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प्रमुख समाचार/संपादकीय

आज का चिंतन-19/10/2013

दूर रहें उन लोगों से
जो मोबाइल कचरा पात्र हैं

– डॉ. दीपक आचार्य 
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

यह जरूरी नहीं कि कचरा पात्र स्थिर पड़े रहने वाले ही हों जिन्हें खाली करने के लिए किसी ओर को मशक्कत करनी पड़े। आजकल जहाँ-तहाँ बिखरे पड़े कचरा पात्रों की ही तर्ज पर आदमियों की एक नई प्रजाति खूब चलन में है जिसका काम ही दुनिया भर के वैचारिक कचरे और प्रदूषण को एक स्थान से संग्रहित कर दूसरे स्थान पर परिवहन करते रहना है। कचरे के इस परिवहन में इन लोगों को अनिर्वचनीय आनंद और ऊर्जा की जो प्राप्ति होती है इसे या तो वे ही जानते हैं अथवा इनकी किस्म के वे समानधर्मा लोग जानते हैं जो इस शौक में रमे हुए हैं।

आजकल लोगों को अपने जीवन और लक्ष्यों से कहीं अधिक आनंद पाने की पड़ी हुई रहती है और इस आनंद को पाने के लिए आजकल आदमी कुछ भी करने-करवाने को हमेशा हर क्षण तैयार रहता है। उसके लिए न कोई वर्जना है, न लाज-शरम या अनुशासन की मर्यादा रेखाएँ। वह अपने हिसाब से रावण रेखा ख्िंाच लेता है और आत्म मुग्ध होकर उसी दायरे में रहकर रोजाना आनंद पाने की भरसक कोशिशों में रमा रहता है।

आदमी की सबसे बड़ी बीमारी यही होती है कि उसे हर घटना या विचार अथवा सूचनाओं का प्रथम द्रष्टा, श्रोता या सर्जक माना और स्वीेकारा जाए। अपनी इसी प्रतिष्ठा को पाने के लिए वह अपने जीवन के कत्र्तव्य कर्मों को भुलाकर उन सारे गोरखधंधों में लिप्त हो जाता है जिनसे औरों को आनंद प्राप्त होता है। इस पराये आनंद पर आश्रित रहने वाले इन लोगों की जिन्दगी भी परायी ही हो जाती है। ये लोग जीवन भर की अपनी यात्रा में एकाध क्षण के लिए भी भीतरी आनंद प्राप्त नहीं कर पाते हैं बल्कि इनके जीवन का पूरा आनंद औरों की मुट्ठी में कैद होता है।

imagesसबसे पहले सुनने-सुनाने और तर्क-कुतर्क करने की इस आदत का ही कमाल है कि बतरस के शौकीनों की हर तरफ बाढ़ ही आयी हुई है। जिस दुकान-दफ्तर, गलियारे, सर्कल, चौराहे और सार्वजनिक स्थल की ओर नज़र घुमायें, इन सभी जगह फालतू की बातों में घण्टों गुजार देने वाले लोग ही नज़र आते हैं। कुछ तो दिन भर इतना बोलते ही रहते हैं कि घण्टों उनका मुँह थकता नहीं।

आदमी के पास आजकल सुनने और सुनाने के सिवा कुछ रह भी नहीं गया है। फिर जो सुनता है वह भी पराया है और सुनाता है वह भी परायों का। एक जगह से कचरा जमा करना और मांग तथा लक्ष्य समूह के मुताबिक बड़े ही सलीके से औरों के सामने परोसना या कि उण्डेलना ही आदमी का मूल काम रह गया है।

हर इलाके में कुल जनसंख्या का काफी प्रतिशत ऎसा ही है जिसके पास बतियाने और जमाने भर की चर्चाओं में रस लेने के सिवा दूजा कोई काम है ही नहीं। कई सारे लोग रोजाना हम देखते हैं जो समूहों में कहीं भी जमा होकर नॉन स्टॉप बतियाते रहेंगे, और नतीजा शून्य।

हमारी रोजमर्रा की जिन्दगी में कई सारे लोग ऎसे फालतू और बकवासी होते हैं जो हमारे सामने उन लोगों या घटनाओं की चर्चा करते रहते हैं जिनसे हमारा कोई रिश्ता नहीं होता। पर ये लोग फालतू लोगों और विचारों को जबरन हमारे सामने परोसकर जिज्ञासा और तलब जगाना चाहते हैं। एक बार परायी और फालतू की चर्चाओं को सुनने की तलब जिसे उठ जाती है वह श्मशान जाने तक इस बुराई को छोड़ नहीं पाता और उन बकवासियों की महफिल में पंजीकृत हो जाता है जिनके लिए बतरस ही ऎसा है जिसमें सारे टॉनिकों का कॉकटेल है। इन्हें खाना-पीना न मिले तो चलेगा, परायी चर्चाओं, उनकी समीक्षा और दूसरों की प्रतिक्रियाओं की जो लम्बी अविराम श्रृंखला चलती रहती है, उसी से इन्हें ताकत मिलती है।

अपने इलाके और हमारे आस-पास भी ऎसे बातूनी लोगों का जमघट लगा ही रहता है जो अपने घर-आँगन से लेकर दुनिया के हर छोर को अपनी बातों से नाप लिया करते हैं। इन लोगों को चलता-फिरता कचरा पात्र कहना ज्यादा प्रासंगिक होगा क्योंकि दिमागी कचरे का परिवहन करते हुए आत्म आनंद का मिथ्या अहसास ही इनके लिए जिन्दगी है।

यह कचरा ही है जो समाज में प्रदूषण फैला रहा है वरना सभी लोग अपने काम-धंधों में लगे रहें या समाज के लिए किसी न किसी रचनात्मक कार्य में जुटे रहें तो समाज और देश का कायापलट हो जाए, और खुद की जिन्दगी सुधरकर सँवर जाए, वो अलग। पर ऎसा हो नहीं पाता। जिन लोगों को गंदगी और मैला सूंघने और फैलाने की आदत है उनके भरोसे न समाज चल सकता है, न देश।

मानसिक दौर्बल्य के शिकार ये मोबाइल कचरा पात्र कचरा जमा और परिवहन करने मात्र के लिए संसार में पैदा होते हैं और प्रदूषण फैला कर अपनी दुर्गन्धियायी मानसिकता के साथ लौट पड़ते हैं उस पशु-अवतार में जाने के लिए जहाँ कचरा ही जिन्दगी है और कचरे भरा परिवेश ही उनका अपना संसार।

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