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गौ और गोवंश

भारतीय गाय और पर्यावरण,खाद्य सुरक्षा

सुबोध कुमार

पर्यावरण और खाद्य सुरक्षा, आज दुनिया की चिंता के दो प्रमुख विषय हैं। यह आज ही नहीं अत्यंत प्राचीन काल से ही मनुष्यों के लिए चिंतनीय विषय रहे हैं। कालखंड कोई सा भी हो, समाज का प्रबुद्ध वर्ग पर्यावरण और खाद्य सुरक्षा की चिंता करता ही रहा है। अपने देश का वैदिक वांग्मय लंबे समय से मानता रहा है कि पृथ्वी पर गाय ही मानव जीवन का आधार है। वेदों की यह साफ घोषणा है कि गाय से ही सबका पालन संभव है और इसको ही अभिव्यक्त करने के लिए पौराणिक आख्यानों में पृथिवी को गाय के रूप में दिखाया गया। यही कारण भी था कि प्राचीन काल से ही देश में गौपालन की एक समृद्ध परंपरा रही थी। गाय हमारे जीवन का हिस्सा थी। जन्म से लेकर विवाह और मृत्यु तक में गाय को शामिल किए बिना कोई कार्य संपन्न नहीं होता था। आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधानों से आज यह स्पष्ट हो चला है कि शाकाहार और गाय आधारित जीवन शैली ही विश्व के पर्यावरण और खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित कर सकता है।
आज के प्रबुद्ध माने जाने वाले समाज का मानना है कि गाय हमारे देश पर एक बोझ है और उसे कम किया जाना आवश्यक है। उदाहरण के लिए यह कहा जाता है कि भारतवर्ष में गौवंश की संख्या विश्व में सबसे अधिक है परंतु वे विश्व में सबसे कम दूध देती हैं। इन गौओं की संख्या कम करके अधिक दूध देने वाली गौओं का ही पालन करना चाहिए। इस दृष्टि से गौवध और गौमांस के उत्पादन पर रोक नहीं लगनी चाहिए। परंतु यह तर्क न केवल अमानवीय है, बल्कि पर्यावरणविरोधी भी है।
यह एक सर्वविदित तथ्य है कि प्राचीन काल में जब भारतवर्ष विश्व में सबसे समृद्ध देश था और सोने की चिड़िया कहलाता था तब यहां गौओं की संख्या मनुष्यों की संख्या से भी अधिक होती थी। आखिर तब गायें हमारे लिए कैसे लाभकारी थीं? क्या तब वे हमारे ऊपर बोझ नहीं थीं? समझा जाता है कि गायों की इस बड़ी संख्या के कारण ही देश की भूमि उपजाऊ बनी हुई थी और समाज समृद्ध था। गाएं केवल दूध का स्रोत नहीं हैं, वे मिट्टी की उत्पादकता की भी संरक्षक हैं। इस बात को विश्व के सबसे पुराने ग्रंथ और हमारे धरोहर वेदों में साफ-साफ कहा गया है।
ऋग्वेद 6.48.13 में कहा है – प्रत्यक्ष में तो गायें केवल दूध देती हैं परंतु परोक्ष में ‘गोआधारित जैविक कृषि द्वारा’ विश्व को भोजन प्रदान करती है। इसी प्रकार ऋग्वेद 1.29.6 में कहा है – सहस्रों गौओं और अश्वों पर आधारित अनेक प्रकार के धनों से समृद्ध जीवन शैली से विध्वंस करने वाले झंझावत दूर के वनों में चले जाते हैं। ऋग्वेद 8.72.12 में आगे कहा है – जहां वनों में गौएं साथ साथ रह कर अपनी रक्षा करती हैं, वहां की भूमि जल से व्याप्त हो कर आर्द्रता को समेट कर रखती है। ऐसे यज्ञमय देश की भूमि कृषि से इतनी समृद्धि प्रदान करती है कि उस देश के लोग कानों में सोने के आभूषण पहनते हैं। गाय इत्यादि सब शाकाहारी पशु वनों में चरते समय एक झुंड बना कर हिंसक पशुओं से अपनी रक्षा करते हैं।
इस प्रकार वेदों में दो महत्वपूर्ण बातें कही गई हैं। पहली बात है कि गायें पूरे विश्व को दूध के अतिरिक्त भोजन भी प्रदान करती हैं। दूसरी बात यह कही गई है कि वनों और कृषियोग्य भूमि की रक्षार्थ गायों को चरने के लिए खुला छोड़ा जाना चाहिए। ये दोनों ही बातें काफी महत्वपूर्ण और उपयोगी हैं। पहले अपने देश में इसका पालन होता था। परिणामस्वरूप देश में वनक्षेत्रा भी काफी विस्तारित था जो पर्यावरण और वर्षा को सुरक्षित और नियमित बनाए रखता था। साथ ही कृषिभूमि भी काफी उपजाऊ हुआ करती थी। दुर्भाग्यवश अंग्रेजों की नीतियों के कारण गायों का वनों में चरने जाना प्रतिबंधित कर दिया गया और गौमांस का व्यापार बढ़ाने के लिए कत्लखानों को प्रोत्साहन दिया जाने लगा। इसका परिणाम है कि आज देश का वनक्षेत्रा खतरे में है और हमारी कृषि भी बर्बाद हो रही है। आज इस बात को विदेशी वैज्ञानिक भी स्वीकार करने लगे हैं कि वनों के संरक्षण में गायों का महत्वपूर्ण योगदान है। इस बात को प्रमाणित करने में एलन सेवरी का नाम उल्लेखनीय है।
एलन सेवरी और अमेरिका सरकार के आधुनिक वन कृषि योजना के अनुसार गायों समूह में वन में विचरने से गोचर और वन क्षेत्रा हरे भरे रहते हैं। इस प्रकार गौओं से वन क्षेत्रा की हरियाली बढ़ने से पर्यावरण का संरक्षण होता है। इनके अनुभव से सिद्ध हुआ है कि गौओं के गोबर और गोमूत्रा भूमि में उन के पैरों मृदा में जब अच्छी तरह से मिल जाते हैं, तब ऐसी मृदा वर्षा के अथवा सिंचाई के जल को समेट कर रखती है, बह कर जाने नहीं देती। जिस भूमि में गौएं खूब विचरती हों वह भूमि अपनी आर्द्रता बनाए रखती है और हरी भरी रहती है। ऐसे वन क्षेत्रा मरुस्थल नहीं बनते।
सबसे पहला यह प्रयोग दक्षिणी रोडेशिया में किया गया था। रोडेशिया में वर्ष 1960 में वन और पर्यावरण में कार्य कर रहे वैज्ञानिकों ने जब विश्व के बदलते पर्यावरण के कारण वहां के हरे भरे वनीय क्षेत्रा की हरयाली के कारण समाप्त होते देखे तो सबने यह सोचा कि संभवतः शाकाहारी पशु हाथी, गौ इत्यादि वनों की हरियाली खा कर समाप्त कर देते हैं। उस वन में हाथी बड़ी संख्या में थे। निर्णय हुआ कि सब हाथियों का वध कर दिया जाएँ इस अभियान में उस दशक में 40,000 से अधिक हाथी मारे गए जो आर्थिक व्यापार की दृष्टि से बड़ा लाभदायक भी रहा। परंतु हाथियों के मारे जाने के बाद बड़ा आश्चर्य हुआ कि जो रही सही हरियाली बची थी, वह भी समाप्त हो गई। इस पर अनुसंधान करने के लिए एलन सेवरी को लगाया गया।
वहां हाथी तो अब समाप्त हो चले थे, शाकाहारी बड़े पशुओं से अनुसंधान करने के लिए केवल गौएं ही बची थीं। कुछ क्षेत्रा चुने गए और वहां गौओं के बड़े समूह रखने की योजना बनी। बड़ा आश्चर्य हुआ जब यह देखा गया कि जिस भूमि पर गौओं का गोबर-गोमूत्रा भूमि पर उनके पैरों से खूब मिला हुआ था, वहां जब अगली बार वर्षा हुई तो वर्षा का पानी बह कर आगे नहीं गया और वहीं भूमि में सोख लिया गया। भूमि की आर्द्रता बढ़ जाने से हरियाली पुनरू उत्पन्न होने लगी। इस अनुसंधान में यह पाया गया कि जिस भूमि में एक किलोग्राम गौ का गोबर मिला होता है वह नौ गुणा यानि नौ किलोग्राम पानी सोख कर रखती है। इस प्रकार उजड़े जंगलों में गौ के समूह पालन करने से उन्हें पुनरू हरा भरा बनाया जा सका।
इस प्रकार एलेन सेवरी इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि जिस प्रकार प्रागैतिहासिक काल में गौओं के बड़े बड़े समूह मुक्त रूप से वनों में घूमा करते थे, उसी प्रकार योजना बद्ध तरीके से गोओं के समूहों को उजड़ रहे वन प्रदेशों में चरने के लिए छोड़ा जाना चाहिए। जितनी अधिक गौएं भूमि पर घूम कर चरते हुए गोबर छोड़ेंगी, उतनी ही भूमि की वर्षा के जल को रोकने की क्षमता बढ़ती है। इसके साथ ही भूमि में कार्बन डाइऑक्साइड गैस को रोकने की क्षमता बढ़ती है जिसके परिणामस्वरूप ओजोन आच्छादन सुरक्षित होता है। इस प्रकार गौओं की संख्या बढ़ा कर गोचरों में छोड़ने के साथ-साथ अन्य गैर पारम्परिक ऊर्जा के सौर ऊर्जा जैसे स्रोतों के उपयोग से विश्व में पर्यावरण की पूर्ण रूप से सुरक्षा सम्भव हो सकेगी। यदि भारतवर्ष की गौरक्षा और सौर ऊर्जा के आधार पर्यावरण नीति बनाई जाए तो यह विश्व की सबसे उन्नत पर्यावरण सुरक्षा नीति सिद्ध हो सकती है।
भारतवर्ष में विश्व के देशों में सब से अधिक कृषि योग्य भूमि बताई जाती है। इसमें से लगभग आधी भूमि बंजर पड़ी है। बंजर भूमि को गौओं द्वारा कृषि योग्य बनाने का जो उपाय आधुनिक वैज्ञानिक एलेन सेवरी बता रहे हैं, वही ऋग्वेद 6.47.20-23 में भी दिया गया है। गौओं द्वारा वनों में चरने से एक और लाभ स्वास्थ्य का भी होता है। गोचर में पोषित गौओं के दूध में औषधिक गुण आ जाते हैं। साथ में गौ के गोचर मे पोषण से गौ के आहार पर व्यय लगभग शून्य होने से दूध लगभग मुफ्त पड़ता है। इस प्रकार गौ का गोचर से सम्बंध पर्यावरण और स्वास्थ्य की दृष्टि से अमूल्य होता है।
आज कल समाज में नेत्रा रोग यानी बाल्यकाल से ही कमज़ोर नजर, कैटेरेक्ट, ग्लुकोमा, आयु के साथ लगातार गिरती नेत्राशक्ति – मेक्युलर डीजेनेरशन आदि हमारे आहार में उन तत्वों की कमी के कारण हो रहे हैं जो केवल गोचर में स्वपोषित गौ के दुध में पाए जाते हैं। आधुनिक डाक्टर नेत्रों के लिए जिन स्वास्थ्यवर्धक तत्वों की कप्स्यूल और गोलियां जैसे ओमेगा 3, ल्यूटीन, बीटा कैरोटीन, ज़ीएक्सेंथीन खाने का परामर्श देते हैं वे गोचर में चरने वाली गौओं के दूध में स्वाभाविक रूप से होता है। यही कारण है कि गौओं के द्वारा बंजर भूमि को हराभरा बनाना आज विश्व में एक प्रमुख साधन माना जाने लगा है।
इसी बात को ऋग्वेद 1.25.16 में कहा है, गौएं गोचर में दूर दूर तक जाती हैं और अपनी इच्छा और विवेक के अनुसार आहार ग्रहण करती है। गौओं को स्वतंत्राता से घूम फिर कर स्वेच्छा से आहार ग्रहण करने की बजाए एक स्थान पर बांध कर चारा इत्यादि खिलाने से जो दूध मिलता है (विषं दुहे) वह दूध विष तुल्य होता है।

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