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भारतीय संस्कृति

यह राष्ट्र आर्यावर्त्त था, जब आर्य ही नही होंगे तो क्या होगा

यहां राष्ट्रीय आर्य निर्मात्री सभा का जनपदीय सम्मेलन बड़े धूमधाम से संपन्न हुआ। सम्मेलन में उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए सांगोपांग वेद विद्या के प्रकांड विद्वान आचार्य परमदेव मीमांसक ने कहा कि हजारों मत पंथों अर्थात तथाकथित धर्मों से यह देश हिंदुस्तान बिखरा हुआ था। मुसलमानों की 700 से अधिक वर्षों की गुलामी से हम अंग्रेजों की गुलामी में आ गये और दो सौ वर्ष उनके गुलाम रहे। 1857 में स्वाधीनता के लिए लड़कर हम हार गये, तो कंपनी की गुलामी से  इंग्लैंड की महारानी के गुलाम हो गये। तब ऋषि दयानंद ने आकर स्वराज्य का मूलमंत्र भारतीयों को दिया और हमने आगे बढ़ने का संकल्प लिया। इस संकल्प के परिणामस्वरूप 1947 में देश आजाद हुआ जिसमें देश के बहुत से क्रांतिकारियों, बलिदानियों के साथ-साथ महात्मा गांधी जैसे देशभक्तों का भी विशेष योगदान था।  आचार्य परमदेव ने कहा कि 1883 में ऋषि दयानंद के बलिदान के बाद आर्यों ने वेदमत को प्रचारित प्रसारित करने का अनर्थक प्रयास किया। इस दिशा में कार्य करते हुए स्वामी श्रद्घानंद जैसे लोगों ने लाखों उन हिंदुओं को पुन: शुद्घ किया जो किसी कारण से मुसलमान या ईसाई बन गये। बहुत से गुरूकुल, डी.ए.बी. संस्थान और आर्य समाज स्थापित किये गये, परंतु फिर भी आर्य समाज का आंदोलन धीमा पड़ गया। आर्य समाज कई गुटों में बंट गया, आर्य समाज पर सिद्घांतहीन लोगों ने कब्जा कर लिया। ऐसी परिस्थितियों में आर्य निर्माण का मिशन शिथिल पड़ गया। उन्होंने कहा कि आज हमें महर्षि के मिशन को आगे बढ़ाने के लिए फिर प्राणपण से कार्य करने की आवश्यकता है, और इसीलिए राष्ट्रीय आर्य निर्मात्री सभा स्थापित की गयी। आचार्य परमदेव ने उपस्थित हजारों आर्य वीरों का आह्वान किया कि आज देश पर संकट मंडरा रहा है। हम केवल धार्मिक क्रिया कलापों तक अपने आपको सीमित न करें, बल्कि इससे आगे बढ़कर देश और समाज के लिए भी कुछ करने का संकल्प लें। उन्होंने कहा कि हम प्रत्येक राष्ट्रभक्त, वेदभक्त और प्रत्येक देशवासी का आह्वान करते हैं कि आओ संगठित होकर देश को फिर आर्य बनावें और राष्ट्र बचावें। यह हमारा सबका पुनीत सांझा कार्य है। उन्होंने कहाकि यह राष्ट्र आर्यवर्त था, जब आर्य ही नही होंगे तो आगे क्या होगा? इसलिए आओ हम सब एकजुट होकर संकल्प लें कि एक भी व्यक्ति जो 18 वर्ष से ऊपर का हो गया हो, उसे इस देश में बिना वेद विद्या के नही रहने देंगे। निर्धन, धनवान, शिक्षित, अशिक्षित, उच्च पद, निम्न पद, किसान, व्यापारी, मजदूर, मालिक किसी भी मतपंथ का क्यों न हो और किसी भी जाति कुल का क्यों न हो उन्हें यह वेद विद्या अवश्य सिखलाएंगे, इसमें कोई भेदभाव नही करेंगे, इस विद्या को प्राप्त करने का अधिकार सभी को है। इस अवसर पर राष्ट्रीय आर्य निर्मात्री सभा के अध्यक्ष पं. लोकनाथ आर्य ने कहा कि इस देश में हमारा जन्म हुआ है, इसके अन्न जल, मिट्टी आदि संसाधनों से हमारा लालन पालन होता है तो सर्वप्रथम इसे ही आर्यवर्त्त बनाने की प्राथमिकता नियत है।उन्होंने कहा कि हिंदू इस वेदविद्या के रक्षक, पोषक और धारक रहे हैं, इसलिए इनको वेद विद्या युक्त करना भी हमारा प्राथमिक कर्त्तव्य है। ऋषि दयानंद के सच्चे अनुयायी ईर्ष्या, द्वेष, फूट और स्वार्थ को भुलाकर इस महान कार्य में जुट जाएं, और  लोगों को संगठित कर राष्ट्र निर्माण के कार्य में योगदान दें।  इस अवसर पर आचार्य हनुमत प्रसाद, आचार्य जितेन्द्र आर्य, आचार्य संजीव आर्य,  आचार्य वीरेन्द्र आर्यव्रत,  आचार्य मनोज,   सुनील शास्त्री,  मायाप्रकाश त्यागी आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किये। सम्मेलन में आर्य नेता महेन्द्र सिंह आर्य, ‘उगता भारत’ के मुख्य संपादक राकेश कुमार आर्य सहसंपादक श्रीनिवास एडवोकेट, रामकुमार वर्मा, अजय आर्य आदि सहित कई लोगों की विशेष उपस्थिति रही।

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