Categories
आर्थिकी/व्यापार भारतीय संस्कृति

भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देकर भी देश की अर्थव्यवस्था को दी जा सकती है गति

देश में संस्कृति की अर्थव्यवस्था पर आज तक ग़ौर नहीं किया गया है और इस तरह के  मुद्दे पर देश में शायद सारगर्भित चर्चा भी नहीं की गई हैं। वैसे तो भारत की संस्कृति हज़ारों सालों से सम्पन्न रही है। लेकिन, हाल ही के इतिहास में ऐसा लगता है कि जैसे भारतीय संस्कृति का दायरा सिकुड़ता चला गया है। देश की संस्कृति जो इसका प्राण है को अनदेखा करके यदि आर्थिक रूप से आगे बढ़ेंगे तो केवल शरीर ही आगे बढ़ेगा और प्राण तो पीछे ही छूट जाएँगे। अतः भारत की जो अस्मिता, उसकी पहिचान है उसे साथ में लेकर ही आगे बढ़ने की आज ज़रूरत है।

संस्कृति की अर्थव्यवस्था के विभिन्न पहलू

भारत की जो सांस्कृतिक विविधता एवं सम्पन्नता है उसको सबसे आगे लाकर हम भारत को एक सांस्कृतिक महाशक्ति के रूप में परिवर्तित कर सकते हैं। यह हमारा उद्देश्य एवं आकांक्षा  होनी चाहिए। भारतीय संस्कृति के विभिन्न पहलुओं में मुख्य रूप से शामिल किया जा सकता है – संगीत, नृत्य, फ़ाइन-आर्ट्स, खाद्य संस्कृति, सिनेमा, सांस्कृतिक पर्यटन (जिसमें हेरिटेज, साइट्स, म्यूजीयम, आदि शामिल है) एवं धार्मिक पर्यटन, आदि।

संस्कृति की अर्थव्यवस्था को आँकना

विश्व के कई देश अपनी संस्कृति की अर्थव्यवस्था का आँकलन कर चुके हैं और लगातार इस ओर अपना पूरा ध्यान दे रहे हैं। भारत में अभी इस क्षेत्र में ज़्यादा काम नहीं हुआ है क्योंकि हमारी विरासत बहुत बड़ी है एवं बहुत बड़े क्षेत्र में फैली हुई है। दुनिया भर में इसे सांस्कृतिक एवं रचनात्मक उद्योग (CCI – Cultural Cretive Industry) का नाम दिया गया है। UNESCO भी सांस्कृतिक एवं रचनात्मक उद्योग को वैज्ञानिक तरीक़े से आँकने का प्रयास कर रहा है। दुनिया भर में अलग-अलग देशों में इस उद्योग को आँकने के पैमाने उपलब्ध हैं। परंतु, भारत में अभी तक इस क्षेत्र में कुछ ज़्यादा काम नहीं हुआ है। UNESCO के एक आँकलन के अनुसार, विश्व के सकल घरेलू उत्पाद में 4 प्रतिशत हिस्सा CCI से आता है। अमेरिका जैसे देशों की जीडीपी में तो CCI का योगदान बहुत अधिक है। एक आँकलन के अनुसार, दुनिया भर में सांस्कृतिक एवं रचनात्मक उद्योग एशिया पेसिफ़िक, उत्तरी अमेरिका, यूरोप एवं भारत में विकसित अवस्था में पाया गया है। इस उद्योग में विश्व की एक प्रतिशत आबादी को रोज़गार उपलब्ध हो रहा है। भारत में चूँकि इसके आर्थिक पहलू का मूल्याँकन नहीं किया जा सका है अतः देश में इस उद्योग में उपलब्ध रोज़गार एवं देश के सकल घरेलू उत्पाद में योगदान सम्बंधी पुख़्ता आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं।

भारत में सांस्कृतिक एवं रचनात्मक उद्योग का आकार आँकने के लिए यदि हम चाहें तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दूसरे देशों द्वारा अपनाए जा रहे पैरामीटर का उपयोग कर सकते हैं अथवा इन पैरामीटर में हमारे देश की परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तन या संशोधन कर इन्हें उपयोग कर सकते हैं, ताकि हमारे देश की अर्थव्यवस्था में इस उद्योग के योगदान को मूर्त रूप में आँका जा सके एवं इसके योगदान को और कैसे बढ़ाया जा सकता है इस सम्बंध में नीतियाँ बनाई जा सकें।

मूर्त एवं अमूर्त सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था

संस्कृति की अर्थव्यवस्था को दो भागों में बाँटा जा सकता है। एक अमूर्त सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था, जिसमें सांस्कृतिक एवं रचनात्मक उद्योग के विभिन्न घटकों का ज्ञान शामिल है, जिसका आकड़ों में मूल्याँकन करना बहुत मुश्किल है एवं दूसरे मूर्त सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था, जिसे आँका जाना आसान है, ऊपर आँकड़ों के माध्यम से जितनी भी जानकारी दी गई है, वह मूर्त सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था का ही हिस्सा ही।  

सांस्कृतिक एवं रचनात्मक उद्योग से निर्यात

अभी हाल ही में दुनिया भर के देशों में सांस्कृतिक एवं रचनात्मक उद्योग के क्षेत्र में  एक अनुसंधान जारी है। इस अनुसंधान के माध्यम से यह जानने का प्रयास किया जा रहा है कि दुनिया के विभिन्न देशों में सांस्कृतिक एवं रचनात्मक उद्योग से कितना निर्यात किया जाता है तथा निर्यात की दृष्टि से कौन कौन से देश अग्रणी देशों की श्रेणी में हैं। इस दृष्टि से विभिन्न देशों की प्रोफ़ायल भी बनाई जा रही है। भारत से भी सांस्कृतिक एवं रचनात्मक उद्योग के क्षेत्र से निर्यात होता है, इसमें शामिल हैं, क्राफ़्ट, संगीत, सिनेमा, एनिमेशन, फ़ैशन, योगा, आदि। एनिमेशन उद्योग तो भारत में काफ़ी फल फूल रहा है एवं तेज़ गति से आगे बढ़ रहा है।

संस्कृति की अर्थव्यवस्था के विकास हेतु सुझाव

संस्कृति की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए सबसे पहिले तो देश में एक निर्देशिका बनायी जानी चाहिए। देश में किस-किस प्रकार की आर्ट्स उपलब्ध है, कहाँ-कहाँ उपलब्ध है, किस-किस के पास उपलब्ध है, यह सारी जानकारी सूचीबद्ध की जानी चाहिए। सूचीबद्ध करने के बाद, इस कला को विकसित करने एवं इसका वैज्ञानिक तरीक़े से प्रस्तुतीकरण करने के लिए सम्बंधित कलाकार के कौशल विकास की ज़रूरत होगी। हमारे देश में ऐसी कई कलाएँ हैं जो वैसे तो कई सदियों से चली आ रही हैं परंतु अब अदृश्य होती जा रहीं हैं, इन लुप्त हो रही कलाओं को पुनर्जीवित भी किया जाना चाहिए। अतः इस प्रकार की कलाओं की भी सूची बनाई जानी चाहिए। हमारी सांस्कृतिक संरचना को पुनर्जीवित करने के लिए बहुत बड़े निवेश की आवश्यकता भी हो सकती है। इसके बाद हम अपनी सांस्कृतिक विविधता एवं सांस्कृतिक सम्पन्नता को आर्थिक उन्नति में परिवर्तित कर सकते हैं। हमारा देश सांस्कृतिक रूप से एक सम्पन्न देश है केवल हमें इसका उचित तरीक़े से दोहन करने की आवश्यकता है। अमेरिका के फ़्लॉरेन्स ओरेगन की सांस्कृतिक पहिचान पहिले बहुत ज़्यादा नहीं थी परंतु वहाँ के विशिष्ट कलाकारों एवं नागरिकों ने अपनी पैंटिंग्स को स्थानीय चेम्बर ओफ़ कामर्स के सहयोग से एक सलीक़े से प्रस्तुत किया। अब वहाँ पर सैलानी वहाँ की पेटिंग्स की ओर आकर्षित होकर फ़्लॉरेन्स ओरेगन घूमने के लिए जाते हैं। इस प्रकार इस शहर की एक सांस्कृतिक पहिचान विकसित हो गई है। भारत में भी एतिहासिक महत्व के कई नगर हैं जिनका उनके सांस्कृतिक एवं रचनात्मक कार्यों के अनुरूप विकास किया जा सकता है, ताकि विदेशों से सैलानी इन नगरों की ओर आकर्षित हो सकें।

भारत में खाद्य संस्कृति भी अपने आप में एक बहुत विस्तृत क्षेत्र है। हर देश की अपनी-अपनी खाद्य संस्कृति होती है। भारत तो इस मामले में पूरे विश्व में सबसे धनी देश है। हमारे यहाँ पुरातन काल से देश के हर भाग की, हर प्रदेश की, हर गाँव की, हर जाति की अपनी-अपनी खाद्य संस्कृति है, इसको हम पूरे विश्व में प्रमोट कर सकते हैं।

किसी समाज का यदि अपनी संस्कृति के प्रति रुझान नहीं है तो उस समाज की संस्कृति का स्तर नीचे गिरता जाता है। यही स्थिति देश की संस्कृति पर भी लागू होती है। जैसे भारत में एक समय पर नृत्य कला इतनी सम्पन्न थी कि लगभग सभी राजे-रजवाड़े एवं सभी समारोहों, धार्मिक समारोह मिलाकर, में नृत्य के बिना कार्य प्रारम्भ एवं सम्पन्न नहीं होता था। परंतु, आज यह कला हम लगभग भूल गए हैं। संगीत, नृत्य, काव्य, साहित्य, मिलकर देश की विभिन्न कलाओं को मूर्त रूप देता है। संस्कृति के अमूर्त रूप को जब तक मूर्त रूप नहीं दिया जाता तब तक आर्थिक पक्ष इसके साथ नहीं जुड़ पाएगा। हमारे देश में घुँघरू को ही लें, इसके भी कई रूप है, कथक नृत्य के लिए अलग हैं, भरतनाट्यम नृत्य  के लिए अलग है, कचिपूडी नृत्य के लिए अलग है। इस प्रकार, कला के इस क्षेत्र में  भारत में बहुत ही सूक्ष्म ज्ञान उपलब्ध है। परंतु, इस प्रकार के ज्ञान को मूर्त रूप देने की ज़रूरत है। आज नृत्य करने वालों एवं घुँघरू बनाने वालों की देश में कोई पूछ नहीं हैं। इस प्रकार तो हम हमारी अपनी कला को भूलते जा रहे है। देश में बुनकर आगे नहीं बढ़ पा रहे है। इनकी कला को जीवित रखने के लिए जुलाहों को आगे बढ़ाने की ज़रूरत है। इस प्रकार की कला को आगे बढ़ाने के लिए न केवल देश की विभिन्न स्तर की सरकारों को बल्कि निगमित सामाजिक जवाबदारी (CSR) के अंतर्गत विभिन्न कम्पनियों को तथा समाज को भी आगे आना चाहिए। विभिन्न कम्पनियाँ निगमित सामाजिक जवाबदारी के अंतर्गत सामान्यतः केवल शिक्षा एवं खेल के क्षेत्र में ही कार्य कर रही हैं, अतः इन्हें अपना दायरा कला के क्षेत्र में भी बढ़ाना चाहिए।  

उदाहरण के तौर पर हमारे देश में कुछ बड़े त्योहारों को ही ले लीजिए, जैसे, गणेश उत्सव, ओणम, दुर्गा पूजा, दीपावली एवं होली, आदि ये भी सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं। इन्हें कैसे व्यवस्थित किया जा सकता है ताकि देश के नागरिकों में इन त्योहारों के प्रति उत्साह में और भी बढ़ोतरी हो और इन त्योहारों को मनाने का पैमाना बढ़ाया जा सके और इन त्योहारों पर विदेशी पर्यटकों को भी देश में आकर्षित किया जा सके। हालाँकि, हमारे देश में पर्यटन उद्योग भी तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, परंतु यह सांस्कृतिक एवं रचनात्मक उद्योग का हिस्सा नहीं है। पर्यटन उद्योग में दूसरे कई पहलू भी जुड़ जाते हैं जैसे होटल उद्योग, इन्फ़्रस्ट्रक्चर उद्योग, वाहन उद्योग, आदि। पर्यटन उद्योग एवं इससे जुड़े दूसरे उद्योग अपने आप में ही आकार में काफ़ी बड़े हैं एवं इनके विकास के लिए नीतिया भी अलग से बनाई जा रही हैं।

संस्कृति को एक उद्योग का दर्जा दिया जाना चाहिए। सरकारों, कम्पनियों और समाज को इसमें मिलकर निवेश करने की ज़रूरत है। उदाहरण के तौर पर कई देशों में म्यूजीयम ही देख लीजिए, कुछ इतने आकर्षक रूप से बनाए गए हैं कि विदेशों से भी लोग इन म्यूजीयम को देखने चले आते हैं जबकि हमारे देश के म्यूजीयम में फ़ुटफाल तुलनात्मक रूप से बहुत कम है। इसलिए कहा जा सकता है कि संस्कृति को मूर्त रूप देने के लिए निवेश की आवश्यकता होगी। इंफ़्रास्ट्रक्चर को विकसित करना होगा, इससे फ़ुटफ़ॉल बढ़ेगा और देश में पर्यटन भी बढ़ेगा।      

हर देश की अपनी विशेष संस्कृति है और हर देश को इसे मूर्त रूप देने एवं इसे आगे बढ़ाने के लिए अलग अलग रणनीति की आवश्यकता होगी। विकसित देशों ने अपनी संस्कृति की अर्थव्यवस्था को मूर्त  रूप देने में बहुत सफलता पाई है, इसमें वैल्यू एडिशन कर इसे बहुत ही अच्छे तरीक़े से मार्केट किया है, इसीलिए अमेरिका एवं ब्राज़ील जैसे देशों के सकल घरेलू उत्पाद में सांस्कृतिक एवं रचनात्मक उद्योग का काफ़ी अच्छा योगदान है। भारत में अभी तक संस्कृति की अर्थव्यवस्था पर ज़्यादा ध्यान ही नहीं दिया गया है। हमें, हमारे देश में विभिन कलाओं का ज्ञान अमूर्त रूप में तो उपलब्ध है परंतु उसे विकसित कर मूर्त रूप प्रदान करने की ज़रूरत है एवं इन भारतीय कलाओं से पूरे विश्व को अवगत कराये जाने आवश्यकता है, ताकि विश्व का भारत के प्रति आकर्षण बढ़े। आज के इस डिजिटल युग में तो यह बहुत ही आसानी से किया जा सकता है। कला के अमूर्त रूप को यदि हम डिजिटल स्पेस में ले जाकर स्थापित कर सकें तो इसे विश्व में मूर्त रूप दिया जा सकता है। इस महान कार्य में देश में लगातार प्रगति कर रहे स्टार्ट-अप उद्योग की भी मदद ली जा सकती है।    

दिनांक 26 अक्टोबर 2019 को राज्य सभा टीवी ने अपने देश-देशांतर कार्यक्रम में संस्कृति की अर्थव्यवस्था विषय पर एक विशेष पैनल चर्चा का आयोजन किया था। उक्त लेख इसी पैनल चर्चा पर आधारित है।

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
hititbet giriş
betgaranti giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
hititbet giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Tuzla İpek Kirpik
hititbet giriş
hititbet
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
Hititbet
Hititbet Güncel Giriş
Hititbet Yeni Giriş
Hititbet Resmi Gİriş
betyap giriş
hititbet giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
hititbet
hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti
betgaranti güncel giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
betkom giriş
hitbet giriş
hitbet giriş
betbox giriş
betbox giriş
betpas giriş
betpas giriş
betkom giriş
betpas giriş
betpark giriş
betpark giriş
hititbet
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
hititbet
betgaranti giriş
betgaranti güncel giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betgaranti güncel giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
xslot giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
hititbet giriş
kolaybet giriş
betkom giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
meritbet giriş
meritbet giriş
meritbet giriş
meritbet giriş
betnano
betnano
betnano
holiganbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet
betpark giriş
betpark giriş
betpas giriş
hitbet giriş
betbox giriş
betbox giriş
hitbet giriş