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भारतीय मीडिया में जड़ जमाने की कोशिश करते चीन पर भी है मोदी सरकार की नजर

आर्थिक मोर्चे पर चीन को लगातार झटके देने के बाद अब मोदी सरकार की पैनी नजर उन संगठनों पर है, जो चीनी दूतावास के इशारे पर भारत में रहकर चीनी एजेंडे को आगे बढ़ने का काम करते हैं। भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में चीन-आधारित थिंक टैंकों की भारत में बाढ़ आ गई है, जिन्हें कम्युनिस्ट झुकाव वालों द्वारा संचालित किया जाता है।

थिंक टैंक के जरिए भारत में चीनी घुसपैठ
चीन हर क्षेत्र में एक ऐसा संगठन तैयार करने की कोशिश में लगा है, जो भारत सरकार की नीतियों को प्रभावित कर सके और चीनी एजेंडे को आगे बढ़ा सके। सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक एक समाजसेवी एवं शिक्षाविद द्वारा ‘भारत चीन संबंधों’ पर थिंक टैंक बनाया गया है, जिसके चीनी दूतावास से करीबी रिश्ते होने का शक है। चीन भारतीय शिक्षण संस्थानों में ‘चाइना स्टडी सेंटर’ स्थापित करने की योजना पर भी काम कर रहा है।
कन्फ्यूशियस इंस्टीट्यूट्स का व्यापक नेटवर्क
चीन ने विदेशी नागरिकों का ब्रेनवॉश करने के लिए ‘स्टडी द पावरफुल कंट्री’ नामक एक एप भी विकसित किया है। बीजिंग भाषा और संस्कृति को बढ़ावा देने के नाम पर दुनिया भर में कन्फ्यूशियस इंस्टीट्यूट्स का व्यापक नेटवर्क स्थापित कर रहा है। हाल ही में, भारत और अमेरिका की सरकारों ने इन संस्थानों के कामकाज की जांच के आदेश दिए थे।
चीनी और भारतीय संस्थानों के बीच समझौतों की होगी जांच
भारत ने चीनी साजिश को उजागर करने के लिए कदम उठाया है। मोदी सरकार भारत में संचालित कन्फ्यूशियस संस्थानों के साथ-साथ चीनी और भारतीय शिक्षण संस्थानों के बीच हुए समझौतों को जांच के दायरे में लेकर आई है। कन्फ्यूशियस इंस्टीट्यूट्स भारत के कई प्रमुख सार्वजनिक और निजी संस्थानों में स्थापित किए गए हैं। इन संस्थानों पर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) की इकाइयों के रूप में कार्य करने और चीनी हितों को आगे बढ़ाने का आरोप है।
पत्रकारों व बुद्धिजीवियों का नेटवर्क स्थापित करने की योजना
कन्फ्यूशियस इंस्टीट्यूट्स की स्थापना के अलावा, चीन भारत में पत्रकारों, शिक्षाविदों और बुद्धिजीवियों का एक मजबूत नेटवर्क स्थापित करने की योजना पर भी काम कर रहा है। मोदी सरकार के रडार पर वे 54 भारतीय संस्थान भी हैं, जिन्होंने चीनी संस्थानों के साथ MOU पर हस्ताक्षर किये थे। इन संस्थानों में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT), राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NITs), भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (ISER), जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) आदि शामिल हैं।
फैलोशिप देकर भारतीय छात्रों का ब्रेनवॉश
भारतीय शैक्षिक क्षेत्रों में चीनी घुसपैठ किस कदर बढ़ गई है, इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि पूर्वोत्तर का एक प्रतिष्ठित प्रबंधन संस्थान चीन में व्यवसायों के प्रबंधन से जुड़ा एक पाठ्यक्रम चला रहा है। इसके अलावा, चीन भारतीय छात्रों को फैलोशिप भी प्रदान करने में लगा है, ताकि चीन बुलाकर उनका ब्रेनवॉश किया जा सके। उसकी प्रमुख फैलोशिप में श्वार्ज़मैन फैलोशिप, कन्फ्यूशियस चाइना स्टडीज प्रोग्राम (CCSP), यूनेस्को/पीआरसी सह-प्रायोजित फैलोशिप शामिल हैं।
भारतीय मीडिया में पैठ बनाने की कोशिश
चीन ने भारतीय मीडिया में भी अपनी पैठ बनाने की कोशिशें तेज कर दी हैं। चीन के विदेश मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली चीनी पब्लिक डिप्लोमेसी एसोसिएशन (CPDA) को इस काम की जिम्मेदारी सौंपी गई है। CPDA एक फेलोशिप चलाता है, जिसके तहत भारतीय पत्रकारों को चीन आमंत्रित करके प्रशिक्षित किया जाता है। इन पत्रकारों को वित्तीय लाभ, आवास और अन्य भत्तों की पेशकश की जाती है।
फेलोशिप पर भारतीय पत्रकारों की चीन यात्रा
भारतीय समाचार एजेंसियों, अंग्रेजी और हिंदी अखबारों और प्रमुख समाचार चैनलों के पत्रकार फेलोशिप पर चीन की यात्रा करते रहे हैं। बदले में पत्रकार, दिलचस्प ढंग से चीन-प्रायोजित कार्यक्रम का उल्लेख किए बिना उसके हित से जुड़ी स्टोरी प्रकाशित करते हैं। हालिया लद्दाख हिंसा के बाद से भारतीय के रूप में ऐसे ‘चीनी सैनिक’ ज्यादा सक्रिय हो गए हैं। ये पत्रकार भारत सरकार के चीन विरोधी फैसलों पर भी सवाल खड़े करते हैं।
ऑनलाइन मीडिया में भी चीनी घुसपैठ
चीन ने ऑनलाइन मीडिया में भी जबरदस्त घुसपैठ की है। दर्जनों ऐसे न्यूज पोर्टल हैं, जो भारत में चीन की कम्युनिस्ट सरकार को लेकर समय-समय पर माहौल तैयार करते रहते हैं। बदले में उन्हें चीन से विज्ञापनों के रूप में भारी-भरकम आर्थिक सहायता मिलती है।
चीन को मसीहा के रूप में दर्शाने की कोशिश
कुछ वक्त पहले तिब्बती कार्यकर्ताओं ने एक प्रमुख भारतीय अंग्रेजी अखबार की आलोचना की थी। दरअसल, अखबार ने एक विज्ञापन प्रकाशित किया था, जिसमें चीन को एक मसीहा के रूप में दर्शाया गया था। जिसने 1950 के बाद से तिब्बत में आर्थिक विकास, सामाजिक समावेश और धार्मिक स्वतंत्रता के लिए बहुत कुछ किया।
चीन के खिलाफ बड़ा अभियान चलाने की जरूरत
जानकारों का मानना है कि सरकार को चीन के खिलाफ बड़ा अभियान चलाने की जरूरत है, ताकि शिक्षा संस्थानों और मीडिया के जरिये अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने की उसकी कोशिशों को असफल किया जा सके।

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