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राजनीति

देर आयद, दुरुस्त आयद

डॉ वेदप्रताप वैदिक

उत्तर प्रदेश की अफसर दुर्गा शक्ति नागपाल की ससम्मान वापसी का सर्वत्र स्वागत होगा। यह दुर्गा शक्ति की वापसी से भी ज्यादा अखिलेश सरकार की प्रतिष्ठा की वापसी है। पिछले डेढ़ साल में अखिलेश की सरकार को अगर सबसे पहला बड़ा धक्का लगा तो दुर्गा शक्ति की मुअत्तिली से लगा। न सिर्फ देश के सभी सरकारी अफसर उत्तर प्रदेश सरकार से खफा हो गए बल्कि आम जनता को भी लगा कि उसने एक महिला अफसर को अपना निशाना इसीलिए बनाया है कि वह ईमानदार है और निर्भीक है। लोगों ने महसूस किया कि एक युवा मुख्यमंत्री से जितनी ऊंची आशाएं हैं, वे धूमिल होती जा रही है। जो लोग समाजवादी पार्टी और मुलायम सिंह के प्रति मित्र-भाव रखते हैं, उनका भी मानना था कि दुर्गा शक्ति को मुअत्तिल करके अखिलेश सरकार ने यह संदेश दिया है कि वह भ्रष्टाचार और संकीर्ण सांप्रदायिकता की संरक्षक है।

अच्छा हुआ कि सरकार ने जांच का नकाब ओढ़ लिया। जाहिर है कि जांच में कुछ नहीं निकला। खुद दुर्गा शक्ति नागपाल और उनके पति ने मुख्यमंत्री से भेंट की और अपनी स्थिति स्पष्ट की। आखिर मुख्यमंत्री अखिलेश मान गए और अब दुर्गा शक्ति को कानपुर के आसपास नियुक्त किया जाएगा, क्योंकि उनके पति वहीं उत्तर प्रदेश के अफसर के तौर पर कार्य कर रहे हैं। इसका मतलब क्या हुआ? क्या यह नहीं कि दुर्गा शक्ति का उत्तर प्रदेश सरकार विशेष ख्याल रख रही है? यह तथ्य किसी भी सरकार को लोकतांत्रिक और मानवीय बनाता है। कोई सरकार होकर अपने गलती स्वीकार करे, यह अपने आप में अत्यंत प्रशंसनीय है। इस कदम की सराहना तो होगी ही। देर आयद, दुरुस्त आयद!

इस पूरे प्रकरण से देश के उन नौकरशाहों के हौंसले बुलंद होंगे, जो कानून को सर्वोपरि मानते हैं। वे अब ईमानदारी और निर्भीकता से काम करेंगे। अब हरियाणा के खेमका जैसे दबंग अफसरों पर हाथ डालना भारी पड़ेगा। सारी खबर पालिका और जनता सरकार की खबर ले लेगी। दुर्गा शक्ति के समर्थन में लोकमत इतना प्रचंड था कि कोई भी सरकार उसकी अनदेखी नहीं कर सकती थी। दुर्गा शक्ति ने अपने काम से अपने नाम को चरितार्थ किया है। वे रेतचोरों के लिए काली-दुर्गा बन गई थीं। स्थानीय नेताओं में स्वार्थांध होकर अपने मुख्यमंत्री को गुमराह कर दिया। रमजान के दिनों में मस्जिद की चाहे गैर-कानूनी ही हो, ऐसी दीवाल को गिराना खतरनाक सिद्ध हो सकता है, फिर भी उसके कारण एक ईमानदार अफसर को मुअत्तिल करना तो ज्यादती ही थी। अफसर तो अपनी ईमानदारी के कारण परेशान हो ली लेकिन जिस छुटभेय्या नेता ने सरकार की इज्जत पैंदे में बिठा दी, उसको सजा कब मिलेगी?

 

लातों के भूतों पर बातों का असर नहीं

कीन्या और पाकिस्तान में इस्लामी आतंकवादियों ने जो कहर ढाया है, वह भयंकर है। मॉल में गए बेकसूर लोग और गिरजे में प्रार्थना करने वालों पर बम बरसाने वाले लोगों से ज्यादा कायर कौन होगा? यदि वे लोग बहादुर होते तो उन पर हमला करते, जो लोग हथियार बंद होते हैं। या जो सुरक्षा के घेरे में चलते हैं। हमला करके भागने वाले लोग अगर अपने आप को इस्लामी कहते हैं तो वे इस्लाम का अपमान करते हैं। कोई भी सच्चा धार्मिक मौलवी ऐसे राक्षसों को मुसलमान कहने की बजाय हैवान ही कहेगा। इस्लाम के नाम पर आतंकवाद फैलाने वाले इन दरिन्दों का इस्लाम से क्या लेना-देना है?

पहले कीन्या के नैरोबी में हुए हमले को लें। इस हमले की जिम्मेदारी ‘अल-शबाब’ नामक संगठन ने ली है। ‘अल-शबाब’ के प्रवक्ता ने इस हमले का कारण कीन्या की विदेशी नीति को बतलाया है। सोमालिया नामक एक पड़ोसी अफ्रीकी देश में कीन्या के पांच-छह हजार सैनिक शांति –स्थापना में लगे हैं। वे अफ्रीकी यूनियन का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। वे वहाँ अल-कायदा की गुंडागर्दी के खिलाफ जूझ रहे हैं।

‘अल-शबाब’ ने जिस ‘वेस्टगेट’ नामक मॉल पर हमला किया है, वह एक यहूदी का है। लेकिन मरने वाले 60 और घायल होने वाले 200 लोगों में ईसाई, मुसलमान और हिन्दू सभी हैं। दो भारतीय नागरिक भी हैं। घाना के राष्ट्र-कवि और लोक नेता कोफी अवनूर भी है। इन लोगों का सोमालिया में कार्यरत कीन्याई फौज से क्या संबंध है? इन बेकसूर लोगों की हत्या करके अल-कायदा के लोगों को क्या फायदा हुआ हैं? इस हत्याकांड के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए अब इस्राइली फौजी कीन्या पहुंच गए हैं। अब ‘अल-शबाब’ के आतंकवादियों को आटे-दाल के भावों का पता चलेगा। क्या उन्हें याद नहीं कि इसी कीन्या में एक यात्री विमान को किस जांबाजी से इस्राइली फौजीयों ने छुड़वाया था? कीन्या के राष्ट्रपति उहरु केन्याटा ने आतंकवादियों के विरुद्ध वज्र प्रहार की घोषणा की है। कितने शर्म की बात है कि पाकिस्तान के नागरिक अबू मूसा मोंबासा का हाथ इस हमले में बताया जा रहा है।

खुद पाकिस्तान में रविवार को एक गिरजे पर आंतकवादियों ने बम बरसा दिए। पेशावर के इस पुराने गिरजाघर में 600-700 लोग प्रार्थना करके ज्यों ही बाहर निकलने वाले थे, उन पर आतंकवादियों ने हमला बोल दिया। हमलावरों का कहना है कि उन्होंने अमेरिका के द्रोन-हमलों का बदला लिया है। उनसे कोई पूछे कि उन हमलों से पाकिस्तान के ईसाइयों का क्या लेना देना है? क्या इसका कारण सिर्फ यह है कि अमेरिका भी ईसाई देश है? पाकिस्तान के ईसाई तो अमेरिकी नीति का निर्धारण नहीं करते हैं और न ही वे अमेरिकी हितों के प्रवक्ता हैं। वे तो सब दलित हिंदू हैं, जो विभाजन के बाद अपनी खाल बचाने के लिए ईसाई बन गए। वे सबसे ज्यादा गरीब और सबसे ज्यादा असुरक्षित लोग हैं। इन डरे हुए लोगों पर इतना, क्रुरतापूर्ण हमला शुद्ध कायरता का प्रतिक है।

पेशावर के ‘आल सेन्ट्स चर्च’ पर हुए हमले को खैबर पख्तूनख्वाह प्रांप्त की सरकार रोक नहीं पाई, यह इमरान खान की प्रांतीय सरकार पर कलंक है। मियां नवाज़ शरीफ की केंद्रीय सरकार भी ऐसे हमलों के सामने असहाय और निरूपाय मालूम पड़ती है। अब मियां नवाज़ किस मुंह से मनमोहनसिंह से बात करेंगे? जो अपने देश के आतंकवाद को ही काबू नहीं कर सकते वे भारत में चल रहें पाकिस्तानी आतंकवाद को कैसे काबू करने का आश्वासन देंगे? उनके आश्वासन की कीमत क्या रह जाएगी? अब वे तालिबान से भी किस मुंह से बात करेंगे? तालिबान की क्रुरता यह संकेत दे रही है कि लातों के भूत बातों से मानने वाले नहीं है। यदि भारत और पाकिस्तान, दोनों मिलकर तालिबना पर टूट पड़े तो शायद उन पर काबू आसान हो।

 

फिर से बात बनने का माहौल

 

हमारे 13 सांसद अभी-अभी पाकिस्तान से लौटे हैं। वे पाकिस्तानी सांसदों से खुले संवाद के लिए गए थे। पाकिस्तान और भारत के सभी प्रमुख दलों के सांसदों ने इस संवाद में भाग लिया। लगभग सभी सांसदों को शक था कि न्यूयार्क में दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों की जो भेंट होने वाली है, उसमें से कुछ ठोस निकलने वाला नहीं है। उनका संदेह ठीक हो सकता है लेकिन अटलजी के साथ भी नवाज शरीफ की भेंट निरर्थक नहीं हुई थी। जनरल मुशर्रफ कितने आक्रामक व्यक्ति थे लेकिन अटलजी के साथ उनकी भेंट हुई और उसके कुछ ठोस नतीजे भी सामने आए। दोनों देशों के बीच आवागमन बढ़ा। रेल और बसें चलने लगीं। लोग पैदल भी सीमा-पार आने-जाने लगे। व्यापार भी बढ़ा। आतंकवादियों की करतूतों के कारण आपसी सहयोग की रफ्तार ढीली हो गई लेकिन अब फिर वही पुराना दौर शुरू हो सके तो इस बार दूर तक साथ चलने के आसार बन रहे हैं।

इसके कई कारण हैं। पहला तो यही कि मियां नवाज़ शरीफ प्रचंड बहुमत से जीत कर आए हैं। आसिफ जरदारी की तरह उनकी सरकार गठबंधन पर निर्भर नहीं है। वे चाहें खुद फैसला ले सकते हैं। दूसरा, मियां नवाज़ पंजाबी हैं। वास्तव में पंजाब ही पाकिस्तान है। फौज, पुलिस, व्यापार और सरकार सर्वत्र पंजाब का वर्चस्व है। मियां नवाज़ पाकिस्तान के प्रचंड और मुखर जनमत के प्रतिनिधि हैं। वे यदि कोई अलोकप्रिय फैसला लें तो भी उनका विरोध उतना कड़ा नहीं होगा। तीसरा, मियां नवाज़ पिछली बार जब प्रधानमंत्री बने थे तो उन्होंने प्रधानमंत्री बनने के लिए भारत से संबंध सुधार का नारा दिया था। वे अब भी अपने संकल्प पर दृढ़ हैं।

चौथा, यह ठीक है कि मियां नवाज़ का पाकिस्तान के मजहबी तत्वों के साथ विशेष संबंध है। इसीलिए माना जाता है कि अंततोगत्वा उन्हें भारत विरोधी तत्वों की बात माननी ही पड़ेगी लेकिन इसका उल्टा भी सही है। मियां नवाज़ के नेतृत्व की वजह से वे तत्व इतना कड़ा भारत विरोध नहीं कर पाएंगे कि नवाज़ शरीफ सरकार ही नाकाम हो जाए। पांचवां, इस समय पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति इतनी विषम हो गई है कि भारत से संबंध सुधारना मियां नवाज़ की मजबूरी हो गई है। न सिर्फ भारत के लिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया के रास्ते खोलने की बात हो रही है बल्कि भारत को सर्वाधिक अनुग्रहीत राष्ट्र का दर्जा देने के प्रस्ताव को दुबारा खोला गया है। पाकिस्तान ने भारत से बिजली और पानी लेने के लिए प्रतिनिधि मंडल भेज रखे हैं।

छठा, फौज और आईएसआई का दबदबा कई कारणों से घट गया है और उनके नए मुखियाओं को भी मियां नवाज़ अपने ढंग से चुनने वाले हैं। दूसरे शब्दों में शायद पहली बार पाकिस्तान का कोई नागरिक प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति भारत नीति चलाने में स्वायत्त होगा। सातवां, पाकिस्तान में आज भारत की बजाय अमेरिका विरोधी माहौल कहीं अधिक है। अफगानिस्तान से अमेरिकी वापसी के बाद वहां भारत की भूमिका को लेकर पाकिस्तान बहुत चिंतित है। भारत चाहे तो इस चिंता को मित्रता में बदल सकता है। इसीलिए सिर्फ प्रधानमंत्रियों के बीच ही नहीं, दोनों देशों के सांसदों, पत्रकारों, विद्धातों, उद्योगपतियों, अफसरों और फौजियों के बीच भी संवाद होते रहना चाहिए।

 

विनाशकाले विपरीत बुद्धि!

हमारी सरकार को क्या हो गया है? वह इतनी क्यों डर गई है? नरेंद्र मोदी का भूत सरकार पर इतना ज्यादा क्यों सवार हो गया है? अभी तो चुनाव की घोषणा भी नहीं हुई है लेकिन भारत सरकार हारे हुए उम्मीदवार की तरह खंभे नोचने लगी है। खिसियाहट की भी हद है। पूर्व सेनापति वी के सिंह और बाबा रामदेव दोनों पर सरकार ने एक साथ हमला बोला है। यदि यह हमला वह सीधा करती और सरे-आम करती तो माना जाता कि वह सरकार है लेकिन वह किसी दब्बू और मरियल योद्धा की तरह पर्दे के पीछे से वार कर रही है। वी के सिंह को दबाने के लिए वह भारतीय सेना और रक्षा मंत्रालय का दुरुपयोग कर रही है और रामदेवजी को तंग करने के लिए वह ब्रिटिश सरकार के कंधे पर बंदूक रख रही है। लेकिन जिन नेताओं के इशारे पर ये खटकरम हो रहे हैं, भारत की जनता उनकी तरह भोंदू नहीं है। वह उनकी हर चाल को समझ रही है।

वी.के. सिंह पर जो आरोप लगाया गया है, उससे केंद्र सरकार की ही भद्द पिटती है। क्या भारतीय सेना किसी राज्य सरकार को गिराने की साजिश अपने बूते पर कर सकती है? असंभव है यह! यदि आज सेना पर यह आरोप लगाया है तो कल केंद्र सरकार को गिराने का आरोप भी उस पर लगाया जा सकता है। जम्मू-कश्मीर की सरकार को गिराने का आरोप अगर सही है तो भी क्या वी के सिंह वहां के खुद मुख्यमंत्री बननेवाले थे? यदि 3-4 करोड़ रुपए कुछ लोगों को खिलाए गए हैं तो क्या वे वी के सिंह के दामाद है? इस आरोप को लगाकर सरकार खुद की इज्जत को चूर्ण-विचूर्ण कर रही है। उसने फौज की गुप्त रपट को, अगर वह सही है तो भी उसे छपवा कर देशद्रोहपूर्ण कार्य किया है। और फिर रपट मार्च में आई है, उसे इसी समय क्या इसलिए प्रकट किया गया है कि पिछले हफ्ते वी के सिंह और नरेंद्र मोदी एक ही मंच पर देखे गए थे? सरकार का इतना डर जाना और डरकर अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी मारना कौन सी बुद्धिमानी है? क्या यह विनाशकाले विपरीत बुद्धि का परिचायक नहीं है?

इसी तरह बाबा रामदेव को लंदन के हीथ्रो हवाई अड्डे पर जिस तरह घंटों बिठाए रखा गया, उसका भी सारा कलंक भारत सरकार के माथे पर चिपक रहा है। रामदेव आजकल देश में घूम-घूमकर बड़ी-बड़ी सभाएं कर रहे हैं और इस भोंदू सरकार के विरुद्ध शंखनाद कर रहे हैं। क्या सरकार के उच्चायोग का कर्तव्य नहीं था कि वह तुरंत हस्तक्षेप करता? रामदेव पहली बार लंदन नहीं गए हैं और देश तथा दुनिया के लोग उन्हें भारत के किसी भी नेता से ज्यादा जानते हैं। जो ब्रिटिश सरकार उन्हें अपनी संसद में योग सिखाने का निमंत्रण देती रही है, वह उन्हें तंग क्यों करेगी, जब तक कि उसे किसी का इशारा न हो।

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