मौसम अध्ययन की भारतीय परंपरा

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समय की अनोखी धारणा है। सर्दी, गर्मी और बारिश को महसूस करते हुए ही मानव ने जाना था कि ऋतु और उसका चक्र क्या है? महिलाओं ने पौधों के फलन और फूलन से नक्षत्रों को जाना और जिसके लिए जैसा जाना, वैसा ही कहा जो दिवस, पक्ष, मास और संवत्सर के फल के लिए भी जाना गया।

आज जबकि विश्व स्तर पर मौसम विज्ञान दिवस को मनाया जाने लगा है तो भारतीय दृष्टिकोण की याद आती है। वैदिक काल में यज्ञ पूर्वक इन्द्र, मरूत, पर्जन्य, सूर्य, चंद्रादि से जो अपेक्षा की जाती थी, उसमें वृष्टि, वायु, वज्र, वन आदि को ध्यान में रखा जाता था। कालांतर में इन मान्यताओं का विस्तार लोक जीवन में निरन्तर रहा। किसान से लेकर शासक तक ने ऋतु और मौसम को जानना चाहा। पराशर से लेकर गर्ग, सहदेव, भड्डली, घाघ, डंक, खरनार आदि अनेकों के वचन लोक स्मृतियों में प्रचलित रहे।

भारत में ऋतु, नक्षत्रों और तिथियों के अनुसार फलों पर खूब विचार हुआ। और, फिर पेड़ों के पल्लवन, पशु – पक्षियों की गतिविधियों को भी देखा गया। ये सब अनुभव मौसम के मिजाज को जानने में सहायक बने।

पंडित मधुसूदन ओझा ने इस ज्ञान को सर्वजन हिताय माना और कादम्बिनी की रचना की। शताधिक ग्रन्थ लिखे लेकिन इसी का अनुवाद स्वयं किया। इस विषय पर भारत में लगभग 40 ग्रंथ मेरे देखने में आए हैं जो पिछले दो ढाई हजार सालों में लिखे गए। कुछ तो संपादित भी किए और कुछ बाकी भी हैं।

मैं चाहता हूं इस विद्या के सब ग्रंथ सामने आए और घर घर पहुंचे। इन ग्रंथों में वे ही बातें मिलती है जो लोक में अनुभव के आधार पर जीवित हैं। चाणक्य ने घर से देश तक की नीति में मौसम को ध्यान में रखने की बात कही है तो ऐसे ज्ञानी भी रहे जिन्होंने अपने यजमानों को सचेत करने प्रयोजन से ऐसे ग्रंथ देश, काल और स्थितियों के आधार पर लिखे।

आपको यह सब मालूम है न! कुछ अपनी बात भी कहिए…

चर्चा बारिश की : यदि ऐसा नजर में आए
श्रीकृष्ण “जुगनू”
1- क्‍या धूप आपको असहनीय, प्रचण्‍ड लग रही है ?
2- क्‍या बतखें चिल्‍लाने लगी हैं ?
3- क्‍या घी पिघला हुआ है ?
4- क्‍या हवा की ओर पीठ करके भेड़-बकरियां बैठी हुई नजर आती हैं ?
5- चिंटियां अण्‍डे लेकर दीवार पर रेंगती दिखाई देती है ?
6- चिडि़यां धूल में नहाती नजर आती हैं ?
7- कांसे की वस्‍तु का रंग फीका पड़ गया है ?
8- आकाश का रंग गहरा नीला दिखाई देने लगा है ?
9- मेढक वाड़ में घुसते दिखाई देने लगे हैं ?
10- कहीं-कहीं सांप पेड़ पर चढ़े दिखाई देने लगे हैं ?

यदि हां तो समझिये की आपके उधर बारिश की तैयारी है। पहले इसी तरह बारिश के संबंध में विचार किया जाता था। ज्‍योतिष के संहिता ग्रंथों से लेकर घाघ भड़डरी की कहावतों में भी बारिश के ये लक्षण सद्याे वृष्टि लक्षण के प्रसंग में आए हैं। Meterorological wisdom of Rajputana पुस्‍तक में यह कहावत आई है —
सूरज तेज सूं तेज आड बोले अनयाली।
मही माट गळ जाय, पवन फिर बैठे छाली।।
कीड़ी मेलै ईंड, चिड़ी रेत में नहावै।
कांसी कामन दौड़, आभौ लील रंग लावै।।
डेडरो डहक बाडां चढै, बिसहर चड बैठे बड़ां।
पांडिया जोतिस झूठा पड़ै, घन बरसै इतरा गुणां।।
बारिश के लिए इस संबंध में विचार जरूर कीजिएगा, हो सकता है कि ये लक्षण देखकर आप अाश्‍वस्‍त हो जाएं।

बारिश के अनुमान कैसे कैसे ?
श्री कृष्ण जुगनू
बारिश, एक जरूरत, एक अहम आवश्‍यकता। जल ही जीवन है, हमारे शास्‍त्रों में जल के 100 पर्यायवाची मिल जाते हैंं, मगर इसका विकल्‍प एक भी नहीं, सच है न।
इस बारिश का पूर्वाभास करने के लिए हमारे पुरखों ने कई कयास लगाए हैं। उस दौर में जबकि न मौसम विज्ञान जैसे यंत्र होते थे न ही कोई आज जैसा अध्‍ययन था। मगर, जो अनुमान तय किए, वे आज भी लोक विज्ञान के अंग के रूप में सामने हैं और अनपढ़ जैसे देहाती भी बारिश के लिए पूर्वानुमान लगाते देखे जा सकते हैं।

इन अनुमानों के आधार पर हमारे यहां समय-पठन की परंपरा रही। देवस्‍थानों से लेकर सूर्य मन्दिरों तक भी वर्षफल, आषाढ़ी तौल, ध्‍वज परीक्षण परिणाम आदि का फलाफल सुनाया जाता था। हमारे कृषि पराशर, मयूरचित्रम्, गार्गीसंहिता, गुरुसंहिता, संवत्‍सर फलम्, कादम्बिनी जैसे कई ग्रंथों में इस पर विस्‍तार से विवरण मिल जाता है। वराहमिहिर कृत बृहत्‍संहिता में तो इस पर विस्‍तार से विमर्श हैं।

अब टीटोडी या टीडभांड नामक पक्षी को ही देख लीजिए, जो जितने अंडे देता है, उनको किसी ऊपरी स्‍थान पर दिया है अथवा नीचे इस आधार पर अतिवृष्टि और अत्‍यल्‍प वृष्टि के रूप में परिणाम बताने वाला समझा जाता है। बेचारी टींटोडी क्‍या जानती है कि अंडों के आधार पर लोग बारिश का परिणाम देखेंगे, मगर क्‍या वह यह जानती हैं कि यदि उसके अंडों वाली जगह पर जलभरण हुआ तो उसके अंडों से बाहर आने वाले चूजों का क्‍या होगा ?

परिन्‍दों की गतिविधियां आज भी वैज्ञानिकों के लिए कुतूहल का विषय बनी हुई हैं।
यही नहीं, उन अंडों के मुख ऊपर हैं या नींचे, इस आधार पर बारिश के महीनों को बताया जाता है। यदि चार अंडों में से दो के मुख ऊपर की ओर है तो दो माह बारिश होगी, तीन के मुख ऊपर है तो तीन माह और चारों के ही मुख ऊपर हैं तो चौमासा पूरा ही बरसेगा, मगर नीचे होने पर…. मालूम नहीं ये सच है या नहीं मगर लोकविज्ञान आज भी अपनी जगह है…।

कृषि पुराण – कहावतों में कृषि व वृष्टि की विद्या

घाघ भड्डरी सहित नहीं, भड्डली पुराण, डाक वचनार, डाक विद्या जैसे देशज कहावत कोशों में कृषि, संंवत्‍सर और वृष्टि, बाजार भाव आदि का पूर्वानुमान मिलता है। इनको ज्‍योतिष के ग्रंथ कहा जाता है जबकि मूलत: ये लोकश्रुतियों और जनमान्‍यताओं पर ही आधारित हैं। इन्‍हीं देशज कहावतों को गर्ग, गार्गि, वराहमिहिर, भोज, काश्‍यप आदि ने अपने ग्रंथों में श्‍लोकबद्ध किया है। इनके पठन-पाठन की सुदीर्घ परंपरा रही है।
लोकमान्‍यताओं का अपना आलोक होता है। राजस्‍थान में ऐसी कहावतें सैकड़ों सालों से कण्‍ठ कोश पर विद्यमान रही हैं। यहां भड्डली पुराण की प्रतिलिपियां मिलती हैं, संवत्‍सर फलं की पांडुलिपियां मिलती हैं। आदरणीय श्री मनोहर सिंहजी राठौड़ ने इस संबंध में एक महत्‍वपूर्ण कृति का संपादन किया है। इसमें जल ही जीवन, वायु से वर्षा विचार, नक्षत्र विचार, बिजली से वर्षा ज्ञान, वर्षा गर्भ समय, हलसोतिया शकुन विचार, डंक भड्डली, डंक भड्डली की कहावतें, पंडित माघजी, बारह मास विचार, औजार और अन्‍य साधन, कृषि कहावतें एवं पहेलियां, ऊंटों से संबंधी प्रमुख शब्‍द, हाड़ौती की कृषि कहावतें, खेती बाड़ी संबंधी पहेलियां, फसलों के रोग और कीट तथा अकाल का पूर्वानुमान… जैसे कई विषय आए हैं। राठौड़जी ने सचित्र अपने विषयों को स्‍पष्‍ट किया है।
मेरा ये सौभाग्‍य रहा कि इस विषय पर एक विस्‍तृत भूमिका लिखने का अवसर मिला जिसमें मैंने भारतीय वृष्टि विज्ञान की धारणा और उसकी पृष्‍ठभूमि को रेखांकित करने का परिश्रम किया है। यह कृति किसानों ही नहीं, भाषा शास्त्रियों व वृष्टि विज्ञान के अध्‍येताओं के लिए भी उपयोगी है। भाई श्री गोविंदलाल सिंह (सुभद्रा पब्लिशर्स एंड डिस्‍ट्रीब्‍यूटर्स, डी 48, गली नंबर 3, दयालपुर, करावलनगर रोड, दिल्‍ली 110094 का धन्‍यवाद कि इस दौर में यह महत्‍वपूर्ण ग्रंथ प्रकाशित किया और कण्‍ठ कोश को सुरक्षा दी है।
✍🏻श्रीकृष्ण जुगनू की पोस्टों से संग्रहित

कृषि, मौसमविज्ञान और कवि घाघ
लेखिका :- मंजू श्री,
लेखिका कवियित्री तथा साहित्यकार हैं।

मनुष्य के जीने के लिए प्रकृति ने जो संसाधन उपलब्ध कराये हैं, उसे उसने अपने ढंग से कृषि के रूप में विकसित तो किया, किन्तु निर्भर रहा उस अदृश्य पर जिसे उसने ईश्वर नाम दिया। जीविका के लिए प्रकृति या मौसम सहायक है, वहीं वह आदमी को असहाय भी कर देती है। उदाहरणस्वरूप समय से वर्षा न होना या असमय वर्षा होना दोनों खेती के लिये हानिकारक हैं। वर्षा के साथ साथ खेती कब की जाये और खेती करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिये, इस विषय में घाघ ने बहुत सी जानकारियां दी हैं। खेती और मौसम के सम्बंध को न जानने के कारण जो विषम हालात उत्पन्न होते हैं, उन विषम हालात का हल ढूँढने का काम लोक कवि एवं सिद्ध ज्योतिषी घाघराम दूबे ने किया है। उसकी कुछ बानिगी देखें –

असनी गलिया अन्त् विनासै, गली रेवती जल को नासे।
भरनी नासे तृनौ सहूतौ, कृतिका बरसै अंत बहुतौ।।
घाघ कहते हैं – यदि चैत्र के अश्विनी नक्षत्र में बरसा हो गई तो बरसात में सूखा पड़ेगा। रेवती में बरसा हुई तो आगे नहीं होगी, भरणी में वर्षा हुई तो तृण का भी नास हो जाएगा, लेकिन अगर कृतिका में पानी हुआ तो अंत तक अच्छी बरसात होगी।

असुनी गल, भरनी गल, गलियो जेष्ठाहमूर।
पूरबा आषाढा़ धूल, कित उपजै सातो तूर।।
अर्थात अगर वर्षा अश्विनी, भरणी एवं मूल नक्षत्र में हो गई और पूर्व आषाढ़ में नहीं भी हुई तब भी सातो प्रकार के अन्न होंगे।

अद्रा बरसै पुनर्वसजाय, दीन अन्न कोऊ नहीं खाय।
मतलब यह कि अगर आद्रा से पुनर्वस तक पानी बरसता रह जाए तो उसमे उपजे अनाज को नहीं खाना चाहिए, क्योंकि वह विषाक्त हो जाता है।
सावन पहली पंचमी गरभे उदेभान, बरखा होगी अति घनी, उँचो जान धान।
अर्थात सावन कृष्णर पंचमी को यदि सूर्योदय बादलों के बीच हो तो उस वर्ष खूब बारिश होगी और धान की फसल भी अच्छीक होगी।

साँझे धनुष सकारे मोरा, ये दोनो पानी के बौरा।
यानी संध्यारकाल में इंद्रधनुष दिखे और प्रात:काल में मोर बोले तो निश्च य ही पानी बरसेगा।

खेती पाती बिनती औ घोड़े की तंग, अपने हाथ सवाँरिये लाख लोग हों संग।
अपनी जीविका, किसी को चिठ्ठीष लिखना, प्रार्थना करना और घोड़े की जीन कसना अपने हाथ से करना चाहिए, चाहे आपके संग लाखों लोग क्योंी न हों।

उत्तम खेती आप सेती, मध्यलम भाई, निकृष्टन खेती चाकर सेती जो आई सोआई ।
कोई भी काम जब हम स्व यं करेगें तो अपनी सम्पूीर्ण क्षमता से करेगें, भाई करेगा पर हमारे मन से कम ही कर पाएगा और यदि नौकर से कराएंगे तो तय है कि निम्न स्तणरीय ही होगा।

आकर कोदो नीम जवा, गाडर गेंहूँ , बेर चना।
जिस साल आकर यानी मदार खूब खिले, तब समझें उस वर्ष कोदो की फसल अच्छीन होगी, नीम फूले-फले तो जौ की पैदावार अच्छीख होगी, खस घास खूब होगी तो तय है कि गेहूँ की रेकॉर्ड तोड़ फसल होगी तथा जब बेर की फसल भरपूर होती है, तब चना भी भरपूर होता है।

आस पास रबी बीच में खरीफ, नोन मिर्च डाल के खा गया हरीफ।
चारों ओर रबी की फसल लगी हो और अगर बीच में कोई खरीफ की फसल लगा दे तो फसलों के शत्रु कीड़े मकोड़े फसल को चट कर जाएगें।

आधा खेत बटाई देके, उँची दीह किआरी। जो तोरलरिका भूखे मरिहे, घघवे दीह गारी।
अगर खेत है पर संगहा नहीं तो किसान को आधा खेत बटाई देना चाहिए और आधे खेत में ऊँची क्याँरी बाँध कर खेती करनी चाहिए। इससे अन्नख-व्यएवस्थां ठीक न हो जाए तो घाघ को भरपूर गरियाना।

इतवारी करै धनवंतरी हो, सोम करे सेवाफल होए।
बुध बियफैसुक्रे भरे बखार, सनि मंगल बीज न आवेद्वोर।
खेती आरम्भभ करते हुए घाघ कहते हैं जो किसान रविवार को खेती का शुभारंम्भ करता है, वह धनवान होगा, सोमवार को करेगा तो मेहनत का फल मिलेगा और बुध, बृहस्पाति और शुक्रवार को कार्य आरंम्भक करने पर बखार भर जाएगा, किन्तु शनिवार, मंगलवार को शुरू की गई खेती पर शुरु करने वाले का बीज भी लौट कर नहीं आता।

ऊँख करै सब कोई, जो बीच में जेठ न होई।
गन्नेभ की खेती सभी कर लेते अगर साल के बीच में जेठ का जलता महिना न होता।

उर्द मोथी की खेती करिहौं, कुँडिय़ाँ फोर उसर मेधरिहौ।
उड़द और मोथ उसर खेत में करना चाहिए।

कपास चुनाई, खेत खनाई।
कपास के फूल चुनने और खेत कोडऩे से लाभ होता है।

कामिनी गरभ औ खेती पकी,ये दोनों हैं दुर्बल बदी।
गर्भवती स्री और तैयार फसल नाजुक होते हैं।

खेती तो थोड़ी करे मेहनत करे सवाय, राम करै वही मानुष को टोटा कभी न आए।
भले खेती कम हो पर भरपूर मेहनत करने वाले को कभी कमी नहीं होती।

गेंहूँभवा काहे आसाढ़ के दो बाहे, गेंहूँभवा काहें, सोलह बाहे नौ गाहे।
आषाढ़ मास में खेत की भली-भाँति जोताई हुई गेंहूँ की अच्छी उपज के लिए खेत की सोलह बार जोताई और नौ बार हेंगाई हुई अर्थात् खेत की मिट्टी् आटे के समान कर दी गई।

कातिक मास रात हर जोतौ, टाँग पसारे घर मतसूतौ।
कार्तिक महीना किसान के लिए परिश्रम का महीना है, इसमें उसे रात दिन मेहनत करना चाहिए, घर में पैर फैला के आराम नहीं फरमाना चाहिए।

गहिर न जोते बोवे धान, सो घर कोठिला भरै किसान।
अर्थात् धान के खेत की जोताई हल्की करनी चाहिए, तभी उपज बढिय़ा होती है

चिरैया में चीर फार, असरैखा में टार-टार, मघा में काँदो सार।
पुष्या नक्षत्र में खेत की हल्की जुताई कर धान लगा देने पर फसल अच्छी होती है, अश्लेषा में खूब जुताई करनी होती है और यदि मघा नक्षत्र में रोपाई करनी है तो जोताई और खाद देना पड़ेगा, तब धान होगा।

उपरोक्त उदाहरणों से हम समझ सकते हैं कि घाघ का साहित्य सागर है जो एक से बढ़ एक मोतियों से भरा है, चाहे मौसम की बात हो, चाहे समाज जीवन या जीने की कला की, खानपान या पशुधन की, सबके बारे में उनका निर्देश अकाट्य है। इस प्रकार के अनगिनत आख्यान घाघ के दोहों में मिलते हैं जिनमें अधिकांश कृषि और पर्यावरण के सम्बंधों को जोडते हैं। साफ है कि घाघ के दोहों का समुचित उपयोग कृषि को और लाभकारी बना सकता है।
✍🏻साभार
भारतीय धरोहर

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