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आज का चिंतन-19/09/2013

सफलता का मूलाधार है

वाणी माधुर्य

– डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

अक्षर में जो ताकत है उसका कभी क्षरण नहीं हो सकता। अक्षर ब्रह्म है और इसी से लौकिक एवं पारलौकिक सृष्टि, पालन और संहार का पूरा क्रम निर्धारित है। विचारों और कल्पनाओं से मूत्र्त होते शब्द हों या फिर समाधि में प्राप्त, शब्दों का लिखित स्वरूप हो या वाणी से अभिव्यक्त। इन सभी में अक्षरीय तरंगों का परमाण्वीय प्रभाव व्यष्टि और समष्टि सभी जगह अचूक प्रभाव छोड़ता हुआ देखने को मिलता है।

जीवन व्यवहार में वाणी का प्रभाव अवर्णनीय है। जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त इसी वाणी का आश्रय पाकर मनुष्य अपने प्रत्येक कर्म में सफलता और आनंद पाना चाहता है। इस वाणी का सीधा संबंध हृदय से होता है। जो व्यक्ति अपनी कथनी और करनी में एक होगा, वाणी और आचरण में एकरूपता होगी, जो मन और मस्तिष्क से जितना अधिक शुद्ध-बुद्ध और शुचितापूर्ण होगा, उसके अक्षरों में महान सामथ्र्य अपने आप साथ चलता है, चाहे फिर वह मानसिक वैचारिक संवेग से लेकर वाचिक या लिखित अभिव्यक्ति का कोई सा धरातल या कैनवास क्यों न हो।

शब्द अपने आप नवसृष्टि करते रहते हैं और इनका असर पिण्ड से लेकर ब्रह्माण्ड तक अचूक प्रभाव छोड़ता है और इसके बाद भी यह नष्ट नहीं होकर व्योम में सुरक्षित रहते हैं और जब-तब इसे ग्राह्य करने लायक अवतारों और मनुजों का अवतरण होता है यह व्योम से उतरकर इस दिव्यात्माओं के माध्यम से सम सामयिक परिवेश और जनमानस तक पहुंचते रहते हैं।  वैज्ञानिक परीक्षणों और प्रयोगों से यह बात अच्छी तरह सिद्ध भी हो चुकी है।

वाणी का सीधा संबंध व्यक्ति के अन्तस्तल से होता है। जो लोग अपने हृदय की आवाज को सीधे होंठों से प्रस्फुटित करते हैं और इनमें किसी भी प्रकार की मिलावट नहीं करते हैं उनके विचार और वाणी का सामथ्र्य गहरे तक प्रभाव छोड़ता है। हृदय से होंठों तक जो बात आए उसे उसी रूप में बाहर निकलने देना चाहिए, इसे अपने ढंग से परिष्कृत या मिलावट कर बाहर अभिव्यक्त करने से वाणी का मौलिक गुण-धर्म और प्रभाव नष्ट हो जाता है और फिर ऎसा विचार या कोई बात सिर्फ स्थूल होकर रह जाता है।

अपने घर-परिवार से लेकर कुटुम्ब, समुदाय, परिवेश और लोक व्यवहार में हर तरफ वाणी का ही प्रभाव आरंभिक छवि का निर्माण करता है और इसी से शुरू होती है संवाद की अर्थ परंपरा और अभीप्सित कार्यों या विचार सम्प्रेषण की प्रक्रिया। आजकल अभिव्यक्ति कौशल में तो आदमी पारंगत और सर्वगुण सम्पन्न हो चला है और अपने विचारों को दूसरा पर थोंपने की हरचंद कोशिश भी करता रहता है। अपने स्वार्थ पूरे करने के लिए हर प्रकार की चापलुसी भी कर लेता है और सेवा भी।

एक किस्म उन लोगों की है जो किसी छोटी सी एक बात को परोसने के लिए हजार शब्दों का सहारा लेते हैं फिर भी सामने वाला अनभिज्ञ ही बना रहता है और उसे कुछ भी स्पष्ट पता नहीं चल पाता। इसका सीधा सा अर्थ यही है कि हमारी वाणी में स्थूलता ज्यादा है, सूक्ष्म धरातल पर प्रभाव छोड़ पाने लायक ऊर्जा नहीं है। जो लोग जिन्दगी भर फालतू की बातों में रस लेते हैं, फिजूल की चर्चाओं में घण्टों जाया करते हैं, उन लोगों की वाणी इसी प्रकार बेदम हो जाती है।

दूसरी किस्म के लोग वे हैं जो अपनी बात मनवाने, स्वार्थ पूरे करने और काम निकलवाने के लिए सामने वाले की इतनी लल्लो-चप्पो करते हैं, तारीफों के पुल बाँधते हैं और भगवान या माई-बाप का दर्जा दे डालते हैं। सामने वाला भी इन्हीं की किस्म का होने पर वह भ्रमित और मुग्ध हो सकता है लेकिन समझदार लोगों पर इनकी चापलुसी कोई असर डाल नहीं पाती बल्कि इन्हें अच्छी तरह यह आभास हो जाता है कि यह जो बोल रहा है, वह किसी अभिनय से कम नहीं है।

तीसरे प्रकार में वे लोग आते हैं जो चाहे कैसा बड़ा या छोटा काम हो, नपी-तुली बात ही करते हैं, ये लोग चाहते हुए भी चापलुसी या जयगान के साथ परिक्रमा नहीं कर पाते। लेकिन ऎसे लोगों के इन थोड़े से शब्द जबर्दस्त प्रभाव छोड़ते हैं और सामने वाले के न सिर्फ मस्तिष्क बल्कि हृदय की दीवारों पर जाकर अधिकार कर लेते हैं और इनका इतना रामबाण असर होता है कि कई दिनों तक सामने वाले के जेहन में तब तक गूंजते रहते हैं जब तक कि ये परिणाम को प्राप्त नहीं कर लेते।

इसका मूल कारण यह होता है कि ये लोग हृदय और विचारों से पूरी तरह शुद्ध होते हैं और जो लोग शुचिता रखते हैं उनके हर शब्द में परमाणु से भी अधिक ऊर्जा होती है जो कम शब्दों में ही हजार शब्दों की समझ साथ लेकर जाती है और सामने वालों को प्रभावित करके ही चैन लेती है। इसलिए वाणी में माधुर्य का होना नितान्त जरूरी है। इस माधुर्य का यह अर्थ नहीं कि झूठी तारीफें करते रहें, चापलुसी हुए मीठे-मीठे बोल बोलें, बल्कि माधुर्य का अर्थ यह है कि जो कुछ बोलें वह सत्यं, शिवं सुन्दरं से भरा हो तथा कथन में पूर्ण शुचिता हो, उद्देश्यों में पवित्रता हो तथा अभिव्यक्ति लोक मंगलकारी हो। कुछ बिरले ऎसे भी होते हैं जो सिर्फ सोचते भर हैं और संकल्प सिद्धि से ही काम हो जाते हैं जहाँ शब्दों का अमूर्त स्वरूप ही सारा खेल खेलता रहता है।

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