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भारत की आत्मा ग्रामों में बसती है अतः देश में ग्रामीण विकास ज़रूरी

अर्थ की महत्ता आदि काल से चली आ रही है। आचार्य चाणक्य ने भी कहा है कि राष्ट्र जीवन में समाज के सर्वांगीण उन्नति का विचार करते समय अर्थ आयाम का चिंतन अपरिहार्य बनता है। इस दृष्टि से जब हम इतिहास पर नज़र डालतें हैं तो पता चलता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था का गौरवशाली इतिहास रहा है एवं जो भारतीय संस्कृति हज़ारों सालों से सम्पन्न रही है, उसका पालन करते हुए ही उस समय पर अर्थव्यवस्था चलाई जाती थी। भारत को उस समय सोने की चिड़िया कहा जाता था। वैश्विक व्यापार एवं निर्यात में भारत का वर्चस्व था। पिछले लगभग 5000 सालों के बीच में ज़्यादातर समय भारत विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था रहा है। उस समय भारत में कृषि क्षेत्र में उत्पादकता अपने चरम पर थी एवं कृषि उत्पाद विशेष रूप से मसाले, आदि भारत से, लगभग पूरे विश्व में पहुंचाए जाते थे। मौर्य शासन काल, चोला शासन काल, चालुक्य शासन काल, अहोम राजवंश, पल्लव शासन काल, पण्ड्या शासन काल, छेरा शासन काल, गुप्त शासन काल, हर्ष शासन काल, मराठा शासन काल, आदि अन्य कई शासन कालों में भारत आर्थिक दृष्टि से बहुत ही सम्पन्न देश रहा है। धार्मिक नगर – प्रयागराज, बनारस, पुरी, नासिक, आदि जो नदियों के आसपास बसे हुए थे, वे उस समय पर व्यापार एवं व्यवसाय की दृष्टि से बहुत सम्पन्न नगर थे। भारत में ब्रिटिश एंपायर के आने के बाद (ईस्ट इंडिया कम्पनी – 1764 से 1857 तक एवं उसके बाद ब्रिटिश राज – 1858 से 1947 तक) विदेशी व्यापार में भारत का पराभव का दौर शुरू हुआ एवं स्वतंत्रता प्राप्ति तक एवं कुछ हद्द तक इसके बाद भी यह दौर जारी रहा है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक दृष्टि से भारत का दबदबा इसलिए था क्योंकि उस समय पर भारतीय संस्कृति का पालन करते हुए ही आर्थिक गतिविधियाँ चलाईं जाती थीं। परंतु, जब से भारतीय संस्कृति के पालन में कुछ भटकाव आया, तब से ही भारत का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर से वर्चस्व कम होता चला गया। दूसरे, आक्रांताओं ने भी भारत, जिसे सोने की चिड़िया कहा जाता था, को बहुत ही दरिंदगी से लूटा था। इस सबका असर यह हुआ कि ब्रिटिश राज के बाद तो भारत कृषि उत्पादन में भी अपनी आत्मनिर्भरता खो बैठा।

आज भी देश में 60 प्रतिशत से अधिक आबादी ग्रामों में निवास करती है और अपने रोज़गार के लिए मुख्य रूप से कृषि क्षेत्र पर ही निर्भर है। भारत अभी भी कृषि प्रधान देश ही कहा जाता है परंतु फिर भी भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का हिस्सा लगभग मात्र 16-18 प्रतिशत ही है। कृषि जनगणना 2015-16 के अनुसार, भारत में लघु एवं सीमांत किसानों की संख्या 12.563 करोड़ है। देश में 35 प्रतिशत किसानों के पास 0.4 हेक्टेयर से कम जमीन है। जबकि, 69 प्रतिशत किसानों के पास 1 हेक्टेयर से कम जमीन है और 87 प्रतिशत किसानों के पास 2 हेक्टेयर से कम जमीन है। आमदनी के लिहाज़ से 0.4 हेक्टेयर से कम जमीन वाले किसान औसतन सालाना रुपए 8,000 कमाते हैं और 1 से 2 हेक्टेयर के बीच जमीन वाले किसान औसतन सालाना रुपए 50,000 कमाते हैं। देश मे लघु और सीमांत किसानों की न केवल आय कम है, बल्कि इनके लिए कृषि एक जोखिम भरा कार्य भी है। इसके चलते ग्रामों में प्रति व्यक्ति आय बहुत ही कम है अतः ग़रीबी की मात्रा भी शहरों की तुलना में ग्रामों में अधिक दिखाई देती है। इस तरह से यदि यह कहा जाय कि भारत की आत्मा ग्रामों में निवास करती है तो यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

आज जब देश में आत्म-निर्भर भारत की बात की जा रही है, तो सबसे पहिले हमें देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आत्म-निर्भर बनाए जाने की ज़्यादा महती आवश्यकता दिखती है। भारतीय आर्थिक चिंतन में भी इस बात का वर्णन किया गया है कि आर्थिक विकास एक तो मनुष्य केंद्रित हो और दूसरे यह सर्वसमावेशी हो। यदि आर्थिक विकास के दौरान आर्थिक विषमता की खाई बढ़ती जाय तो ऐसी व्यवस्था राष्ट्र के लिए घातक सिद्ध हो सकती है। शोषण मुक्त और समतायुक्त समाज को साकार करने वाला सर्व समावेशी विकास ही सामाजित जीवन को स्वस्थ और निरोगी बना सकता है। आदरणीय पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी भी कहते थे कि पंक्ति में अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति का जब तक विकास नहीं हो जाता तब तक देश का आर्थिक विकास एक तरह से बेमानी है। इस दृष्टि से आज भारत के ग्रामों में जब ग़रीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले व्यक्तियों की एक अच्छी ख़ासी संख्या विद्यमान हो तो देश के आर्थिक विकास को बेमानी ही कहा जाएगा। ग्राम, जिले, प्रांत एवं देश को इसी क्रम में आत्मनिर्भर बनाया जाना चाहिए।

अतः आज आश्यकता इस बात की है कि अब पुनः भारतीय संस्कृति को केंद्र में रखकर ही आर्थिक विकास किया जाना चाहिए। भारतीय संस्कृति में भौतिकवाद एवं अध्यात्मवाद दोनों में समन्वय स्थापित करना सिखाया जाता है एवं भारतीय जीवन पद्धति में मानवीय पहलुओं को प्राथमिकता दी जाती है। देश में आर्थिक विकास को आंकने के पैमाने में, ग्रामीण इलाक़ों में निवास कर रहे लोगों द्वारा प्राप्त किये गए स्वावलम्बन की मात्रा, रोज़गार के नए अवसरों का सृजन, नागरिकों में आनंद की मात्रा, आदि मानदंडो को शामिल किया जाना चाहिए। साथ ही, ऊर्जा दक्षता, पर्यावरण की अनुकूलता, प्रकृति से साथ तालमेल, विज्ञान का अधिकतम उपयोग, विकेंद्रीयकरण को बढ़ावा आदि मानदंडो पर भी ध्यान दिए जाने की आज आवश्यकता है। सृष्टि ने जो नियम बनाए हैं उनका पालन करते हुए ही देश में आर्थिक विकास होना चाहिए। अतः आज भी देश की संस्कृति, जो इसका प्राण है, को अनदेखा करके यदि आर्थिक रूप से आगे बढ़ेंगे तो केवल शरीर ही आगे बढ़ेगा प्राण तो पीछे ही छूट जाएंगे। इसलिए भारत की जो अस्मिता, उसकी पहिचान है उसे साथ में लेकर ही आगे बढ़ने की ज़रूरत है। पिछले छह से अधिक महीनों से पूरे विश्व पर जो कोरोना वायरस महामारी की मार पड़ रही है उसके कारण आज सारी दुनिया भी विचार करने लगी है और पर्यावरण का मित्र बनकर मनुष्य और सृष्टि का एक साथ विकास साधने वाले भारतीय विचार के मूल तत्वों की ओर पूरी दुनिया लौटती दिख रही है एवं भारत की ओर आशा भरी नज़रों से देख रही है।

भारत में ग्रामों से पलायन की समस्या भी विकराल रूप धारण किए हुए है। अभी तक उद्योग धंधे सामान्यतः उन इलाक़ों में अधिक स्थापित किए गए जहां कच्चा माल उपलब्ध था अथवा उन इलाक़ों में जहां उत्पाद का बाज़ार उपलब्ध था। महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, आदि प्रदेशों में इन्हीं कारणों के चलते अधिक मात्रा में उद्योग पनपे हैं। हालांकि, मांग एवं आपूर्ति का सिद्धांत भी तो लागू होता है। महाराष्ट्र एवं गुजरात में बहुत अधिक औद्योगिक इकाईयां होने के कारण श्रमिकों की मांग अधिक है जबकि इन प्रदेशों में श्रमिकों की उपलब्धता कम हैं। इन प्रदेशों में पढ़ाई लिखाई का स्तर बहुत अच्छा है एवं लोग पढ़ लिखकर विदेशों की ओर चले जाते हैं अथवा ब्लू-कॉलर रोज़गार प्राप्त कर लेते हैं। अतः इन राज्यों में श्रमिकों की कमी महसूस की जाती रही है। श्रमिकों की आपूर्ति उन राज्यों से हो रही है जहां शिक्षा का स्तर कम है एवं इन प्रदेश के लोगों को ब्लू कॉलर रोज़गार नहीं मिल पाते हैं अतः इन प्रदेशों के लोग अपनी आजीविका के लिए केवल खेती पर निर्भर हो जाते हैं। साथ ही, गावों में जो लोग उत्साही हैं एवं अपने जीवन में कुछ कर दिखाना चाहते हैं वे भी शहरों की ओर पलायन करते हैं क्योंकि उद्योगों की स्थापना भी इन प्रदेशों में बहुत ही कम मात्रा में हुई है। उक्त कारण से आज पलायन का दबाव उन राज्यों में अधिक महसूस किया जा रहा है जहां जनसंख्या का दबाव ज़्यादा है एवं जहां उद्योग धंधों का सर्वथा अभाव है, यथा उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, आदि।

इसलिए आज देश के आर्थिक विकास को गति देने के लिए कुटीर उद्योग तथा सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों को ग्राम स्तर पर ही चालू करने की सख़्त ज़रूरत है। इसके चलते इन गावों में निवास करने वाले लोगों को ग्रामीण स्तर पर ही रोज़गार के अवसर उपलब्ध होंगे एवं गावों से लोगों के शहरों की ओर पलायन को रोका जा सकेगा। देश में अमूल डेयरी के सफलता की कहानी का भी एक सफल मॉडल के तौर पर यहां उदाहरण दिया जा सकता है। अमूल डेयरी आज 27 लाख लोगों को रोज़गार दे रही है। यह शुद्ध रूप से एक भारतीय मॉडल है। देश में आज एक अमूल डेयरी जैसे संस्थान की नहीं बल्कि इस तरह के हज़ारों संस्थानों की आवश्यकता है।

वास्तव में, कुटीर एवं लघु उद्योंगों के सामने सबसे बड़ी समस्या अपने उत्पाद को बेचने की रहती है। इस समस्या का समाधान करने हेतु एक मॉडल विकसित किया जा सकता है, जिसके अंतर्गत लगभग 100 ग्रामों को शामिल कर एक क्लस्टर (इकाई) का गठन किया जाय। 100 ग्रामों की इस इकाई में कुटीर एवं लघु उद्योगों की स्थापना की जाय एवं उत्पादित वस्तुओं को इन 100 ग्रामों में सबसे पहिले बेचा जाय। सरपंचो पर यह ज़िम्मेदारी डाली जाय कि वे इस प्रकार का माहौल पैदा करें कि इन ग्रामों में निवास कर रहे नागरिकों द्वारा इन कुटीर एवं लघु उद्योगों में निर्मित वस्तुओं का ही उपयोग किया जाय ताकि इन उद्योगों द्वारा निर्मित वस्तुओं को आसानी से बेचा जा सके। तात्पर्य यह है कि स्थानीय स्तर पर निर्मित वस्तुओं को स्थानीय स्तर पर ही बेचा जाना चाहिए। ग्रामीण स्तर पर इस प्रकार के उद्योगों में शामिल हो सकते हैं – हर्बल सामान जैसे साबुन, तेल आदि का निर्माण करने वाले उद्योग, चाकलेट का निर्माण करने वाले उद्योग, कुकी और बिस्कुट का निर्माण करने वाले उद्योग, देशी मक्खन, घी व पनीर का निर्माण करने वाले उद्योग, मोमबत्ती तथा अगरबत्ती का निर्माण करने वाले उद्योग, पीने की सोडा का निर्माण करने वाले उद्योग, फलों का गूदा निकालने वाले उद्योग, डिसपोज़ेबल कप-प्लेट का निर्माण करने वाले उद्योग, टोकरी का निर्माण करने वाले उद्योग, कपड़े व चमड़े के बैग का निर्माण करने वाले उद्योग, आदि इस तरह के सैंकड़ों प्रकार के लघु स्तर के उद्योग हो सकते है, जिनकी स्थापना ग्रामीण स्तर पर की जा सकती है। इस तरह के उद्योगों में अधिक राशि के निवेश की आवश्यकता भी नहीं होती है एवं घर के सदस्य ही मिलकर इस कार्य को आसानी सम्पादित कर सकते हैं। परंतु हां, उन 100 ग्रामों की इकाई में निवास कर रहे समस्त नागरिकों को उनके आसपास इन कुटीर एवं लघु उद्योग इकाईयों द्वारा निर्मित की जा रही वस्तुओं के उपयोग को प्राथमिकता ज़रूर देनी होगी। इससे इन उद्योगों की एक सबसे बड़ी समस्या अर्थात उनके द्वारा निर्मित वस्तुओं को बेचने सम्बंधी समस्या का समाधान आसानी से किया जा सकेगा। देश में स्थापित की जाने वाली 100 ग्रामों की इकाईयों की आपस में प्रतिस्पर्धा भी करायी जा सकती है जिससे इन इकाईयों में अधिक से अधिक कुटीर एवं लघु उद्योग स्थापित किए जा सकें एवं अधिक से अधिक रोज़गार के अवसर निर्मित किए जा सकें। इन दोनों क्षेत्रों में राज्यवार सबसे अधिक अच्छा कार्य करने वाली इकाईयों को राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार प्रदान किए जा सकते हैं। इस मॉडल की सफलता सरपंचो एवं इन ग्रामों में निवास कर रहे निवासियों की भागीदारी पर अधिक निर्भर रहेगी।

भारत आज कृषि उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर हो चुका है अतः अब इस क्षेत्र से निर्यात बढ़ाने के प्रयास भी किए जाने चाहिए। इसके लिए किसानों को न केवल अपने उत्पाद की गुणवत्ता में सुधार करना होगा बल्कि अपनी उत्पादकता में भी वृद्धि करनी होगी। शीघ्र ख़राब होने वाले कृषि उत्पादों का स्टोरेज करने के लिए कोल्ड स्टोरेज की चैन को ग्रामीण स्तर पर देश के कोने कोने में फैलाना होगा एवं ग्रामीण स्तर पर ही खाद्य प्रसंस्करण इकाईयों की स्थापना करनी होगी। ग्रामों में आधारिक संरचना का विकास भी करना होगा ताकि कृषि उत्पादों को शीघ्र ही ग्रामों से उपभोग स्थल तक पहुंचाया जा सके। देश में किसानों को भी अब समझना पड़ेगा कि कृषि क्षेत्र से निर्यात बढ़ाने के लिए ओरगेनिक खेती की ओर मुड़ना ज़रूरी है एवं अंतरराष्ट्रीय मानदंडो के अनुरूप ही कृषि उत्पादन करने की ज़रूरत है।

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