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ट्रंप के द्वारा भारत की इस तरह आलोचना करने का क्या यह उचित अवसर था?

ललित गर्ग

जलवायु परिवर्तन के लिए अमेरिका बहुत हद तक जिम्मेदार है, लेकिन वह ट्रंप के नेतृत्व में अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़कर दूसरों को दोष दे रहा है। कोरोना महामारी में सर्वाधिक विकसित देश ने जिस तरह की विनाशलीला देखी, वह भी वहां की शासन-व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्न बनी है।

अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव बहुत दिलचस्प मोड़ पर पहुंच चुका है। तीन नवम्बर को अमेरिका की आम जनता नए राष्ट्रपति का चुनाव करने के लिए मतदान करेगी। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके प्रतिद्वंद्वी जो बाइडेन के बीच सीधा मुकाबला है। इन चुनावों में भारतीय मूल के अमेरिकियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है, बावजूद इसके डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर भारत की जिस तरह आलोचना की है, वह न सिर्फ दुखद, विरोधाभासी बल्कि शुद्ध रूप से राजनीति प्रेरित है। भले ही इस आलोचना का कारण कोरोना महामारी एवं बढ़ते पर्यावरण संकटों का ट्रंप पर दबाव हो, अपने देश की जनता से जुड़े इस तरह के सवालों के सटीक जवाब न दे पाने की स्थिति में क्या भारत की आलोचना या चर्चा औचित्यपूर्ण है? इस तरह के बयान एवं आलोचना राजनीतिक अपरिपक्वता की तो परिचायक है ही, सोच के अंधेरों की भी द्योतक है। मतदाताओं को लुभाने के लिये इस तरह के अंधेरों की नहीं, बल्कि रोशनी की जरूरत होती है। ‘रोशनी’ एक बहुत सीधी-सादी लेकिन कुछ बेवफा किस्म की चीज है। वह एक-न-एक दिन सबको नंगा कर देती है। उनको तो जरूर ही जो उसे आवरणों में कैद रखना चाहते हैं।

राजनीति के हमाम में सब नंगे हैं एवं राजनीति में सब कुछ जायज है, को डोनाल्ड ट्रंप ने भी अमेरिका में चल रहे युद्धस्तरीय चुनाव प्रचार में चरितार्थ कर दिया। भारत की आलोचना वाले डोनाल्ड ट्रंप के उद्गार, ‘चीन को देखो, कितना गंदा है। रूस को देखो, भारत को देखो, ये बहुत गंदे हैं, हवा गंदी है।’ आश्चर्यकारी है इस तरह बेवजह भारत की चर्चा का होना। यह सर्वविदित है कि अनेक अवसरों पर ट्रंप भारत और भारतीयों को अपना मित्र या सहयोगी बता चुके हैं। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अमेरिका में बसे भारतीयों का एक बड़ा आयोजन इसलिये कर चुके हैं कि ट्रंप को भारतीयों का सहारा मिले। मोदी और ट्रंप की दोस्ती भी परवान चढ़ती रही है, भारत और अमेरिका के संबंधों में निकटता के साथ-साथ आपसी हितों के दर्शन भी होते रहे हैं, ट्रंप यह मानकर चल रहे हैं कि अमेरिका में उन्हें भारतीय मूल के अमेरिकियों के ज्यादा वोट मिलेंगे, लेकिन तब भी क्या उन्हें प्रदूषण या पर्यावरण के मामले में भारत की निंदा करनी चाहिए थी? बेशक, इसमें भारत के साथ रूस और चीन को भी उन्होंने लपेटा है, लेकिन उनका भारत पर विशेष रूप से जोर देना बहुत लोगों को नागवार गुजरा हैं। ट्रंप के द्वारा भारत की इस तरह आलोचना करना अमेरिका की राजनीति में उनके विरुद्ध भी जा सकता है। अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए होने वाली सीधी बहस का यह आखिरी दौर था और इसमें भारत का नाम लेकर आलोचना करना और पर्यावरण संबंधी अपनी नीतियों का बेशर्म बचाव करने की कोशिश करना अनुचित ही नहीं, शर्मनाक भी है।

प्रश्न यह है कि ट्रंप के द्वारा भारत की इस तरह आलोचना करने का क्या यह उचित अवसर था? क्या ट्रंप को इस बात का एहसास हो गया है कि भारतीय मूल के ज्यादातर अमेरिकी मतदाता डेमोक्रेट उम्मीदवार जो बाइडेन के पक्ष में मतदान करने वाले हैं? विरोध की राजनीति को अपने पक्ष में करने का यह तरीका ट्रंप के लिये नुकसानदेह ही साबित होता हुआ प्रतीत हो रहा है। इसका तत्काल प्रभाव तो ट्रंप को अपने देश में ही देखने को मिल गया है। उनके भारत विरोधी बयान को न केवल भ्रामक करार दिया गया है, बल्कि बिना सोचे-समझे इस तरह के बयान को निराशाजनक एवं दुर्भाग्यपूर्ण भी माना गया है। भारत भले ही प्रदूषित देशों में शुमार है, जलवायु परिवर्तन के लिये जिम्मेदार देशों में भारत की भी भूमिका हो सकती है, लेकिन जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण एवं प्रदूषण के मामलों में अमेरिका की वर्तमान शासन व्यवस्था भी कम दोषी नहीं है। इसलिये अपनी कमियों को ढंकने के लिये दूसरों को दोषी ठहराने की नीति उचित नहीं कहीं जा सकती। इसलिये जब जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार देशों की बात आती है, तो ट्रंप की टिप्पणी खरी नहीं उतरती।

वस्तुस्थिति तो यह है कि जलवायु परिवर्तन के लिए अमेरिका बहुत हद तक जिम्मेदार है, लेकिन वह ट्रंप के नेतृत्व में अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़कर दूसरों को दोष दे रहा है। कोरोना महामारी में सर्वाधिक विकसित देश ने जिस तरह की विनाशलीला देखी, वह भी वहां की शासन-व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्न बनी है, तभी डोनाल्ड ट्रंप ने स्वीकारा है कि न्यूयॉर्क भूतिया शहर में बदल रहा है। देश को बंद नहीं कर सकते, ऐसा होने से तो देश के लोग आत्महत्या करना शुरू कर देंगे। कोरोना वायरस से अमेरिका में हुई मौतों पर ट्रंप ने कहा कि यह मेरी गलती नहीं है, यह जो बाइडेन की भी गलती नहीं है, यह चीन की गलती है जो अमेरिका में आई। इस तरह ट्रंप के मुंह से रूस और चीन की आलोचना तो समझ में आती है, लेकिन भारत को भी साथ रखना कूटनीतिक और व्यावहारिक रूप से भी गलत एवं राजनीतिक अपरिपक्वता का द्योतक है। ट्रंप ने बिना सोचे-समझे अपना नुकसान कर लिया है। उन्हें यह परवाह नहीं है कि उनका देश भारत के साथ रणनीतिक भागीदारी बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ चुका है और ऐसे में, भारत को आलोचना का निशाना बनाना हर प्रकार से अनुचित एवं बढ़ती दोस्ती के बीच दरार का कारण बन सकता है।

भारत-अमेरिका संबंध एक नए साहसिक युग की दहलीज पर खड़े हैं, इसके लिये ट्रंप एवं मोदी ने व्यापक प्रयत्न किये हैं, ऐसे समय में ट्रंप के द्वारा भारत की असंगतिपूर्ण आलोचना क्यों? मोदी की दूरदर्शी सोच से दोनों देशों के बीच संतोषप्रद द्विपक्षीय रिश्ते को अप्रत्याशित रणनीतिक जरूरत के रूप में उभरते हुए देखा गया। इसकी शुरुआत तो 2008 के सितंबर-अक्तूबर में ही हो गयी थी जब परमाणु मुद्दे से जुड़े जटिल रणनीतिक-रक्षा संबंध की नींव रखी गई थी और इसका श्रेय तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के राजनीतिक संकल्प को जाता है, जिसकी बदौलत भारत को अंतरराष्ट्रीय परमाणु समुदाय में विशिष्ट स्थान मिला, और वह भी तब, जबकि हम परमाणु अप्रसार संधि से दूर थे। दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में इससे एक खास बदलाव आया, क्योंकि उससे पहले इन दोनों बड़े लोकतंत्रों के आपसी रिश्ते को अक्सर तनावपूर्ण बताया जाता था। भले ही 25 वर्ष पहले, बिल क्लिंटन और नरसिंह राव ने अमेरिका व भारत के असामान्य रिश्ते में लचीलापन लाने की शुरुआत की थी, लेकिन इन दोनों देशों के बीच आपसी हितों के समझौते, निकटता एवं दोस्ताना संबंध तो मोदी एवं ट्रंप के शासन काल में ही नयी ऊर्जा एवं आभा के साथ परवान चढ़े। नरेंद्र मोदी एवं ट्रंप ने एक स्थायी द्विपक्षीय रिश्ते को आकार देने की कोशिशें की हैं। मगर राजनीतिक अनुकूलता और रणनीतिक संस्कृति के लिहाज से अमेरिका व भारत के रिश्ते क्या अब भी बहुत सहज नहीं हैं? ट्रंप के द्वारा भारत की आलोचना का क्या अर्थ है? जाहिर है, ट्रंप द्वारा किए गए प्रहार के बाद अब डेमोक्रेट पूरी तरह से भारत के पक्ष में खड़े दिख रहे हैं, उन्होंने कहा है कि ट्रंप हमारे दक्षिण एशियाई समुदाय की जीवंतता, सुंदरता और विविधता का सम्मान नहीं करेंगे।

अमेरिका में हो रहे चुनावों एवं उभर रहे मुद्दों के बीच भारतीय मूल के लोगों को संतुलन रखने की अपेक्षा है, भारत को आधिकारिक रूप से अमेरिकी राजनीति में सक्रिय एवं निर्णायक भागीदारी से बचना चाहिए, यह जाहिर है कि ट्रंप की इस ताजा आलोचना से भारतीय मूल के लोगों पर विपरीत प्रभाव पड़ा है, वह न चाहते हुए भी ट्रंप से दूर चले जाएंगे। ऐसे माहौल में भारतीय विशेषज्ञों को यह बात अवश्य जोर देकर बतानी चाहिए कि जलवायु परिवर्तन में भारत या किस देश का कितना योगदान है। पर्यावरण प्रदूषण एवं जलवायु परिवर्तन किसी एक देश की समस्या नहीं है, यह दुनिया की उभरती हुई ज्वलंत समस्या है, इसके समाधान के लिये सभी देशों को प्रयत्न करने की जरूरत है। भारत के लिये यह सही समय है, भले ही ट्रंप की आलोचना हमारे लिये नागवार गुजरी हो, लेकिन इन ज्वलंत समस्याओं के सन्दर्भ में भारत को अपनी कोशिशों पर गौर करना चाहिए और ज्यादा व्यावहारिक बनना चाहिए। दुनिया के प्रदूषित देशों में हमारी गिनती होना, हमारे लिये चिन्तनीय है, हमारी बढ़ती विश्व छवि पर एक अवरोध भी है, इसलिये हमें अपने देश को इन प्रदूषित देशों की सूची से हटाने के लिये तत्पर होना चाहिए। अपने तेज विकास के लिए युद्ध स्तर पर बढ़ते प्रदूषण का उपचार करना जरूरी हो गया है। पराली की गंदगी हो या यातायात प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन हो या बढ़ता प्रकृति का दोहन- हम दुनिया को आलोचना का मौका कब तक देते रहेंगे? कुछ ऐसी धुंध छा गई है कि लोगों को मालूम नहीं कि सवेरा होने वाला है या रात?

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