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सत्य सिद्धांतों के प्रचार व प्रसार से ही देश व समाज का कल्याण होगा

ओ३म्

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संसार के सभी मनुष्य एक समान हैं। जन्म से सब एक समान व अज्ञानी उत्पन्न होते हैं। जीवन में ज्ञान की मात्रा व आचरण से ही उनके व्यक्तित्व व जीवन का निर्माण होता है। ज्ञान का आदि स्रोत चार वेद ही हैं। वेद न होते तो ज्ञान भी न होता। वेदों का ज्ञान ही हमारी स्कूली किताबों व मत-मतान्तरों में प्राप्त होता है। मत-मतानतरों में जो ज्ञान विरुद्ध अविद्या की बातें हैं वह सब उनकी अपनी है। यदि वह वेदों का अध्ययन कर सत्य व असत्य का निर्धारण कर अपने मतों की मान्यताओं का विचार कर उन्हें वेद के आलोक में शुद्ध करें तो यह कार्य जब चाहें तभी हो सकता है। इसके विपरीत सभी मनुष्य समुदाय व मत-पन्थ आदि अपनी मान्यताआंे की सत्यता की परीक्षा करने व उन्हें सत्य की कसौटी पर कसने को तैयार नहीं हैं। ऋषि दयानन्द ने अपने अध्ययन, तप और पुरुषार्थ से जाना था कि सत्य से ही मनुष्य जाति की उन्नति व सुखों में वृद्धि हो सकती है तथा सत्य को प्राप्त होकर व उसका आचरण किये बिना मनुष्य, देश व समाज उन्नति, सुख व कल्याण को प्राप्त नहीं हो सकते।

जब हम सत्य सिद्धान्तों की बात करते हैं तो हमें किसी एक विषय में वेद के विचारों व मान्यताओं की मत-मतान्तरों में तद्विषयक मान्यताओं को जानकर उनसे तुलना करनी होती है। ईश्वर का ही विषय लें तो वेदों से ईश्वर का जो सत्य स्वरूप मिलता है वह ऋषि दयानन्द के अनुसार सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता आदि गुण, कर्म व स्वभाव वाला प्राप्त होता है। ईश्वर वेद ज्ञान का देने वाला है। उसने अपनी सनातन प्रजा जीवों को उनके कर्मों का सुख व दुःख प्रदान करने के लिये इस सृष्टि को रचा है तथा वही इसको चला रहा वा पालन कर रहा है। संसार में जितने प्रमुख मत मतान्तर आदि हैं, उनमें ईश्वर के इस सत्य व तर्कसंगत स्वरूप को नहीं बताया व प्रचारित किया जाता। कुछ मतों में तो अजन्मा व सर्वव्यापक ईश्वर के कहानी व किससे भी सुने सुनाये जाते हैं। होना यह चाहिये कि वेद मत व अन्य मतों का अध्ययन व परीक्षा की जानी चाहिये और वेदों के सत्य को स्वीकार तथा अपनी अपनी असत्य मान्यताओं का परित्याग करना चाहिये। धार्मिक जगत में सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग का यही काम ऋषि दयानन्द ने किया था और वह ईश्वर सहित सभी विषयों में अपनी मान्यतायें व सिद्धान्त स्थिर कर पाये थे। अपनी सभी मान्यताओं व सिद्धान्तों को उन्होंने वेदों की तराजू पर तोला था और उन्हें वेदानुकूल, तर्कसंगत तथा सृष्टिक्रम के अनुकूल होने पर ही सत्य स्वीकार किया था।

ऋषि दयानन्द ऐसे विद्वान ऋषि थे जिन्होंने अपनी किसी मान्यता के असत्य पाये जाने पर अपने अनुयायियों को उस पर सूक्ष्म दृष्टि से विचार कर उसे वेदानुकूल बनाने की भी प्रेरणा की थी। विगत 137 वर्षों में उनका कोई सिद्धान्त अपूर्ण, वेदविरुद्ध तथा सृष्टिक्रम के विरुद्ध नहीं पाया गया है। अतः उनका प्रतिनिधि संगठन आर्यसमाज उनके सभी सिद्धान्तों का देश देशान्तर में प्रचार करता है और संसार के सभी मतों व मनुष्यों को अवसर देता है कि वह वैदिक मान्यताओं की परीक्षा कर उस पर शंका कर सकते हैं जिसका समाधान आर्यसमाज के विद्वान करने के लिये कटिबद्ध होते हैं। यदि सब मत इस सिद्धान्त को स्वीकार कर लेते तो जो विद्वान व आचार्य किंवा मत-मतान्तर अपने अपने मत का प्रचार कर अपने अनुयायियों की संख्या के विस्तार के कार्य में लगे हुए हैं, इसकी उन्हें आवश्यकता न पड़ती। सब सत्य को जानने का प्रयत्न करते और उसे स्वीकार कर उस पर आचरण करते हुए ईश्वर को प्राप्त होकर जीवन के लक्ष्य सुख व शान्ति को प्राप्त होकर सन्तुष्ट जीवन व्यतीत करते। सब मनुष्य वेदानुसार यौगिक जीवन व्यतीत करते हुए ईश्वर का साक्षात्कार करने भी समर्थ होते हैं और शरीर व आत्मा को दुर्गुणों व दुव्र्यस्नों के कारण होने वाले दुःखों से भी मुक्त कर सकते थे।

ईश्वर द्वारा वेदों में विश्व के सभी मनुष्यों के जीवन को सुखी व सफल करने का जो मार्गदर्शन किया गया है उसे क्रियान्वित करने करने के लिये ही ऋषि दयानन्द ने वैदिक मान्यताओं पर आधारित ‘‘सत्यार्थप्रकाश” ग्रन्थ की रचना की। इस ग्रन्थ से मनुष्य जीवन की सभी भ्रान्तियां व अन्धविश्वास दूर होते हैं। इस ग्रन्थ से मार्गदर्शन प्राप्त कर जीवन को आनन्द प्राप्ति के लक्ष्य की ओर ले जाकर उसे प्राप्त किया जा सकता है। मत-मतान्तरों के अपने-अपने कारणों से इस सत्यार्थ का प्रकाश करने वाले ग्रन्थ को न अपनाने के कारण इसका उद्देश्य पूरा नहीं हो सका। अतः यह आन्दोलन तब तक जारी रहेगा जब तक कि सभी मनुष्य वेदों के सत्य अर्थों को जानकर उसका पालन करना स्वीकार न करें। इसी से मनुष्य जीवन सहित देश व समाज की सभी समस्याओं का हल सम्भव है। सृष्टि के आरम्भ से महाभारत युद्ध के 1.96 अरब वर्षों तक वेदों की मान्यताओं व सिद्धान्तों के अनुसार भारत भूमि सहित सभी देशों के शासन व जीवन चलते थे। आश्चर्य होता है कि वर्तमान समय में लोग वेदों के सत्य विचारों व मान्यताओं को भी स्वीकार नहीं करते हैं और न ही अध्ययन ही करते हैं।

सत्य ज्ञान को प्राप्त होने का मार्ग यह है कि मनुष्य विद्या को प्राप्त करे जो सत्य का ग्रहण व असत्य का त्याग कराती है। विद्या प्राप्ति की प्राचीन पद्धति गुरुकुलीय पद्धति है जिसमें 5 से 12 वर्षों की आयु के बालक बालिकाओं को गुरुकुलों में रखकर वहां उन्हें अक्षरों सहित शब्दों, शब्दार्थ एवं व्याकरण का ज्ञान कराया जाता है। व्याकरण पढ़ने के बाद बालक व बालिकाओं को अनेक विषयों के ग्रन्थ पढ़ाये जाते हैं। बच्चे उपनषिद, दर्शन, मनुस्मृति, रामायण व महाभारत सहित वेदों का अध्ययन करते हैं। पूर्व काल में आयुर्वेद सहित धनुर्विद्या व खगोल ज्योतिष का अध्ययन भी हमारे गुरुकुलों में कराया जाता था व वर्तमान में भी कराया जाता है। कृषि विज्ञान तथा वाणिज्य से सम्बन्धित विषयों का ज्ञान भी शिष्य अपने आचार्यों से प्राप्त करते रहे हैं। गुरुकुल में किसी भी विषय व विद्या का अध्ययन करने का निषेध नहीं था न अब है। आज भी वहां बच्चों को सत्यार्थप्रकाश सहित उपनिषद, दर्शन तथा वेद आदि ग्रन्थों का अध्ययन कराया जाता है और इसके साथ वह आधुनिक ज्ञान विज्ञान व गणित आदि का अध्ययन कर उन सब विषयों का अभ्यास करते हैं। वैदिक साहित्य के अध्ययन से मनुष्य को अपना जीवन सत्य नियमों पर आधारित बनाने की प्रेरणा व शक्ति प्राप्त होती है। मनुष्य का जीवन सत्य एवं अहिंसा के सिद्धान्तों पर आधारित होने सहित शारीरिक, आत्मिक तथा सामाजिक उन्नति पर केन्द्रित होना चाहिये। यह लक्ष्य गुरुकुलीय शिक्षा में आधुनिक ज्ञान व विज्ञान से युक्त सभी विषयों के अध्ययन को समाविष्ट कर प्राप्त किया जा सकता है।

आजकल की शिक्षा मनुष्य को ईश्वर का सत्यस्वरूप बताकर उसे ईश्वर उपासना में प्रवृत्त करने के स्थान पर इसे अध्ययन में सम्मिलित न कर बालक व युवाओं को ईश्वर से दूर करती है जिससे उनके जीवन में ईश्वर की उपासना से होने वाले लाभों यथा मन की एकाग्रता, दुर्गुणों का नाश तथा आत्मा की उन्नति आदि होने की स्थिति नहीं बन पाती। ईश्वर का सच्चा ज्ञान व उपासना मनुष्य को दुर्गुणों को दूर कर उसे आत्मिक बल प्रदान करने का साधन होता है। आत्मा व परमात्मा का सच्चा स्वरूप व इनके गुण, कर्म व स्वभाव को जानकर मनुष्य के सभी भ्रम व शंकायें दूर हो जाते हैं। इससे मनुष्य जीवन में पुरुषार्थ करते हुए धनोपार्जन व भौतिक साधन अर्जित करने सहित उपासना से अपनी आत्मा को भी ऊंचा उठाता जाता है। प्राचीन काल में आत्मा की उन्नति को महत्व दिया जाता था परन्तु अब इसकी उपेक्षा की जाती है। यदि हमें सचमुच सभी देशवासियों के जीवन की उन्नति करनी है तो हमें निश्चय ही धर्म व संस्कृति विषयक सत्य सिद्धान्तों का निर्धारण कर उससे अपनी बाल व युवा पीढ़ी को संस्कारित व दीक्षित करना होगा। इससे न केवल बच्चों के जीवन सत्य ज्ञान के प्रकाश से आलोकित हांेगे अपितु वह देश व समाज विरोधी सभी गतिविधियों व कार्यों से भी बचेंगे। ऐसा होने पर कोई शत्रु देश हमारे देशवासियों को लोभ व छल से प्रभावित कर देश विरोधी कार्य नहीं करा सकेगा। वर्तमान में बहुत से देश व संगठन मनुष्यों को लोभ देकर व उनकी बुद्धि विकृत कर उनसे समाज व देश विरोधी कार्य कराते हैं। सत्य धर्म व संस्कृति के पर्याय वेदों के अध्ययन से देश व समाज को सभी प्रकार के अनुचित कार्यों से बचाया जा सकता है।

सत्य मान्यताओं पर आधारित देश व समाज को बनाना अत्यन्त कठिन कार्य है। ऋषि दयानन्द ने अपने जीवन में इस कार्य की नींव डाली थी। सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ की रचना व आर्यसमाज की स्थापना इसी उद्देश्य से किये गये कार्य कहे जा सकते हैं। यदि देश वेद व सत्यार्थप्रकाश को अपना ले तो देश विश्व का गुरु भी बन सकता है और संसार में एक आदर्श राष्ट्र बनकर और प्रत्येक दृष्टि से सुदृण होकर अपने सभी आन्तरिक व बाह्य शत्रुओं पर विजय पा सकता है। अन्य समाधान समस्या को एक सीमा तक ही हल कर सकते हैं। देश को विश्व के सर्वोत्तम धर्म व संस्कृति से युक्त करने हेतु देश भर में सत्य का प्रचार व असत्य का खण्डन आवश्यक है। वैदिक धर्म में पूरी तरह से दीक्षित युवा ही विद्या का प्रचार कर ऋषि दयानन्द के स्वप्न को पूरा कर देश को वैदिक राष्ट्र बना सकते हैं जहां किसी के साथ किसी प्रकार अन्याय नहीं होगा। सबको अपनी सभी प्रकार की उन्नति करने के अवसर मिलेंगे। पात्रों को अधिकार मिलेंगे और पात्रहीनों की उपेक्षा होगी। वर्तमान में भी ऐसा ही होता है तथापि लोग क्षणिक लाभ के लिए असत्य में प्रवृत्त देखे जाते हैं। वेद प्रचार की न्यूनता के कारण ऐसा हो रहा है। यदि महाभारत युद्ध के बाद ऋषि दयानन्द जैसे ऋषि देश में होते और उनके अनुरूप वेद विद्याओं के प्रचार का कार्य होता तो आज देश में अविद्यायुक्त मतों का प्रचार न होता। सब एक मत, एक मन, एक सुख-दुःख व परस्पर सुहृद मित्र होकर देश में सुखों की वृद्धि करते। अतः देश में प्रचलित सभी विचारों, मान्यताओं, सिद्धान्तों व मत-पन्थों में सत्य की पूर्ण प्रतिष्ठा आवश्यक है। इसी से मानव जाति का भला हो सकता है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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