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स्वास्थ्य के प्रति शरद ऋतु में क्या – क्या सावधानी बरतें

राहुल पाराशर

शरद ऋतु में पित्त स्वाभाविक रुप से कुपित अवस्था में रहता है। पित्त का पाचकस्वभाव दूर होकर वह हानिप्रद बन जाता है। परिणामस्वरुप भूख और जठराग्नि मंद रहती है। इसलिए इस ऋतु में अधिकमात्रा में आहार लेने से बचना चाहिए और भोजन भी तब ही करना चाहिए जबकि भूख खूब खुलकर लगे। मधुर, कषाय, चरपरे, सुपाच्य और ठंडी तासीर वाले व्यंजनो का ही सेवन करना चाहिए क्योंकि ऐसे पदार्थ पित्त का शमन करने वाले होते है। जिनकी प्रकृति में पित्त की प्रधानता है या जो लोग पित्तजन्य रोगों जैसे एसिडिटी, चर्मरोग, सिर में दर्द, अत्यधिक प्यास लगना, ज्वर, रक्तपित्त आदि से परेशान है उन्हें इस ऋतुचर्या का पालन अत्यधिकसावधानी केसाथ करना चाहिए।

इस ऋतु में पीने केपानी पर सबसे अधिकध्यान देना चाहिए क्योंकिनदी नालों के जल में वर्षा केपानी केसाथ कई प्रकार केहानिकारकतत्व मिल जाते है। परिणामस्वरुप इन दिनों में दूषित जल केकारण होने वाले रोग अधिक होते हैं।

क्या करें:-

अनाज में गेहूं, जौ, ज्वार, धान, समा लें। दलहन में चने, तुअर, मंूग, मसूर, मटर लें। सब्जी में गोभी, ककोड़ा, परवल, गिल्की, ग्वारफली, गाजर, मक्के का भुट्टा, तुरई, चौलाई, लौकी, पालक,कदृदू, सहजन की फली, जमीकंद, आलू ले सकते हैं। फलों में अंजीर, पके केले, जामफल, जामुन, तरबूज, अनार, अंगूर, नारियल, पका पपीता, मौसम्बी, नींबू, गन्ना आदि। सूखे मेवों में अखरोट, आलू बुखारा, काजू, खजूर, चारोली, बादाम, सिंघाड़े, पिस्ता। मसालों में जीरा, आंवला, धनिया, हल्दी, खसखस, दालचीनी, कालीमिर्च, सौंफ। घी का सेवन करना चाहिए। घी अग्नि को तो प्रदीप्त करता ही है साथ ही साथ पित्त का भी शमन करता है। इसके अलावा बरसात के दिनों में आ गई रुक्षता को भी दूर करता है। गन्ने का रस एवं नारियल का पानी खूब फायदेमंद है। इस ऋतु में मालिश अवश्य करनी चाहिए। शीतली व शीतकारी प्राणायाम लाभप्रद होते हैं। बाएं नासाछिद्र से गहरी श्वांस लें।

क्या न करें :-

मौसमी सब्जियों का कम सेवन करें, क्योंकिवर्षा ऋतु का नया पानी होने की वजह से वो दोषयुक्त होती हैं। ओस, जवाखार जैसे क्षार, दही, खट्टी छाछ, गरम एवं मसालेदार वस्तुएं नहीं लें। खट्टे फल जैसे-नींबू, सन्तरा, मौसम्बी आदि का सेवन कम करें। बाजरी, मक्का, उड़द, कुलथी, चौला, फूट, प्याज, नोनिया की भाजी, रतालू, बैंगन, इमली, पोदीना, फालसा, अनानास कच्चे बेलफल, कच्ची कैरी, तिल, मंूगफली सरसों आदि पित्तकारक होत हैं अत: इनसे बचें। मिर्च मसालों का प्रयोग कम करें। यदि किसी को मसालेदार ही खाना है तो उसके लिए अदरक का प्रयोग किया जा सकता है। लहसुन, मैंथी और हींग का सेवन कम करें। सरसों के तेल का प्रयोग कम करें। मेवों का सेवन कम करें। मद्यपान न करें। इस ऋतु में शरीर का बल मध्यम रहता है अत: अत्यधिकपरिश्रम और अति व्यायाम करना हानिकारक है। पुरवाई हवा से बचें क्योंकिये हवा बंगाल की खाड़ी से उठने के कारण नमी लिए होती है। इस के कारण पुरानी बीमारियां जैसे- जोड़ों का दर्द आदि फिर से उखाड़ सकती हैं। संयम से रहें और क्रोध अधिक न करें। जब भी समय मिले दोस्तों के साथ हंसी मज़ाक करते हुये समय व्यतीत करें।

आजकल दिन और रात केतापमान में काफी अन्तर होता है। कई बार रात बहुत ठंडी भी हो जाती हैं इसलिए रात में सोते समय ये ध्यान रखना चाहिए कि शरीर कहीं से उघड़ा हुआ न रह जाये। ऐसे लोग जो अपने कमरे में एसी, पंखे या कूलर का उपयोग करते हैं, उन्हें भी ध्यान रखना चाहिए कि उन का कमरा आवश्यकता से अधिक ठंडा न हो, ऐसा न करने पर वात कुपित होने की सम्भावना रहती है। जिसके कारण कई बार सुबह उठते वक्त पूरे शरीर में दर्द महसूस होता है।

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