आतंक का नया दौर
अगस्त 1983 के अंत में चीनियों ने दमन की नयी पारी शुरू की। शिगात्से (27/9/83) और ल्हासा (30/9/83 और 1/10/83) में मृत्युदंड देने की घटनायें हुईं। इसके पश्चात कांज़े में मृत्युदंड दिये गये साथ ही चाम्डो और ग्यात्से में और लोग बन्दी बनाये गये। चीनी बन्दी बनाये गये और मृत्युदंड दिये गये लोगों का वर्गीकरण अपराधी, समाज विरोधी तत्त्व आदि के रूप में करते हैं लेकिन प्रतीत होता है कि वर्गीकरण चीनियों का अभिप्सित मनवाने के लिये किया गया है और उसमें विशेष रूप से वे लोग सम्मिलित हैं जिन्हों ने आवाज़ उठाई या बौद्ध धर्म के प्रत्यक्ष अनुसरण के प्रयास किये और राजनीतिक गतिविधियों में सम्मिलित हुये और जिन्हों ने तिब्बती स्वतंत्रता के पक्ष में तर्क रखे जैसे कि गेशे लोब्सांग वांग्चुक (जिसने माओत्से तुंग के लेखन के सन्दर्भ देते हुये ऐसा किया)। 1984 के अन्त में सांग्यिप जेल से हटाये जाने के पश्चात वह अब भयावह द्राप्ची जेल में है। उसके मामले की एमनेस्टी इंटरनेशनल द्वारा सक्रिय रूप से जाँच जारी है और उसके 1985 के रिपोर्ट में उसे सम्मिलित किया गया है। बहुत से तिब्बती ल्हासा के निकट कुख्यात सांग्यिप और द्राप्ची जेलों में बन्दी हैं, जिनमें से कुछ को जंजीरों से बाँध कर तथा हथकड़ी लगा कर रखा गया है और एकांतिक कक्षों में बन्द रखा। 13/9/83 के दिन लगभग 370 भिक्षु चीनियों द्वारा ध्वस्त किये गये गादेन मठ के कुछ भाग के पुनर्निर्माण का प्रयास कर रहे थे कि उन्हें 1000 की संख्या में सैनिकों ने घेर लिया, पीटा और ट्रकों में ठूँस दिया। एक वृद्ध भिक्षु और पुराने मठमुखिया को पीटते पीटते मार डाला गया। ऐसा प्रतीत होता है कि बन्दी बनाये लोगों में कई (कुल संख्या सम्भवत: हजारों में हो) को तिब्बत के उत्तर में स्थित लेबर कैम्पों में भेज दिया गया है जहाँ से सम्भावित है कि बहुतेरे नहीं लौटेंगे। जैसा कि वांग्दक नामक भिक्षु के साथ हुआ, भारत से अपने परिवार से मिलने गये तिब्बती शरणार्थी भी बन्दी बनाये गये हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी कल्संग त्सेरिंग की गिरफ्तारी की सूचना दी है, जिसका साक्षात्कार पत्रकारों ने द्रेपुंग मठ में लिया और जिसे 26/8/83 को बन्दी बना लिया गया।
समूचा तिब्बत अब आतंक की स्थिति में घरों के दरवाजों पर खटखटाहट की प्रतीक्षा कर रहा है। जैसा कि पहले प्राय: घटित हुआ है, सार्वजनिक रूप से मृत्युदंड पाने वालों के परिवार जनों को अपने सबसे अच्छे कपड़ों में वहाँ सम्मिलित होने को बाध्य किया जाता है और ‘समाजविरोधी प्रतिक्रियावादी तत्त्वों’ को समाप्त करने के लिये चीनियों को सार्वजनिक धन्यवाद ज्ञापन के लिये मजबूर किया जाता है। इस बात की सूचना है कि अंतिम समय में मृत्युदंड पाये लोग कुछ कह न सकें, इसके लिये चीनी सांस्कृतिक क्रांति के दौर में प्रचलित स्वर तंतुओं (vocal chord) को काट देने की पुरानी परिपाटी पर लौट आये हैं। और अधिक सूचनायें बताती हैं कि ल्हासा में मृत्युदंड देने के पश्चात शवों को उनके सम्बन्धियों के यहाँ भेज दिया गया और व्यक्ति को मारने के लिये प्रयुक्त गोलियों के बदले 25 स्टर्लिंग प्रति गोली की दर से उनसे हर्जाना वसूला गया। 1983 के अंतिम और 1984 के प्रारम्भिक काल के दौरान मृत्युदंड जारी रहे। हालाँकि मानवाधिकार संगठनों, भारत और अन्य देशों में फैले तिब्बतियों, पश्चिमी बौद्धों सहित धार्मिक संगठनों के विश्वव्यापी विरोध और वृहदस्तरीय मीडिया आलोचनाओं के परिणामस्वरूप चीनी अपनी दमन नीति में संशोधन कर रहे हैं और उदारीकरण की नीति की ओर लौटने के लिये कुछ प्रयास किये जा रहे हैं।


स्वायत्तता का झूठ
यदि कोई यह मान बैठे कि इस रिपोर्ट में दिये गये बहुतेरे तथ्य ‘तिब्बत स्वायत्तशासी क्षेत्र’ की संज्ञा को झुठलाते हैं तो वह क्षम्य है। तिब्बत में लगभग 5 लाख चीनी सैनिकों की उपस्थिति ही तिब्बती स्वायत्तता जैसी किसी संज्ञा के विरुद्ध एक अकेली प्रबल तर्क साबित होगी। सीमा क्षेत्रों जैसे पेमाको और मेतोक द्ज़ोंग में सैन्य जमावड़े के साथ साथ हर सैन्य जिले में बड़े सैन्य गैरिसन हैं जिनकी पकड़ तिब्बती युद्ध के दौरान चीनियों के लिये अति उपयोगी साबित हुये सैन्य मार्गों के कारण सुदृढ़ है। तिब्बत में अब चीनियों के पास नौ सैन्य वायुक्षेत्र, ग्यारह रडार केन्द्र और तीन आणविक बेस हैं। 1950 तक 3200 किलोमीटर लम्बी भारत तिब्बत सीमा पर यदा कदा सीमा पुलिस के जवान दिखते थे। 1962 में हुये युद्ध और सीमा पर चीनियों के जमावड़े को देखते हुये भारतीय प्रतिक्रिया के परिणामस्वरूप दोनों ओर तैनात सैनिकों की संख्या अब लाखों में प्रतीत होती है। चीन ने तिब्बत में अंतर्महाद्वीपीय बैलिस्टिक प्रक्षेपास्त्र लगा रखे हैं जो भारत की जनसंख्या और उद्योगों के प्रमुख केन्द्रों पर अपना निशाना साधे हुये हैं और कुछ हिन्द महासागर के विस्तृत क्षेत्र की ओर हैं और दूसरे सोवियत संघ पर केन्द्रित हैं (सम्भवत: ‘चेतावनी पर प्रक्षेपण’ तंत्र से जुड़े हुये हैं)।
तिब्बत सरकार में दो सबसे महत्त्वपूर्ण आनुसांगिक कम्युनिस्ट पार्टी समिति और जन सरकार (People’s Government) हैं जिनके सभी शीर्षस्थ व्यक्ति चीनी हैं। विपरीत छाप छोड़ने के लिये वे तथ्य का चाहे जितना खंडन करें, प्रशासनिक प्राधिकरण और राजनीतिक नियुक्तियों की शक्ति पूर्ण रूप से चीनियों के हाथ में है।
उपसंहार
पिछले 36 वर्षों के दौरान जारी रही तिब्बत की दु:खद गाथा के बारे में कोई मैक्डफ के इन शब्दों को दुहराने के सिवाय क्या कह सकता है: ‘आतंक, आतंक, आतंक! न तो हृदय अनुमान लगा सकता है और न जीभ बयाँ कर सकती है’। इसे कभी भी घटित नहीं होना था। एक प्रसिद्ध तिब्बतशास्त्री ने एक बार कहा था कि तिब्बत की स्वतंत्रता के पक्ष विपक्ष के तर्कों या हाथ से जा चुके पूर्वी प्रांतों के मुद्दे के रहते हुये भी चीनी तिब्बत को धीरे धीरे बीसवीं शताब्दी जैसी स्थिति में लाने की आदर्श स्थिति में थे। इसके बजाय जिसे ‘आधुनिक काल में अक्षुण्ण जीवित रही एकमात्र संस्कृति’ कहा जाता है, वह नाज़ियों जैसी डरावनी क्रूरता के प्रयोग द्वारा धरा से मिटाई जा चुकी है। इस रिपोर्ट से ये बिन्दु उठते हैं:

(1) 1950 से आगे चीनियों के हाथों लगभग दस लाख तिब्बती मारे जा चुके हैं। ऐसी क्रूरता अस्वीकार्य है। यह उद्घाटित होता है कि जितना सामान्यत: स्वीकारा जाता है, सशस्त्र प्रतिरोध, मृत्युदंड, लेबर कैम्पों और जेलों में मृत्यु, भूख के कारण मृत्यु और यातना उससे कहीं बहुत अधिक रहे हैं। यह सब चीनियों को तिब्बत में मानवाधिकार हनन के विकट दोषी ठहराते हैं।
(2) यह पूर्णत: सत्य है कि आधिकारिक रूप से ‘स्वायत्तशासी क्षेत्र’ कहे जाने पर भी तिब्बत को स्वायत्त रूप से काम काज करने की अनुमति नहीं है। प्रशासन में सभी स्तरों पर चीनियों का प्रभुत्त्व है और लगभग 5 लाख की संख्या में चीनी सेना ‘तिब्बत स्वायत्तशासी क्षेत्र’ में बनी हुई है। 1950 से आगे यदि तिब्बतियों को अधिक स्वायत्त रूप से काम करने दिया गया होता तो यह सारा भयानक रक्तपात सम्भवत: अघटित रह जाता। धीमे सुधार तिब्बत को बीसवीं शताब्दी जैसी स्थिति में ला सके होते। 1950 से जो भी घटित हुआ है उसके प्रकाश में संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में जनमतसंग्रह की तिब्बतियों की माँग पर, जिसमें कि तिब्बती चीन से स्वतंत्र होने के मुद्दे पर मत दे सकें, गम्भीरतापूर्वक विचार होना चाहिये।
(3) तिब्बती बौद्धों पर जाति आधारित अत्याचार लगभग अकल्पनीय आयामों में से एक है और उन लोगों ने मनोवैज्ञानिक उत्पीड़न को उस गहराई तक झेला है जो ऑर्वेल की रचना ‘1984’ से असामान्य समानता रखती है। यह सब तब घटित हुआ जब कि चीनी संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की कुछ सीमा तक अनुमति देता है और वास्तव में तिब्बतियों को इसके लिये उस ’17 सूत्री समझौते’ में वादा किया गया था जिस पर उन्हें जबरन हस्ताक्षर करने पड़े थे।
(4) तिब्बती राष्ट्रीय पहचान को मिटाने के निरंतर प्रयास के चलते तिब्बत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत व्यवहारत: नष्ट हो चुकी है। इसके परिणामस्वरूप अब तिब्बती सांस्कृतिक जातिसंहार का सामना कर रहे हैं। बहुत शीघ्र वे उन सबसे महरूम हो जायेंगे जो उन्हें चीनियों से अलग पहचान देते थे और वे चीनी नागरिकों और सैनिकों की आती बाढ़ में डूब रहे हैं। भीतरी मंगोलिया और सिंकियांग के लोगों के साथ भी ऐसी ही तबाहियाँ घटित हुई हैं। उनकी संस्कृतियाँ भी भौतिक रूप में नष्ट की जा रही हैं।
(5) पारिस्थितिक संतुलन की घोर उपेक्षा करते हुये तिब्बत के प्राकृतिक संसाधनों का आपराधिक कुप्रबन्धन हुआ है जो पूँजीवाद के सबसे बर्बर और उच्छृंखल रूप की ओर ध्यान दिलाता है। पिछले 36 वर्षों के अकाल और अर्थव्यवस्था की पूर्ण तबाही अपरिहार्य रूप से 19 वीं सदी के मध्य में ब्रिटिश शासन के दौरान आयरिश लोगों की दुर्दशा से तुलना करने को उकसाते हैं। जिस तरह से उपनिवेशी शक्तियों ने वहाँ अपने शिकार के प्राकृतिक संसाधनों को चूस कर सुखा डाला उसी तरह से चीनी तिब्बत में खनिज, लकड़ी आदि का दोहन कर रहे हैं और उन्हें चीन के दूसरे भागों में भेज रहे हैं। यह समझ पाना कठिन है कि यह सब किसी भी तरह से ‘मुक्ति’ जैसी अवधारणा को प्रदर्शित कर सकते हैं।

हम यह माँग करेंगे कि तिब्बती लोगों को मौलिक मानवाधिकारों से वंचित रखने की इस स्थिति में संयुक्त राष्ट्र के एक प्रतिवेदक को तिब्बत जाने की अनुमति दी जाय, उसे निर्बाध रूप से उपनगरों, देहाती जिलों, जेलों, लेबर कैम्पों आदि में जाने दिया जाय और उसे अपने जाँच परिणामों पर रिपोर्ट देने को कहा जाय।
(समाप्त)
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नोट:
तिब्बत पर सन् 1984 तक हुये भीषण अत्याचारों की यह रिपोर्ट आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। आज चीन एक महाशक्ति है। शक्ति और अंतरराष्ट्रीय़ पकड़ का प्रयोग करते हुये वह अपने एजेंडा पर और जोर शोर से लगा हुआ है। प्रमाण स्वरूप इस शृंखला के बीच में ही उद्धृत क्षेपक को देखा जा सकता है।
यह दु:संयोग है कि जॉर्ज ऑरवेल के उपन्यास ‘1984’ में वर्णित जाने कितनी ‘कल्पनायें’ तिब्बतियों के लिये 1984 तक वास्तविक हो चुकी थीं और अभी भी जारी हैं। आश्चर्य नहीं कि उपन्यास का उल्लेख कई बार किया गया है।
दुर्भाग्य से राष्ट्रों और नृवंशों की जीवन रेखायें सदियों में फैली होती हैं और सुख की तरह ही दुख का काल भी कई पीढ़ियों तक अपना प्रसार रखता है। यहूदियों और पारसियों को शरण दे उनकी संस्कृति को बचाये रखने में उदार भारत ने सहायता की और तिब्बतियों के साथ भी ऐसा ही किया। हर चरित्र का एक कृष्ण पक्ष भी होता है। भारत की उदारता का कृष्ण पक्ष यह है कि कश्मीरी अपने ही देश में शरणार्थी बना दिये गये और यह देश चुपचाप तमाशा देखते गलाबाजी में व्यस्त रहा और आज भी है।
इन सब के होते हुये भी आशा और मुक्ति की सनातन मानवीयता पर भरोसा करना ही होगा। दुख को शाश्वत और उससे जुड़ी सचाइयों को आर्यसत्यों की श्रेणी में रखने वाली बौद्ध संस्कृति दुख निदान और उसके मार्ग को अपना मूल जीवन दर्शन मानती है और यह मान्यता ही उन्हें चुप नहीं बैठने देगी। एक दिन, एक दिन तिब्बत में वे अवश्य पुनर्स्थापित होंगे।
मानव जीवन में श्वेत श्याम जैसा स्पष्ट विभाजन नहीं होता। जो खल हैं वे धूसर में कालेपन को बढ़ाने को जीते हैं और सज्जन सफेदी को। सभ्यताओं के साथ भी ऐसा ही है। ऐसे में आर्ष वाणी ‘सर्वेऽपि सुखिन: संतु, सर्वे संतु निरामया’ या शांति पाठ के स्थान पर घनघोर जिजीविषा को बयाँ करती दो डायरियों से उद्धृत करना अधिक उपयुक्त होगा क्यों कि उन्हों ने अत्याचार, आतंक और दिन ब दिन आती मृत्यु को प्रत्यक्ष झेलते हुये भी अपने श्वेत पक्ष को न केवल बनाये रखा बल्कि उन्हें सहज सनातन अभिव्यक्ति दी। इन्हें दो किशोरियों का भावुक बचपना नहीं, सम्पूर्ण मानवता की अभिव्यक्ति समझें और समझें कि लाखों मूक तिब्बतियों के स्वर भी इनमें सम्मिलित हैं क्यों कि साम्यवाद के अत्याचार वे भी झेल रहे हैं:
(1)एक सोवियत छात्रा की डायरी (1932-37) – नीना लुगोव्स्काया
कम्युनिस्ट सोवियत संघ में स्तालिन के शासन काल में एक बोल्शेविक क्रांतिकारी की पुत्री। डायरी में लिखी बातों को प्रतिक्रांतिकारी माना गया और समूचे परिवार को बन्दी बना लिया गया। वह कोल्यमा कैम्प में चार-पाँच वर्ष बन्दी रही और सात वर्षों तक निर्वासित रही।)

“… उक्रेन… इसे क्या हो गया है? यह पहचान में नहीं आता। मृत शांत स्तेपी (घास के बड़े मैदान)… बोल्शेविक इस तबाही के लिये तैयार थे। वसंत में बोये जाने वाले छोटे छोते खेत अब लाल सेना द्वारा बोये काटे जा रहे हैं जिन्हें इस उद्देश्य के लिये ही वहाँ भेजा गया था…”
“… मैं रोने लगी, कोसते हुये कमरे में इधर उधर दौड़ने लगी और इस निष्कर्ष पर पहुँची कि इस भीड़ को अवश्य ही मार दिया जाना चाहिये। कई दिनों तक मैं शामों को बिस्तर में पड़ी सोचती रही कि मुझे ही इस व्यक्ति(स्तालिन) को मार देना चाहिये। और यह तानाशाह और अधिक वादे करता है, यह नरपशु, यह घामड़, यह दुष्ट जार्जियाई जो रूस को तबाह कर रहा है। यह कैसे हुआ कि महान रूस, महान रूसी लोग ठगों के हाथ लग गये? क्रोध में पागल हो मैंने अपनी मुठ्ठियाँ कसीं। जितनी जल्दी हो सके उसे मार दूँ! अपने और अपने पिता पर हुये अत्याचारों का बदला लूँ…“
“…मैं घुटन भरे कमरे के लिये नहीं बनी, और न (ऐसी) भीड़ के लिये। स्वतंत्रता! मेरा हृदय स्वतंत्रता की माँग करता है। मैं प्रकृति में मिल जाना चाहती हूँ, स्वतंत्र हवाओं के साथ पृथ्वी के ऊपर ऊँची उड़ान भरना चाहती हूँ और दूर उड़ जाना चाहती हूँ … दूर अनजाने देशों की ओर..”

(2)एक किशोरी की डायरी – अन्ने फ्रैंक
(एक यहूदी लड़की जिसे हिटलर के सैनिकों ने परिवार सहित बन्दी बना कर यातना कैम्प में भेज दिया। वह वहीं मर गई। बन्दी होने के पहले लगभग दो वर्षों तक वे लोग छिप कर रहे जहाँ उन्हें बाहरी संसार में किये जा रहे अत्याचारों और यहूदियों पर मृत्यु के कसते शिकंजों की खबरें मिलती रहीं। 4 अगस्त 1944 को गिरफ्तार होने के पहले 15 जुलाई 1944 को उसने डायरी में यह लिखा)।
हम लोग इन समस्याओं से निपटने के लिये बहुत छोटे हैं लेकिन बड़े लोग हम पर अपनी बात तब तक थोपते रहते हैं जब तक अंतत: हम एक हल सोचने को बाध्य नहीं हो जाते, यद्यपि अधिकांश मौकों पर हमारे निदान सचाई का सामना होते ही बिखर जाते हैं। ऐसे समय में यह कठिन है: आदर्श, सपने और प्रिय आशायें हमारे भीतर उठती हैं और नग्न यथार्थ के आगे कुचली जाती हैं। यह आश्चर्य ही है कि मैंने अपने सारे आदर्श नहीं छोड़े हैं, वे अव्यावहारिक और मूर्खतापूर्ण लगते हैं। फिर भी मैं उनसे चिपकी रहती हूँ क्यों कि मैं अब भी भरोसा करती हूँ कि सब के बावजूद, लोग सच में दिल से अच्छे होते हैं… मैं आने वाले तूफान को सुन सकती हूँ जो एक दिन हमें भी नष्ट कर देगा, मैं लाखों लोगों के दुख का अनुभव करती हूँ। फिर भी … मैं अनुभव करती हूँ कि एक दिन क्रूरता का भी अंत होगा…”
✍🏻गिरिजेश राव

चीन ने जब तिब्बत खा लिया था तो दमन चलाया था। अभी भी चला रहे हैं, लेकिन साथ साथ यह रणनीति भी है कि चाइनिज लोगों की वहाँ भरमार कर रहे हैं, कोई काम तिब्बती पर निर्भर नहीं । तिब्बती को रहना है तो चीन को निष्ठा समर्पित करे, स्वतंत्र तिब्बत का खयाल भूल जाये । चाइनिज लड़के से बेटी का ब्याह करे, चाइनिज लड़की को बहू बनाए, दो पीढ़ी में पूरा चाइनिज नागरिक भी बन जाये ।

नहीं तो देश छोड़ कर भाग जाये, या फिर उसे दुनिया से मुक्ति दिलाने में चाइना को कोई हर्ज, लाज, शर्म कुछ भी नहीं । कम्युनिस्ट देश है । उसके लिए उनसे कोई धंधा करना भी बंद नहीं करता, भारत में मानवाधिकार पर RR मचानेवाले सभी पश्चिमी देश चाइना से धंधा करने के लिए तरसते रहते हैं । (फांसी रद्द करने के लिए स्यापा मचानेवाले यही लोग बेरहमी से सर काटनेवाले सऊदी को भी मानवाधिकार की कुर्सी सौंप देते हैं ।)

हाँगकाँग के साथ चाइना ने अलग सलुख किया । लोगों को आशंकाएँ थी कि उनकी कमाई चाइना लूटेगा कम्यूनिज़्म के नाम पर । वैसे कुछ हुआ नहीं । हाँगकाँग सोने के अंडे देनेवाली मुर्गी थी और चाइना को उसी में रस था । वैसे भी ब्रिटेन और चाइना के बीच जो करार था उसके मुताबिक वो चाइना को वापस देना ही था ।

हाँगकाँग वालों को कोई देश भावना तो थी नहीं जैसे तिब्बतवालों को थी । वो देश नहीं था, एक ब्रिटिश उपनिवेश था । कमर्शियल सेंटर था जहां दुनियाभर से लोग आ कर नसीब चमकाते थे । टैक्स भी भरते थे जिसमें हाँग काँग की भी लाइफ़ स्टाइल से चलती थी । याने पूरी जनता का रवैया “कौनों हो नृप, हमें न हो हानी” वाला था। चाइना को कमाना था, उसने वहाँ तिब्बत जैसा रवैया नहीं अपनाया । लोग वहीं पर है, कमा भी रहे हैं । लोगों के साथ चाइना भी कमा रहा है ।

तिब्बत का takeover एक सामरिक takeover था । चाइना को वो प्रदेश चाहिए था उसके सामरिक महत्व के लिए । प्रदेश के लोग नहीं, वे उसके लिए बाधा थे । हाँगकाँग में इसके बिलकुल विपरीत स्थिति थी, हाँगकाँग का महत्व व्यापारिक है, सामरिक नहीं । यहाँ वे लोग रहने जरूरी है जिनके कारण हाँगकाँग को महत्व है । उनको चाइना ने आश्वस्त किया, वे भी रह गए । निकले होंगे कई, लेकिन ज़्यादातर बने रहे, उनको समझ में बात आई कि बने रहने में कोई समस्या नहीं, बसा बसाया कारोबार है, छोड़कर नए सिरे से कहाँ चालू करें?
हाँगकाँग और तिब्बत के अलावा और भी किस्से होंगे,
✍🏻आनन्द राजाध्यक्ष

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