अब ताजमहल के बाद कुतुबमीनार के भीतर भी मंदिर के होने का किया गया दावा

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भारतीय इतिहास के साथ की गई भारी छेड़छाड़ का सिलसिला परत दर परत उघड़ने लगा है । श्री राम जन्मभूमि के विवाद में जहां यह स्पष्ट हुआ कि वहां पर मूल रूप में कभी श्री राम जी का मंदिर था, वहीं उससे यह भी स्पष्ट हो गया कि भारत के इतिहास के तथ्यों के साथ किस प्रकार खिलवाड़ किया गया है ? दैनिक जनसत्ता में छपी एक खबर के अनुसार अब दैनिक ‘जनसत्ता’ में छपी एक खबर के अनुसार अब देश की राजधानी दिल्ली में स्थित कुतुबमीनार के बारे में भी कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है जिसमें कहा गया है कि कुतुब मीनार में हिंदू और जैन देवी देवताओं की फिर से स्थापना किए जाने और पूजा-पाठ किए जाने का रास्ता अदालत साफ करे।
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि को लेकर भी अदालती लड़ाई लड़ी जा रही है। अब ये अदालती लड़ाई राजधानी दिल्ली की पहचान माने जाने वाले कुतुब मीनार को लेकर भी छिड़ गई है। दरअसल दिल्ली की साकेत कोर्ट में मध्यकालीन समय में बनी इस ऐतिहासिक धरोहर में पूजा-अर्चना के लिए याचिका दायर की गई है।
याचिका में कहा गया है कि कुतुबमीनार में हिंदू और जैन देवी देवताओं की फिर से स्थापना किए जाने और फिर से पूजा-पाठ किए जाने का रास्ता अदालत साफ करे। याचिकाकर्ताओं का पक्ष है कि मीनार निर्माण से पहले वहां मंदिर हुआ करता था।
इसके अलावा याचिकाकर्ता चाहते हैं कि केंद्र सरकार मंदिर के लिए ट्रस्ट बनाए और इसके प्रबंधन की जिम्मेदारी ट्रस्ट को दे दी जाए। मांग की गई है कि कई ऐसे हिंदू देवता हैं जिनके मंदिर वहां थे, यही नहीं जैन आस्था से जुड़े मंदिर भी थे। कोर्ट से पूरे रीति-रिवाज के साथ पूजा करने की अनुमति देने की मांग की गई है।
अब उपरोक्त याचिका पर माननीय न्यायालय अपना क्या निर्णय देंगे यह तो भविष्य के गर्भ में छिपा हुआ प्रश्न है। परंतु एक बात तो अब स्पष्ट हो रही है कि भारत के लोग अब अपने गौरवमई इतिहास के तथ्यों को स्पष्ट कर सामने लाने के लिए सजग हो चुके हैं। अब इस बात का फैसला होना ही चाहिए कि मुसलमानी शासन के समय देश के किन-किन ऐतिहासिक स्थलों पर मुसलमानी शासकों ने अपने बनाने का ठप्पा लगाया और यदि उन्होंने ऐसा किया तो किस पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर किया ? इतना ही नहीं यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि यदि यह सब कुछ हिंदू राजाओं के द्वारा निर्मित भवन थे तो फिर देश की सरकारों के सामने ऐसी कौन सी मजबूरी थी कि वह सत्य को उजागर करने से बच,ती रहीं ?

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