बुढ़ापे से बचाएँ बच्चों को

– डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

बचपन से लेकर पचपन और सत्तर पार तक परिश्रम का महत्त्व सर्वविदित है। जो जितना अधिक परिश्रम करता है उतना अधिक स्वस्थ और मस्त रहता है। परिश्रम से शरीररस्थ हवाओं, रक्त परिसंचरण तंत्र, नाड़ियों, स्नायुतंत्र और हड्डियों से लेकर सभी प्रकार के अंगों-उपांगों को ताजगी तथा नवीनता का अहसास होता है और शरीर के भीतर से प्रदूषित तत्वों का बहिर्गमन हो जाता है और उनके स्थान पर ताजे तत्वों और पंच महाभूतों का पुनर्भरण होता रहता है।

यह क्रम निरन्तर बने रहने पर शरीर स्वस्थ और मन प्रसन्न रहता है। ऎसा नहीं होने पर शरीरस्थ प्रदूषण का घनत्व बढ़ जाया करता है और ऎसे में शरीर कई बीमारियों का घर बन जाता है जो बाद में चलकर असाध्य भी हो सकती हैं। इसके साथ ही मानसिक संतुलन और ताजगी पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है और सेहत की स्थितियां ऎसी हो जाती हैं कि जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती।

शरीर के सभी अवयवों का संतुलित इस्तेमाल होने पर ही सेहत ठीक रह सकती है। आजकल पैसे कमाने की मशीनों के निर्माण में हम अपने बच्चों का व्यक्तित्व विकास भूल चुके हैं। हम चाहते हैं कि वह पढ़ाई-पढ़ाई और पढ़ाई इतनी कर ले कि ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने लायक हो जाए।

ऎसे में बच्चों के मस्तिष्क पर अनावश्यक कई गुना दबाव बढ़ता जा रहा है। दिमाग से काम खूब लिया जा रहा है लेकिन शरीर से उतना काम नहीं लिया जा रहा है जितना हर व्यक्ति के लिए जरूरी होता है। हो यह गया है कि दिमाग जेट से तेज रफ्तार पर है और शरीर हो गया कछुवा चाल।

ऎसे में मस्तिष्क और शरीर के बीच असंतुलन की खायी इतनी अधिक बढ़ गई है कि अपना शरीर अपने ही आपे में नहीं रहा। अवयवों में दुर्बलता आ गई है और बिना परिश्रम के शरीर अपनी क्षमताओं को खोकर स्थूल होता जा रहा है। कहीं अत्यधिक दबाव की वजह से शरीर कृशकाय भी होने लगे हैं। कोई मरियल टट्टू बना हुआ फिर रहा है तो कोई अनावश्यक मोटू-पेटू और दमघोटू।

वर्तमान पीढ़ी परिश्रम से अलग होती जा रही है। भोग-विलासिता की सारी सुख-सुविधाएं अपने आस-पास ही मौजूद हैं। कुछ मीटर जाना हो तब भी बाईक या कार चाहिए। फिर ऊपर से मोबाइल, टीवी और कंप्यूटर के मायाजाल ने बच्चों की दुनिया कुछ वर्ग फीट के बंद कमरों तक सिमटा कर रख दी है जहाँ हिलने-डुलने तक का कोई काम नहीं। गणपति स्थापना की तरह एक बार बैठ गए तो फिर घण्टों तक वैसे ही कुण्डली मारे रहो।

पैदल चलना हम भी छोड़ चुके हैं और हमारे बच्चे भी। बातें हम दुनिया भर की करें, मंगल तक यान भेजने पर चर्चा करें और विश्व भर के बारे में जानने-सोचने-समझने की डींगें हाँकते रहें, मगर हमारा अपना संसार कितना छोटा हो चला है। इस वजह से परिश्रम करना न कोई चाहता है, न करना पड़ता है। फिर बाद में एक समय ऎसा आ जाता है जब अनचाहे भी समय निकाल कर टहलने को विवश होना पड़ता है। यही स्थिति यदि हम जीवन के आरंभ से ही पैदा कर दें तो हमारा शरीर भी स्वस्थ एवं मस्त रहेगा और बाद के दिनों में व्यस्तता में से समय चुराने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी।

नई पीढ़ी को उन कामों की ओर मोड़ें जहाँ शरीर से परिश्रम हो, ताकि ऑक्सीडेशन हो जाए और इससे शरीर में ताजगी और स्फूर्ति हमेशा बनी रहे तथा जीवन के उत्तरार्ध में फिर सायास और मन मारकर ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़े। बच्चे जितने अधिक सुविधाभोगी होंगे, उतनी उनकी समस्याओं का ग्राफ बढ़ता चला जाएगा। इस सत्य को आज नहीं तो कल हरेक को स्वीकारना पड़ेगा ही।

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