कोरोना के कारण से अस्तव्यस्त हो गये व्यापार, रोजगार आदि

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ललित गर्ग

सांसदों के वेतन में तीस प्रतिशत कटौती तो अप्रैल में ही यह सोच कर लागू कर दी गयी थी कि कोरोना-काल ज्यादा लम्बा नहीं चलेगा, लेकिन अब सितंबर में भी साफ तौर पर लगने लगा है कि यह बुरा समय आगे भी चलने वाला है।

आदर्श नेतृत्व की परिभाषा है, ”सबको साथ लेकर चलना, निर्णय लेने की क्षमता, समस्या का सही समाधान, कथनी-करनी की समानता, लोगों का विश्वास, दूरदर्शिता, जनता के दुःख में सहभागिता, कल्पनाशीलता और सृजनशीलता।” इन शब्दों को एक बार फिर भारत की संसद ने कोरोना महामारी से जुड़े आर्थिक संकट को कम करने के लिये प्रधानमंत्री, मंत्रियों और सांसदों के वेतन में कटौती के विधेयक को सर्वसम्मति से पारित करके सार्थक किया है। नेतृत्व का आदर्श न पक्ष में है और न प्रतिपक्ष में, बल्कि इस तरह के संवेदनशील एवं प्रेरक निर्णयों में है। एक युग था जब सम्राट, राजा-महाराजा अपने राज्य और प्रजा की रक्षा अपनी बाजुओं की ताकत से लड़कर करते थे और इस कर्तव्य एवं आदर्श के लिए प्राण तक न्यौछावर कर देते थे, आज कोरोना महामारी के संकट से खासतौर पर आर्थिक मोर्चे पर गंभीर संकट से जूझ रहे देश को स्थायी राहत पहुंचाने की दृष्टि से संसद द्वारा पारित वेतन में कटौती का यह विधेयक न केवल स्वागत के योग्य, बल्कि अनुकरणीय भी है।

लोकतंत्र के पहरुओं एवं शीर्ष नेतृत्व द्वारा देश को यह संदेश देना जरूरी था कि देश में अगर सबकी कमाई घटी है, तो उनमें सांसद भी शामिल हैं। यह नैतिकता का तकाजा भी है और वक्त की जरूरत भी है कि खुद आगे बढ़कर सांसदों ने वेतन में कटौती की है। इस प्रेरणास्पद पहल से पता चलता है कि सांसद कोरोना महामारी के समय में अपने व्यक्तिगत योगदान को लेकर सजग एवं संवेदनशील हैं। पूरे एक वर्ष के लिए वेतन को 30 प्रतिशत घटाया गया है। सांसदों के वेतन में हुई कटौती से भले ही कोई बहुत बड़ी राशि का फण्ड नहीं बचेगा, लेकिन सेवा में योगदान के प्रति उनका नैतिक बल जरूर बढ़ेगा, राष्ट्रीय चरित्र एवं बल मजबूत होगा।

वेतन में तीस प्रतिशत कटौती तो अप्रैल में ही यह सोच कर लागू कर दी गयी थी कि कोरोना-काल ज्यादा लम्बा नहीं चलेगा, लेकिन अब सितंबर में भी साफ तौर पर लगने लगा है कि यह बुरा समय आगे भी चलने वाला है। इस महासंकट को देखते हुए संसद ने एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया है, इस तरह के उदाहरण पहले भी प्रस्तुत होते रहे हैं। 1962 के युद्ध में भारत को बहुत नुकसान हुआ था। इसी का फायदा उठाने के लिए पाकिस्तान ने 1965 में युद्ध छेड़ दिया। लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के नेतृत्व में भारतीय सेना ने पाक को मुंहतोड़ जवाब देकर हरा दिया। युद्ध के दौरान भारत में वित्तीय संकट गहरा गया था। ऐसे में शास्त्रीजी ने रामलीला मैदान से लोगों से अपील की थी कि सभी अपने फालतू के खर्चे छोड़ दें और हफ्ते में एक दिन उपवास जरूर रखें। जिससे भारत को अमेरिका से गेंहू ज्यादा ना खरीदना पड़े और भारत जल्दी वित्तीय संकट से उबर पाए। इसलिए उन्होंने खुद भी एक दिन उपवास रखना शुरू कर दिया था। इतना ही नहीं, इस वित्तीय संकट से देश को निकालने और देशवासियों के सामने प्रेरणा बनने के लिए उन्होंने अपना वेतन लेने से भी मना कर दिया था। कहा तो यह भी जाता है कि एक बार शास्त्रीजी की धोती फट गई थी तो उन्होंने नई धोती की जगह फटी धोती ही सिलने का आदेश दिया था।

वर्तमान दौर में भी ऐसे अनेक सांसद रोशनी बने हैं। महान क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर इन दिनों राज्यसभा के सांसद के तौर पर छह साल में मिले वेतन-भत्तों की राशि लगभग 90 लाख रुपये प्रधानमंत्री कोष में जमा कर उदाहरण बने हैं। स्वर साम्राज्ञी और भारत रत्न से सम्मानित लता मंगेशकर ने तो वेतन-भत्तों के चेक को छुआ तक नहीं था। लता मंगेशकर वर्ष 1999 से 2005 तक राज्यसभा की मनोनीत संसद सदस्य रही हैं। इस दौरान उन्होंने न तो वेतन लिया और न ही भत्ते। इतना ही नहीं, जब उन्हें चेक भेजे गए तो वहां से वापस आ गए थे। लता मंगेशकर ने पेंशन के लिए भी आवेदन नहीं किया है। ऐसे किसी भी पूर्व सदस्य का ब्योरा उपलब्ध नहीं है जो पेंशन न ले रहे हों। वास्तव में लता जितनी बड़ी गायिका हैं, उतना ही बड़ा उनका नैतिक बल और दिल भी है।

वेतन-भत्ते कटौती के लिए आगे आने वालों में राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति और राज्यपाल भी शामिल हैं। देश के सभी राज्यों को ऐसी ही कटौती की दिशा में कदम उठाना चाहिए। सरकार सही कह रही है कि सेवा घर से शुरू होती है और इसे हर स्तर पर लागू करके देश के सामने आदर्श पेश करना सांसदों की जिम्मेदारी है। वेतन में कटौती के साथ ही सरकार को अपने उन खर्चों को भी प्राथमिकता के साथ कम करना चाहिए, जिनके बिना काम चल सकता है। फिजूलखर्ची रोकने के साथ ही यह भी बहुत जरूरी है कि कोरोना के नाम पर एकत्र हो रहा धन सिर्फ जरूरतमंदों के हाथों तक पहुंचे। जिम्मेदारी जितनी सरकार पर है, उतनी ही सभी सांसदों पर भी, ताकि कोरोना के समय देश की पाई-पाई का अधिकतम सदुपयोग हो सके। हालांकि कोरोना के समय सांसदों के कुछ ऐसे भत्तों में भी कटौती की जा सकती थी, जिनकी जरूरत समय के साथ कम हो गई है। सांसदों का लोगों से मिलना-जुलना पहले की तुलना में कम हुआ है, ज्यादातर बैठकें भी आभासी हो गई हैं, और यह उचित भी है। ऐसे में, भत्तों पर विचार किया जाना चाहिए। सांसदों के साथ-साथ उच्च अधिकारियों एवं कर्मचारियों के वेतन एवं भत्तों पर भी चिन्तन अपेक्षित है। क्षेत्रीय विकास के लिए मिलने वाली सांसद निधि को दो साल तक निलंबित करने का निर्णय भी समयोचित है। हरेक सांसद को हर साल पांच करोड़ रुपये सांसद निधि के रूप में मिलते हैं, ताकि वह अपने क्षेत्र के विकास में जरूरत के हिसाब से खर्च कर या करा सकें।

अनेक विपक्षी नेताओं ने सांसद निधि के निलंबन को गैर-जरूरी बताया है। उनका मानना है कि महामारी के समय में सांसदों की जिम्मेदारी कतई कम नहीं हुई है, लोग उनसे पहले की तरह ही उम्मीद करेंगे, बल्कि महामारी के समय तो लोगों की उम्मीदें और भी बढ़ गई हैं। ऐसे समय में, सांसद निधि की पूरी न सही, आंशिक बहाली के पक्ष में मजबूत तर्क दिए जा रहे हैं। लेकिन कोरोना महामारी से उत्पन्न आर्थिक संकट में विकास कार्यों से ज्यादा जरूरी है आम जनजीवन से जुड़ी मूलभूत अपेक्षाएं। सांसद निधि खर्च न होने से होने वाली बचत को अगर वेतन में 30 प्रतिशत कटौती से होने वाली बचत के साथ मिला दिया जाए, तो अनुमान है कि सरकार के पास 7,930 करोड़ रुपये बचेंगे। इस धनराशि को कोरोना के खिलाफ लड़ाई में खर्च करने का सरकार का इरादा है और इसे कतई गलत नहीं कहा जा सकता। वेतन में कटौती और सांसद निधि के निलंबन के निर्णय कोरोना के खिलाफ केंद्र एवं राज्य सरकारों की लड़ाई को नयी दिशा एवं बल देने वाले और महत्वपूर्ण कदम साबित होंगे।

कोरोना के कारण से अस्तव्यस्त हो गये व्यापार, रोजगार आदि के सन्दर्भ में भी संसद को ठोस कदम उठाने की अपेक्षा है। शहरी सम्पन्न जीवन को सुविधापूर्ण व सुखमय बनाने के आधार रहे नवोदित कारीगरों व श्रमिकों का जीवन भी हमारे लिए कम मूल्यवान नहीं है। संसद की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह उन लोगों के जख्मों पर मरहम लगाये जिन्हें कोरोना ने बर्बाद कर डाला है। यह बर्बादी कई आयामों में हुई है। इसका सबसे बड़ा आयाम काम-धंधों का चौपट हो जाना और आम आदमी की क्रय क्षमता न्यूनतम हो जाना है। इसमें सुधार करने के लिए संसद के माध्यम से ही ऐसा सुझाव आना चाहिए जिससे इस देश के लोगों को लगे कि संसद में भेजे गये उनके प्रतिनिधि अपना काम ईमानदारी से कर रहे हैं। यह ईमानदारी सत्ता व विपक्ष दोनों ही तरफ के सांसदों को दिखानी होगी क्योंकि दोनों ही पक्षों के सांसद आम जनता के वोटों से चुन कर आते हैं। राजा और प्रजा, शासक और शासित की व्यवस्था को नया आयाम देने एवं संवेदनशील बनाने की जरूरत है। वर्तमान शीर्ष नेतृत्व को साधुवाद और मंगलकामना कि वह आमजन को तंत्र के बल पर नहीं, भावना, प्रेम एवं संवेदना के बल पर जीए और जीते। क्योंकि जब कल ही नहीं रहा तो आज भी नहीं रहेगा।

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