अखिलेश यादव को डॉ. कफील के बहाने मिला मौका ‘सियासत’ चमकाने का मौका

अजय कुमार

अखिलेश के ट्वीट करते ही भाजपा नेताओं की त्योरियां चढ़ गईं। ऐसा स्वाभाविक भी था, क्योंकि अखिलेश भी अच्छी तरह से जानते हैं कि आजम और डॉ. कफील की गिरफ्तारी की वजह बिल्कुल अलग थी। कफील भड़काऊ बयानबाजी के आरोप में जेल गए थे।

कोई दो अपराध एक जैसे नहीं होते हैं। यह बात कई मौकों पर न्यायपालिका भी दोहरा चुकी है, लेकिन हमारे सियासतदार ऐसा नहीं मानते हैं वह हर जगह राजनीतिक फायदे की राह तलाश ही लेते हैं। इसीलिए तो जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार द्वारा गोरखपुर मेडिकल कालेज के डॉक्टर कफील खान पर लगाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून को अवैध करार दिया तो समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को डॉ. कफील के बहाने योगी सरकार पर हमला बोलते हुए तुष्टिकरण की सियासत चमकाने का मौका मिल गया। अखिलेश यादव ने डॉ. कफील के पक्ष में हाईकोर्ट के फैसले पर तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत मथुरा जेल में बंद डॉ. कफील खान की रिहाई पर खुशी जाहिर की बल्कि यह कहने से भी नहीं चूके कि डॉ. कफील की तरह झूठे मुकदमों में फंसाए गए हमारे नेता व सांसद आजम खां को भी जल्द इंसाफ मिलेगा। अखिलेश यादव ने यह बात ट्वीट कर कही। अखिलेश का कहना था, ‘सत्ताधारियों का अन्याय और अत्याचार हमेशा नहीं चलता है।’

अखिलेश के ट्वीट करते ही भाजपा नेताओं की त्योरियां चढ़ गईं। ऐसा स्वाभाविक भी था, क्योंकि अखिलेश भी अच्छी तरह से जानते हैं कि आजम और डॉ. कफील की गिरफ्तारी की वजह बिल्कुल अलग थी। कफील भड़काऊ बयानबाजी के आरोप में जेल गए थे, जबकि आजम खान पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं। उत्तर प्रदेश के रामपुर से समाजवादी पार्टी के सांसद आजम खान के नाम एक ऐसा रिकॉर्ड दर्ज है जिसे वो याद रखना भी मुनासिब नहीं समझेंगे। आजम खान पर पुलिस ने अब तक 78 मुकदमे दर्ज किए हैं। इसके साथ ही आजम देश के पहले सांसद बन गए हैं जिनके खिलाफ इतनी संख्या में मुकदमे दर्ज हैं। इनमें से अधिकांश मुकदमे भले ही उनके हाल ही में सांसद बनने के बाद दर्ज हुए हैं, लेकिन आजम पर जितने भी मुकदमे दर्ज हुए हैं, वह उनके अखिलेश सरकार में मंत्री रहते किए गए भ्रष्टाचार से जुड़े हैं।

आजम पर उनके गृह जनपद रामपुर में मौलाना जौहर अली यूनिवर्सिटी के लिए आलियागंज के किसानों की जमीन कब्जा करने के आरोपों में 28 मुकदमे दर्ज हैं। इसी प्रकार यतीमखाना में भैंस चोरी प्रकरण में आजम पर 9 तो शत्रु संपत्ति के मामले में दो मुकदमे दर्ज हैं। वहीं किताबों की चोरी, शेर की मूर्ति चुराने, 2700 खैर के पेड़ों की चोरी का भी मुकदमा दर्ज है। इसके अलावा बेटे अब्दुल्ला आजम के दो-दो जन्म प्रमाणपत्र के आरोपों में दो मुकदमे दर्ज हैं।

आजम के खिलाफ 28 मुकदमे जौहर यूनिवर्सिटी के लिए जमीन कब्जाने के आरोप में अजीम नगर थाने में दर्ज हुए हैं जबकि 11 मुकदमे गंज थाने में लोगों के घर तोड़ने और लूटपाट करने के आरोप में दर्ज कराए गए हैं। आजम खान पर शत्रु संपत्ति को वफ्फ संपत्ति में दर्ज करने और वक्फ संपत्ति को हड़पने का आरोप लगा है। इस मामले में आजम खान, उनकी पत्नी तजीम फातिमा और बेटे अब्दुल्ला आजम के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है।

बता दें कि जौहर विश्वविद्यालय के लिए जमीन हड़पने के मामलों में अगर आजम खान दोषी पाए जाते हैं तो उन्हें 10 साल तक की सजा हो सकती है क्योंकि पुलिस ने मुकदमा दर्ज होने के बाद आईपीसी की धारा 389 को भी बढ़ा दिया है। यह गैर जमानती धारा है और इस धारा में 10 साल तक की सजा का भी प्रवाधान है। आजम के कृत्य को देखते हुए कोर्ट आजम एंड फैमली को जमानत तक नहीं दे रही है। परंतु अखिलेश को आजम का भ्रष्टाचार न तब दिखाई दिया था, जब वह उनकी कैबिनेट में मंत्री थे, न अब दिखाई दे रहा है जब न्यायपालिका आजम के भ्रष्टाचार पर सख्त रवैया अपनाए हुए है। अखिलेश ऐसा दर्शा रहे हैं मानो आजम को जानबूझकर योगी सरकार परेशान कर रही है।

दरअअल, अखिलेश यादव एक पढ़े-लिखे नेता हैं। वह जानते हैं कि आजम खान और डॉक्टर कफील का मामला बिल्कुल अलग है, लेकिन इन बातों से इत्तर वह यह मुगालता पाले हुए हैं कि उनका वोटर वही सच्चाई देखेगा, जो उनके द्वारा उन्हें दिखायी जायेगी। यानी, अगर वह आम को इमली कह देंगे, तो वोटर उसे इमली मान लेगा। असल में अखिलेश यादव भ्रष्ट आजम खान के सहारे मुस्लिम तुष्टिकरण की सियासत का खेल, खेल रहे हैं। मुस्लिम वोट हासिल करने के लिए जैसी सियासत अखिलेश कर रहे हैं, वैसी ही सियासत कभी उनके पिता मुलायम सिंह यादव भी किया करते थे। मुलायम की सारी सियासत मुसलमानों और पिछड़ों (पिछड़ों में खास करके यादव) पर केन्द्रित रही। मुलायम ने मुस्लिम वोट बैंक को अपने साथ ऐसे जोड़कर रखा, जैसे ‘फैविकोल’ का जोड़ हो। जब तक मुलायम राजनीति में रहे तब तक वह तमाम मुद्दो पर हिन्दुओं की भावनाओं की चिंता किए बगैर मुसलमानों को खुश करने के लिए अनाप-शनाप तर्कों के सहारे उनका (मुसलमानों का) पक्ष लेते रहे। 1990 में कारसेवकों पर गोलियां चलाने से भी उन्हें गुरेज नहीं हुआ। मुलायम की तुष्टिकरण की सियासत के एक नहीं दर्जनों उदाहरण मौजूद हैं। पिछड़ी बिरादरी से सियासत की दुनिया में कदम रखने वाले मुलायम ने अपने ऊपर लगे पिछड़ी जाति के धब्बे को ऐसा धोया कि लोग पिछड़ी जाति का होने का दर्द भूलकर इसके सहारे नई ऊंचाइयां छूने लगे।

बहरहाल, न तो पूर्व सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने अपनी सियासत की शुरूआत तुष्टिकरण की राजनीति से की थी, न अखिलेश यादव को शुरूआती दिनों में तुष्टिकरण की सियासत रास आती थी। शुरूआत में अखिलेश अपने को विकासवादी नेता ही मानते थे, लेकिन 2012 में यूपी की सत्ता संभालने के दो वर्ष के पश्चात 2014 के लोकसभा चुनाव में जब सपा को भाजपा से करारी हार का सामना करना पड़ा तो अखिलेश ने मुस्लिम तुष्टिकरण की सियासत की तरफ कदम बढ़ा लिए। इसी के चलते अखिलेश सरकार ने आतंकवादियों पर से मुकदमे हटाने तक का फैसला कर दिया। अगर न्यायपालिका आड़े नहीं आती तो अखिलेश सरकार कई आतंकवादियों को जेलों से बाहर खुले में छोड़ देती। विपक्ष में रहते भी अखिलेश कभी नागकिता संशोधन एक्ट (सीएए) तो कभी आजम खान के नाम पर मुस्लिम तुष्टिकरण की सियासत में लगे रहते हैं।

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