अग्निहोत्र यज्ञ विषयक पठनीय एक पुस्तक ‘यज्ञ एक परिचय’

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ओ३म्
“अग्निहोत्र यज्ञ विषयक पठनीय एक पुस्तक ‘यज्ञ एक परिचय”
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गुरुकुल पौंधा-देहरादून ब्रह्मचारियों को वेद वेदांग का अध्ययन कराने के साथ वैदिक साहित्य का प्रकाशन भी करता है। इस कार्य के लिये गुरुकुल ने ‘आचार्य प्रणवानन्द विश्वनीड़-न्यास’ नाम से एक संस्था का गठन किया हुआ है। इस न्याय का नवीनतम प्रकाशन है ‘यज्ञ एक परिचय’। यह पुस्तक नवम्बर, 2020 में प्रकाशित हुई है। यह पुस्तक का प्रथम संस्करण है। यथा नाम तथा गुण के अनुरूप88 पृष्ठों की यह पुस्तक यज्ञ प्रेमियों के लिये पठनीय एवं सग्रहणीय है। पुस्तक में पंचमहायज्ञों के विधि भाग को भी संकलित कर प्रस्तुत किया गया है। इस पुस्तक के लेखक गुरुकुल के ही एक मेधावी ब्रह्मचारी श्री राहुल आर्य हैं। आचार्य प्रणवानन्द विश्वनीड-न्याय गुरुकुल परिसर में ही स्थित है। इसका पता है ‘दूनवाटिका-2, गुरुकुलपौन्धा, देहरादून (उत्तराखण्ड)’। न्यास का मोबाइल नं. 9411106104 है तथा इमेल arsh.jyoti@yahoo.in है। न्यास की वेबसाइट है: www.pranwanand.org। इस पुस्तक का शब्द संयोजन गुरुकुल के एक सुयोग्य ब्रह्मचारी एवं आचार्य श्री शिवदेव आर्य जी ने किया है।

श्री शिवदेव आर्य गुरुकुल की मासिक पत्रिका ‘आर्ष ज्योति’ का सम्पादन भी करते हैं। वह स्वयं ही पत्रिका की प्रेस व मुद्रण प्रति तैयार करते हैं। गुरुकुल से पूर्व में प्रकाशित अनेक पुस्तकों की मुद्रणार्थ प्रेस प्रति भी उन्होंने ही तैयार की हैं। गुरुकुल का वार्षिक उत्सव जून, 2020 माह में हुआ था जिसका आनलाइन प्रसारण गुरुकुल के फेसबुक पृष्ठ से श्री शिवेदव आर्य जी के प्रयासों से हुआ था। इस उत्सव में अमेरिका, मुम्बई आदि दूरस्थ स्थानों के आर्य विद्वानों के प्रवचनों एवं भजनीकों के भजनों का आनलाइन प्रसारण सफलतापूर्वक किया गया था। श्री शिवदेव आर्य जी एक बहुप्रतिभाशाली विनम्र स्वभाव के ऋषिभक्त युवक हैं। हम उन्हें अपनी हार्दिक शुभकामनायें देते हैं। यह पुस्तक सहारनपुर में ‘नन्दिता इन्टरप्राईजेज, राधा विहार’ से मुद्रित हुई है। इस पुस्तक का मूल्य 20 रुपये मात्र है जिसे गुरुकुल पौंधा-देहरादून सहित गुरुकुल गौतमनगर, दिल्ली से प्राप्त किया जा सकता है।

पुस्तक का प्रकाशकीय गुरुकुल के आचार्य डा. धनंजय जी ने लिखा है। उन्होंने बताया है कि ‘यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म’ के व्यवहारिक प्रयोग नियम से यज्ञ प्रत्येक उस कर्म का नाम है, जिससे व्यक्ति तथा समाज, जड़ तथा जंगम, वर्तमान तथा भविष्य का भद्र विधान किया जाता है। अतः वैदिक विचारधारा में यज्ञ का विशेष महत्व रहा है। वेदिक मान्यता यज्ञ को आध्यात्मिक तथा भौतिक दृष्टि से स्वीकार करती है। यज्ञ उध्र्वगामिता, आन्तरिक शत्रुओं का दमन, तेजस्विता, देवपूजा, शान्ति, संगठन आदि भावनाओं को उद्बुद्ध करता है तथा भौतिक दृष्टि से यह वायुमण्ड को शुद्ध करता है। यज्ञ में डाला हुआ पदार्थ नष्ट नहीं होता। अग्नि का काम स्थूल पदार्थ को सूक्ष्म रूप में परिवर्तित करना है। यजुर्वेद में अग्नि को धूरसि कहकर सम्बोधित किया है। धूरसि अर्थात् भौतिक अग्नि सब पदार्थों का छेदन तथा अन्धकार का नाश करने वाला है। भौतिक अग्नि धूरसि इसलिये है कि वह उन होम द्रव्यों को परमाणुरूप करके वायु और जल के साथ मिलाकर शुद्ध कर दे। आचार्य धनंजय जी आगे कहते हैं कि वैदिक यज्ञ के पुरोधा महर्षि दयानन्द सरस्वती ने पंचमहायज्ञविधि को नित्यकर्मविधि के रूप में सम्बोधित किया है। वे पंचमहायज्ञविधि के आरम्भ में लिखते हैं- ‘यह पुस्तक नित्यकर्म विधि का है, इसमें पंचमहायज्ञों का विधान है।…. इन नित्यकर्मों के फल ये हैं कि ज्ञान प्राप्ति से आत्मा की उन्नति और आरोग्यता होने से शरीर के सुख से व्यवहार और परमाथ कार्यों की सिद्धि होना, उससे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सिद्ध होते हैं। इनको प्राप्त होकर मनुष्य को सुखी होना उचित है।’ महर्षि के उक्त वचन से सुस्पष्ट है कि प्रत्येक मनुष्य को यज्ञ अवश्य करना चाहिये।

पुस्तक का प्राक्कथन पुस्तक के लेखक ब्र. राहुल आर्य ने लिखा है। वह कहते हैं कि विज्ञान के इस मशीनी युग में मनुष्य ने समय को तो बचा लिया है किन्तु उस बचे हुए समय का सदुपयोग कैसे हो? इस बात से वह आज भी अनभिज्ञ है। आज मनुष्य सुख का मूल यन्त्रों व मशीनों में खोज रहा है। यह एक अति भ्रामक स्थिति है। वर्तमान में यन्त्रों का सम्बन्ध केवल शरीर से है, अध्यात्म से तो वह बहुत परे है। यदि हम प्राचीन सभ्यता की ओर दृष्टिपात करें तो ज्ञात होता है कि वैदिक युग किसी भी प्रकार से विज्ञान से अनभिज्ञ नहीं था अपितु आज के इस मशीनी युग से अति ज्येष्ठ-श्रेष्ठ था। यज्ञ के पदार्थ विज्ञान का एक उत्कृष्ट रूप हैं तथा प्राचीन वैज्ञानिकता का एक ज्वलन्त उदाहरण है। अतः मनुष्य जीवन के लिए यज्ञ कर्म को सर्वोत्कृष्ट बतलाया गया है। ब्राह्मण तथा कल्प-सूत्रों में अनेक प्रकार के यज्ञों का वर्णन प्राप्त होता है जिनके एक-तिहाई भाग के विषय में ही हम वर्तमान समय में जानते हैं और जिस एक-तिहाई भाग को हम जानते हैं उसको भी हम जीवन में न उतारकर केवल पूजा-पाठ तक ही सीमित रखते हैं। महाभारतकाल पर्यन्त प्रायः सभी यज्ञों का प्रयोग होता आया है किन्तु उसके पश्चात् प्राचीन ज्ञान-विज्ञान के साथ-साथ यज्ञ-विज्ञान का भी विनाश प्रारम्भ हो गया और जो कुछ किंचित यज्ञ-विषयक ज्ञान अवशिष्ट रहा वह भी अन्धविश्वास में परिवर्तित हो गया। जिस यज्ञ का हिंसा के साथ दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं था तथा जिसे ‘अध्वर’ आदि नामों से जाना जाता रहा, जिसका फल ही ही मोक्ष हुआ करता था, ऐसे यज्ञों का विकृतरूप उत्तरकाल में उभरकर सामने आया तथा जिसमें पशुबलि एक अनिवार्य क्रिया बन गई। यज्ञ के नाम पर अनेक प्रकार के कुकृत्यों का प्रचलन धूर्त-पाखण्डियों द्वारा किया गया। तमस के इस घोर वातावरण में वेदों के पुनरुद्धारक महर्षि दयानन्द सरस्वती का उदय हुआ जिन्होंने हिंसा में प्रवृत्त की हुई यज्ञाग्नि को उसका सही स्वरूप दिखाया तथा जनसमूह के समक्ष यज्ञ का विलुप्त हुआ विज्ञान विषयक दृष्टिकोण प्रस्थापित किया।

प्राक्कथन के पश्चात पुस्तक में सम्मिलित विषयों की सूची दी गई है। इनमें जो विषय सम्मिलित हैं वह हैं1- यज्ञ एक परिचय, 2- पंचमहायज्ञ, 3- यज्ञीय अग्नि, 4- श्रौत् एवं स्मार्त यज्ञ, 5- ऋत्विजों की संख्या, 6- यज्ञ में मन्त्र विनियोग, 7- हवनीय पदार्थ, 8- हवनीय द्रव्यों का विवेचन, 9- यज्ञकुण्ड की परिधि, 10- विभिन्न यज्ञों में प्रयोग किये जाने वाले यज्ञकुण्डों के प्रकार, 11- यज्ञ पात्र, 12- यज्ञशाला, 13- यज्ञ करने का समय, 14- ऋतु अनुसार यज्ञ-सामग्री, 15- यज्ञ की वैज्ञानिकता एवं चिकित्सा, 16- सामग्री, 17- यज्ञ द्वारा वर्षा, 18- वेदों में यज्ञ, 19- ब्राह्मण-ग्रन्थों में यज्ञ, 20- आरण्यक-ग्रन्थों में यज्ञ, 21- उपनिषद् ग्रन्थों में यज्ञ, 22- स्मृति ग्रन्थों में यज्ञ, 23- गीता में यज्ञ, 24- महर्षि दयानन्द और यज्ञ, 25- अथ ब्रह्मयज्ञ (वैदिक सन्ध्या), 26- अथ देवयज्ञ-अग्निहोत्रम्, 27- बृहद् यज्ञ-मन्त्र, 28- अथ पितृयज्ञ, 29- अथ बलिवैश्वदेव यज्ञ, 30- अथ अतिथि यज्ञ, 31- वैदिक राष्ट्रीय प्रार्थना, 32- भोजन मन्त्र, 33- यज्ञोपवीत मन्त्र, 34- व्रत मन्त्र, 35- प्रार्थना मन्त्र, 36- प्रातः जागरण-प्रार्थना-मन्त्र, 37- शयन-प्रार्थना-मन्त्र, 38- मंगलकार्य, 39- महावामदेव्यम्, 40- यज्ञ प्रार्थना एवं 41- शान्तिपाठ। इस विषय सूची के बाद सभी विषयों को सारगर्भित रूप में विवरण सहित प्रस्तुत किया गया है।

साधना, उपासना, ध्यान व चिन्तन सहित अग्निहोत्र यज्ञ में रुचि रखने वाले सभी बन्धुओं को इस पुस्तक को देखना चाहिये। यह पुस्तक उपयेागी है। इसके अध्ययन से पढ़े हुए विषयों की पुनरावृत्ति व स्मृति होगी और कुछ नई बातें भी ज्ञात होंगी जो या तो पढ़ी हुई नहीं होंगी या विस्मृति के कारण ध्यान में नहीं होंगी। हम इस पुस्तक के लेखक श्री राहुल आर्य जी को शुभकामनायें देते हैं और इसके प्रकाशक सहित न्यास के अध्यक्ष आचार्य डा. धनंजय जी को पुस्तक प्रकाशन के लिये बधाई देते हैं। हम आशा करते हैं कि भविष्य में भी न्यास की ओर से उपयोगी साहित्य का प्रकाशन किया जाता रहेगा। गुरुकुल पौंधा सहित आचार्य प्रणवानन्द विश्वनीड़-न्यास को हमारी ओर से आभार एवं धन्यवाद।

-मनमोहन कुमार आर्य

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