भारत की आर्थिक समृद्धि का स्वरूप , भाग – 3

 

*राज्य की भूमिका*
राज्य की भूमिका का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। सौभाग्य से उससे सम्बन्धित कुछ साहित्य प्रकाश में आ चुका है। विकास के सन्दर्भ मेें, बारम्बार यह दुहराया जाता है कि यूरोपीय राष्ट्र-राज्य शक्तिशाली आर्थिक हस्ती बनकर उभरे तो इसका श्रेय जाता है यूरोपीय राजाओं और रानियों के योगदान को और व्यापार के प्रति उनकी आवेगमूलक सक्रियता को। इसके विपरीत, भारतीय या एशियाई शासकों को उदासीन बताया जाता है। कहा जाता है कि एशियाई राज्यकर्ता लोग स्थानीय सैनिक अभियानों में ही मुख्य ध्यान लगाये रहते थे या फिर विकृत ऐय्याशियों में डूबे रहते थे। ‘गौरव की तलाश, ‘बड़े पैमाने पर अहं की संतुष्टि और जोखिम भरे कामों का शौकÓ, ‘अर्थव्यवस्था के प्रति लापरवाहीÓ आदि-इत्यादि शब्दों का उन राजाओं-रानियों के लिए प्रयोग ध्यान देने योग्य है। परन्तु यदि हम इन बहुप्रचारित धारणाओं के जाल में न फँसकर उन दिनों के भारतीय एवं एशियाई आर्थिक जीवन तथा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के स्वरूप से जुड़े तथ्यों पर ध्यान दें तथा उसके सन्दर्भ में राज्य की तत्कालीन भूमिका को समझें और विवेकपूर्ण विश्लेषण करें तो इसमें बौद्धिक स्तर पर लाभ होगा।
*राज्य बल ने संभव बनाया भारत का शान्तिपूर्ण व्यापार*
पहली बात यह स्मरणीय है कि भारत का समुद्रमार्गीय व्यापार सघन एवं व्यापक था, साथ ही शान्तिपूर्वक गतिशील था। समद्री लुटेरे उसे बाधित नहीं कर पाते थे। उनके नियमित यातयात एवं व्यापार में भी बाधा-व्यवधान कदाचित ही कभी पड़ते हों। ये बाधाएँ यूरोपीयों के परिदृश्य पर उभरने के बाद ही पडऩे लगीं। उससे पहले, समुद्री डकैती की जो घटना यदा-कदा घटती, उसे एशियाई राज्य-सत्ताएँ निर्ममतापूर्वक कुचल डालती थीं। समुद्री मार्गों की सुरक्षा भलीभाँति सुनिश्चित की जाती थी। इसके पर्याप्त एवं विपुल सन्दर्भ मिलते हैं कि राज्यकर्ताओं की नौसेना अपने समुद्री इलाकों का नियमित गश्त करती थीं, क्योंकि समुद्री-व्यापार में व्यवधान से क्षति राजकीय राजस्व को भी उठानी पड़ती थी। यहाँ तक कि यूरोपीय समुद्री डकैतों को भी एशियाई सागरतटीय राजाओं की नौसेनाओं का पूरा ध्यान रखना होता था, यद्यपि वे इस डकैती के जरिए ही मालामाल हो रहे थे। इसीलिए वे दुर्गम समुद्री इलाकों के बीच में अवस्थित छुट-पुट द्वीपों में अपना अड्डा बनाते थे। 18वीं शती ई. तक यूरोपीय जलदस्युओं ने अपनी शक्ति बहुत बढ़ा ली थी, तब भी उन्हें ‘शाही कोपÓ का भय बना रहता था जो कि व्यापारियों से दुव्र्यवहार करने पर उन पर टूटता था। मुगल इतिहासकार शफी खान ने लिखा है कि यूरोप से व्यापार का जो तुरत वित्तीय लाभ मिलता था- उसके कारण देश से यूरोपीयों के निष्कासन का क्रांतिकारी कदम सामान्यत: नहीं उठाया जाता था। जैसा कि पहले उल्लेख हो चुका है, बड़े व्यापार एवं वित्तपति जब पाते थे कि उनके व्यापक शांतिपूर्ण समुद्रपारीय व्यापार पर कोई बाहरी चोट पड़ी है तो वे राज्य का सहयोग सरलता से माँग लेते और पा जाते थे। इसके अतिरिक्त ‘शाही अधिकारी इस बारे में सतत सजग रहते थे कि जिन व्यापारिक नगरों में भारतीय सौदागरों का यूरोपीयों से मुकाबला जोरदार होना है, वहाँ कोई सैनिक शक्ति यूरोपीय लोग न बढ़ा लेंÓ। ‘हिस्ट्री ऑव ब्रिटिश इंडियाÓ में हंटर ने बताया है कि कैसे ‘कम्पनी बंगाल से निकाल बाहर की गई तथा कैसे मुम्बई द्वीप पर मुगल नौसेना ने कब्जा कर लिया। एक अन्य उल्लेख बताता है कि, ‘मराठा एडमिरल कान्होजी आंग्रे ने 18वीं शती के आरम्भ में ईस्ट इंडिया कम्पनी के मुम्बई व्यापार को तथा समुद्री नियंत्रण को गम्भीर खतरा पैदा कर दिया था।
*प्राचीनतम भारतीय नौसेनाएँ*
यहाँ उल्लेखनीय है कि भारत का सैनिक इतिहास विश्व में प्राचीनतम है। हजारों वर्ष पूर्व से यहाँ सेनाएँ रही हैं और भारत के सभी किसान तथा ग्रामीण भी सैन्य क्षमता से सम्पन्न रहते थे, उन्हें युद्धकला आती थी, शस्त्र संचालन आते थे और वे वीरता को एक श्रेष्ठ आदर्श मानते थे। वेदों में भी सेनाओं का उल्लेख है। भारत के दो प्राचीनतम महाकाव्य हैं- महर्षि वाल्मीकि रचित- रामायण और महर्षि वेदव्यास रचित- महाभारत। दोनों युद्धकाव्य भी हैं, धर्मकाव्य और राजनीतिशास्त्रीय काव्य भी। दोनों में हजारों प्रकार के अस्त्र शस्त्रों, विमानों और प्रक्षेप्यास्त्रों तथा भयानक संहारकारी शस्त्रों का वर्णन है। धनुर्वेद हजारों साल से भारत का एक मान्य शास्त्र है। कम से कम 5000 वर्षों से भारतीय नौसेनाओं का गौरवशाली इतिहास है। ईसा पूर्व 2300 में सारस्वत सभ्यता (सैन्धव सभ्यता) के अवशेष लोथल में मिले हैं, जिसमें नौ सेना होने का साक्ष्य है। चाणक्य ने शस्त्रोपजीवी, आयुधजीवी और राजशब्दोपजीवी समूहों का वर्णन किया है।अर्थशास्त्र का 9वां, 10वां, 12वां, 13वां और 14वां अध्याय (अधिकरण) शस्त्रास्त्रों के बारे में विस्तार से बताता है। नौभार, नौतरण और नौबलाध्यक्ष के विवरण अर्थशास्त्र में हैं। दूसरे अधिकरण के 44वें प्रकरण में 28वां अध्याय ‘नावध्यक्ष:Ó शीर्षक से है, जो नौवकाध्यक्ष के लिए है। इस प्रकार सम्राट नन्द और सम्राट चन्द्रगुप्त के समय में बहुत पहले से चली आ रही सेना और नौसेना का वर्णन मिलता है। नौसेनाओं के पास मत्स्य यंत्र भी होता था। सम्राट अशोक, सातवाहन सम्राटों, चोल सम्राटों, विजयनगर साम्राज्य के स्वामियों, कलिंग साम्राज्य के स्वामियों से लेकर मराठों तक के पास सशक्त नौसेना रही है। मराठों तथा केरल राज्य की नौसेनाओं ने अंग्रेजों तथा यूरोपीयों की नौसेनाओं को हरा दिया था। कान्होजी आंग्रे मराठा नौसेना के सेनापति थे। इस प्रकार भारत में अत्यंत प्राचीनकाल से नौसेना रही है। इसी सशक्त नौसेना के कारण भारत के व्यापारी समुद्र में दूर-दूर तक निर्भय होकर व्यापारिक यात्रा कर सकते थे।
श्री धर्मपाल ने ईस्ट इंडिया कंपनी के कतिपय अधिकारियों द्वारा किए गए सर्वेक्षणों के आधार पर 18वीं शताब्दी ईस्वी में भारत में शिक्षा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के बारे में प्रामाणिक आंकड़े दिए हैं। तदनुसार भारत के प्रत्येक गांव में कम से कम एक विद्यालय होता था, बड़े गांव में एक से अधिक विद्यालय होते थे और शहरों में अनेक विद्यालय होते थे। इन विद्यालयों में सभी जातियों के शिक्षक पढ़ाते थे तथा सभी जातियों के छात्र पढ़ते थे। छात्राओं के लिए अलग विद्यालय होते थे। श्री धर्मपाल ने अपनी ओर से केवल भूमिका ही लिखी है। शेष सम्पूर्ण पुस्तक अंग्रेज अधिकारियों द्वारा किए गए सर्वेक्षण की रिपोर्टों को यथावत प्रकाशित करती है। अत: वे आंकड़े पूर्णत: प्रामाणिक हैं और उनसे यह प्रचार पूरी तरह झूठा सिद्ध होता है कि भारत में शिक्षा केवल कुछ जातियों का विशेषाधिकार है और यह बात भी पूरी तरह झूठ सिद्ध होती है कि केवल ब्राह्मण ही शिक्षक होते थे, क्योंकि इंग्लैंड में केवल पादरी ही पढऩे लिखने के अधिकारी 18वीं शताब्दी तक थे और केवल पादरी ही पढ़ा सकते थे। इसीलिए उन्होंने भारत के बारे में ही यह झूठ रचा और फैलाया तथा बलप्रयोग और प्रचार के द्वारा 100 वर्षों के भीतर इसे एक सत्य की तरह स्थापित कर दिया तथा इसी के साथ सचमुच भी पढ़ाई को कुछ वर्गों तक ही सीमित बनाकर रख दिया। राज्य के हस्तक्षेप से भारत में समाज अपेक्षाकृत अधिक तेजी से बदलता है, क्योंकि यहाँ इंग्लैंड या अन्य यूरोपीय ईसाई देशों की तरह का कोई संगठित चर्चनुमा धर्मतंत्र नहीं है और राज्य के प्रति समाज में कोई प्रतिरोध भाव नहीं है।
18वीं शताब्दी में भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के बारे में भी कतिपय अंग्रेज अधिकारियों ने सर्वेक्षण कर रिपोर्टें लिखी थीं। अत: उससे यह भी प्रमाणित होता है कि 18वीं शताब्दी ईस्वी में भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की दशा इंग्लैंड से बहुत उन्नत थी। इस्पात बनाने की विधियाँ, बर्फ बनाने की विधि, खेती और सिंचाई सम्बन्धी उन्नत तकनीक, चेचक का टीका, आयुर्वेद की उन्नत वैज्ञानिक विद्या आदि अनेक क्षेत्रों में भारत विज्ञान और प्रौद्योगिकी में इंग्लैंड से बहुत आगे था।
भारत के बहुत से वैज्ञानिक ग्रंथ अंग्रेज और जर्मन चुराकर ले गए, यह बात भी समाज में बहुत प्रचलित है। यद्यपि इनका प्रामाणिक विवरण अभी तक सामने नहीं आया है। परन्तु शिक्षा, प्रौद्योगिकी, कृषि, इस्पात, तकनीकी, धातुकर्म, वस्त्र उद्योग तथा व्यापार के क्षेत्रों में भारत की समृद्धि सर्वविदित है। खगोल शास्त्र में भी भारत का ज्ञान बहुत उन्नत था। रॉबर्ट बार्कर ने रॉयल सोसायटी लंदन के समक्ष 1777 ईस्वी में उसकी जानकारी दी। एडिन बरो और जॉन प्लेफेयर ने भी अपने लेखों के द्वारा इसकी जानकारियाँ दीं। यह तो विश्वविदित है कि गणित शास्त्र में भारत ही विश्व गुरु है। रेखा गणित और त्रिकोणमिति का ज्ञान भी भारत में ही सर्वप्रथम था। इंग्लैंड तथा यूरोपीय देशों को ये जानकारियाँ बहुत बाद में मिली। इस्पात बनाने की विधि, चेचक के टीके, बर्फ बनाने की विधि और भारत में विकसित शल्य चिकित्सा तथा आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति का ज्ञान भी अंग्रेजों को 18वीं शताब्दी ईस्वी में ही पहली बार हुआ। इसके अतिरिक्त और भी विशद विवरण उपलब्ध हैं जिनसे यह सिद्धान्त खण्डित होता है कि 18वीं शती ईस्वी के भारत में किसी प्रकार का ठहराव और क्षय था। वस्तुत: उस अवधि में भारतीय समृद्धि सतत गतिशील थी जिसका प्रमुख श्रेय भारतीय राजाओं और राजकीय नीतियों को जाता है। राज्य की पहल पर ही भारतीय व्यापार-वाणिज्य नया-नया विस्तार पाते रहते थे। 1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु हुई। तब विविध सूबेदारों ने स्वयं को दिल्ली की गद्दी के आधिपत्य से मुक्त घोषित कर दिया। पर इससे इन सूबों में प्रगति थमी नहीं। उल्टे उत्पादन एवं वस्तु-निर्माण में तीव्र वृद्धि हुई, आर्थिक विकास हुआ तथा व्यापार का फैलाव हुआ। बंगाल उसी दौर में रेशमी वस्त्रों का प्रमुख उत्पादक तथा निर्यातक बनकर फिर उभरा। सारा देश 18वीं शती ईस्वी में प्राणवान, जीवंत तथा उच्च स्तरीय सक्रियता में संलग्न था। यहाँ के राजे-महाराजे भी आर्थिक-सामाजिक उन्नति में गहरी रुचि लेते थे तथा उसमें सक्रिय योगदान देते थे। अत: ब्रिटिशपूर्व भारत के बारे में समाजशास्त्रियों, सामाजिक विज्ञानियों को नये सिरे से सोचना चाहिए तथा स्वतंत्र बुद्धि से, भिन्न अवधारणा कोटियों में विकास की भारतीय समस्या को देखना-समझना चाहिए। ( समाप्त)
✍🏻साभार : भारतीय धरोहर पत्रिका

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