औरों को हंसते देखो मनु, हंसो और सुख पाओ

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योगेन्द्र नाथ शर्मा ‘अरुण’

आज हम सभी कहीं-न-कहीं तनावों में घिरे हुए बेचैनी में जी रहे हैं। भौतिकता में फंसे हम अपने सिवा किसी के बारे में जैसे कभी सोच ही नहीं पाते या फिर सोचने का मन ही नहीं करता। महानगरों में बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं में रहकर भी जाने क्यों, हमें सुख और सुकून की नींद नहीं आ पाती और डॉक्टर की दी हुई गोलियों में हम नींद ढूंढ़ते हैं।

कबीर ने तो अपनी एक उलटवांसी में कहा ही है :-

काहे री नलिनी तू कुम्हलानी,

तेरे ही नाल सरोवर पानी।

इस उलटवांंसी को सुलझाते हुआ कबीर एक साखी में कहता है :-कबीरा संगत साधु की, हरे और कई व्याधि/ संगत बुरी असाधु की, आठों पहर उपाधि।

तात्पर्य यह है कि अगर आप सज्जन व्यक्ति की संगति में रहते हैं तो आपकी कई व्याधियां तो स्वतः समाप्त हो जाएंगी, लेकिन अगर कुसंगति में फंस गए तो फिर आपके जीवन से सुख और चैन गायब ही रहेंगे। आज एक मित्र ने अच्छी संगति का दृष्टान्त भेजा है। वह यूं है— एक सज्जन रेलवे स्टेशन पर बैठे गाड़ी की प्रतीक्षा कर रहे थे, तभी जूते पॉलिश करने वाला एक लड़का आकर बोला, ‘साहब! क्या बूट पॉलिश कर दूं?’ उसकी दयनीय सूरत देखकर साहब अपने जूते आगे बढ़ाते हुए बोले, ‘लो, पर जूते ठीक से चमकाना।’ लड़के ने काम तो शुरू किया, परंतु स्टेशन पर पॉलिश करने वाले अन्य लड़कों की तरह उसमें स्फूर्ति नहीं थी। वे बोले, ‘अरे! कैसे ढीले-ढीले काम करते हो? जरा जल्दी-जल्दी हाथ चलाओ न?’ इस पर वह लड़का मौन खड़ा रहा। इतने में ही एक दूसरा लड़का आया। उसने पहले लड़के को तुरंत अलग कर दिया और स्वयं फटाफट बूट पॉलिश के काम में जुट गया। पहले वाला लड़का गूंगे की तरह एक ओर खड़ा रहा। दूसरे लड़के ने साहब के जूते खूब चमका दिए।

पैसे किसे देने हैं? साहब ने सोचा। इस पर विचार करते हुए साहब ने जेब में हाथ डाला। उन्हें लगा कि अब इन दोनों लड़कों में पैसों के लिए झगड़ा या खूब मारपीट होगी। फिर उन्होंने सोचा, जिसने काम किया है, उसे ही पैसे भी मिलने चाहिए। इसलिए उन्होंने बाद में आने वाले लड़के को पैसे दे दिये। लड़के ने साहब से पैसे तो लिये, परंतु वे पैसे उसने पहले वाले लड़के की हथेली पर रख दिये। फिर प्रेम से उसकी पीठ थपथपायी और चल दिया। वे साहब विस्मित नेत्रों से यह देखते रहे। उन्होंने दूसरे लड़के को तुरंत वापस बुलाया और पूछा, ‘यह क्या चक्कर है रे?’ लड़का बोला, ‘साहब! यह लड़का तीन महीने पहले चलती ट्रेन से गिर गया था। तब हाथ-पैर में बहुत चोटें आयी थीं। ईश्वर की कृपा से बेचारा बच गया, नहीं तो इसकी वृद्धा मां और पांच बहनों का क्या होता?’

फिर थोड़ा रुककर वह बोला, ‘साहब! यहां जूते पॉलिश करने वालों का हमारा ग्रुप है और उसमें एक देवता जैसे हम सबके प्यारे चाचाजी हैं, जिन्हें हम सब ‘सत्संगी चाचाजी’ कहते हैं। वे सत्संग में जाते हैं और हमें भी आकर सत्संग की बातें बताते रहते हैं। उन्होंने ही सुझाव रखा कि साथियो! अब यह पहले की तरह फुर्ती से काम नहीं कर सकता, तो क्या हुआ? ईश्वर ने हम सबको अपने साथी के प्रति सक्रिय हित, त्याग-भावना, स्नेह, सहानुभूति और एकत्व का भाव प्रकटाने का एक अवसर दिया है। जैसे आदमी की पीठ, पेट, चेहरा, हाथ और पैर भिन्न-भिन्न दिखते हुए भी हैं तो एक ही शरीर के अंग, वैसे ही हम सभी शरीर से भिन्न-भिन्न होते हुए भी, हैं तो एक ही जैसी आत्मा, इसलिए हम सब भी तो एक ही हैं। स्टेशन पर रहने वाले हम सब साथियों ने मिलकर तय किया कि हम अपनी एक जोड़ी जूते पॉलिश करने की आय प्रतिदिन इसे दिया करेंगे और जरूरत पड़ने पर इसके काम में सहायता भी किया करेंगे।’

जूते पॉलिश करने वालों में आपसी प्रेम, सहयोग, एकता तथा मानवता की ऐसी ऊंचाई देखकर वे साहब चकित रह गये। एक सत्संगी व्यक्ति के सम्पर्क में आने वालों का जीवन मानवीयता, सहयोग और सहृदयता की अनूठी बगिया जैसा महक जाता है। सत्संगी व्यक्ति अपने सम्पर्क में आने वाले लोगों को अपने जैसा बना देता है। हमें भी बुरी संगत वालों से नहीं, बल्कि अच्छी संगत वालों से ही मित्रता करनी चाहिए।

महाकवि प्रसाद की विश्व-कृति कामायनी में श्रद्धा ने मनु से जो कुछ कहा था, वह याद हो आया है :-

अपने में भर सब कुछ कैसे,

व्यक्ति विकास करेगा?

यह एकान्त स्वार्थ है भीषण,

अपना नाश करेगा।

जीवन में सुख, शान्ति और सुकून पाने का एक ही मार्ग श्रद्धा ने मनु को बताया है, जो आज भौतिकता की दौड़ में हांफ रहे हम सबको याद रखना होगा :-

औरों को हंसते देखो मनु,

हंसो और सुख पाओ।

अपने सुख को विस्तृत करलो,

सबको सुखी बनाओ।

आइए, हम एक संकल्प तो आज ले ही लें कि जहां कहीं भी किसी को कष्ट में देखेंगे, तो हम उसकी मदद करने का भरसक प्रयास जरूर करेंगे।

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