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तिब्बत : सीखते अक्षर, भाग – 8

जनसंख्या विस्थापन और असंतुलन
निश्चित रूप से यह बताना सम्भव नहीं है कि पिछले 30 वर्षों में कितने तिब्बती मर मरा गये लेकिन इस संख्या के दस लाख तक होने की सम्भावना है। शांति हेतु एशियाई बौद्ध सम्मेलन(1982) के अंतरराष्ट्रीय सचिवालय के दलजीत सेन अदेल ने अनुमान लगाया कि पिछले तीन दशकों में कम्पूचिया और तिब्बत में कुल मिला कर चालीस लाख बौद्धों की हत्या कर दी गई। विश्वसनीय जानसांख्यिक आंकड़ों के अभाव में मामला और जटिल हो जाता है। उदाहरण के लिये, सन् 1959 में चीनियों द्वारा बताई गई तिब्बतियों की 11.9 लाख संख्या केवल भौगोलिक रूप से बहुत छोटे कर दिये गये ‘तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र’ से सम्बद्ध है (ऐतिहासिक खाम प्रांत का अधिकांश अब पड़ोसी चीनी प्रांतों कांसु, स्ज़ेचुआन और युनान में मिला दिया गया है।) नये मानचित्र पर एक दृष्टि डालने पर यह भी दिखता है कि तिब्बत का पुराना आम्डो क्षेत्र जिसकी जनसंख्या का बहुलांश तिब्बती मूल से है, अब चिंघाई प्रांत नाम से पुनर्नामित कर दिया गया है और उसे बाकी तिब्बत से अलग कर दिया गया है।


इस क्षेत्र पर चीनियों का दावा मुख्यत: पहले वर्णित सम्राट कांग ह्सी की 1720 में कूटनीतिक और सैन्य सफलताओं से आता है। अब बस यही कहा जा सकता है कि अब कई लाख तिब्बती मूल के लोग कथित तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र से बाहर रहते हैं। इस कथन का आधार यह है कि 1950 के पहले तिब्बतियों की सामान्यत: स्वीकृत जनसंख्या चालीस से साठ लाख के बीच थी। चीनियों के उलट बात बताने के बावज़ूद, तिब्बती जनसंख्या में आई असंदिग्ध कमी के निम्न कारण हैं:
(1) युद्ध:
वैज्ञानिक बौद्ध संगठन की एक उपसमिति ने चीन-तिब्बत युद्ध पर विस्तृत शोध किया और इस निष्कर्ष पर पहुँची कि युद्ध के समय विस्तार, प्रसार और तीव्रता के कारण मारे गये तिब्बतियों की संख्या लाखों में थी (इस अनुमान के कमतर होने की पर्याप्त सम्भावनायें हैं)| इस निष्कर्ष को इस तथ्य से पुष्टि मिलती है कि तिब्बत के कई भागों में स्त्रियों की संख्या पुरुषों से अधिक है, जब कि पहले खाम नाम से जाने जाते क्षेत्र जिसमें कि लड़ाई भयानक थी, 35 वर्ष से ऊपर आयु के बहुत कम पुरुष दिखते हैं। लड़ाई और उसके पश्चात प्रभावों के कारण दो पीढ़ियों का करीब करीब सफाया ही हो गया।
(2) जनसंहार:
चीनियों के द्वारा तिब्बतियों की भारी संख्या में हत्या कर दी गई है, 1960 में अकेले मध्य तिब्बत में ही ल्हासा विद्रोह के पश्चात 87000 तिब्बतियों की हत्या कर दी गई। संग्रहीत साक्षी रिपोर्टों के अनुसार 1966 में 17 दिनों के भीतर ल्हासा और उसके आस पास के क्षेत्रों में 69000 तिब्बती मार दिये गये। (17 दिनों में चीनियों द्वारा मारे गये तिब्बतियों की संख्या नाज़ियों द्वारा फ्रांस के साढ़े चार वर्षों के आधिपत्य के दौरान की गई हत्याओं से भी अधिक थी)। तिब्बत के विभिन्न भागों में सामूहिक हत्याओं के प्रमाणों का अभी अध्ययन चल रहा है। आम्डो, पूर्वी तिब्बत के गोलोक क्षेत्र के छ: जिलों के आँकड़ों में एक विशिष्ट पैटर्न देखा जा सकता है। 1957 में गोलोक की जनसंख्या 120000 थी। 1958 से 1962 के बीच 21000 स्थानीय तिब्बती पी एल ए के साथ लड़ाई में मारे गये, 20000 को स्थानीय जेलों में चीनियों ने मार डाला और चीनियों द्वारा खाद्य पदार्थों के अनिवार्य दोहन से उत्पन्न अकाल के कारण 20000 भुखमरी के शिकार हो गये। इसके अतिरिक्त 53000 को 1962 में निर्वासित कर दिया गया जो ‘लुप्त’ हो गये। मूल जनसंख्या में से केवल 6000 बचे जो कि 1963-79 के दौरान घट कर 4700 रह गये। बाहर से नये रहवासियों को ला कर जनसंख्या को 10000 तक बढ़ाया गया, जिनमें लगभग 2500 चीनी और 2500 ‘ग़ैर-चीनी’ थे।
(3) श्रमिक शिविर (Labour Camp):
पिछले तीस वर्षों में अनगिनत हजार तिब्बती, जेलों और बन्धुआ श्रमिक शिविरों में मर चुके हैं। 1951 में भीतरी मंगोलिया की सीमा से लगे चिउजिन की विशाल जेल में डा. तेंज़िन चोडाक बन्दी बनाये गये थे। जब वह अधिकतर चीनी रहवासियों वाले जेल में पहुँचे तो उन्हों ने पाया कि 300 तिब्बती बन्दियों में से 1957 तक केवल दो बचे थे, बाकियों की पिटाई, यातना, भूख और जबरन श्रमकार्यों के कारण मृत्यु हो गई।
स्थिति इतनी भयावह थी कि एक बन्दी तो आठ साल की आयु वाले एक बालक को मार कर खा गया। तीन वर्षों के भीतर ही डाक्टर चोडाक के साथ बन्दी बनाये गये तिब्बतियों में से दो तिहाई की मृत्यु हो गई। एक दूसरे तिब्बती एन.जे. तोप्ग्याल ने इस बारे में लिखा है कि कैसे कोंग्पो क्षेत्र में सड़क निर्माण कार्य के दौरान तिब्बती मक्खियों की तरह मरे।
चीनी मृत देहों के ढेर लगाते और जब उनकी ऊँचाई एक छोटी पहाड़ी सी हो जाती तो उन्हें आग के हवाले कर दिया जाता। एक अन्य तिब्बती किसान बन्दी आकलन करता है कि 1960-65 के दौरान ल्हासा के कुख्यात द्राप्ची बन्दीगृह में लगभग 10000 लोगों की मृत्यु हुई। साइनिंग में एक विशाल बन्दीगृह संकुल है जिसमें पाँचवे और छ्ठे दशक के दौरान बहुत से खाम्ब जनों को लाया गया जिनमें से अनगिनत तिब्बती भूख, यातना और पिटाई के कारण मृत्यु को प्राप्त हुये। सामान्यत: इस दूरवर्ती क्षेत्र के बारे में सूचनायें अत्यल्प हैं लेकिन एक पुराने अमेरिकी बन्दी ने तीसरे दशक में स्तालिन के साइबेरियाई संकुलों की याद दिलाते इस विशाल जेल संकुल के बारे में बताया है। उसने यह भी कहा कि इस क्षेत्र में रहने वाले बहुतेरे तिब्बती या तो बन्दी थे या ‘बन्धुआ/बलात कर्मचारी’। मिन्याक, द्राप्ची और साइनिंग जैसे जेल और लेबर कैम्प संकुल पूरे तिब्बत में कुख्यात हैं और बताने पर उसी भय का संचार करते हैं जैसा कि ऑस्कवित्ज़ (Auschwitz), बेल्सेन (Belsen) और दचाउ (Dachau) जैसे नाम यूरोप में। लेकिन कम से कम यूरोप में यह सब 1945 में समाप्त हो गया। तिब्बत में अभी भी जारी है।
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नोट:
(1) तीस वर्षों के भूतकाल का प्रारम्भ सन्दर्भ वर्ष 1984 है, जब कि चीनी अत्याचारों की मानवाधिकार हनन की दृष्टि से विवेचना प्रारम्भ हुई।
(2) ऑस्कवित्ज़ (Auschwitz), बेल्सेन (Belsen) और दचाउ (Dachau) हिटलर द्वारा यहूदियों के सफाये के लिये संस्थापित यातना संकुल थे।
(3) 1958 में प्रख्यात ‘प्रथम सम्राट’ शी हुआँग-ति का सन्दर्भ देते हुये माओ ने कहा,”कहते हैं कि उसने 400 विद्वानों को जीवित ही दफन कर दिया। हमने 40000 को दफन किया है। इसलिये कृपा कर के हमारी तुलना शी हुआँग-ति से न करें। हमने उसे सैकड़ोगुना अंतर से पछाड़ दिया है।”

अधिनायकवाद चाहे नाज़ी हो, फासी हो, पूँजीवादी हो या सर्वहारा का; दमन और नृशंस अत्याचारों का रूप कमोबेश एक सा ही रहता है। धर्म के अफीम को नकारते हुये कम्युनिस्ट क्रांति का गाँजा पीने वालों से और उनके क्रियाकलापों से सतर्क रहने की महती आवश्यकता है। वे भी अपने तंत्र को लोकतंत्र कहते हैं – सच्चा लोकतंत्र।
……अगले भागों में जारी
✍🏻गिरिजेश राव

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