चर्चाओं में ही समय न गँवाएँ

संक्रमण काल का सदुपयोगsamay-sadupyog करें

– डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

जो कुछ होना था, हो गया। जो परिणाम सामने आने हैं वे कुछ दिन में अपने आप आ ही जाएंगे। बीच का यह पूरा समय संक्रमण काल है जिसे चाहे-अनचाहे गुजारना ही है। कुछ न करें, तब भी ये गुजर जाएगा, और कुछ करते रहें तब भी गुजर ही जाने वाला है।

इन दिनों सभी जगह लोगों के पास खूब सारे विषय हैं जिन पर चर्चाओं का ज्वार ही आया हुआ हैं। कयासों, भविष्यवाणियों, गणितीय पहेलियों, शंकाओं, आशंकाओं आदि का जोर सब तरफ की हवाओं में हैं। हमें सुकून तभी मिलता है जब हमारे पास कोई न कोई ज्वलन्त मुद्दा बरकरार हो। हम एक इंसान के रूप में भले ही वो काम नहीं कर पाएं जो एक औसत आदमी को रोजमर्रा की जिन्दगी में करने होते हैं, मगर कुछेक अलग किस्म के प्राणियों को छोड़ दिया जाए तो शेष रहे हम सारे के सारे ऎसे हैं जिनके पास और कोई काम-धंधा है ही नहीं, सिवाय बतियाने और फालतू की चर्चाओं में रस लेने के। भले ही इन चर्चाओं का हमसे संबंध हो न हो, हम फालतू सोचने और बोलने के मामले में दुनिया भर में अव्वल हैं, और रहेंगे।

हममें से खूब सारे लोग इन दिनों स्वयंभू भविष्यवक्ता हो गए हैं, ज्योतिषीय गणनाओं की तरह सम सामयिक गणित के सवालों को सुलटाने में व्यस्त हैं और अपनी-अपनी गणित लगा रहे हैं। कई सारे लोग जमाने भर की हवाओं और आदमी के पसीने को सूँघने में माहिर हैं और वे इसी से कयास लगा रहे हैं।

बहुसंख्यक ऎसे हैं जो एक जगह कोई बात सुनते हैं और उसी बात को दूसरी जगह नमक-मिर्च लगाकर कर नया तड़का देते हुए बड़े ही सलीके से अपनी बताकर परोस देते हैंं। ढेरों ऎसे हैं जिनमें न कोई काम-धंधा करने की कुव्वत है, न ये कुछ कर पाने की स्थिति में हैं। इनके लिए पूरी जिन्दगी कभी इधर तो कभी उधर बैठे रहकर गपियाने और अपने इलाके से लेकर दुनिया भर के बारे में चर्चाएँ करना ही हो चुकी है। ये लोग किसी वजह से चंद घण्टों तक मौन रह जाएं अथवा कुछ सुन न पाएँ तो पागलों की तरह व्यवहार करने लगते हैं, नींद नहीं आए सो अलग।

सब तरफ बस चर्चाओं का माहौल गर्म है, कयासों का हाट बाजार लगा हुआ है, जहाँ खरीदारों और बेचने वालों से लेकर सारे के सारे किसी न किसी कयास में रमे हुए हैं।  जो मुख्य भूमिका में हैं वे प्रसूति वेदना सा दर्द महसूस करते हुए कभी हँसने की स्थिति में आ जाते हैं और कभी रोने लगते हैं। कोई कुछ कह देता है तो खुश हो जाते हैं, कोई दूसरी बात कर देता है तो मुँह पिचका कर बैठ जाते हैं।

बुद्धू बक्से के सामने बैठकर दुनिया भर की चर्चाओं और गणित को सुनने वाले लोगों का जमघट हर तरफ पसरा हुआ है। सारे के सारे भविष्य की गणित के सवालों को सुलझाने के फेर में अपनी वाणी और श्रवण सामथ्र्य के साथ जीवनीशक्ति के क्षरण में तुले हुए हैं। इन्हें पता ही नहीं है कि वे जो कुछ कर रहे हैं उसका मनोरंजन और टाईमपास के सिवा कोई औचित्य नहीं है। टीवी वालों को अपनी टीआरपी बढ़ानी है, चौबीस घण्टे निकालने हैं।

बोलते रहने के आदी लोगोें को तलाश है सहनशील श्रोताओं की, और फालतू की चर्चाओं को ही टॉनिक मान बैठे लोगों को तलाश है उन लोगों की जो बिना थके बोलते रहने की परंपरागत बीमारी से ग्रसित हैं। दोनों पक्षाेंं के बीच एक तीसरा वर्ग ऎसा भी है जो न बोलने में विश्वास रखता है, न प्रतिक्रिया करने में, वह चुपचाप सुनता हुआ दोनों के मजे ले रहा है।

इस संक्रमण काल के महत्त्व को पहचानें तथा कुछ दिन सब कुछ भूल भुलाकर अपने लिए जिएं, समाज और क्षेत्र के लोगों की भलाई के लिए कोई ऎसा रचनात्मक अभियान हाथ में लें जिससे सभी का भला हो। अन्यथा ये पाँच- छह दिन यों ही गुजर जाएंगे चर्चाओं में। प्याज के छिलकों की तरह हाथ कुछ न आएगा चाहे कितनी ही परतों को उघाड़ने में दिन-रात रमे रहो। इस संक्रमण काल का सदुपयोग कैसे करें, यह हमें सोचना है। जो सोचे उसका भला, जो न सोच पाए उसका भी…..।

—-000—-

Comment:

betbox giriş
betbox giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
sekabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
romabet giriş
romabet giriş
İmajbet güncel
Safirbet resmi adres
Safirbet giriş
betnano giriş
sekabet giriş
sekabet giriş
nitrobahis giriş
nitrobahis giriş
winxbet giriş
yakabet giriş
jojobet giriş
jojobet giriş
batumslot giriş
batumslot
batumslot giriş