। ज्येष्ठ पुत्र का नाम था मूलराज द्वितीय एवं छोटे पुत्र का नाम था भीमदेव द्वितीय। गुजरात के सिंहासन पर महाराजा के ज्येष्ठ पुत्र मूलराज द्वितीय को बैठाया गया, जिन्हें इतिहास में बाल मूलराज के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि उनका राज्याभिषेक बाल्यकाल में ही हुआ था। उनकी माता महारानी नायिकी देवी रूप में साक्षात माता पार्वती और बुद्धिमत्ता में माँ सरस्वती के समान थी। उनकी राजनैतिक कुशलता से प्रभावित होकर दरबारी राजाओं, सामंतों ने परामर्श दिया कि राज्य उनके हाथों में अधिक सुरक्षित रहेगा क्योंकि वे राज्य पर शासन करने की पूर्ण योग्यता रखती है। मूलराज अबोध बालक था, इस कारण रानी माता से अनुरोध किया गया कि सिंहासन ग्रहण कर राज्य की कार्यभार अपने हाथों में लें। इस पर महारानी नायिकी देवी ने विचार व्यक्त करते हुए कहा राजवंश के नियमों के अनुसार यह असंभव है। राजवंश के उत्तराधिकारी के जीवित रहते हुए कोई और सिंहासन पर आसीन नहीं हो सकता है अंतत: महारानी नायिकी देवी ने निर्णय लिया कि वो राज्य की प्रतिनिधि बनकर महाराजा बाल मूलराज द्वितीय का मार्गदर्शन करेंगी एवं राज्य की अगुवायी भी करेंगी, इस तरह महारानी नायिकी देवी राजमाता नायिकी देवी की भूमिका का पालन करने लगीं।
महाराजा मूलराज द्वितीय को सिंहासनारोहण किये हुए कुछ वर्ष बीते ही थे कि अचानक राज्य में घोर विपत्ति का अंधेरा छा गया। राजमाता नायिकी देवी के गुप्तचरों ने गुप्त सूचना पत्र भेजकर बताया कि किस तरह गिद्ध नरमांस भोजन के लिए तैयार बैठा है और कभी भी गिद्धों का झुंड राज्य में प्रवेश कर सकता है। गिद्ध का अर्थ होता है तुर्की आक्रमणकारी और नरमांस भोजन अर्थात् राज्य की प्रजा को मौत के घाट उतारकर उनका सर्वस्व लूटकर ले जाना। राजमाता नायिकी देवी के कुशल गुप्तचरों के समूह का नाम था शार्ङग।
आर्यावर्त ने ऐसे कई आक्रमण झेले है पर भारतीय वीरों की तलवारों ने उनसभी आक्रमणकारियों का पांव उखाड़ फेंका हैं। प्रथम खलीफा के शासन के बाद अरबी लूटेरों ने आर्यावर्त पर अनेक आक्रमण किये पर कामयाब नहीं हो पाये। आर्यावर्त के अलावा संपूर्ण विश्व पर मलेच्छ आक्रमणकारी अरबी लूटेरों का कब्जा हो चुका था एवं 620 ईसवी से नवीन मजहब का जन्म के साथ मूर्तिपूजकों पर बहुत कू्रर अत्याचार हो रहा था। आर्यवर्त के अलावा जितने भी मूर्तिपूजक राष्ट्र थे, उन सबका अस्तित्व मिटा दिया गया।
तुर्की लुटेरे मुहम्मद गोरी ने सन 1178 ईसवी में अपने समुद्र जितनी विशाल सैन्यबल के साथ लाहौर पर धावा बोला। आर्यावर्त में वो अपना सल्तनत कायम करने के उद्देश्य से आगे बढ़ा मुलतान के मार्ग से होते हुए गोमाल दर्रा का मार्ग प्रशस्त किया। मुलतान एवं उच्च से होते हुए तेज गति से उत्तर पूर्व की और कूच किया जहां राजपूत शासकों का शासन था। इस मार्ग से होते हुए उसने अन्हिलवाड़ा की ओर कूच किया।
सन 1178 ईसवी में आबू पर्वत के समक्ष उपस्थित घाट गदारराघट्टा पर मुहम्मद गोरी ने अपना सैन्य शिविर बनाया। यह घाट गुजरात की राजधानी अन्हिलवाड़ा से 40 मील की दूरी पर था। युद्ध से पूर्व गोरी ने अपने दूत के हाथों संदेश भिजवाया कि श्रानी और उसके बच्चे को मुझे सौंप कर तुम सभी अपनी अपनी महिलाओं, कन्याओं एवं अपनी धन दौलत सब मुझे दे दो तो मैं तुम सब पर रहम कर जान बक्श दूंगा।
गोरी यह सोच कर भूल कर बैठा था कि उसका मुकाबला एक स्त्री से है। वह इस बात से अनभिज्ञ था कि राजमाता नायिकी देवी उस देश की महारानी है जहाँ महिषासुरमर्दिनी दुर्गा, चंड व मुंड नामक राक्षसों की संहारकारिणी माँ काली जैसे अश्शूर संहारकारिणी भी अवतरित होती है उस देश की हर साधारण नारी के अंदर एक दुर्गा, काली रूपी स्वरूप भी होती है जो राष्ट्रधर्म पर विप्पत्ति आने पर समय समय पर अवतार लेती है।
राजमाता के सेनापति के हाथों गोरी का दूत पत्र सौंपकर उत्तर की प्रतीक्षा में महल के प्रवेश द्वार पर प्रतीक्षा करने लगा। राजमाता नायिकी देवी ने अपने सेनापति कुँवर रामवीर के हाथों पत्र का उत्तर लिख कर भेजा कि ‘जाओ जाकर गोरी से कह दो उनकी शर्ते मान ली हैं हमने।’
राजमाता ने अत्यंत कुशलतापूर्वक एवं बुद्धिमत्ता के साथ निर्णय लिया। गोरी जैसे कू्रर आक्रमणकारी के साथ छल से रण करना ही उचित होगा। राजमाता ने आर्यावर्त की अस्मिता अर्थात आर्यवर्त की माताओं एवं नाबालिग कन्याओं पर कोई आंच ना आये, इसलिए यह छल किया। गोरी की शर्तों को मान कर उसे भ्रम में रहने दिया। गोरी के पास जब यह खबर पहुँची कि उसकी शर्तें मान ली गई है, तो उसने इस खबर को सच मान लिया कि राजमाता ने बिना युद्ध किये हथियार डाल दिया और उसने इस आसान जीत की जश्न मनाने की तैयारियां शुरू कर दी। इसी प्रतीक्षा में थी राजमाता नायिकी देवी। उन्होंने अपने सेनापति को आदेश दिया कि राज्य के गुप्त द्वार से माताओं एवं कन्याओं को लेकर राज्य के प्रजागण पड़ोसी राज्य नाडोल में जाकर शरण ले। नाडोल के चौहान वंशीय महाराजा कल्हणदेव चौहान ने गुजरात से आये शरणार्थियों को शरण दी।
प्रजा को सुरक्षित स्थल पर पहुँचाने के बाद राजमाता नायिकी देवी ने अपने दोनों पुत्रों को पीठ पर बांध लिया और घोड़े पर सवार होकर गोरी की शिविर की और चल दी। मेरुतुंग द्वारा लिखी गयी प्रबन्ध चिंतामणि एवं अन्य इतिहासकारों ने भी इस बात की पुष्टि किया है। राजमाता नायिकी देवी की योजना अनुसार यह रणनीति बनाई गई थी कि राजमाता के निकलने से पूर्व ही गोरी के सैन्य शिविर में 200 राजपूत योद्धा भेष बदलकर उपस्थित रहेंगे। वे गोरी के सैनिकों में छिपकर रहेंगे और कुछ हजार राजपूत योद्धा आबू पर्वतों की घाटियों का सहारा लेकर अन्हिलवाड़ा के सीमा को घेरकर रखेंगे। राजमाता नायिकी देवी का इस अप्रतिम रणनीति ने उन्हें आर्यावर्त की सबसे कुशल योद्धा बनाया।
राजमाता गोरी को भ्रम में रखना चाहती थी, इसलिए उन्होंने अपने 25,000 सैनिकों को कई टुकडिय़ों में बांट दिया। कुछ गोरी के सैन्यबल में मिल गए, कुछ आबू पर्वत की घाटियों को घेर कर छिप गए और कुछ ने कायादरा की सीमा को घेर लिया। राजमाता घोड़े पर सवार होकर गोरी की सैन्य शिविर की ओर चल पड़ीं। उनसे पचास योजन की दूरी पर उनके पीछे उनके बाकी बचे सैन्यबल को लेकर सेनापति कुँवर रामवीर थे।
गोरी अपने शिविर से बाहर निकल कर चालुक्य ‘सोलंकी’ राजपूतों के सैन्य शिविर की ओर देखने लगा। उसने देखा कि कुछ घुड़सवार उसके सैन्य शिविर की और आ रहे हैं। और नजदीक आने पर उसने देखा कि एक खुबसूरत महिला अपने बच्चे को अपने साथ बांधकर उसकी ओर आ रही है। गोरी इस भूल में था कि राजमाता की पराजय हो चुकी है। वह मन ही मन हंस ही रहा था कि अचानक से रानी नायिकी देवी के घोड़े रुक गए। इससे पहले की वह कुछ समझ पाता, उसके शिविर में मौजूद राजमाता के गुप्त सैनिकों ने हर हर महादेव का शंखनाद करते हुए आक्रमण कर दिया और हाहाकार मचा दिया। इस बीच राजमाता नायिकी देवी के पीछे गज सेना, अश्वसेना एवं पैदल सैनिकों के सैलाब ने पर्वत और पथ को घेर लिया था। गोरी के पास कुछ सोचने एवं समझने का समय नहीं रहा। उसने आनन फानन में अपनी भागती सेना को एकत्र किया और आक्रमण की तैयारी की।
राजमाता नायिकी देवी के दोनों हाथों के तलवार थी साक्षात दुर्गा बन अवतरित हुईं। राजमाता नायिकी देवी एक के बाद एक आक्रमणकारियों को गाजर मूली की तरह काट रही थी मानो जैसे आज आर्यवर्त की पावनधरा को आक्रमणकारियों के रक्त से अभिषेक हो रहा हो। अंत मे राजमाता गोरी की सैनिकों के चक्रव्यूह को भेद कर गोरी तक पहुँच गयी।
गोरी उनकी एक झलक पाकर भयभीत होकर भागने लगा। अंत में राजमाता ने उसे घेर लिया। इस बार गोरी भाग नही पाया। राजमाता की तलवार की वार से गोरी मूर्छित हो गया, उसका अंग भंग हो गया था। इससे पहले की गोरी राजमाता के हाथों से मृत्यु को प्राप्त होता, गोरी की सेना वहाँ आ पहुँची और उन्होंने गोरी को वहाँ से घायल अवस्था में बचाकर निकाल लिया गया।
गोरी इतना डर गया था कि उसके घाव से खून बहने के बाद भी वह घोड़े से नहीं उतरा था और सीधा मुल्तान पहुंच कर घोड़े से उतरा। गोरी ने अपने सैनिको को हुकुम दिया था कि घोड़ा किसी हाल पे नहीं रुकना चाहिए चाहे उसे नींद आ जाये या कितनी भी इलाज की जरूरत पड़ जाए पर घोड़ा मुल्तान गंतव्य पहुँच के ही रुकना चाहिए। अगर घोड़ा कही रुक जाए थक कर तो उसे दूसरे घोड़े पे बैठा कर ले जाने का हुकुम दे रखा था। जब गोरी मुल्तान पहुंचा तो वह पूरी तरह से खून से लथपथ था। उसे पता चला कि रानी नायिकी देवी के तलवार के वार से वह अपना गुप्तांग खो चूका था और हमेशा के लिए नपुंसक बन गया था।
इसके बाद 13 वर्षों तक गोरी की भारत पर आक्रमण करने की हिम्मत नहीं हुई। दिल्ली नरेश सम्राट केल्हानदेव चौहान ने भी गोरी के साथ युद्ध में उस समय रानी नायिकी देवी की सहायता की थी। कर्नल टॉड एवं डॉक्टर दशरथ शर्मा की पुस्तकों से यह साक्ष्य मिलता है कि दिल्ली नरेश सम्राट केल्हानदेव चौहान ने एकछत्र शासन स्थापित करके पाँच राज्यों के राजाओं (नाहरवाल के महाराजा राये जो कि मात्र 14 वर्ष के थे, जालोर के महाराजा कीर्तिपाल चौहान एवं अर्बुदा के शासक परमार राजा धरवर्षा परमार) के साथ रानी नायिकी देवी की सहायता के लिए अपने अपने सैन्यबल के साथ रणभूमि में उपस्थित हुए थे।
रानी नायिकी देवी के रूप में काल का साक्षात दर्शन प्राप्त करने के बाद मानसिक रूप से एवं रानी नायिकी देवी की तलवार के वार से शारीरिक रूप से नपुंसक बनने के बाद गोरी की कामेच्छा हमेशा के लिए समाप्त हो गयी। गोरी जब तक जीवित रहा, वह उस राजपूतानी के तलवार की धार को कभी नहीं भुला पाया। लड़ाई के लिए अब वह असमर्थ हो चुका था। उसे अब अपने दासो पर निर्भर होना पड़ा। उसका वंश भी आगे नहीं बढ़ सका, उसने अपनी सारी सम्पत्ति एवं राज्य उसके द्वारा बनाये गये यौन गुलामो में बाँट दिया।

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