भारतीय क्षत्रिय धर्म और अहिंसा (है बलिदानी इतिहास हमारा ) अध्याय – 18(क) गांधी जी की अहिंसा बनाम स्वामी श्रद्धानंद जी की क्रांति

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इन्द्र विद्यावाचस्पति लिखते हैं :–” जब लम्बी दासता से बंजर हुई भारत की भूमि को सशस्त्र क्रान्ति के विशाल हल ने खोदकर तैयार कर दिया और जब सुधारकों के दल ने उसमें मानसिक स्वाधीनता के बीज बो दिए , तब यह सम्भव हो गया कि उसमें से राजनीतिक स्वाधीनता के बिना सामाजिक स्वाधीनता और सामाजिक स्वाधीनता के बिना राजनीतिक स्वाधीनता असम्भव है । 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में देश के पूरब और पश्चिम में उत्तर और दक्षिण में राजनीतिक जागृति के चिह्न दिखाई देने लगे।”
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1857 की क्रान्ति के पश्चात देश में ऐसे अनेकों समाचार पत्र पत्रिकाएं भी मैदान में उतर चुके थे जो देश में राष्ट्रवाद की बयार को और तेज कर रहे थे। इन्द्र विद्यावाचस्पति ही हमें बताते हैं कि देसी भाषा के पत्रों में सर्व प्रथम स्थान पण्डित ईश्वर चन्द्र विद्यासागर के ‘प्रभाकर’ का है। इसके पश्चात बंगाल से कई पत्र निकले । अंग्रेजी पत्रों में ‘हिन्दू’ ,’ पेट्रियट’, ‘हरकारा’ , ‘इंडियन मिरर’ , ‘अमृत बाजार पत्रिका’ आदि का नाम उल्लेखनीय है। मुम्बई के ‘रास्ता गुप्तार’, ‘मुम्बई समाचार’, ‘जाम ए जमशेद’ आदि पत्रों ने और मद्रास से ‘हिन्दू स्टैंडर्ड’ और ‘स्वदेश मित्रन्’ ने भी सार्वजनिक जीवन को उत्तम बनाने में पर्याप्त सहयोग दिया । कुछ समय पीछे लाहौर से ‘ट्रिब्यून’ बिहार से ‘हेराल्ड’ और लखनऊ से ‘एडवोकेट’ निकले और राष्ट्रीय अग्नि के हवाईवाहन बनकर उतरी भारत में जागृति की ज्वाला फैलाने लगे।”

आर्य समाज और हिन्दू सभा

1857 की क्रान्ति के पश्चात हमें वर्तमान इतिहास केवल कांग्रेस के बारे में बताता है कि कांग्रेस की स्थापना होना समकालीन इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी । हमारा मानना है कि कांग्रेस की स्थापना उतनी महत्वपूर्ण नहीं थी , जितनी उसके सही 10 वर्ष पहले 1875 में आर्य समाज की स्थापना होना एक महत्वपूर्ण घटना थी। लगभग उसी समय हिन्दू सभा पंजाब और हिन्दू सभा बंगाल भी अस्तित्व में आई। बाद में इन दोनों संगठनों ने मिलकर क्रान्ति की उस ज्वाला को प्रदीप्त किए रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया जो भारत के इस मौलिक संस्कार में विश्वास रखती थी कि ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’ – जबकि कांग्रेस ने देर सवेर उस विचारधारा को पकड़ा जो इस देश के लिए पूर्व में कभी आत्मघाती सिद्ध हो चुकी थी अर्थात महात्मा बुद्ध अशोक की अहिंसा की विचारधारा।
आर्य समाज अपने आप में क्रान्तिकारियों की एक फैक्ट्री बन गया । इसके गुरुकुलों ने बड़ी तेजी से क्रान्तिकारी तैयार करने आरम्भ किए । सर्वत्र देशभक्ति, राष्ट्रवाद और बलिदान की प्रचण्ड ज्वालाएं उठती हुई दिखाई देने लगीं। यही कारण था कि उस काल में अंग्रेज को सबसे अधिक डर आर्य समाजी और आर्य समाजी गुरुकुलों से लगता था । आर्य समाज और हिन्दू सभा जहाँ भारतीयता को लेकर आगे बढ़ रहे थे वहीं कांग्रेस को अपने शैशव काल में ही ब्रिटिश राज भक्ति का पालना प्राप्त हो गया । जिसने ब्रिटिश राज भक्ति की धाय का दूध पिया । जबकि आर्य समाज और हिंदू महासभा जैसे संगठनों ने ठेठ भारतीयता का दूध पीकर अपने आप को बलिष्ठ किया। आर्य समाज के साथ-साथ अन्य अनेकों संगठन भी क्रांति की डगर पकड़ चुके थे । 1905 में जब सरकार ने बंग -भंग का निर्णय लिया तो देश में उसकी व्यापक प्रतिक्रिया हुई , ‘क्रान्ति विस्फोट’ के भय से सरकार ने अपने निर्णय को बदल दिया।

तिलक ने ललकारा नपुंसकता को

इस काल में ‘लाल – बाल- पाल’ की जोड़ी ने स्वतन्त्रता आन्दोलन को बहुत तीव्र गति प्रदान की । लालाजी के विषय में इन्द्र विद्यावाचस्पति जी कहते हैं – “पंजाब केसरी की दहाड़ प्रान्त के एक सिरे से दूसरे सिरे तक पहुँचने लगी। यह तो असंदिग्ध बात है कि अपने समय में लालाजी से अधिक या उनके समान उस समय हिन्दुस्तानी प्रभावशाली वक्ता नहीं था।”
उसी समय बाल गंगाधर तिलक ने भी अपना तेजस्वी नेतृत्व हमारे क्रान्तिकारियों को प्रदान किया। उनके विषय में यह निर्विवाद सत्य है कि उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर भारतवर्ष में प्रत्येक प्रकार की नपुंसकता को ललकारा और अपनी गतिविधियों से उस समय की क्रूर सत्ता को सीधी चुनौती प्रदान की। उन्होंने भारतवर्ष की दुर्दशा का एकमात्र कारण विदेशी सत्ता को माना और इस दुर्दशा से मुक्ति का एकमात्र उपाय भी ब्रिटिश सत्ता का भारत से यथाशीघ्र विनाश ही माना। 1905 में उन्होंने कांग्रेस को लताड़ते हुए कहा था कि विरोध पत्र और प्रार्थना पत्रों के दिन लद चुके हैं। जापान , आयरलैंड और उसके उदाहरण की ओर देखो और उनका अनुकरण करो । स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है – यह मानकर विदेशी शासकों का विरोध करो।
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के बारे में इन्द्र विद्यावाचस्पति लिखते हैं :-“लोकमान्य की राजनीतिक प्रवृत्तियों की प्रारम्भ से ही यह विशेषता थी कि वह स्वाधीनता प्राप्त करने के लिए जनता की ओर देखते थे , राजा की ओर नहीं। उनका निश्चय था कि लुटी हुई स्वाधीनता ली जाती है , मांगी नहीं जाती ।इस कारण प्रारम्भ से ही उनका कांग्रेस संचालकों से मतभेद रहा। कांग्रेस के संचालकों का ध्येय था – ब्रिटिश राज्य के दायरे में वैधानिक अधिकारों की प्राप्ति और लोकमान्य का ध्येय था देश में वैसे राष्ट्रीय शासन की स्थापना जैसी शिवाजी महाराज ने की थी।
कांग्रेस के उस समय के नेता इस विश्वास पर चल रहे थे कि अंग्रेज जाति स्वभाव से न्याय और स्वाधीनता से प्रेम करती है । यदि अच्छी तरह उसका दरवाजा खटखटाया जाए तो उससे हमें सब कुछ प्राप्त हो सकता है ।उनका विक्टोरिया की घोषणा की ईमानदारी पर विश्वास था। इसके विपरीत लोकमान्य तिलक को अंग्रेज शासकों की सदिच्छाओं पर कोई भरोसा नहीं था । वह मानते थे कि अंग्रेज भारत में शासन करना चाहते हैं , इससे लाभ उठाना चाहते हैं, और जो कुछ करते हैं -अपने लाभ के लिए करते हैं। यदि हमें अब राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं होते हैं तो स्वाधीनता सैकड़ों वर्षो तक भीख मांगने से भी प्राप्त नहीं हो सकती।”
तिलक और उस समय के अन्य अनेकों क्रान्तिकारियों की राजनीतिक तेजस्विता का ही परिणाम था कि लोगों ने कांग्रेस से अधिक उनकी बातों पर ध्यान दिया। यही कारण था कि रौलट एक्ट जैसे भारत विरोधी कानून का देश की जनता ने देश के क्रान्तिकारियों की आवाज पर डटकर जोरदार विरोध किया। उस समय लोकमान्य तिलक ब्रिटिश सत्ता के लिए गम्भीर चुनौती बन चुके थे । उनसे निपटने में ब्रिटिश शासक अपने आपको असहाय अनुभव करते थे ,जबकि कांग्रेस उस समय ब्रिटिश शासकों के तलवे चाट रही थी।

स्वामी श्रद्धानन्द की वीरता

आर्य समाज की ओर से रौलट एक्ट का विरोध करने वाले लोगों में स्वामी श्रद्धानन्द जी का नाम अग्रगण्य है। उन्होंने इस एक्ट का विरोध करने वाले जुलूस का नेतृत्व किया । यह घटना 30 मार्च 1919 की है। डॉक्टर पट्टाभीसीतारामय्या लिखते हैं :- “वहाँ (दिल्ली ) 30 मार्च को ही जुलूस निकला और हड़ताल हुई , गोली भी चली , इस दिन के जुलूस का नेतृत्व स्वामी श्रद्धानन्द जी कर रहे थे । उन्हें कुछ गोरे सिपाहियों ने गोली मारने की धमकी दी । इस पर उन्होंने अपनी छाती खोल दी और कहा -” लो मारो गोली” – बस ,गौरों की धमकी हवा में उड़ गई।”
हमारे इन सभी बलिदानियों ने अपना इतना रक्त केवल अपने राष्ट्र के लिए बहाया तो इसका कारण केवल एक ही था कि वह जानते थे कि राष्ट्र क्या होता है और राष्ट्र के लिए क्या करना पड़ता है ? जनार्दन राय नागर ‘अकिंचन’ ने राष्ट्र के विषय में जो कुछ लिखा है , उसे हमारे बलिदानियों की दृष्टि से देखने की आवश्यकता है , वह लिखते हैं :-“राष्ट्र एक अनन्त शक्ति है । जिसके हृदय मन्दिर में स्वतन्त्रता की देवी शोभायमान है। जिसने देवी का प्रसाद पाया ,जिसने इस महामाया का आह्वान कर लिया , उसने राष्ट्र क्या है ? -यह जान लिया । राष्ट्र भयंकर होते हुए भी उसमें अभिनव आनन्द है। राष्ट्र महान होते हुए भी पतन का छोटा सा ग्रास है। राष्ट्र अग्नि का भयानक कुण्ड है। जिसकी लोल लपटों में बलिदान के श्रीफल की आहुति दी जाती है । इस प्रचंड मानव संघटन के सामने संसार की साम्राज्यवाद से सनी हुई शक्तियां हार जाती हैं। राष्ट्र के सामने उन्नति हाथ जोड़ती है, समृद्धि आ खड़ी होती है और विश्व का विजय डंका आज जिनके घरों में गूँज रहा है, उससे भी बढ़ी चढ़ी हुई ध्वनि राष्ट्र के पवित्र मन्दिर में गूँजती है। राष्ट्र वह दाहिक शक्ति है जो प्रतिद्वंद्वियों को भस्मीभूत करती है। राष्ट्र प्रचण्ड हुंकार है। जिसे हृदयों को सुनकर मायावी मृर्गों के हृदयों में हाहाकार मच उठता है। राष्ट्र अमर है , चाहे उसका पतन होता हो, परन्तु वह स्वयं परमात्मा के सदृश्य ज्योतिर्मान होकर स्वतन्त्रता की वरमाला से शोभायमान होता है।”
राष्ट्र के प्रति ऐसे ही विचार और भावों से प्रेरित होकर हमारे सभी क्रान्तिकारियों ने अपना आन्दोलन अंग्रेजों के विरुद्ध आरम्भ किया था। क्रान्तिकारियों की गतिविधियां लगभग सारे देश में समान रूप से जारी रही थीं और न केवल भारत वर्ष के भीतर बल्कि भारतवर्ष के बाहर विदेशों में भी क्रान्तिकारी आन्दोलन से जुड़ने वाले क्रान्तिकारियों की झड़ी लग गई थी।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक :उगता भारत एवं
राष्ट्रीय अध्यक्ष : भारतीय इतिहास पुनरलेखन समिति

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