गुरुकुल पौंधा देहरादून की हमारी यात्रा विषयक कुछ बातें

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ओ३म्

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कल शनिवार दिनांक 11-7-2020 को हम अपने एक वरिष्ठ स्थानीय मित्र कर्नल रामकुमार आर्य जी के साथ गुरुकुल पौंधा भ्रमण के लिये गये। कल गुरुकुल के आचार्य डा. धनंजय आर्य जी का जन्म दिवस भी था। इस दृष्टि से हमारा कल जाना अधिक सार्थक रहा। हमने आचार्य जी को जन्म दिवस की बधाई दी। उनके साथ तथा गुरुकुल के आचार्य डा. यज्ञवीर, आचार्य शिवकुमार वेदि तथा आचार्य शिवदेव आर्य जी से भी बातें हुई। गुरुकुल उन्नति के पथ पर अग्रसर है। इस वर्ष कोरोना रोग के कारण नये बच्चे प्रविष्ट नहीं किये जा सके हैं। अन्य बच्चों का अध्ययन सामान्य रूप से चल रहा है। प्रतिदिन अपरान्ह 4.30 बजे व्याकरण की आनलाइन क्लास भी होती है जिसका लाभ लोग अपने घरों पर बैठे हुए प्राप्त करते हैं। गुरुकुल को अपने पुराने व नये अनेक स्नातकों का सहयोग प्राप्त है। यह स्नातक सभी प्रकार से गुरुकुल की सहायता करने के लिये तत्पर रहते हैं।

कल आचार्य धनंजय जी ने हमें गुरुकुल पुस्तकालय का नया कक्ष भी दिखाया। इससे पूर्व यह कक्ष किसी दूसरे हाल में था। छत पुरानी होने के कारण उसमें वर्षा के कारण नमी आ गई थी जिससे पुस्तकों को हानि होने का भय था। गुरुकुल का अपना विशाल पुस्तकालय है। आचार्य धनंजय जी इसे वैदिक ज्ञान व ग्रन्थों का एक सर्वसुलभ पुस्तकालय बनाने के लिये तत्परता से कार्य कर रहे हैं। उनका कहना है कि वह चाहते हैं कि किसी भी वैदिक विषय पर शोध करने वाले छात्रों को यहां आकर उनके शोध की प्रचुर सामग्री यहां उपलब्ध हो जाये जिससे उनका शोध कार्य तेजी से आगे बढ़े व पूरा हो। आचार्य जी जिस बात को ठान लेते हैं उसे पूरा करके ही आराम करते हैं। हम विश्वास करते हैं कि आचार्य जी का यह स्वप्न शीघ्र ही अवश्य पूरा होगा। आचार्य जी ने हमें पुराने पुस्तकालय कक्ष की जीर्ण हुई छत भी दिखाई। उस पर अब एक वृहद टीन सेड बनाकर वहां सूटिंग रेंज बनाने का प्रस्ताव है। कार्य आरम्भ हो चुका है एवं तेजी से प्रगति कर रहा है। कुछ ही दिनों में अति व्यय साध्य इस कार्य को दानि महानुभाव सहयोगियों के सहयोग से पूरा कर लिया जायेगा, ऐसी हम आशा करते हैं।

कल पुस्तकालय का निरीक्षण करते हुए आचार्य जी ने हमें बताया कि वह आर्यसमाज के पुराने विद्वान आचार्य भूदेव शास्त्री, देहरादून का समस्त साहित्य गुरुकुल में ले जायें हैं। आचार्य भूदेव जी गुरुकुल महाविद्यालय, ज्वालापुर में पं. प्रकाशवीर शास्त्री जी के सहपाठी रहे थे। उनके संग्रह में पं. प्रकाशवीर शास्त्री जी, सांसद का पं. भूदेव शास्त्री जी को 57 वर्ष पूर्व सन् 1963 का लिखा एक पत्र भी मिला। इस पत्र में पं. प्रकाशवीर शास्त्री जी ने लिखा हैः-

‘‘प्रेषक प्रकाशवीर शास्त्री, सदस्य लोकसभा, फोन 48706- 1, केनिंग लेन, नई दिल्लीः दिनांक 19-11-63 –

माननीय (भूदेव) शास्त्री जी, सादर नमस्ते। आपने प्रोत्साहन के लिये जो आशीर्वाद के शब्द लिखे हैं उसके लिये मैं हृदय से आपका आभारी हूं। बचपन से ही आपका वरद-हस्त मेरी पीठ पर रहा है। आशा है भविष्य में भी यह कृपा यथावत् बनी रहेगी। अपने सम्बन्ध में आपने नहीं लिखा कि आजकल क्या विशेष गतिविधि चल रही हैं। उनसे भी सूचित कर सकें तो अच्छा हो। भवदीय, ह./- प्रकाशवीर शास्त्री—”

इस पत्र से इन दोनों विभूतियों की मित्रता एवं परस्पर प्रेमपूर्ण सम्बन्धों पर प्रकाश पड़ता है। हम देहरादून में रहते हैं। हमने कुछ मित्रों से कई बार भूदेव शास्त्री जी का नाम सुना। वह यदाकदा आर्यसमाज लक्ष्मण चैक में आया भी करते थे परन्तु हमें कभी उनके दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ। यदि हमें उनकी विद्वता एवं महत्ताओं का पूरा ज्ञान होता तो हम प्रयत्न कर उनके निवास वा समाज में दर्शन करने अवश्य जाते। कल आचार्य डा. धनंजय जी ने बताया कि अब उनका पुत्र शास्त्री जी के निवास पर रहता है। देहरादून के आर्य पुराहित पं. वेदवसु जी उनसे मिलते रहते हैं। वही आचार्य धनंजय जी को भूदेव शास्त्री जी के पुत्र से मिलाने ले गये थे। पं. भूदेव शास्त्री जी का अति संक्षिप्त विवरण भी हमें प्राप्त हुआ है। इसे बाद मं् अलग से प्रस्तुत करेंगे।

कल दिन का भोजन हमने गुरुकुल में ही किया। आचार्य धनंजय जी, अन्य आचार्य शिवकुमार वेदि तथा आचार्य शिवदेव आर्य जी सहित कर्नल रामकुमार आर्य जी के साथ भोजन कर हमें अत्यन्त आनन्द का अनुभव हुआ। कर्नल साहब ने गुरुकुल में अपने लिये एक कुटिया व कक्ष बनाया हुआ है। भोजन के बाद हमने इस कक्ष में विश्राम किया। बीच में ब्रह्मचारी हमें जल व चाय आदि देने आते रहे। हमने कुछ ब्रह्मचारियों से बातचीत भी की। दो ब्रह्मचारियों का हमने विवरण भी प्राप्त किया। पहले ब्रह्मचारी विभुं थे। यह 13 वर्ष की वय के हैं तथा बदायुं के रहने वाले हैं। यह कक्षा 8 उत्तीर्ण कर गुरुकुल पौंधा में आये हैं। इस समय यह कक्षा 10 में पढ़ रहे हैं। आपकी एक बड़ी बहिन चोटीपुरा कन्या गुरुकुल में पढ़ती है। आपके पिता श्री अनुपम शर्मा व्यवसाय से वकील हैं। माता श्रीमती पल्लवी शर्मा एक अध्यापिका हैं। इस बालक की सूटिंग/निशानेबाजी में रुचि है। गायन, कला, पेंटिग आदि में भी इसकी रुचि है। इस बालक से बातें करके हमें बहुत अच्छा लगा। हमने उसे कुछ प्रेरणायें भी की। हम आशा करते हैं कि यह बच्चा आगे चलकर वैदिक धर्म का पालन करते हुए उसके प्रचार प्रसार में कुछ योगदान करेगा।

दूसरा बालक वंश था। इसकी वर्तमान वय 13 वर्ष की है। यह उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले का रहने वाला है। इसकी दो बड़ी बहनें शालू एवं अंजलि भी हैं। शालू 12वी पास है तथा अंजलि ने कक्षा 10 उत्तीर्ण की है। इस बालक के पिता श्री रामपाल सिंह अध्यापक हैं। माता कविता देवी एक गृहणी हैं। बालक की शूटिंग में रुचि है। उसने बताया कि संस्कृत पढ़कर संस्कृत का विद्वान बनने के लिये भी वह प्रयत्न करेगा। इस बालक को भी कर्नल रामकुमार आर्य तथा हमनें कुछ प्रेरक बातें कहीं। इन दोनों व अन्य सभी बालकों को गुरुकुल में अपने परिवार से दूर देखते हैं तो हमें इन बच्चों पर गर्व होता है। इन्होंने अपने मातृ-पितृ स्नेह को छोड़कर गुरुकुल में वेदांगों का अध्ययन कर अपने जीवन को सफल बनाने में लगे हुए हैं। ईश्वर इन्हें विद्यादान कर योग्य विद्वान बनाये, यह हमारी भावना है। इन सब बच्चों के माता-पिता भी धन्य है जिन्होंने अपने इन छोटे बच्चों को अपने से दूर कर गुरुकुल में जीवन निर्माण के लिये भेजा है। बच्चों से दूरी का अहसास व कष्टपूर्ण अनुभूति तो वह करते ही होंगे। यह इसलिये भी होती होगी क्योंकि आजकल समाज में बच्चों को अपने से दूर भेजने का महौल नहीं है। इस प्रकार की अनुभूतियां भी हमें गुरुकुल में इन बच्चों से संवाद करते हुए हुईं।

इस प्रकार लगभग 5.00 बजे सायं तक गुरुकुल में रुक कर हम अपने निवास पर लौट आये। हम समझते हैं कि हमारी यह यात्रा उपयोगी एवं सार्थक रही। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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