vijender-singh-aryaऐसे जीओ हर घड़ी, जैसे जीवै संत
गतांक से आगे….

ऐसे जीओ हर घड़ी,
जैसे जीवै संत।
याद आवेगा तब वही,
जब आवेगा अंत ।। 630 ।।

प्रसंगवश कहना चाहता हूं कि ‘गीता’ के आठवें अध्याय के पांचवें श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं, हे पार्थ! जिनके चित्त में अंतकाल के समय भी मेरी स्मृति बनी रहती है, उसे मेरी प्राप्ति हो जाती है। सामान्य लोगों ने इसे ऐसे कहना शुरू कर दिया-‘अंत मति, सो गति’ अज्ञानी लोगों ने इसका अर्थ का अनर्थ कर दिया और कहना शुरू कर दिया कि मृत्यु के समय यदि मनुष्य भगवान का स्मरण कर ले, तो उसे भगवान की शरणागति मिल जाएगी, सदगति हो जाएगी। जरा सोचिए किसी ने मूली खाई है तो डकारें मूली की आयेंगी या खीर की? इसका सीधा सा उत्तर है-मूली खाने वाले को मूली की डकारें आयेंगी, जबकि खीर खाने वाले को खीर की आएंगी। ठीक इसी प्रकार यदि किसी ने जीवन भर पाप किये हों और मृत्यु के समय मात्र क्षण भर के लिए उसे परमात्मा की स्मृति हो जाए तो वह कैसे परमधाम को प्राप्त हो जाएगा अथवा कैसे सद्गति को प्राप्त हो जाएगा? याद रखो, क्षण भर के भाव से स्वभाव नही बनता है। स्वभाव तो स्थाई भाव से बनता है। इसलिए जिनके चित्त में जीवनपर्यन्त सत्चर्चा, सत्कर्म, पुण्य सत्चिंतन अर्थात प्रभु का सिमरण के भाव रहे हों, ऐसे व्यक्ति का स्वभाव सात्विक हो जाता है, वह संत प्रवृत्ति का हो जाता है। ऐसे संत पुरूष ही परमात्मा की शरणागति को प्राप्त होते हैं, सद्गति को प्राप्त होते हैं, अन्य नही। मृत्यु बेशक सामने खड़ी हो, फिर भी वे महर्षि देव दयानंद की तरह हंसकर कहते हैं-‘हे प्रभु! तूनै अच्छी लीला की, तेरी इच्छा पूर्ण हो, पूर्ण हो।’ ईशा मसीह ने भी सूली पर चढ़ते समय प्रभु का चिंतन किया और अपने हत्यारों के लिए प्रभु से प्रार्थना की-‘हे प्रभु! इन्हें क्षमा कर देना, ये जानते ही नही, हम क्या कर रहे हैं?’ हमारे राष्ट्र पिता महात्मा गांधी ने सीने में गोली लगने पर भी ‘हे राम! हे राम!!’ कहा था।
अत: यह कभी मत भूलो की जिस मनुष्य की जहां वासना होती है, उसी वासना के अनुसार अंत समय में चिंतन होता है, और उस चिंतन के अनुरूप ही मनुष्य की गति होती है। इससे स्पष्ट है कि परमात्मा के नाम अथवा सत्कर्म को अंत समय के लिए कभी मत छोड़ो, अपितु उससे हमेशा जुड़े रहिए। याद रखने वाली बात यह है कि जिस तरह सुई के पीछे-पीछे उसी मार्ग से धागा जाता है, ठीक इसी प्रकार मनुष्य (आत्मा) भी अंतकाल के चिंतन अथवा भाव के अनुसार उसी लोक में जाता है, उसी गति में जाता है। शरीर का सजातीय तत्व संसार (प्रकृति अथवा माया) है, जबकि हमारी आत्मा का सजातीय तत्व परमात्मा है। अत: जो जीवन पर्यन्त संसार (माया) में भटकते रहे अथवा आसक्त रहे, उन्हें मृत्यु के समय संसार ही याद आता है और जो जीवन पर्यन्त सत्चर्चा, सत्कर्म तथा सत्चिंतन अर्थात प्रभु स्मरण में रहे, उन्हें ही मृत्यु के समय परमपिता परमात्मा की सहजता से याद आती है। ऐसा व्यक्ति निर्मल लोकों को प्राप्त होता है, सद्गति को प्राप्त होता है, परमधाम को प्राप्त होता है।
विस्तृत जानकारी के लिए देखें, ‘गीता’ के चौदहवें अध्याय के 14वें, 15वें तथा 16वें श्लोक।
धन से चाहे संपन्न हो,
किंतु गुणों से हीन।
त्यागने में ही लाभ है,
रह लो मित्र विहीन ।। 631।।
क्रमश:

Comment:

mariobet giriş
mariobet giriş
betpark giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
hilarionbet giriş
hilarionbet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
hilarionbet giriş
hazbet giriş
hazbet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
maxwin giriş
maxwin giriş
norabahis giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
milanobet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
celtabet giriş
celtabet giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
noktabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
romabet giriş
romabet giriş
noktabet giriş
betwild giriş
betwild giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
nitrobahis giriş
nitrobahis giriş
nitrobahis giriş
nitrobahis giriş