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विश्व की गिरती आर्थिक व्यवस्था को वैक्सीन का ही सहारा

हरजिंदर सितंबर

स्पूतनिक वी की पिछले दिनों खासी आलोचना भी हुई थी। रूस ने इस वैक्सीन के तीसरे चरण का पूरा परीक्षण किए बिना ही उसका इस्तेमाल शुरू कर दिया। इतनी विवादास्पद वैक्सीन के क्लिनिकल परीक्षण की अनुमति देना हैरत में डालने वाली खबर है।

इस सप्ताह की शुरूआत में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने कहा था कि देश में बन रही कोरोना वायरस की वैक्सीन अगले साल मार्च महीने तक प्रयोग के लिए तैयार होगी। चार दिन बाद उन्होंने संसद में कहा कि हमें वैक्सीन अगले साल के शुरू तक मिल जाएगी। हालांकि इन दोनों ही बयानों में बहुत अंतर नहीं दिखाई देता लेकिन इस बीच कुछ ऐसे समाचार आए हैं जिनके हिसाब से देखें तो अंतर थोड़ा ज्यादा स्पष्ट हो जाता है।

स्वास्थ्य मंत्री के पहले बयान के दो दिन के भीतर ही यह खबर आई कि रूस में तैयार कोविड-19 की वैक्सीन स्पूतनिक वी के तीसरे चरण का परीक्षण भारत में भी होगा। यह काम भारत की प्रतिष्ठित दवा कंपनी डॉक्टर रेड्डी लेबरोटरीज़ को मिला है। कुछ खबरों में यह भी बताया गया कि रूस के निवेश बोर्ड ने इसके लिए भारत में बाकायदा काफी बड़ा निवेश किया है और यहां स्पूतनिक वी के तीस करोड़ टीकों का उत्पादन होगा, जिसमें से दस करोड़ का इस्तेमाल भारत में ही किया जा सकेगा। हालांकि इस दूसरी खबर की अभी पुष्टि नहीं हो सकी है।

स्पूतनिक वी वह वैक्सीन है जिसके लिए पिछले दिनों रूस की खासी आलोचना भी हुई थी। उसने इस वैक्सीन के तीसरे चरण का पूरा परीक्षण किए बिना ही उसका इस्तेमाल शुरू कर दिया। इतनी विवादास्पद वैक्सीन के क्लिनिकल परीक्षण की अनुमति देना हैरत में डालने वाली खबर है। वह भी तब जब भारत में खुद अपनी तीन वैक्सीन परीक्षण के विभिन्न चरणों में हैं। इसके अलावा ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय और आस्ट्रा जेंका नाम की दवा कंपनी द्वारा तैयार की गई वैक्सीन का परीक्षण यहां पहले ही चल रहा है।

आश्चर्य की बात यह इसलिए भी है कि भारत में वैक्सीन या किसी दवा के क्लिनिकल परीक्षण की अनुमति मिलना आसान नहीं होता। ड्रग एंड कास्मेटिक एक्ट के तहत ऐसे परीक्षण की अनुमति और लाईसेंस हासिल करने के लिए कंपनियों खासकर विदेशी कंपनियों को काफी पापड़ बेलने पड़ते हैं और इसमें वक्त भी काफी लगता है। फिर यहां तो मामला एक ऐसी वैक्सीन का है जो भारत में आने से पहले ही विवादों के केंद्र में आ चुकी है।

लेकिन यह समस्या भारत में ही नहीं है। कोविड-19 से मुक्ति के लिए दुनिया भर में बेचैनी है उसके चलते तमाम देशों ने या तो अपने नियम कायदों में ढील दी है या फिर उसकी प्रक्रियाओं को तेजी से निपटाने का रास्ता अपनाया है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण इंडोनेशिया है। वहां एक साथ कई देशों की वैक्सीन का क्लिनिकल परीक्षण चल रहा है। इनमें सबसे प्रमुख और सबसे आगे है चीन की कंपनी साइनोवैक की वैक्सीन कोरोनावैक। वैसे खुद इंडोनेशिया के वैज्ञानिक भी अपनी एक वैक्सीन विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं। रेड एंड वाइट नाम की यह वैक्सीन परीक्षण के दौर में अभी काफी पीछे है। इसी तरह पाकिस्तान में भी चीन की एक से ज्यादा वैक्सीन का परीक्षण चल रहा है।

यह बेचैनी सभी जगह पर है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की वैक्सीन में तीसरे चरण के परीक्षण के दौरान कुछ लोगों को बुखार होने की सूचना मिली थी। इसके बाद इसके परीक्षण को रोक दिया गया, लेकिन दो ही दिन बाद इसे फिर से शुरू कर दिया गया। आमतौर पर ऐसे हालात में इतनी जल्दी नहीं दिखाई जाती और जिन लोगों में समस्या दिख रही हो उनकी लंबी जांच से आश्वस्त होने के बाद ही परीक्षण दुबारा शुरू किया जाता है। लेकिन इस समय वैक्सीन लाने की जल्दबाजी में ऐसे नियम कायदों को नजरंदाज किया जा रहा है।

बेचैनी का एक दूसरा और सबसे अजीब राजनैतिक रूप अमेरिका में दिख रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चाहते हैं कि किसी तरह से उनके देश में तैयार हो रही वैक्सीन वहां चुनाव प्रक्रिया शुरू होने से पहले इस्तेमाल के लिए बाजार में आ जाए। दो नवंबर को वहां चुनाव होंगे और वहां अगले महीने वैक्सीन बाजार में उतारने के दावे किए जा रहे हैं। कोविड-19 की सबसे ज्यादा वैक्सीन इस समय अमेरिका में ही तैयार हो रही हैं, लेकिन ट्रंप सरकार ने सबसे बड़ा दांव मॉडेरना नाम की कंपनी द्वारा तैयार की जा रही वैक्सीन पर लगाया है। कुछ अन्य कंपनियों के साथ ही इस कंपनी को भी सरकार ने वैक्सीन तैयार करने के लिए भारी आर्थिक मदद दी है। लेकिन अब मॉडरेना ने कहा है कि वैक्सीन तैयार होने में वक्त लग सकता है और शायद यह काम दिसंबर में ही पूरा हो पाए। वैसे मॉडरेना इस वैक्सीन के लिए जिस तकनीक का इस्तेमाल कर रही है उस पर कनाडा की एक कंपनी से उसका पेटेंट विवाद भी चल रहा है, जो इस देरी को और लंबा भी खींच सकता है।

वैक्सीन को लेकर दुनिया भर की सरकारों की बेचैनी इसलिए भी है कि अब इसके अलावा किसी को कोई और रास्ता नहीं नजर आ रहा। खासकर तमाम देशों की अर्थव्यवस्था जिस तरह मुंह के बल गिरी है उसके बाद सभी को वैक्सीन में ही आसरा दिख रहा है। यह माना जा रहा है कि वैक्सीन बाजार में आने के बाद ही अर्थव्यवस्था को पूरी तरह पटरी पर लाने की कवायद शुरू हो सकेगी। हालांकि इसके लिए जिस तरह की जल्दबाजी दिखाई बहुत से वैज्ञानिक उसे भी एक खतरा मानते हैं, लेकिन आपातकाल में बहुत-सी सावधानियों को भुला दिया जाता है और अभी भी यही हो रहा है।

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