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राष्ट्र-चिंतन: मुस्लिम तुष्टिकरण, दंगे और मुलायम की घिनौनी राजनीति

विष्णुगुप्त

मुजफ्फ रनगर का दंगा सत्ता प्राप्त करने की घिनौनी राजनीति का दुष्परिणाम है। अगर ऐेसा नहीं होता तो एक महिला के साथ छेड़खानी पर हुई मजहबी हिंसा को पूरी छूट ही क्यों दी गयी? सरकार और प्रशासन द्वारा मजहबी हिंसा पर रोक लगाने की जरूरत क्यों नहीं समझी गयी? मजहबी हिंसा के पीड़ित परिवार को ही पुलिस-शासन व्यवस्था ने निशाना क्यों बनाया और उन्हें ही मुकदमें का शिकार क्यों बनाया? हिंसा और प्रतिहिंसा की आग कई दिनों से सुलग रही थी फि र भी मुलायम-अखिलेश की तुष्टिकरण वाली सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। मुलायम-अखिलेश की सरकार शायद यह अवसर तलाश रही थी कि मुजफ्फ रनगर में कोई भयानक दंगा और हिंसा दूर-दूर तक फैले ताकि सत्ता प्राप्त करने वाला मजहबी वोट बैंक उसके खाते में गिर सकें। अब मुलायम-अखिलेश सरकार कह रही है कि दंगें को कड़ाई से रोका जायेगा? अब सवाल यह उठता है कि समय पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई? अगर मुलायम-अखिलेश की सरकार ईमानदार होती और अपना राष्ट्रधर्म निभाया होता तो निश्चित तौर पर इतने लोगों की जानें नहीं जातीं और दोनों सम्प्रदायों के बीच इतनी कटुता भी नहीं आती, मजहबी मानसिकताएं इतनी खतरनाक भी तो नहीं हो सकती थीं? अखिलेश-मुलायम या फिर कांग्रेस सोच यह रही होगी कि मुजफ्फरनगर के दंगे की आग की गर्मी दूर-दूर तक नहीं जायेगी? मुजफ्फ रनगर के दंगे की आग की गर्मी दूर-दूर तक तो जा चुकी है, सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि देश के कोने-कोने तक बहुसंख्यक आबादी को मुजफ्फ रपुर दंगे का डर/भय सताया हुआ है, और उसे आत्मरक्षा और आत्मसम्मान की चिंता हो उठी है। क्या सिर्फ मजहबी मतों के आधार पर ही मुलायम-अखिलेश की सरकार बनी थी? क्या 2014 के लोकसभा चुनाव में मुलायम सिंह यादव सिर्फ मजहबी वोटों की ताल पर ही प्रधानमंत्री बनने का अपना सपना साकार करेंगे? लेकिन शायद उन्हें पता नहीं है कि बहुसंख्यक आबादी के त्रिनेत्र से न तो सपा बचेगी और न ही कांग्रेस?

मुलायम-अखिलेश सरकार सिर्फ एक साल के शासनकाल में उत्तर प्रदेश में एक सौ से अधिक मजहबी दंगे हो चुके हैं। मुजफ्फ रपुर से लेकर रायबेरली और आजमगढ़ से लेकर लखनऊ तक मजहबी शक्तियां अपनी हिंसा से कानून व्यवस्था और इंसानियत को शर्मसार कर चुकी हैं। एक साल के अंदर सौ से अधिक मजहबी दंगे इस बात का प्रमाण है कि मुलायम-अखिलेश की सरकार कितनी लापरवाह, गैर जिम्मेदार और मजहबी शक्तियों का खिलौना रही है। इलाहाबाद और लखनऊ में हुए मजहबी उत्पात व हिंसा ने लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास करने वालों के साथ ही साथ हिन्दुत्व विरोधियों को भी डराया था। हर बार मुलायम-अखिलेश की सरकार कड़ी कार्रवाई करने और कानून को तोड़ने वालों पर सख्त कार्रवाई करने से परहेज किया। अभी हाल ही में इंडियन मुजाहिदीन का आतंकवादी भटकल जब पकड़ा गया तब सपा के महासचिव कमाल फारुखी ने बयान दिया था कि मुसलमान होने के कारण भटकल को आतंकवादी बनाया गया है उसे गलत तरीके से गिरफ्तार किया गया है जबकि सच्चाई कौन नहीं जानता। भटकल पर देश के अंदर चार दर्जन से अधिक बम विस्फोटों की घटनाओं को अंजाम देने का आरोप है। भटकल सउदी अरब और पाकिस्तान में बैठकर भारत में आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देता था। सउदी अरब ने ही उसे अपने देश से निर्वासित किया था। जब सरेआम मुलायम-अखिलेश की सरकार आतंकवादियों और मजहबी मानसिकता से ग्रस्त हिंसक लोगों को संरक्षण देगी तब मजहबी दंगे कैसे रुकेंगे?

मीडिया के लोग ही नहीं बल्कि देश का प्रबुद्ध वर्ग यह जानता है कि जब-जब उश्रर प्रदेश में मुलायम-सपा की सरकार आती है तब-तब अपराधियों में भय समाप्त हो जाता है, मजहबी ताकतें मजबूत हो जाती हैं। इसकी भयानक और खतरनाक परिणति यह होती है कि अपराधी और मजहबी शक्तियां बेलगाम होती हैं, अराजक हो जाती है। वर्तमान में उत्तर प्रदेश में पूरी तरह से अराजकता पसरी हुई है, मजहबी शक्तियां ही नहीं बल्कि अपराधी भी बेलगाम होकर हिंसा, लूट-मार फैला रहे हैं। मुलायम सिंह यादव की सोच यही रही है कि अपराधियों और मजहबी शक्तियों के तुष्टिकरण से ही सत्ता मिलती है। यही कारण है कि मुलायम-अखिलेश की सरकार और सपा पार्टी मजहबी शक्तियों और अपराधियों के हाथों का खिलौना बन जाती है। उत्तर प्रदेश में पिछली बार मायावती की सरकार थी। मायावती की सरकार में तमाम तरह की बुराइयां थीं, मायावती सरकार पर भ्रष्टाचार और तानाशाही जैसे शिकायतें बहुत ही ज्यादा थी। लेकिन हमें पिछली मायावती सरकार की प्रशंसा इस बात की करनी चाहिए कि उसने मजहबी हिंसा और आपराधिक हिंसा को न तो तरजीह दी थी और न ही मजहबी हिंसा-आपराधिक हिंसा की ऐसी कोई बड़ी घटना हुई थी। बसपा में एक पर एक मुस्लिम नेता थे पर मायावती ने अपने किसी मुस्लिम नेता को आजम खान नहीं बनने दिया था। मुलायम सिंह की पार्टी में आजम खान-कमाल फरुखी जैसे कोई एक-दो नेता नहीं हैं बल्कि दर्जनों मुस्लिम नेता हैं जो उत्तर प्रदेश में मजहबी हिसा को संरक्षण और विस्तार देने की राजनीति में सक्रिय हैं जिन पर अखिलेश का कोई अंकुश भी तो नहीं है।

मुजफ्फ रनगर की मजहबी हिंसा और दंगा की बुनियाद भी आप यहां देख लीजिये। कलाव गांव के रवीन्द्र सिंह की बेटी को मुस्लिम युवकों ने सरेआम छेड़ा और उसे उठा कर ले जाने लगे, रवीन्द्र सिंह का बेटा गौरव अपनी बहन को बचाने के लिए अपने एक दोस्त के साथ दौड़ा। छेड़खानी करने वाले युवकों ने अफ वाह फैला कर अपने समुदाय को जुटा लिया और गौरव और उसके दोस्त की निर्ममतापूर्वक वहशी भीड़ ने मार डाला। इस घटना से उत्तेजित जाट समुदाय ने ‘बहू-बेटी’ बचाओ पंचायत रखी थी। पंचायत में आने वाले लोगों पर हमले किये गये, मस्जिदों से गोलियां चली और लगभग एक दर्जन बहुसंख्यक समाज के लोगों की हत्या होती है। सवाल यहां यह उठता है कि मुस्लिम आबादी अपने उन युवकों के बहकावे में क्यों आयी जो युवती को सरेआम छेड़ने और उठा कर ले जाने पर आमदा थे? मुलायम सिंह-अखिलेश ने युवती को सरेआम छेड़ने वाले युवकों और युवती के भाइयों की हत्या करने वाली वहशी भीड़ के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। इतना ही नहीं बल्कि युवती के पिता और उसके परिजनों पर ही मुकदमा ठोक दिया गया। ऐसी प्रमाणित खबर पर पूरे जाट समुदाय की गोलबंदी को कैसे अस्वाभाविक माना जा सकता है। अगर अखिलेश की सरकार सख्ती बरतती और मजहबी मानसिकता के प्रति समर्पण नहीं दिखाती तो जाट समुदाय को ‘बहू-बेटी बचाओ पंचायत’ करने की जरूरत ही नहीं थी। मुलायम सिंह यादव या फिर कांग्रेस पार्टी की यह सोच आत्मघाती हो सकती है कि मुस्लिम तुष्टिकरण और मुस्लिम हिंसा से बहुसंख्यक वर्ग को शिकार बनाकर सत्ता प्राप्त करने की स्थायी राजनीति हो सकती है। कांग्रेस पार्टी की मुस्लिम पक्षधर नीतियों से भी मजहबी मानसिकताएं और मजहबी हिंसा को बल मिला है। मजहबी तुष्टिकरण के विसात पर सत्ता हासिल करने की नीति कांग्रेस की थी जिसे मुलायम सिंह यादव और उनकी पार्टी समाजवादी पार्टी ने अपना ली है। कांग्रेस-समाजवादी पार्टी ही क्यों बल्कि अन्य कथित तौर पर धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक पार्टियों की यह खुशफ हमी भी टूट सकती है कि मुस्लिम तुष्टिकरण और मुस्लिम हिंसा से बहुसंख्यक समुदाय को ग्राह बनाने की प्रतिक्रिया नहीं होगी। बहुसंख्यक आबादी में इसकी प्रतिक्रिया भी तेजी के साथ हुई है। इस बात को भी झुठलाया नहीं जा सकता है कि सिर्फ  मुस्लिम आबादी के समर्थन से कोई एक पार्टी सता में आ नहीं सकती है। खासकर मुजफ्फरनगर दंगे की आग की गर्मी सिर्फ उत्तर प्रदेश में नहीं बल्कि देश के अन्य भागों तक फैल चुकी है। उत्तर प्रदेश और देश के अन्य भागों में बहुसंख्यक आबादी का गुस्सा समजावादी पार्टी और कांग्रेस के खिलाफ बढ़ा है। मुजफ्फरनगर जैसी अन्य सभी मजहबी हिंसा का दुष्परिणाम समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पार्टी 2014 के लोकसभा चुनावों में भुगतेगी? यह तय है।

विष्णुगुप्त

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