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विश्वगुरू के रूप में भारत

प्राचीन भारत के राजनीतिक सिद्धांतों और विज्ञान को आज लागू करन की आवश्यकता

डॉ. पवन सिन्हा

(लेखक आध्यात्मिक गुरु तथा
दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र के प्राध्यापक हैं।)

यदि मैं वर्तमान हूँ तो मैं अपने इतिहास का उत्पाद हूँ। इसका अर्थ है कि मेरा इतिहास ही मुझे बता रहा है कि आज मैं क्या हूँ और उसी इतिहास के आधार पर मैं यह तय करूँगा कि मैं कल क्या बनुंगा। हर मनुष्य के माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी, जिनके बारे में वह जानना चाहता है, वह उसके लिए उसका इतिहास हैं। हर मनुष्य की जाति उसका इतिहास बताती है। उसका घर, उसका मोहल्ला एक इतिहास होता है। हमें हमेशा यह बताया गया है कि हमारा देश काफी महान था, परंतु वह महान क्यों था, यह हमें स्पष्ट नहीं है। क्या हम मंदिरों के कारण महान थे, क्या हम पूजा-पाठ, रामायण, महाभारत के कारण महान थे? हमारा देश सोने की चिडिय़ा था तो कैसे? क्या मंदिरों में बहुत सोना था इसलिए? इन सभी का गंभीर विश्लेषण करने की आवश्यकता है। इसके बिना हम भारत को समझ नहीं सकते।
हम कहते हैं कि भारत पहले विश्वगुरु था। भारत विश्वगुरु किसी एक क्षेत्र में विशेषज्ञता के कारण नहीं था। भारत यदि विश्वगुरु था तो रसायनों के क्षेत्र में भी विश्वगुरु था, भौतिकी, धातुकर्म, गणित, ब्रह्मांड विज्ञान, शरीरविज्ञान, राज्य व्यवस्था आदि सभी क्षेत्रों में भारत विश्वगुरु था। भारत में अहिंसा की बातें की गईं, परंतु भारत युद्धविद्या में भी विश्वगुरु था। भारत की बनी तलवारें दुनियाभर के आकर्षण का केंद्र थीं। यहाँ की तलवारें अरब में जरबे हिंद कहलाती थीं। हम हथियारों के निर्माण में भी सबसे आगे थे।
क्या हमने सोचा है कि आज हम जिस हरी मिर्च को बड़ी ही सहजता से खाते हैं, उसकी खोज कैसे हुई होगी? सोच कर देखिए। उस समय हरी मिर्च तो एक जंगली पौधा ही रही होगी। उस समय तो और भी पौधे रहे होंगे। लोगों ने कैसे समझा होगा कि इसे खाना चाहिए और इसके खाने से लाभ है। तब आज की भांति प्रयोगशालाएं तो थीं नहीं। आज हमें पता है कि उसमें विटामिन सी है, तब कैसे पता चला होगा? इससे पता चलता है कि भारत का प्राचीन ज्ञान-विज्ञान कितना महान रहा होगा। मनुष्य के जीवन के जितने भी आयाम हो सकते हैं, उन सभी में भारत अग्रणी था। चाहे वह शिक्षा का आयाम हो या फिर शरीर रचना का हो, मस्तिष्क का आयाम हो, कृषि का हो, राजस्व का हो या फिर प्रशासन का हो। सभी राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और यहाँ तक कि विदेशनीति संबंधित ज्ञान भी भारत में था। श्रीकृष्ण विदेशनीति पढ़ते थे। चंद्रगुप्त मौर्य ने विदेशनीति पढ़ी थी, श्रीराम को विदेशनीति पता थी।
अब बात यह है कि केवल यह कहने से कि भारत काफी महान था, मुझ जैसे लोग संतुष्ट नहीं हो सकते। हमने पचास-सौ ग्रंथ और 15-20 विषय गिनवा दिये कि यह सब कुछ भारत में था, परंतु यह बात अधूरी है। चूँकि प्राचीन महानता वर्तमान में परिलक्षित नहीं हो रही और इसलिए भविष्य में वह हमारे साथ नहीं जाएगी। प्राचीन मान्यताएं आज से दो-चार सौ वर्ष पहले वर्तमान में परिलक्षित नहीं हुईं और इसलिए उस वक्त का वर्तमान हमारे साथ नहीं आया, वहीं छूट गया। हमारे पास आयुर्वेद में इतना ज्ञान था, आज कहाँ है? हमारे पास आड पाइथागोरस प्रमेय है, परंतु हमारी अपनी मय दानव का प्रमेय कहाँ है, बोधायन का प्रमेय का कहाँ है?
मेरा मानना है कि जो भारतीय ज्ञान संपदा है, उसका वैज्ञानिक विश्लेषण किए जाने की आवश्यकता है। हमें भारत के शास्त्रों को धार्मिक शास्त्र कहना बंद करना होगा। जैसे ही हम धर्म की बात करते हैं, मन पूजा-अर्चना की ओर चला जाता है जिससे शास्त्रों में छिपा विज्ञान कहीं पीछे छूट जाएगा। भावोक्ति तो आ जाएगी, लेकिन उसका भाव गायब हो जाएगा। हम उसकी भक्ति तो करेंगे, परंतु उस भक्ति का आधार हमसे छूट जाएगा। हमें अपने शास्त्रों को ज्ञान-विज्ञान की पुस्तकों की तरह देखना होगा। हमें अपनी चीजों को विज्ञान की दृष्टि से देखने का स्वभाव विकसित करना होगा।
मैं भोजपुर गया था। वहाँ राजा भोज द्वारा बनवाया गया एक मंदिर है। 18 फीट ऊँचा शिवलिंग है वहाँ। वहाँ मैंने पूजा की और ध्यान लगाया, जो कि हमें करना ही चाहिए। परंतु मैंने वहाँ निहित विज्ञान को भी जानने का प्रयास किया। पत्थर का बना शिवलिंग आज भी चमक रहा है, जबकि वह हजार वर्ष से अधिक पुराना था। कैसे चमक रहा है। आज हम मकानों को चमकाने के लिए पेंट लगाते हैं और वह पेंट 3-4 वर्ष में फीका पड़ जाता है। फिर वह शिवलिंग हजार वर्ष से कैसे चमक रहा है? पूछताछ करने पर पता चला कि उस पर एक प्रकार का लेप चढ़ाया हुआ है। सोचने की बात यह है कि हमें आज से हजार वर्ष पहले वह कला आती थी जिसमें पत्थर पर ऐसी परत चढ़ाई जा सकती थी, जो हजारों वर्ष तक उसे चमकीला बनाए रखे। आज उस कला का पता चले तो उसका कितना लाभ हमें हो सकता है? इसी प्रकार अपने यहाँ लोहे पर ऐसी परत चढ़ाई जाती थी कि उस पर जंग नहीं लगता था। आज वह तकनीक हमारे उद्योग जगत को मिल जाए तो सोचिए क्या हो सकता है? जंगरोधक कहने की आवश्यकता ही समाप्त हो जाएगी। भारत का लोहा है, तो जंग नहीं लगेगा, यह विश्वास दुनिया के मन में जम जाएगा। विश्वगुरु कहने की पहल ऐसे होती है।
यदि हम राजनीतिक सिद्धांतों की बात करें तो हमारे यहाँ रामराज्य की संकल्पना विकसित हुई है। रामराज्य की बात करते ही एक भाव मन में आता है कि ऐसा राज्य जहाँ कोई दुखी नहीं, सब सुखी होते थे। परंतु ऐसा तो था नहीं। रामायण को यदि हम पढ़ें तो उसमें दुखी और बहुत दुखी लोग भी हैं। वहाँ उन्नति भी है और अशांति भी है। श्रीराम यह सब कैसे संभालते हैं? यदि हम उनके राजनीतिक सिद्धांतों को समझ लें तो हमारी आज की बहुत सारी परेशानियाँ दूर हो सकती हैं। श्री राम राजा भरत को कहते हैं कि पुरोहितों का ध्यान रखना कि उनके पास यज्ञ की सामग्री कभी कम न पड़े और यह भी ध्यान रखना कि वे नियमित रूप से यज्ञ कर रहे हों। वह यज्ञ भगवान की प्राप्ति के लिए नहीं किया जा रहा है, वह किया जा रहा है पर्यावरण की शुद्धता के लिए। तो पर्यावरण की चिंता राज्य कर रहा है। श्रीराम के समय में कोषागार है, अधिवक्ता हैं, सेनाएं हैं। लेकिन हमारे श्रीराम मंदिरों में बंद हैं। हमारे पास उनकी पूजा करने के लिए 5, 11, 51 दीपक रामनवमी त्यौहार आदि तो हैं, परंतु उनके विचारो पर चिंतन करने की प्रक्रिया नहीं है। श्रीराम की पूजा हमें करनी चाहिए. आखिर हम उनकी पूजा नहीं करेंगे तो किनकी करेंगे, परंतु उनके प्रशासनिक सिद्धांतों पर भी हमें ध्यान देना चाहिए।
श्रीराम के प्रशासन की विशेषता क्या थी? अन्त्योदय। एक सामान्य से धोबी की बात को भी सम्राट सुनता था। आज वह व्यवस्था क्यों नहीं लागू हो सकती? आज सड़कों पर धरने प्रदर्शन हो रहे हैं। उनमें विद्रोह और असुरक्षा की भावना उत्पन्न होती है और उससे राज्य व्यवस्था क्षीण होती है। अगर हमारे शासक जनता में क्रोध न पनपने दें, तो यह उस समय की व्यवस्था को लागू करना ही तो हुआ। दूसरी बात, राजा या उसके प्रतिनिधि वेष बदल कर राज्य में घूमा करते थे। जिस मकान में प्रकाश दिखाई देता था, वहाँ की बात छिप कर सुनते थे कि कोई भूखा तो नहीं सो रहा है। भूखे के लिए भोजन व्यवस्था करना यह राज्य का कर्तव्य था हमारे यहाँ। आज जबकि अपने देश में जिम्मेदार प्रशासन है, लोककल्याणकारी लोकतंत्र है, यह सिद्धांत लागू क्यों नहीं? यह तो हमारी व्यवस्था में तो सहज ही होना चाहिए था। इसके लिए विधेयक लाना पड़े, यह तो हमारे लिए शर्म की बात होनी चाहिए।
रामायण के सौवें सर्ग में लिखा है कि भरत जब श्रीराम से दंडकारण्य में मिलने आए हैं तो श्रीराम उनसे कह रहे हैं कि राजा को अपराह्न में अच्छे कपड़े पहन कर राज्य की मुख्य सड़कों पर घूमना चाहिए और लोगों से मिलना चाहिए। वे बात कर रहे हैं कि आपके भीतर का दुख-क्लेश प्रजा को नहीं दिखे। आपके व्यक्तित्व से प्रजा प्रभावित हो और आप प्रजा से बात कर सकें। जब राजा प्रजा से सीधे बात करेगा तो बीच के अधिकारी बीच में डंडी नहीं मार सकते। आज का राजा प्रजा से सीधे संवाद नहीं करते। वे केवल मंच से बात करते हैं। राजा और प्रजा में पुल का काम करते हैं अधिकारीगण, पार्टियों के कार्यकर्ता आदि। ये राजा को जो समझाते हैं, राजा उस हिसाब से चलता है। यह हमारी व्यवस्था नहीं रही है। हमारे यहाँ प्रशासन में जनता से सीधा संवाद करना होता था, जिसे हमने आधुनिक भारत में नहीं माना। रामायण के सौवें सर्ग में और भी बहुत कुछ है। कोषाध्यक्ष बनाने की योग्यता क्यो हो, यह तक लिखा है। श्रीराम भरत से कहते हैं कि जहाँ खदानों में खुदाइयां होती हैं, या जो दंड के स्थान हैं, जो कारागार हैं, वहाँ नियुक्त किये जाने वाले लोगों पर ध्यान रखो कि कृत्रिम चरित्र के लोग वहाँ स्थान नहीं पाएं। श्रीराम भ्रष्टाचार होने के बाद नहीं, पहले से सक्रिय राजा हैं। भ्रष्टाचार होने से पहले ही निगाह रखने के लिए कह रहे हैं। वे कहते हैं कि निगाह रखो कि कोई पैसे लेकर काम न कर रहा हो। क्या प्राचीन भारत के इन राजनीतिक सिद्धांतों को आज लागू करन की आवश्यकता नहीं है?
इसी प्रकार हमारे यहाँ आयुर्वेद में जो नियम बताए गए हैं, हमने उनकी उपेक्षा की हुई है, इससे आज हम बीमार पड़ रहे हैं। हम सूर्य की उपासना इसलिए करते थे क्योंकि सूर्य हमारी अधिकांश बीमारियों को ठीक करता है। ऐसे और भी ज्ञान-विज्ञान के विषय हैं जिनका यदि आज उपयोग किया जाए तो देश का काफी विकास हो सकता है, लोगों का काफी कल्याण हो सकता है। शारीरिक स्वास्थ्य से लेकर भौतिक उन्नति तक सभी कुछ मिल सकता है और वह सब कुछ सामाजिक सद्भाव और प्राकृतिक पर्यावरण को बचाते हुए।

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