Categories
भारतीय संस्कृति

कुछ भ्रांतियां और उनके निवारण

भ्रान्ति है कि महर्षि अगस्त्य ने तीन आचमनों में समुद्र का पान कर लिया था ।
ब्रहमचर्य की रक्षा करने वाले महर्षि अगस्त्य तीन आचमनों में समुद्र पार करने वाले बने।
महर्षि सनत कुमार ने नारद मुनि को बताया कि ब्रहमचर्य वह होता है जो समुंद्र के समुंद्र को पान का लेता है।
वह तीन आचमन कौन से हैं ?

ज्ञान, कर्म, उपासना।
यह तीन प्रकार की विद्या इनको त्रिविद्या भी कहते हैं, इनका पान करने से समझो संसार रूपी समुंद्र को पान कर लेना होता है अर्थात संसार को समुद्र की खाड़ी समझकर त्याग देना है। जिज्ञासु को महर्षि अगस्त्य ने 3 प्रकार की विद्या को धारण करते हुए इस संसार रूपी से समुद्र ( जो हमें दृष्टिगोचर हो रहा है ) से पार हो गए। इसको खारी बनाकर त्याग दिया था।
जैसी लोमश मुनि ने जीवन भर ब्रहमचर्य की रक्षा की, अंत में दीर्घायु वाले बनें। मोक्ष को प्राप्त किया।

राजा इंद्र के विषय में व्याप्त भ्रान्ति

इंद्र एक उपाधि है। 101 यज्ञ करने वाले राजा को इंद्र की उपाधि मिलती थी। अतः भ्रमित नहीं होना चाहिए क्योंकि इंद्र बहुत कालों में मिलते हैं। इंद्र ज्ञान को भी कहते हैं। इंद्र मेघ को भी कहते हैं। इंद्र वायु को भी कहते हैं।

बकासुर के विषय में व्याप्त भ्रान्ति

दुष्ट विचारों का नाम भी बकासुर है। जब तुच्छ विचार हमारी सोच पर छा जातें हैं अर्थात हमारी वाणी (वाक) पर आसुरी शक्तियां छा जाती हैं और हम वाणी से अनुचित ,अधर्म और अन्याय करते हैं ,
तब ज्ञान रुपी देवता इंद्र व दुष्ट विचारों का जो संग्राम जो हमारे शरीर में होता है उसे ही इंद्र व बकासुर-संग्राम कहते हैं।
उस समय हम इंद्र रूपी ज्ञान का आवाहन करते हैं कि हे देव ! आ और इस पापी बकासुर से संग्राम करके इसको शांत कर।
उस समय हम ज्ञान का मंथन करते हैं और ज्ञानरुपी इंद्र को अपने भीतर धारण करते हैं तथा इससे बकासुर शांत हो जाता है अर्थात पाप शांत जाता है।
उपरोक्त के अतिरिक्त जब हम इंद्र की याचना करके और वर्षा करने के लिए प्रार्थना करते हैं तब वायु (इंद्र) अपने प्राण रुपी वज्रों से मेघ के ऊपर आक्रमण करता है और मेघ को छिन्न – भिन्न करके वर्षा कराता है ।बकासुर शांत हो जाना ही हमारे लिए शांतिदायक है। क्योंकि वाणी में छाया हुआ पाप एवं वृष्टि न होना, दोनों ही अशांति के कारण बनते हैं। यही इंद्र वका सुर-संग्राम है।
अब आते हैं समुद्र मंथन पर । समुद्र मंथन क्या है ? क्या-क्या मिला था समुद्र मंथन से ? किस-किस ने मथा था समुद्र को ? देव और देत्य कौन हैं ? समुद्र मंथन की उस क्रिया से किस – किस को क्या प्राप्त हुआ था ? क्या इसमें भी कहीं आत्मा और परमात्मा का रहस्य छिपा है ?
अब उपरोक्त सभी बिंदुओं पर विचार करते हैं।
वास्तव में यह एक अलंकारिक भाषा है। जिसमें यह कहा जाता है कि देव और दैत्यों ने समुद्र का मंथन किया और मंथन के पश्चात 14 रत्न निकले।
कछुआ को आप जानते हैं जिसको संस्कृत में कच्छ कहते हैं और कच्छ परमात्मा को भी कहते हैं । क्योंकि परमात्मा अपनी पीठ पर सारी पृथ्वी व सृष्टि को धारण किए हुए है।
श्रृंग ऋषि ने महानंद मुनि को बताया कि जब सृष्टि प्रारंभ हुई तो समुद्र का मंथन किया। जब हिरण्याक्ष दैत्य आए । पृथ्वी को अपने में धारण कर लिया तो यहां देवता पहुंचे । उन दैत्यों से संग्राम किया। हिरण्याक्ष को नष्ट करके कुछ अंतरिक्ष में पहुंचा दिया, कुछ मृत्युलोक में पहुंचा दिया और कुछ लोक लोकांतरों में पहुंचा दिया। यह देखो समुद्र मंथन है।
मानव जब अपने संकल्पों को प्रदीप्त करता है और उसमें से रत्नों की खोज करता है तो वह भी समुद्र मंथन हैं। मानव के द्वारा कौन से रत्न हैं , जिनकी खोज करनी चाहिए।
महाराजा कृष्ण षोडस कलाओं के ज्ञाता थे। मानव के हृदय में पांच प्राण होते हैं। पांच कर्मेंद्रिय पांच ज्ञानेंद्रियां और एक मन। यह सब 16 कला होती हैं।
योगेश्वर कृष्ण ने इन सब विषयों को जाना और मन को स्थिर करके उन रत्नों की खोज की जो परमात्मा ने सृष्टि के प्रारंभ में समुद्र मंथन करके महान विकास कर दिया ।
प्रश्न आता है कि भी रतन थे या नहीं थे ? यदि नहीं थे तो कहां से आए ?
इससे प्रतीत होता है कि जब परमात्मा इस शून्य प्रकृति को अपनी प्राण रूपी सत्ता देता है तो यह महान निकलने लगती है । यह अपना प्रकाश देने लगती है ।उस समय धीरे-धीरे यह संसार रच जाता है ।परमात्मा ने अपना महत्व देकर 14 रत्न इस पृथ्वी से निकाले ।यह है परमात्मा का मंथन ।समुद्र कहते हैं कि प्रकृति को। जिसका कोई पार नहीं। यह मंथन किसके लिए किया ?
जैसे माता का बालक है। गौ दूध देती है ।माता दुग्ध की क्रिया बनाती है । क्रिया बना करके उस दुग्ध का मंथन करके उसमें से घृत निकाल लेती है ।वह माता किसके लिए निकाल लेती है ? वह जो उसका परिवार उसके द्वारा है । वह घृत को अपने बालक को अर्पण कर देती है। ऐसे ही परमात्मा इस महान प्रकृति का मंथन अपने बालक आत्मा के लिए करता है।
परमात्मा ने अपने महान बालक आत्मा के लिए समुद्र का मंथन किया । 14 रत्न निकाले जो मानव के लिए महत्व दायक है।
परमात्मा ने श्याम वरण घोड़े को निकाला। महान धेनु को निकाला। यह सत्य है। जितने भी तत्व हैं यह सब महान प्रकृति से आए हैं। जैसे सूर्य है, चंद्रमा है, कामधेनु हैं ,अग्नि है, वरुण है, यह सब प्रकृति के मंथन से आए हैं।
धेनु माता को भी कहते हैं और गौ को भी कहते हैं। पृथ्वी को भी गौ कहा जाता है। पृथ्वी को मंथन करके परमात्मा ने स्थिर किया। श्याम वरण अग्नि व सूर्य को कहा जाता है।
परमात्मा ने इन सबको प्रकृति से निकाला । माता बहनों को उत्पन्न किया । जिससे संसार की उत्पत्ति होती है ।परमात्मा ने 14 रत्नों को निकाला।
परंतु जब परमात्मा ने इतने विशाल समुद्र को अर्थात प्रकृति को हमारे लिए मंथन किया तो आज हमारा कर्तव्य है कि हम परमात्मा के मंथन किए हुए संसार रूपी समुद्र से पार हो जाएं और पार होकर परमात्मा की गोद में चले जाएं। यह हमारा प्राथमिक कर्तव्य है।
इसके लिए भी हमको अपने आपको मथना पड़ेगा। प्रभु की शरण में जाकर उसकी गोद में बैठकर अपने दुष्ट विकारों और विकारों को दूर करना होगा । उस परमपिता परमेश्वर की कृपा का अनुभव करते हुए उसके साथ सामंजस्य बैठाना होगा। उसको अपने हृदय में देखकर उसी की आज्ञा का पालन करते हुए अपने जीवनव्रतों का निर्धारण करना होगा। जब जीवन में इस प्रकार के मंथन की प्रक्रिया आरंभ हो जाती है तो दैत्य या राक्षस पराजित होने लगते हैं और देवताओं की विजय होने लगती है। कहने का अभिप्राय है कि ऐसी स्थिति को प्राप्त होकर मनुष्य के भीतर सद्प्रवृत्तियों का विकास होता है और दुष्ट प्रवृत्तियों का विनाश होता है । जब इस प्रकार की स्थिति आ जाती है तो भक्त की भक्ति परवान चढ़कर बोलने लगती है और जीवन ध्येय स्पष्ट हो जाता है।

देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन : उगता भारत

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
hititbet giriş
betgaranti giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
hititbet giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Tuzla İpek Kirpik
hititbet giriş
hititbet
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
Hititbet
Hititbet Güncel Giriş
Hititbet Yeni Giriş
Hititbet Resmi Gİriş
betyap giriş
hititbet giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
hititbet
hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti
betgaranti güncel giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
betkom giriş
hitbet giriş
hitbet giriş
betbox giriş
betbox giriş
betpas giriş
betpas giriş
betkom giriş
betpas giriş
betpark giriş
betpark giriş
hititbet
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
hititbet
betgaranti giriş
betgaranti güncel giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betgaranti güncel giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
xslot giriş
betpark giriş
jojobet giriş
jojobet giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vdcasino
vdcasino
vdcasino
vdcasino
hititbet giriş
meritbet
meritbet
kolaybet giriş
betkom giriş
betgaranti giriş
betpark giriş