पर्यावरण संरक्षण , आपदा प्रबंधन और महिला सामाजिक सुरक्षा को समर्पित त्यौहार है हरियाली तीज

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भारत देश त्योहारों का देश है |यदि हम मनाएं तो यहां हर दिन त्योहार है ,शायद ही दुनिया के किसी भी #भूभाग में इतने त्यौहार मनाए जाते हो| पर्व का अर्थ होता है #गांठ अर्थात त्योहार समाज को बांधे रखते है| वर्षा ऋतु सावन मास के द्वितीय शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाने वाला त्यौहार हरियाली तीज प्रकृति के सौंदर्य ,खाद्य सुरक्षा ,आपदा प्रबंधन को समर्पित एक प्राचीन त्यौहार है|
लेकिन आज यह त्यौहार सांकेतिक, प्रतिकात्मक मात्र बनकर रह गए हैं ना लोगों में उत्साह है ना उमंग रहा है|
अवसाद तनाव चिंता ने अधिकांश मनुष्य को अपने चंगुल में घेर लिया है| मानसिक उत्साह सौंदर्य नष्ट हो रहा है|
ग्रामीण अंचल में मनाई जाने वाला हरियाली तीज तोहार पूरे श्रावण मास में मनाया जाता था| गुड़ शक्कर से बनी हुई खाद्य सामग्री भेंट स्वरूप विवाहिता महिला के ससुराल में पहुंचाई जाती थी जिसे #सिंदारा कहते हैं उत्तर भारत में तो इसे यही कहा जाता है यह पर्व देश के अन्य हिस्सों में अलग-अलग नाम रूप से संबोधित है | इसके पीछे केवल एक उद्देश्य था कि बरसात के मौसम में प्रकृति अपना रूद्र रूप धारण कर लेती थी खाद्य संकट ग्रामीणांचल में उत्पन्न हो जाता था गुड़ की मीठी पूरी, पुडॉ, भुने हुए गेहूं के आटे से निर्मित मिठाई आदि जो लंबे समय तक नष्ट नहीं होते थे, खाद्य सुरक्षा स्वरूप बेटी के मायके में पहुंचाए जाते थे| अधिकांश कच्चे मकान होते थे कोई अनहोनी बेटी के मायके में #दैवीय_प्रकोप #रोग घटित होने की स्थिति में बेटी व उसके पारिवारिक जनों का कुशलक्षेम वृतांत जान लिया जाता था..इसी के साथ ही गांव समाज में खाद्य सामग्री घर-घर जाकर बाटी जाती थी समरसता के भाव से|

मायके पक्ष से सम्मान स्वरूप उपहार श्रृंगार सामग्री खाद्य सामग्री को पाकर माताएं बहने निश्चित होकर महीने भर आनंद से विभोर होकर #लोकगीत गाकर इस पर्व को मनाया करती थी|

अनेक सप्ताह मनाए जाने वाला यह पर्व कुछ घंटों तक ही सिमट कर रह गया है उत्साह आनंद उल्लास नष्ट हो गया है, केवल सांकेतिक तौर पर शहरों की तो बात छोड़िए अब यह ग्रामीण अंचलों में बनाया जा रहा है,वह भी प्रतीकात्मक तौर पर |

इस वर्ष कोरोना महामारी के प्रकोप के कारण माताओं बहनों को इस पर्व की एवज में दिए जाने वाले उपहार मिष्ठान आदि की व्यवस्था भी प्रभावित हुई है| लुप्त होती इस परंपरा को कोरोना महामारी ने अधिक प्रभावित किया है…. जबकि यह परंपरा इतनी उत्तम है इसके माध्यम से महामारी से बचाव की सामग्री राहत पहुंचाई जा सकती है सिधारा आदि के साथ मास्क सैनिटाइजर काढ़ा पतंजलि की कोरोनिल दवाई आदि भेंट स्वरूप माता बहनों को दी जा सकती है|

कुछ जागरूक भाई ऐसा ही कर रहे हैं यह सराहनीय है|
बुरी से बुरी परिस्थिति में समाधान निकाला जा सकता है थोड़े से धैर्य संयम की आवश्यकता पड़ती है…………!

*आर्य सागर खारी*✍

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