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राजनीति

क्या कह रही है राजस्थान की राजनीति ?

समयानुसार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा दलबदल कानून में संतुलन की सख्त जरूरत है

—डॉo सत्यवान सौरभ,
हाल ही में राजस्थान में बिगड़ते राजनीतिक संकट के बीच राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष द्वारा बागी विधायकों को ‘दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता नोटिस जारी किया गया है। इसको लेकर बागी काॅन्ग्रेसी नेता सचिन पायलट और 18 अन्य असंतुष्ट विधायकों ने अयोग्यता नोटिस को उच्च न्यायालय में चुनौती दी है। मामले पर बागी विधायकों का तर्क है विधानसभा के बाहर कुछ नेताओं के निर्णयों और नीतियों से असहमत होने के आधार पर उन्हें संसदीय ‘दलबदल विरोधी कानून’ के तहत अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता है,ऐसा करना गलत है।

मामला ये है कि राजस्थान के कांग्रेसी उपमुख्यमंत्री सहित कॉंग्रेस के कुछ बागी विधायक हाल ही में ‘काॅन्ग्रेस विधायक दल की बैठकों में बार-बार निमंत्रण देने के बावज़ूद शामिल नहीं हुए थे। इसके बाद राज्य में पार्टी के मुख्य सचेतक की अपील पर विधानसभा अध्यक्ष द्वारा इन विधायकों को अयोग्यता संबंधी नोटिस जारी किया गया है।

जवाब में बागी विधायकों ने अपनी रिट याचिका में नोटिस को रद्द करने की मांग करते हुए तर्क दिया है कि उनके द्वारा सदन की सदस्यता का त्याग नहीं किया गया है, अत: ‘दल बदल विरोधी कानून’ का उन पर प्रयोग नहीं किया जा सकता। और न ही बैठकों में शामिल न होने में विफल रहने के आधार पर उन्हें दल बदल विरोधी कानून के तहत उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है।

बागी विधायकों के द्वारा रिट याचिका ‘राजस्थान विधानसभा सदस्यों की वैधता (पार्टी बदलने के आधार पर अयोग्यता) नियम’, 1989 और संविधान की दसवीं अनुसूची के क्लॉज़ 2(1)(a) को चुनौती देने के लिये दायर की गई है। जो कहता है कि स्वेच्छा से एक राजनीतिक पार्टी की सदस्यता का त्याग करने पर सदस्य दलबदल कानून के तहत अयोग्यता के लिये उत्तरदायी होगा।

वैसे 10वीं अनुसूची पर बहस बार-बार होती रही है। इसके चैप्टर 2 का पार्ट 1 (ए) कहता है कि सदन में किसी भी दल का सदस्य अयोग्य करार दिया जा सकता है यदि वह स्वेच्छा से वह पार्टी से अपनी सदस्यता छोड़ देता है। कांग्रेस के कानूनी सलाहकारों एवं सत्तापक्ष का मानना है कि विधायक दल की बैठक में शामिल नहीं होना (पायलट ने पार्टी व्हिप को नजरअंदाज करते हुए कांग्रेस विधायक दल की दो बैठकों का बहिष्कार किया) स्वेच्छा से सदस्यता छोड़ने जैसा है, लेकिन कई एक्सपर्ट इससे सहमत नहीं हैं।

पिछले कुछ सालों में देश भर में इस तरह के कई हाई-प्रोफाइल केस में दलबदल विरोधी कानून पर खूब बहस हई है। 2016 में उत्तराखंड में 9 कांग्रेस विधायकों ने पाला बदला, बीजेपी विधायक दल ने बहुमत का दावा किया। राज्यपाल केके पॉल ने निर्धारित समय में कांग्रेस को बहुमत साबित करने को कहा। और वहां कांग्रेस के विरोध के बाद राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। आगे चलकर कांग्रेस ने इसका कोर्ट में विरोध किया।

दसवीं अनुसूची को 1985 में 52 वें संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान में डाला गया था। जिसमे कहा गया है कि विधायकों को सदन के किसी अन्य सदस्य द्वारा याचिका पर आधारित विधायिका के पीठासीन अधिकारी द्वारा दलबदल के आधार पर अयोग्य ठहराया जा सकता है। दलबदल के आधार पर अयोग्यता के रूप में प्रश्न पर निर्णय ऐसे सदन के अध्यक्ष या अध्यक्ष का निर्णय अंतिम होता है। ये कानून संसद और राज्य विधानसभाओं दोनों पर लागू होता है।

यदि किसी राजनीतिक दल से संबंधित सदन का सदस्य स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है, या अपने राजनीतिक दल के निर्देशों के विपरीत, वोट नहीं देता है या विधायिका में वोट नहीं करता है। और यदि सदस्य ने पूर्व अनुमति ले ली है, या इस तरह के मतदान या परहेज से 15 दिनों के भीतर पार्टी द्वारा निंदा की जाती है, तो सदस्य को अयोग्य घोषित नहीं किया जाएगा।

लेकिन विधायक कुछ परिस्थितियों में अयोग्यता के जोखिम के बिना अपनी पार्टी को बदल सकते हैं। कानून एक पार्टी के साथ या किसी अन्य पार्टी में विलय करने की अनुमति देता है, बशर्ते कि कम से कम दो-तिहाई विधायक विलय के पक्ष में हों। ऐसे परिदृश्य में, न तो वे सदस्य जो विलय का निर्णय लेते हैं, और न ही मूल पार्टी के साथ रहने वालों को अयोग्यता का सामना करना पड़ेगा।

इसके अलावा ये भी कहा गया है कि पीठासीन अधिकारी का निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन नहीं है। 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने इस शर्त को समाप्त कर दिया, जिससे उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय में पीठासीन अधिकारी के फैसले के खिलाफ अपील की गई। हालाँकि, यह माना गया कि जब तक पीठासीन अधिकारी अपना आदेश नहीं देता तब तक कोई न्यायिक हस्तक्षेप नहीं हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने 21 जनवरी 2020 के आदेश में अयोग्यता के निर्णय के लिए उचित समय अवधि के बारे कई बातें कही जब तक कि “असाधारण परिस्थितियां” नहीं हो तो दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता याचिकाएं तीन महीने के भीतर तय की जानी चाहिए एक उचित समय अवधि के भीतर स्पीकर द्वारा निर्णय देने में विफलता अदालत को अयोग्यता मामले में हस्तक्षेप करने के लिए मजबूर कर सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने ने अयोग्यता याचिका पर फैसला करने के लिए संसद से स्वतंत्र और स्थायी निकाय पर विचार करने के लिए कहा, जिसके लिए संविधान में संशोधन की आवश्यकता है। ये भी कहा गया कि हम भारत की संसदीय प्रणाली के क्षरण की गहरी चुनौती का सामना कर रहे हैं, इसलिए, संस्थागत सुधारों से परे, हमें एक नैतिक राजनीति की एक लोकप्रिय अभिव्यक्ति की भी आवश्यकता है जो जनता को ऐसे राजनीतिक पैंतरेबाजी से दूर करने का कारण बनता है।

वैसे देखा जाए तो पार्टी निष्ठा सरकार को स्थिरता प्रदान करती है। यह सुनिश्चित करता है कि उम्मीदवार पार्टी के साथ ही नागरिकों के लिए भी उसके प्रति वफादार रहें। पार्टी के अनुशासन को बढ़ावा देता है। विरोधी दलबदल के प्रावधानों को आकर्षित किए बिना राजनीतिक दलों के विलय की सुविधा राजनीतिक स्तर पर भ्रष्टाचार को कम करने की उम्मीद है। एक सदस्य के खिलाफ दंडात्मक उपायों के लिए प्रदान करता है जो एक पार्टी से दूसरे में दोष करता है।

ऐसे में एक ही राजनीतिक दल के सदस्यों द्वारा असमान स्थिति या मनमुटाव की एक सार्वजनिक छवि को राजनीतिक परंपरा में वांछनीय स्थिति के रूप में नहीं देखा जाता है। हालाँकि जब सरकार के गठन में अनेक राजनीतिक दल शामिल होते हैं तो वहाँ दलों के बीच मनमुटाव को उचित ठहराया जा सकता है।

ऐसे समय में जब भारत की रैंक ‘नवीनतम लोकतंत्र सूचकांक’ (2019) में बुरी तरह गिर गई है, आज हमारी संसद से यह अपेक्षा की जाती है कि वह इन सबको को सुधारने और मज़बूत करने के लिये कदम उठाए। समयानुसार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा दलबदल कानून में संतुलन बनाए रखने के लिये कानून में आवश्यक बदलाव किये जाने की पुरजोर आवश्यकता है।

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