Categories
धर्म-अध्यात्म

आत्मा का जन्म मृत्यु और पुनर्जन्म का सिद्धांत सत्य सिद्धांत है

ओ३म्
===========
मनुष्य एक चेतन प्राणी है। चेतन प्राणी होने से प्रत्येक मनुष्य व इतर प्राणियों के शरीर में एक जैसी आत्मा का वास होता है। यह आत्मा अनादि, नित्य, अविनाशी, अजर व अमर सत्ता है। इसका आकार अत्यन्त सूक्ष्म एवं आंखों से न देखे जा सकने योग्य होता है। आत्मा से भी सूक्ष्म परमात्मा वा ईश्वर है। प्रकृति से सूक्ष्म ईश्वर व जीवात्मा होते हैं। यह तीनों पदार्थ अनादि, नित्य एवं अविनाशी है। इनका कभी निर्माण व उत्पत्ति नहीं हुई। यह इस ब्रह्माण्ड में सदा से हैं और सदा रहेंगे। परमात्मा चेतन है, सर्वज्ञ है एवं सर्वशक्तिमान है। यह निष्क्रिय सत्ता नहीं है। आत्मा भी चेतन, अनादि, एकदेशी, ससीम, जन्म-मरण धर्मा, पाप व पुण्य कर्मों को करने वाली तथा ईश्वर की व्यवस्था से अपने किये कर्मों का फल भोगने वाली सत्ता है। मनुष्य योनि में जीवात्मा जो पाप व पुण्य कर्म करता है, उन्हीं का सुख व दुःखरुपी फल भोगने के लिए ही परमात्मा सृष्टि की रचना, पालन व प्रलय करते हैं तथा प्रलय के बाद पुनः सृष्टि की रचना करते हैं। सृष्टि की रचना, पालन व प्रलय का क्रम अनादि काल से ही चला आ रहा है और इसी प्रकार से सदैव चलता रहेगा। यह सिद्धान्त ईश्वरीय ज्ञान वेदों में निहित व पोषित होने से सर्वथा सत्य है। सृष्टि के आदि काल से हमारे ऋषि, मुनि, योगी व ध्यानी जन ईश्वर का साक्षात्कार कर इस सत्य सिद्धान्त का प्रत्यक्ष करते आये हैं। वैदिक ग्रन्थों का स्वाध्याय करने से भी जिज्ञासु व पाठकों को यह सिद्धान्त सर्वथा सत्य, तर्क व युक्तिसंगत प्रतीत होता है। वर्तमान से लगभग 195 वर्ष पूर्व जन्में ऋषि व योगी महर्षि दयानन्द सरस्वती ने भी इस सिद्धान्त की परीक्षा की व इसे सत्य पाया। उन्होंने इस सिद्धान्त का अपने सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ एवं अन्यत्र भी पोषण किया है। जो मनुष्य इस सिद्धान्त को मानते हैं वह जीवन में मोक्ष मार्ग के पथिक बनकर आत्मा व सद्कर्मों के कर्माशय में वृद्धि करते हैं। उनका कल्याण होता है। उनका परजन्म उत्तम परिवेश व मनुष्यों की देव योनि में होता है। वैदिक सिद्धान्तों का पालन करते हुए वह मोक्ष को प्राप्त होते हैं और जन्म मरण से होने वाले दुःखों से छूट जाते हैं। सत्यार्थप्रकाश संसार का सबसे उपयेागी एवं महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। सभी मनुष्यों को सभी प्रकार के अज्ञान व भ्रमों से ऊपर उठकर इस ग्रन्थ का अध्ययन कर अपनी अविद्या दूर करनी चाहिये और सृष्टि में विद्यमान सत्य सिद्धान्तों को जानना चाहिये जिससे उनकी आत्मा का कल्याण हो।

आत्मा अनादि व नित्य है और परमात्मा भी ऐसा ही है। अनादि होने से आत्मा अनादि काल से विद्यमान है। परमात्मा भी सभी जीवों व प्रकृति सहित इस ब्रह्माण्ड में विद्यमान है। परमात्मा सृष्टिकर्ता एवं जीवों को उनके पूर्वजन्मों के कर्मानुसार सुख व दुःख का भोग कराता है। जो लोग पुनर्जन्म को नहीं मानते उनसे यह प्रश्न होता है कि अनादि काल से आत्मा व परमात्मा क्या निठल्ले थे जो आत्मा का जन्म व पुनर्जन्म नहीं हो रहा था। इस सृष्टि को बने हुए भी लगभग 2 अरब वर्ष बीत चुके हैं। इस अवधि में सभी अनन्त आत्मायें विभिन्न योनियों में जन्म लेती आ रही हैं और कुछ काल बाद सबकी मृत्यु हो जाती है। सृष्टि में जन्म-मृत्यु और जन्म व पुनर्जन्म का सिद्धान्त सतत चल रहा है। अब प्रश्न उठता है कि जो जीवात्मा मनुष्य अथवा अन्य प्राणी योनियों में जन्म लेता है, वह आता कहां से है? क्या आत्मा उत्पत्ति धर्मा है? आत्मा उत्पत्ति धर्मा नहीं है अपितु यह अनादि, नित्य, अविनाशी व अमर सत्ता है। कोई मनुष्य, वैज्ञानिक, किसी मत व सम्प्रदाय का विद्वान अथवा आचार्य आत्मा को उत्पत्ति धर्मा सिद्ध नहीं कर सकता। इससे अनादि काल से विद्यमान जीवात्मा का जन्म होना सिद्ध होता है क्योंकि य सिद्धान्त ईश्वर के शक्तिमान व सृष्टिकर्ता होने तथा जीवों को जन्म देने के सिद्धान्त के अनुरूप है। संसार में किसी के पास इस बात का प्रमाण नहीं है कि जिस आत्मा का जन्म होता है, क्या उसका जन्म से पूर्व अभाव़ होता है। यदि आत्मा की सत्ता थी तो क्या वह निष्क्रिय थी और अचानक उसका जन्म हो गया। यह विचार व मान्यता अपुष्ट एवं अस्वीकार्य है। आत्मा थी तो उसका जन्म अवश्य रहा होगा और उसकी मृत्यु हुई होगी। आत्मा की उत्पत्ति नहीं होती। यह सनातन व शाश्वत है। यही सिद्धान्त तर्क एवं युक्ति संगत है। अतः अनादि व अविनाशी आत्मा का जन्म व मरण और मृत्यु के बाद पुनर्जन्म होता रहता है व सदैव होता रहेगा। यह सिद्धान्त सत्य व पुष्ट है।

आत्मा का पुनर्जन्म होता है, इसके अनेक प्रमाण हैं। यदि आत्मा का पहली बार जन्म होता तो सभी योनियों के प्राणियों के गुण, कर्म, स्वभाव, शरीर की आकृति, परिमाण, भार व ऊंचाईं सबकी समान अवस्थाओं में समान होनी चाहिये थी। ऐसा नहीं होता। एक ही परिवार में जन्म लेने वाले बच्चे गुण, कर्म, स्वभाव में एक दूसरे से भिन्न देखे जाते हैं। एक बलिष्ठ होता है तो एक दुर्बल। एक साहसी होता है तो दूसरा डरपोक। एक तीव्र बुद्धि व स्मरण शक्ति लेकर जन्म लेता है तो दूसरा इसके विपरीत निर्बुद्धि व कमजोर स्मरण शक्ति वाला होता है। एक अध्यापक बनना चाहता है, तो एक सरकार कर्मचारी। कोई इंजीनियर तो कोई डाक्टर आदि। इन सब बातों से आत्मा का पूर्वजन्म व पुराने संस्कार व सबकी भिन्न भिन्न परिस्थितियां व परिवेशों का होना सिद्ध होता है। ऋषि दयानन्द के सभी भाई बहिनों के गुण, कर्म व स्वभाव व जीवन पर दृष्टि डालें तो सभी ऋषि दयानन्द के समान विद्वान, बुद्धिमान, धार्मिक, ज्ञानी व साहसी नहीं थे। कोई अल्पायु का शिकार हो गया तो एक बहिन ने अपने अन्य भाई बहिनों से अधिक आयु प्राप्त की। इस सबका कारण उनका प्रारब्ध वा पूर्व जन्म के कर्म ही सिद्ध होते हैं जिनका फल भोगने व मुक्ति की प्राप्ति के लिये प्रयत्न करने के लिए परमेश्वर उनको वेदाध्ययन कर शुभ कर्म करने का अवसर देता है। अनादि काल से ऐसा ही होता आ रहा है। एक ही परिवार में भाई बहिनों की भिन्न भिन्न रुचि व स्वभाव तथा ज्ञान प्राप्ति की क्षमता व आचरण में अन्तर पूर्वजन्म व प्रारब्ध के कारण से ही होता है। इसका अन्य कोई तर्कयुक्त कारण कोई नहीं बता सकता।

हम इस सृष्टि को अपने नेत्रों से देखते हैं तथा इसकी उपस्थिति व अस्तित्व को स्वीकार भी करते हैं। हम विचार नहीं करते कि इस सृष्टि को किसने व क्यों बनाया है? विस्तृत अध्ययन व चिन्तन के बाद जो अकाट्य तथ्य सामने आते हैं वह यहीं हैं कि संसार में ईश्वर, जीव तथा प्रकृति का अस्तित्व है जो अनादि व नित्य है। ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकर, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, अनादि, अनुपम, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी एवं सर्वाधार सत्ता है। ईश्वर सृष्टिकर्ता भी है। वह प्रकृति नाम की अनादि सत्ता से सृष्टि को पूर्वकल्प के समान बनाती व सृष्टि का पालन करती है। ईश्वर का प्रयोजन यह है कि वह जीवों के कल्याण तथा उनके पूर्वजन्म व पूर्वकल्पों के अवशिष्ट कर्मों का फल देने के लिये सृष्टि को बनाते व पालन करते हैं। यह सिद्धान्त वेद, वैदिक शास्त्र तथा ऋषि, मुनियों सहित तर्क एवं युक्ति से भी सिद्ध है। अनादि काल से सृष्टि की रचना, पालन व प्रलय का क्रम जारी है। जीव भी जन्म लेते आ रहे हैं। सृष्टि की प्रलय व उत्पत्ति को ज्ञान व विज्ञान भी स्वीकार करता है। सृष्टि में उत्पत्ति व नाश का सिद्धान्त लागू होता है। सिद्धान्त है कि जिसकी उत्पत्ति होती है उसका नाश भी अवश्य होता है और जिसका नाश होता है उसकी उत्पत्ति भी अवश्य होती है। इसी प्रकार से आत्मा का मनुष्य आदि अनेक योनियों में जन्म होता है तथा कालान्तर में मृत्यु भी होती है। मृत्यु के बाद कर्मों का फल भोगने के लिये पुनर्जन्म होना भी अवश्यम्भावी है अन्यथा ईश्वर की व्यवस्था जिसका वर्णन वेदों में है, भंग होती है। ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि सृष्टि में ईश्वर की कर्म-फल व्यवस्था वेद के विपरीत हो व वैदिक सिद्धान्त भंग होते हों।

अतः ईश्वर जीवों के कर्मों का फल देने के लिये सृष्टि को बनाते तथा मुक्ति पर्यन्त जीवों को जन्म व उसके कर्मों का सुख व दुःख रूपी फल देते रहते हैं। वेदों का पुनर्जन्म का यह सिद्धान्त शाश्वत सत्य है। सभी मत-मतान्तरों के लोगों को पुनर्जन्म के सत्य सिद्धान्त को स्वीकार करना चाहिये। इसी में सबका हित है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
hititbet giriş
betgaranti giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
hititbet giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Tuzla İpek Kirpik
hititbet giriş
hititbet
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
Hititbet
Hititbet Güncel Giriş
Hititbet Yeni Giriş
Hititbet Resmi Gİriş
betnano
betyap giriş
hititbet giriş
betnano
betnano
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
hititbet
hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti
betgaranti güncel giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
betnano
betnano
betkom giriş
hitbet giriş
hitbet giriş
betbox giriş
betbox giriş
betpas giriş
betpas giriş
betkom giriş
betpas giriş
betpark giriş
betpark giriş
casibom giriş
casibom giriş
casibom giriş
jojobet
jojobet
hititbet
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
hititbet
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti güncel giriş
holiganbet giriş
holiganbet resmi giriş
betpark giriş
betkom giriş
betkom resmi giriş
jojobet
jojobet
betkom giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
betgaranti güncel giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş