देश और समाज पर भार हैं

बिना काम-काज के व्यस्त आदमी

– डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

 

कोई काम नहीं, फिर भी अपने आपको ऎसा दिखाते हैं जैसे कि उनके पास इतने सारे काम हैं कि बस, सारे काम उन्हीं को करने पड़ते हैं, वे न होते तो कोई काम होता ही नहीं। बहुत सारे लोग हमेशा कहते रहते हैं कि उनके पास इतने सारे काम हैं कि मरने तक की फुरसत नहीं।

कई लोग कुछ भी नहीं करते, दिन भर गपियाते फिरेंगे, इधर-उधर घूमते रहेंगे और चाय-काफी की चुस्कियों, कचोरी-समोसों  का स्वाद लेते रहेंगे और यों ही हर दिन टाईमपास करते रहेंगे, मगर जब कोई काम बता दो, तो नानी मर जाती है।

जब से कार्य-संस्कृति हाशिये पर आ गई है तभी से ऎसे लोगों की तादाद बढ़ती जा रही है। एक तो जन्मजात निकम्मे, निखट्टू और कामचोर होते हैं, दूसरे वे हैं जिन्हें जमाने की नसीहतों और जीवन की अनचाही-अनपेक्षित स्थितियों ने नाकारा बनने को विवश कर दिया है।

खूब सारे ऎसे हैं जिन्हें इस सत्य का भान हो चला है कि जो काम करता है उसी को समस्याएं झेलनी पड़ती हैं। जो लोग निकम्मे होकर जीते हैं उनसे कोई काम लेना नहीं चाहता। वह जानता है कि इनसे काम लेने का मतलब है कार्यसिद्धि में अवरोध।

बहुत से लोग इस शाश्वत सत्य से भी वाकिफ हो चुके हैं कि आजकल काम से ज्यादा सैटिंग और चापलुसी का महत्त्व है और ऎसे में जो लोग काम करने वाले हैं उनकी पूछ नहीं होती बल्कि उन्हें हमेशा किसी न किसी प्रकार से मानसिक रूप से प्रताड़ित होना पड़ता है और ऎसे में कई तनावों और अवसादों की वजह से शारीरिक स्थितियां बिगड़ जाती हैं लेकिन इससे उन लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता तो अधिनायकवादी और सामंती सोच रखते हैं। इस वजह से भी कर्मयोगी लोगों को अपनी रफ्तार धीमी करने को विवश होना पड़ता है। चापलूसों को सिर्फ चापलुसी ही करनी पड़ती है, इस एकमात्र हुनर से उनके सारे काम सिद्ध हो जाते हैं, फिर आजकल ऎसे लोगों की कोई कमी नहीं हैं जिन्हें सत्यासत्य की बजाय खुशामदी लोग पसंद आ गए हैं।

आजकल वर्क कल्चर को सभी जगह ग्रहण लगता जा रहा है और इसका स्थान ले लिया है चंद लोगों को राजी करने के तमाम गोरखधंधों ने, जिनमें कहीं कोई वर्जना नहीं है। औरों को खुश करने और रखने के लिए सब कुछ जायज है, यहाँ तक कि अपनी इंसानियत को गिरवी रखना भी।

हमारे आस-पास ऎसे खूब सारे लोगों का जमावड़ा अक्सर लगा रहता है जिनके पास कोई काम नहीं होता मगर दिन भर काम ही काम होने का रोना रोते रहते हैं। ये लोग इस कला में माहिर होते हैं कि कैसे दिन गुजार लिया जाए। ऎसे लोगों के पास खूब सारे काम होने का बहाना ही एकमात्र ऎसा जबर्दस्त हुनर बन जाता है कि ये औरों को भ्रमित करते हुए अपनी जिन्दगी के सारे मजे लूटते रहते हैं।

कई लोग हाथों और कॉख में फाइलें दबाये, कई बैग लिए और कई तेज गति में चलते हुए इधर-उधर घूमते रहेंगे, किसी काम के बारे में कहें तो काम ही काम के बहाने बनाते हुए आगे चल पड़ते हैं। ऎसे बिना किसी काम-काज के व्यस्त आदमियों की भीड़ आजकल तमाम गलियारों में फबने लगी है। दिन भर कोई काम नहीं करेंगे और दिखाएंगे ऎसे कि जाने इनके बूते ही कार्यालय, संस्थान, क्षेत्र और देश चल रहा है। इनका पावन अस्तित्व नहीं होता तो शायद समय की गति ठहर ही जाती।

जहाँ कहीं ऎसे बिना काम-काज के बहानेबाज और ढोंगी लोग मिलें, इनसे दिन भर का हिसाब लें और पूछें कि आज कौनसे काम किए, तो कलई अपने आप खुल जाएगी। पर इन निर्लज्ज-बेशरम लोगों को इससे क्या फर्क पड़ता है। उन्हें तो जैसे-तैसे अपने उल्लू सीधे करते हुए टाईमपास करना है। और जो लोग ऎसे ‘विदाउट वर्क बिजी मैन’ को प्रश्रय देते हैं उन्हें भी तो ऎसे उल्लूओं और गधों की जरूरत पड़ती ही है जो उनकी प्रशस्ति में कुछ न कुछ कहते और करते रहें।

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