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भूख से तड़प-तड़प कर मरा पत्रकार, चंदा करके हुआ अंतिम संस्‍कार

राम किशोर पंवार, वैतूल से

blac and red scene sky

जहां एक ओर भाजपा के अच्छे दिन आने वाले है वहीं दूसरी ओर भाजपा शासित मध्यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्य बैतूल जिला मुख्यालय पर एक पत्रकार नौकरी से निकाले जाने के बाद भूख की वजह से काल के गाल में समा गया। बैतूल में एक पूर्व विधायक और उद्योगपति द्वारा शुरू की गई कंपनी द्वारा संचालित फोर कलर में छपने वाले हिन्दी दैनिक समाचार पत्र के प्रिंट लाइन में बतौर स्थानीय संपादक छपने वाले प्रदीप उर्फ मोनू रैकवार की मौत के बाद अंतिम संस्कार भी चंदा करके किया।

जिला केन्द्रीय सहकारी बैक में कार्यरत पिता की मृत्यु के बाद उसके स्थान पर अनुकम्पा नौकरी के लिए दर – दर भटकने तथा सौतेली मां के द्वारा लगाई गई आपित्त के बाद पिता की नौकरी से वंचित पत्रकार के परिवार के भरण पोषण का माध्यम बनी दैनिक प्रादेशिक ‘जनमत बैतूल’ की नौकरी से कुछ दिनो पूर्व समाचार पत्र संस्थान के पर्दे के पीछे कर्ता-धर्ता बने संचालक मण्डल के एक सदस्य से हुई नोक- झोक के बाद नौकरी से निकाले गए प्रदीप ऊर्फ मोनू रैकवार ने यहां – वहां पर नौकरी के लिए प्रयास किये लेकिन नौकरी नहीं मिली और पत्नी भी छोटी सी बेटी को लेकर मायके चली गई। इन सब हादसो के बाद सदमे में आए पत्रकार ने शराब का अत्याधिक सेवन किया और घर में अनाज का एक दाना भी नहीं होने के कारण वह भूखा प्यासा मर गया। उसने सुबह पड़ोस से पीने के लिए पानी मांगा लेकिन पानी का एक घूट भी नहीं पी पाया और काल के गाल में समा गया। जैसे ही मोनू रैकवार की मौत की खबर पूरे शहर में फैली जिला मुख्यायल के पत्रकारों ने उसके परिवार की खबर ली लेकिन उनके पास अंतिम संस्कर के लिए पचास रूपये भी नही होने की वज़ह से पत्रकारों ने अंतिम संस्कार के लिए एक दूसरे से आर्थिक सहयोग चंदा के रूप में लिया और देर रात्रि उसका अंतिम संस्कार किया।

लेकिन मोनू के मौत से जुड़े हादसे अभी यहीं खत्म नहीं हुए थे। भूख से मिली मौत के बाद न सिर्फ जन संपर्क कार्यालय ने मोनू रैकवार को पत्रकार मानने से इंकार कर दिया बल्कि खुद वह अखबार उन्हें पत्रकार मानने के लिए तैयार न हुआ जिसके प्रिंटलाइन में कभी मोनू का नाम छपता था। इसके बाद कुछ लोगों ने प्रिंट लाइन में छपे नाम के प्रमाण प्रस्तुत किए लेकिन संस्थान की ओर से जिला जन सम्पर्क कार्यालय एवं जिला प्रशासन को गुमराह करने का प्रयास किया गया कि उसे एक सपताह पूर्व निकाला जा चुका है। जब पत्रकारो ने किसी भी पत्रकार को संस्थान से निकाले जाने पर पूर्व सूचना पत्र या कारण बताओं नोटिस देने तथा तीन माह की नौकरी का वेतन देने की बात कहीं तो पूरा मामला तूल पकडऩे लगा।

जिले में कार्यरत पत्रकार संगठन आइसना, एमपी वर्कींग जर्नलिस्ट यूनियन, बैतूल मीडिया सेंटर सोसायटी, राष्ट्रीय पत्रकार मोर्चा, आईएफडब्लयूजे, मध्यप्रदेश श्रमजीवी पत्रकार संगठन से जुड़े पत्रकारो ने पूरे मामले की जानकारी भोपाल से लेकर दिल्ली तक दी तो पूरा मामला गरमाने लगा। जिले के पत्रकारों ने जिला कलैक्टर बैतूल को मृतक पत्रकार की बेवा पत्नी को मुख्यमंत्री आर्थिक सहायता से एक लाख रूपये की सहायता देने की मांग का ज्ञापन दिया। पत्रकारों ने राज्य के सीपीआर राकेश श्रीवास्तव से भी चर्चा की तथा पूरे मामले की जानकारी दी। चुनाव आचार संहिता हटने के बाद मृतक पत्रकार की पत्नी को आर्थिक सहायता दिलवाने का आश्वासन मिला।
इधर पत्रकारों ने आपस में चंदा एकत्र कर मृतक की पत्नी को अंतिम संस्कार के बाद के क्रियाकर्म के लिए 11 हजार रूपये की राशि एकत्र कर भेंट की। बैतूल जिले में पूर्व विधायक के परिजनो के द्वारा संचालित दैनिक समाचार पत्र के स्थानीय संपादक मोनू रैकवार की मौत के कारणो के पीछे संस्थान की भूमिका की पत्रकार संगठनो ने भी जांच की मांग की है। इस संदर्भ में सभी पत्रकार संगठनो ने अपने – अपने स्तर पर मांग पत्र राज्य सरकार को भिजवाने शुरू कर दिये है। बैतूल जिले में पत्रकारो के भी दो रूप देखने को मिले। कुछ टीवी चैनलो एवं बड़े बैनरो के वे पत्रकार जो पूर्व विधायक एवं उद्योगपति से उपकृत होते चले आ रहे थे उनके द्वारा पत्रकार की मौत को शराब पीने से हुई सामान्य मौत बता कर पूरे मामले को दबाने का प्रयास भी किया।

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