Categories
इतिहास के पन्नों से देश विदेश

तिब्बत : चीखते अक्षर, भाग -13

 

जातीय भेदभाव
सात वर्ष की अवस्था से तिब्बती बच्चे चीनियों के हाथों संस्थागत भेदभाव झेलते हैं। अगर वे विद्यालय में जाते हैं तो वे पाते हैं कि जरा से बहाने से उन्हें निष्कासित कर दिया जाता है जब कि चीनी बच्चों को हमेशा ही प्रोत्साहित किया जाता है।


किसी भी व्यक्ति का ‘वर्ग’ उसके नाम, जन्मतिथि और जन्मस्थान के साथ उसके राशन कार्ड पर अंकित करना होता है। इसका अर्थ यह हुआ कि आठ वर्ष का एक बच्चे को एक या दूसरे ‘वर्ग’ में श्रेणीबद्ध करना होता है। जीवन में प्रगति करने और ऑफिसर होने की योग्यतायें ‘सही वर्ग’ और ‘सही प्रवृत्ति’ हैं। न तो प्रशासनिक क्षमता को देखा जाता है और न ही या शैक्षिक योग्यता को। जहाँ तक काम का प्रश्न है, तिब्बतियों को ‘दक्षिण अफ्रीकी रंगभेद नीति’ जैसा झेलना पड़ता है। युवा लोग शीघ्र ही यह पाते हैं कि वे चाहे जो काम पायें, वे हमेशा एक चीनी के अधीनस्थ रहते हैं और चीनियों को सेवायोजन की किसी भी प्रतियोगिता में वरीयता दी जाती है। उन्हें कार्यालयों के सर्वोत्तम काम दिये जाते हैं और दक्षिण तिब्बत के फल बागानों की देखभाल भी चीनी ही करते हैं। कारखानों और खेतों में या सड़क पर अकुशल श्रम हमेशा तिब्बतियों के हिस्से आता है जिन्हें उन परिस्थितियों में काम करना होता है जो बेगारी के समतुल्य होती हैं।
चीनियों का भोजन अलग होता है और वे अधिक वेतन या मज़दूरी पाते हैं। नवनिर्मित आवास परिसर चीनी और तिब्बती अधिकारियों के लिये सुरक्षित होते हैं और तिब्बत में अधिकतर घर दीर्घकाल से खस्ताहाल हैं। उन राज्य नियंत्रित दुकानों के माध्यम से जहाँ अधिकतर वस्तुयें इतनी महँगी हैं कि तिब्बती उन्हें खरीद नहीं सकते, चीनी अधिकारियों का व्यापार पर एकाधिकार है। तिब्बती संगीत और नृत्य, जिनके उद्गम काल की गहराइयों में खो चुके हैं, लुप्तप्राय हैं।
चीनी अपनी सांस्कृतिक श्रेष्ठताबोध को लेकर अटल हैं और चीन में पढ़ रहे अफ्रीकी विद्यार्थी अक्सर असभ्यतम जातीय दुर्व्यवहार की शिकायतें करते हैं। चीनीकरण के पीछे संस्क़ृति के श्रेष्ठतर होने की अवधारणा है जो चीनी मनोलोक में इतनी गहरी धसी हुई है कि उनका जातिगत श्रेष्ठताबोध की कगार तक पहुँचा संरक्षण भाव अधिकतर सहज सा है और इसलिये किसी सुधार के प्रति अति प्रतिरोधी है। अब चीनी घुसपैठियों की लहरें तिब्बत पर छाती जा रही हैं। उनमें से सभी कथित ‘विशेषज्ञ’ हैं जो तिब्बत के विकास में सहायता करने आये हैं। पहले ही ऐसे कई दसियो हजार ‘विशेषज्ञ’ तिब्बत में बस चुके हैं और ढेर सारे रास्ते में हैं। वास्तव में ये सर्वोत्तम नौकरियों पर कब्जा कर और उन्हें उनके पारम्परिक व्यवसायों से वंचित कर तिब्बती लोगों के लिये कठिन समस्यायें उत्पन्न कर रहे हैं। जब इन चीनी घुसपैठियों को तिब्बत भेजा गया तो उनकी समझ में यह बैठा दिया गया था कि उन्हें वरीयता मिलेगी और वे उस परिस्थिति का लाभ उठाने से नहीं हिचकिचाते जिसकी रचना तिब्बतियों के प्रति भेदभाव करने के लिये की गई है। और अधिक कहें तो चीनी घुसपैठियों का विराट प्रवाह तिब्बतियों के अस्तित्त्व के ऊपर सादृश्यीकरण और अवशोषण के द्वारा उनके पूर्ण विनाश का खतरा बन मँडरा रहा है। मुख्य उपनगरों और नगरों में पहले से ही चीनियों की संख्या तिब्बतियों से अधिक पहुँच चुकी है। शीघ्र ही तिब्बती जन अपने ही देश में अल्पसंख्यक बन जायेंगे। यह जान कर बहुत आश्चर्य नहीं होता कि एशिया के बड़े भाग में तिब्बत को चीन का ‘गहन दक्षिण (deep south)’ कहा जाता है।
पारिस्थितिक तबाही
चीनियों ने तिब्बत के बड़े भागों में जंगलों का समूल विनाश कर दिया है। न्गापा और देचेन क्षेत्रों में 65000 से ऊपर की संख्या में लोगों को काष्ठ उद्योग में लगाया गया है। कई वर्षों से जारी इस धन्धे में सारी की सारी लकड़ियाँ नदी मार्ग से दक्षिण और मध्य चीन को भेज दी गई हैं जिनकी कुल कीमत नि:सन्देह रूप से अरबों डॉलर है। बहुत बड़े बड़े भूभागों को तबाह कर दिया गया है और उनका पर्यावरण बरबाद कर दिया गया है। कृषि और पशुचारण के चीनी कुप्रबन्धन के कारण घास के मैदानों को जोत दिया गया जो तीव्र तिब्बती वायु वेग को न झेल पाने के कारण अब धूल के मैदान हो रहे हैं और पशुचारण की अति तथा याक के गोबर के पारम्परिक प्रयोग के स्थान पर झाड़ियों को उखाड़ कर जलावन के रूप में उपयोग करने के कारण भूमि का आवरण नष्ट हो चुका है।
कभी फलता फूलता वनजीवन चीनियों के हाथों लगभग समाप्त हो गया प्रतीत होता है। कभी इस क्षेत्र में भालू, भेंड़िये, जंगली मुर्गाबियाँ, बतखें, कृष्णग्रीव सारस, मत्स्य बाज और कुररी, तिब्बती नील भेंड़ों के समूह, जंगली याक, हिरन और बारहसिंघे पाये जाते थे। उनमें से अधिकांश अब लुप्तप्राय प्रतीत होते हैं, जिन्हें चीनियों की क्षुधा पूर्ति के लिये अधिकतर जीप पर लगी मशीनगनों के द्वारा मारा जाता रहा है।
इससे भी आगे बढ़ कर चीनियों ने लॉप नॉर क्षेत्र में आणविक परीक्षण कर पर्यावरण को खतरनाक क्षति पहुँचाई है और चीनी वातावरण में व्याप्त भयावह विकिरण विषाक्तता को स्वीकारते हैं। बहुत ही जल्दबाजी में इस क्षेत्र में रह रहे तिब्बतियों को पीकिंग (बीजिंग) भेजना पड़ गया। (जारी)

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
betnano giriş
vdcasino
Vdcasino giriş
vdcasino giriş
ngsbahis
ngsbahis
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
milanobet giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
kolaybet giriş
kolaybet
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
casibom giriş
casibom giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
runtobet giriş
runtobet giriş
runtobet giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
damabet
casinofast