हमारा यह संसार 3 अनादि सत्ताओं की देन है

IMG-20200809-WA0006

ओ३म्

==========
हमारा यह जगत सूर्य, चन्द्र, पृथिवी सहित अनेकों ग्रह व उपग्रहों से युक्त है। इस समस्त सृष्टि में हमारे सौर्य मण्डल के समान अनेक व अनन्त सौर्य मण्डल हैं। इतने विशाल जगत् को देखकर जिज्ञासा होती है कि यह संसार किससे, क्यों, कैसे व कब अस्तित्व में आया और इसका भविष्य क्या है? हमारे पूर्वजों ने इन सभी प्रश्नों पर विचार किया था और उनके उत्तर भी उन्होंने प्राप्त किये थे। यह उत्तर हमें वैदिक साहित्य वा ऋषि दयानन्द के अमर ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन कर प्राप्त होते हैं। प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि वह इन प्रश्नों की जिज्ञासा करें और इनके उत्तर जानकर उन्हें आने वाली पीढ़ियों को प्रदान करें जिससे सभी मनुष्य अपने कर्तव्य व लक्ष्य का बोध प्राप्त कर उनके अनुसार अपना जीवन व्यतीत करते हुए उन्हें प्राप्त होकर अपने जीवन को सफल कर सकें और अकर्तव्य-कर्मों को करने से बच कर उनके परिणाम दुःखों से भी बच सकें। ऐसा करके ही हम अपने मनुष्य जीवन वा मनुष्य को परमात्मा से प्राप्त हुई बुद्धि का सदुपयोग कर अपनी आत्मा व जीवन की रक्षा कर सकते हैं और अपने दुःखों को दूर कर दूसरों को भी दुःखों से रहित सन्मार्ग का ज्ञान करा सकते है। वेद संसार में तीन अनादि सत्ताओं का होना बताते हैं। यह सत्तायें हैं ईश्वर, जीव और प्रकृति। इन तीन सत्ताओं से ही यह संसार बना है व चल रहा है। इनमें से यदि एक सत्ता का भी अभाव होता तो यह संसार न तो बन सकता था न ही यह सृष्टि चल सकती थी। ईश्वर संसार को बनाने व चलाने वाला है। जिसके लिये संसार बनाया गया है वह ‘‘जीव” नामी अनादि व नित्य सत्ता है। जिस पदार्थ से यह संसार बना है वह जड़ प्रकृति है जो सूक्ष्म एवं सत्व, रज व तम गुणों वाली त्रिगुणात्मक प्रकृति कहलाती है। यह ज्ञान ईश्वर ने वेदों में कराया है और जिन ऋषियों ने अपने उपदेशों व दर्शन आदि ग्रन्थों द्वारा इसका प्रचार किया है वह भी उन्होंने वेदों सहित अपनी ईश्वर उपासना, चिन्तन-मनन तथा आपसी चर्चा से प्राप्त किया था। इन तीन सत्ताओं का विस्तृत ज्ञान भी वेदों में प्राप्त होता है। हमारी यह सृष्टि 1.96 अरब वर्ष पूर्व अस्तित्व में आई है। सृष्टि के आरम्भ में अमैथुनी सृष्टि हुई थी जिसमें अनेक स्त्री व पुरुष परमात्मा द्वारा युवा अवस्था में उत्पन्न किये गये थे। इन स्त्री पुरुषों को ज्ञान की आवश्यकता थी जिसे ईश्वर ने इन्हें चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा को उत्पन्न कर प्रदान कराया था। वेदोत्पत्ति का प्रकरण ऋषि दयानन्द ने अपने अनुसंधान एवं विवेक से अपने अमर ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश एवं ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में प्रस्तुत किया है। वहां इसे देखा जा सकता है और इस विषयक अपनी सभी भ्रान्तियां दूर की जा सकती हैं। यह ऐसा ज्ञान है जिसे जान लेने से मनुष्य को अपने जीवन में लाभ होता है। जिस मनुष्य को इस विषय का ज्ञान नहीं है, उसका मनुष्य जीवन प्राप्त करना पूरी तरह सार्थक नहीं कहा जा सकता। मनुष्य को जन्म ज्ञान प्राप्ति और ज्ञान के अनुसार कर्म करने के लिये ही मिला है। ज्ञान से ही मनुष्य की मुक्ति होती है। मुक्ति दुःखों व जन्म-मरण से होती है, जिसके लिये वेद व वैदिक साहित्य के अध्ययन व अभ्यास के अतिरिक्त मनुष्य के पास अन्य कोई साधन नहीं है। अतः संसार के सभी मनुष्यों को वेद व वैदिक साहित्य की शरण में आकर अपने जीवन के यथार्थ रहस्य व उसके धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति के विषय में ज्ञान अर्जित करना चाहिये। सभी ऋषि मुनि, ज्ञानी व ध्यानी तथा योगी इसी वैदिक जीवन को जीते थे तथा अपने अभीष्ट मुक्ति पथ के पथिक बन कर आत्मा के लक्ष्य ज्ञानोन्नति, दुःखनिवृत्ति तथा मोक्ष को प्राप्त करते थे।

ईश्वर संसार की सर्वोत्तम, प्रमुख, सृष्टि को रचने व इसका पालन करने वाली सत्ता है। वेदों के अनुसार इसका स्वरूप, गुण, कर्म व स्वभाव बताते हुए ऋषि दयानन्द ने कहा है कि ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। इस स्वरूप वाले सत्तावान ईश्वर की ही सब मनुष्यों को स्तुति, प्रार्थना व उपासना करनी चाहिये। ईश्वर से इतर कोई मनुष्य, महापुरुष व सत्ता मनुष्य के लिये ईश्वर के समान उपासनीय व पूजनीय नहीं है। ईश्वर की उपासना से जो लाभ प्राप्त होते हैं वह अन्य किसी आचार्य व सन्देशवाहक की उपासना, उनके प्रति श्रद्धा व अज्ञान पालन से नहीं होते। इसका विस्तृत अध्ययन भी ऋषि दयानन्द के सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों से किया जा सकता है। ऋषि दयानन्द ईश्वर के विषय में लिखते हैं कि ईश्वर वह है जो सब दिव्य गुण, कर्म, स्वभाव, सब विद्याओं से युक्त और जिसमें पृथिवी सूर्यादि सब लोक स्थित हैं। ईश्वर आकाश के समान व्यापक है और सब देवों का देव है। उस परमेश्वर को जो मनुष्य न जानते न मानते और उस का ध्यान नहीं करते वे नास्तिक मन्दमति सदा दुःखसागर में डूबे ही रहते हैं। इसलिये सर्वदा उसी को जानकर सब मनुष्य सुखी होते हैं। ऋषि दयानन्द ने यह भी बताया है कि संसार में ईश्वर केवल एक ही है अर्थात् एक से अधिक ईश्वर नहीं हैं। देवताओं के विषय में ऋषि दयानन्द ने बताया है कि देवता दिव्य गुणों से युक्त जड़ पदार्थों यथा अग्नि, वायु, जल, आकाश व पृथिवी आदि को कहते हैं। ईश्वर देव और महादेव भी है। महादेव केवल एक सच्चिदानन्दस्वरूप ईश्वर ही होता है। जड़ देवों व परमात्मा से मनुष्य को यथायोग्य उपकार लेना चाहिये परन्तु कोई भी जड़ पदार्थ वा देवता उपासनीय नहीं है। कोई भी जड़ देवता हमारी किसी प्रार्थना को अनुभव नहीं कर सकते और न ही उसे पूरा कर सकते। यह काम ईश्वर की उपासना से ही होता है। इस विषय को विस्तार से ऋषि दयानन्द के सभी ग्रन्थों का अध्ययन कर जाना जा सकता है।

ईश्वर से इतर दूसरी मुख्य सत्ता ‘‘जीव” है। यह जीव चेतन गुण वाली सत्ता है जिसमें स्वाभाविक आनन्द का अभाव है। जीव में आनन्द ईश्वर के सान्निध्य से प्राप्त होता है। इसके लिये मनुष्य योनि में होते हुए वह जीव उपासना कर ईश्वरीय आनन्द को प्राप्त कर सकता है। भौतिक पदार्थों से इन्द्रियों के द्वारा मनुष्य सुख की अनुभूति कर सकते हैं परन्तु इन्द्रिय सुख एवं ईश्वर के आनन्द में अन्तर है। ईश्वर के आनन्द के समान संसार का कोई सुख नहीं है। ईश्वर का आनन्द अनुभव की वस्तु है जिसे योगी ध्यान व समाधि की अवस्था में ही अनुभव करते हैं। हम इसे ऋषियों के ग्रन्थों के आधार पर कह रहे हैं। अतः ईश्वर के आनन्द की प्राप्ति के लिये प्रत्येक मनुष्य को ऋषि प्रणीत वैदिक सन्ध्या प्रतिदिन प्रातः व सायं करनी चाहिये। इससे आत्मा में उत्तरोत्तर ईश्वर के ज्ञान का प्रकाश बढ़ता जायेगा और आनन्द की उपलब्धि भी होगी। जीव के विषय में ऋषि दयानन्द सत्यार्थप्रकाश के सप्तमसमुल्लास में लिखते हैं कि ईश्वर व जीव दोनों चेतनस्वरूप हैं। दोनों का स्वभाव पवित्र, अविनाशी और धार्मिकता आदि है। परमेश्वर के सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय, सब को नियम में रखना, जीवों को पाप पुण्यों के फल देना आदि धर्मयुक्त कर्म हैं। जीव के सन्तानोत्पत्ति, उन का पालन, शिल्पविद्या आदि अच्छे बुरे कर्म हैं। ईश्वर में नित्यज्ञान, आनन्द, अनन्त बल आदि गुण जीव से अतिरिक्त हैं। ऐसी संसार की दो अनादि सत्तायें ईश्वर व जीव हैं।

जीव के लक्षण व सत्ता पर प्रकाश डालते हुए ऋषि ने बताया है कि जीव में पदार्थों की प्राप्ति की अभिलाषा, दुःखादि की अनिच्छा, वैर, पुरुषार्थ, बल, सुख व आनन्द, दुःख, विलाप अप्रसन्नता, विवेक, पहिचानना ये गुण-दोष हैं। इसके अतिरिक्त प्राण वायु को बाहर निकालना, प्राण को बाहर से भीतर को लेना, आंख को मींचना, आंख को खोलना, प्राण का धारण करना, निश्चय, स्मरण और अहंकार करना, चलना, सब इन्द्रियों को चलाना, भिन्न-भिन्न क्षुधा, तृषा, हर्ष, शोकादियुक्त होना, ये जीवात्मा के गुण हैं। जीवात्मा के यह गुण परमात्मा से भिन्न हैं। इन गुणों से ही जीवात्मा की प्रतीती होती है। यह भी जानना चाहिये कि जीवात्मा स्थूल नहीं है। जब तक आत्मा देह में होता है तभी तक यह गुण देह में प्रकाशित रहते हैं और जब शरीर छोड़ कर चला जाता है तब ये गुण शरीर में नहीं रहते। जिस के होने से जो हों और न होने से न हों वे गुण उसी ़(प्रस्तुत प्रकरण में आत्मा) के होते हैं। जैसे दीप और सूर्यादि के न होने से प्रकाशादि का न होना और होने से होना है, वैसे ही जीव और परमात्मा का ज्ञान व विज्ञान इनके गुणों द्वारा होता है।

जगत् में तीसरा पदार्थ है प्रकृति। प्रकृति को ऋषि दयानन्द जी ने सांख्य सूत्रों के आधार पर वर्णित किया है। वह लिखते हैं कि सत्व वा शुद्ध, रजः अर्थात् मध्य तथा तमः अर्थात् जाड्य यह तीन वस्तु मिलकर जो एक संघात है उस का नाम प्रकृति है। उस प्रकृति से महतत्व बुद्धि, उस से अहंकार, उस से पांच तन्मात्रा सूक्ष्म भूत और दश इन्द्रियां तथा ग्यारहवां मन, पांच तन्मात्राओं से पृथिवी आदि पांच भूत ये (तेईस), चैबीस और पच्चीसवां पुरुष अर्थात् जीव और परमेश्वर हैं। इन में से प्रकृति अविकारिणी और महतत्व अहंकार पांच सूक्ष्म भूत प्रकृति का कार्य और इन्द्रियां मन तथा स्थूलभूतों का कारण हैं। पुरुष न किसी की प्रकृति, न उपादान कारण और न किसी का कार्य है।

हमारा यह संसार प्रकृति नामी जड़ पदार्थ से बना है। बनाने वाला परमात्मा है तथा जिसके लिये बनाया गया है वह ‘‘जीव” हैं। सृष्टि की रचना लगभग दो अरब वर्ष पूर्व हुई और इस समय मनुष्योत्पत्ति का काल 1,96,08,53,120 वर्ष व्यतीत हुआ है। यह सृष्टि प्रवाह से अनादि है अर्थात् अनादि काल से यह सृष्टि प्रकृति नामी उपादान कारण से बनती आ रही है और सर्ग काल की समाप्ति पर परमात्मा इसको इसके कारण मूल प्रकृति में विलीन कर देती है। प्रलय की अवधि पूर्ण होने पर पुनः सृष्टि की रचना होती है। इस प्रकार सृष्टि उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय का यह कार्य अनादि से चल रहा है तथा अनन्त काल तक चलता रहेगा। जीव अपने अपने कर्मों के अनुसार अनेक प्राणी योनियों में जन्म लेकर सुख व दुःख पाते रहेंगे और वेदानुसार जीवन व्यतीत करने सहित ईश्वर का साक्षात्कार कर मोक्ष व मोक्ष के बाद पुनः जन्म प्राप्त करते रहेंगे। सभी मनुष्यों को इन रहस्यों को जानना चाहिये तभी मनुष्य जीवन की सार्थकता है।

हमने संक्षेप में सृष्टि के तीन अनादि पदार्थों की चर्चा की है। पाठक मित्रों से निवेदन है कि वह सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ के सप्तम्, अष्टम् तथा नवम् समुल्लास को पढ़कर सृष्टि के रहस्यों को विस्तार जानें और अपने कर्तव्यों सहित जीवन लक्ष्य व उसकी प्राप्ति के उपायों व साधनों को भी जानें। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

Comment:

betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
Hititbet Giriş
Vaycasino Giriş
betorder giriş
Supertotobet Giriş
Vaycasino Giriş
vaycasino
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino
vaycasino giriş
betpark giriş
betnano giriş
betpark giriş
marsbahis giriş
marsbahis giriş
ikimisli giriş
roketbet giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betplay
betplay
betpark giriş
kolaybet giriş
ikimisli giriş
roketbet giriş
xlsot giriş
xslot giriş
mavibet giriş
mavibet giriş
betplay
betplay
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betorder giriş
betorder
kralbet giriş
tarafbet giriş
xslot giriş
trendbet giriş
mavibet giriş
ikimisli giriş
mavibet giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betasus giriş
padisahbet giriş
padisahbet giriş
padisahbet
padisahbet
betpark giriş
ultrabet giriş