Categories
भारतीय संस्कृति

किए हुए कर्म का फल तो भोगना ही पड़ता है : कृष्ण दत्त ब्रह्मचारी के प्रवचनों के आधार पर

मुनिवरो ! यह सत्य युग के काल का समय है।हमारे गुरु ब्रह्मा वेद के प्रकांड पंडित और विद्या के भंडार थे l मुनिवर देखो ! उनका महान से सिर मंडल भी था उनके एक पुत्र महा सृष्टु मुनि महाराज थे।
मुनि वरो! एक समय महा सृष्टू मुनि महाराज अपनी तुंबा नाम की धर्मपत्नी के साथ एक स्थान पर विराजमान थे। उन दोनों के हृदय में एक भावना उत्पन्न हुई कि हमारे कोई पुत्र होना चाहिए ।परंतु पुत्र तेजस्वी हो। हमारे पिता ब्रह्मा ने कहा है कि तुम दोनों को जितने समय की अवधि दी है ब्रह्मचर्य का पालन करो और तपस्या करो । दोनों एकांत स्थान में वेदों को विचारते रहते थे , उन्होंने अपने पिता को कंठ किया ।उनके पिता ब्रह्मा उनके समक्ष आ पहुंचे। उस समय दोनों ने निवेदन किया “महाराज अब हम एक पुत्र चाहते हैं ” – उस समय उन्होंने आज्ञा दी कि तुम अवश्य पुत्र उत्पन्न करो।

मुनि वरों ! उस समय हमने सुना है कि उनके आदेशानुकूल महा सृष्टु मुनि महाराज ने “यज्ञाति यजं ते “यज्ञ किया ,भजन किया ।वेदों का स्वाध्याय किया और उसी के अनुकूल गर्भ स्थल की स्थापना की। आगे बेटा , यह संसार चलता रहा। कुछ समय के पश्चात तुंबा नाम की धर्मपत्नी से पुत्र उत्पन्न हुआ। उस बालक का जन्म संस्कार के पश्चात नामकरण संस्कार किया । सृष्ट् मुनि महाराज ने अपने बालक का नाम कुत्री मुनि नियुक्त कर दिया।
बाल्यकाल से ही पति और पत्नी दोनों उसे इतने उच्च वातावरण में शिक्षा दिया करते थे कि वह वेदों का प्रकांड विद्वान बन गया। बेटा !देखो जब वह 25 वर्ष का आदित्य ब्रहमचारी बन गया उस समय उसने अपने माता-पिता से निवेदन किया कि मुझे आज्ञा दो, मेरी इच्छा है कि मैं इस समय देखो “ब्रह्मे वर्चो अस्ती ब्राजनोती देतम योगस्ते शुभ :योगा भावनाय यस्तम” परमपिता परमात्मा की उपासना करना चाहता हूं जिससे मेरे जीवन का विकास हो। मैं उस आध्यात्मिक विज्ञान को खोजना चाहता हूं , जिसको हमारे गुरु ब्रह्मा आदि सब आचार्य खोजते चले आए हैं।
उस समय बेटा ! जब उनके माता-पिता ने उसके अंतःकरण की यह वार्ता सुनी तो वह प्रसन्न हो गए और प्रसन्न होकर के आज्ञा दी “बेटा! तुम्हें धन्य हैं। हमारे कैसे सौभाग्य हैं जो ऐसा पुत्र उत्पन्न हुआ जो अपनी मृत्यु को विजय पाने की सोच रहा है ।पुत्र जैसी तुम्हारी इच्छा है वैसा कार्य करो और उसके अनुकूल अपने जीवन को ऊंचा बनाओ।”
उस समय वह बालक माता पिता की आज्ञा पाकर के बहते हुए वह करूड़ मुनि महाराज के समक्ष जा पहुंचे। करूड मुनि महाराज ने उनका बड़ा ऊंचा सत्कार किया और कहा आनंद हो ब्रह्मचारी जी। उस समय कहा महाराज आनंद है। “क्या तुम्हारे पिता भी आनंद हैं। उस समय कहा विशेष आनंद है ।”जब सब आनंद पूर्वक वार्ता कह सुनाई तब बालक वहां से बहते हुए अगले स्थान पर जा पहुंचे। जहां बेटा! महर्षि सुदक्षमुनी महाराज त्वकेतु मुनि महाराज और अमरोती मुनि महाराज विराजमान थे ।
ऋषियों के मध्य में जाकर उनके चरणों को स्पर्श किया और स्पर्श करते हुए आनंदपूर्वक वार्ता उच्चारण की। ऋषियों ने भी जान लिया कि यह तो सरष्टू मुनि महाराज का बालक है, ब्रह्मचारी है और ऋषि बनने के लिए जा रहा है।
मुनिवरो! वहां से आज्ञा लेकर अगले स्थान पर जा पहुंचे । जहां कार्तिक मुनि महाराज रहा करते थे। जहां बेटा ! अंबेतू ऋषि ,अकेतू मुनि महाराज, अंगिरा आदि आचार्य वहां विराजमान थे ।अकेतू मुनि महाराज ने उनका बड़ा ऊंचा सत्कार किया।
मुनिवरो !वह काल कितना ऊंचा था , जिस समय बुद्धिमानों का इतना सत्कार होता था। बुद्धिमान होने के नाते जिस ऋषि के स्थान पर जाते थे , ऋषि उनका ऊंचा सत्कार किया करते थे।
वहां से आज्ञा लेकर बहते हुए अगले स्थान पर जहां देखो कपिल मुनि महाराज, मधेतू ऋषि महाराज, गंगकेतू ऋषि, प्राची मुनि महाराज और द्रूगनी और ऋण वनती ऋषि महाराज और भी आदि आदि ऋषि विराजमान थे। लोमश मुनि भी विराजमान थे। दार्शनिक विषय हो रहा था । उस दार्शनिक समाज में जाकर उन्होंने सबको नमस्कार किया। आनंदपूर्वक सबने उनका सत्कार किया। महर्षि लोमश ने कहा “कहिए भगवन !आप कहां से विराज रहे हैं ?” उस समय उन्होंने कहा मैं तो भगवन! आप ऋषियों के दर्शन करने के लिए आ रहा हूं। दर्शन कर आनंदित हो जाऊंगा।
तब लोमश मुनि ने कहा “अरे तुम कहां जा रहे हो यहां तो दार्शनिक विषय हो रहा है , यह तो बड़ा गूढ़ विषय है।” वह दार्शनिक समाज में विराजमान हो गए,। नारद मुनि महाराज भी वहां थे ।उस समय दार्शनिक समाज में यह निर्णय किया जा रहा था कि जब एक कल्प समाप्त हो जाता है उसके पश्चात ब्रह्मा का एक दिवस माना जाता है ।यह इस प्रकार क्यों है? ब्रह्मा किस पदार्थ का नाम है ? ब्रह्मा कोई मानव है या ब्रह्मा कोई बुद्धिमान है ? या ब्रह्मा परमात्मा को कहते हैं ?
लोमश मुनि ने निर्णय किया कि वह जो ब्रह्मा का दिवस है वह ब्रह्मा की आयु है । वह 100 कल्प के पश्चात मानी गई है। ब्रह्मा की जितनी आयु है इतनी आयु तक यह परमात्मा के गर्भ में आनंद लेता है। बेटा! इसका विषय तो कल उच्चारण करेंगे , आज समय नहीं।
देखो ।यह ऋषि बालक उस दार्शनिक समाज से आज्ञा पाकर के बहते भए शौनक ऋषि महाराज के समक्ष आ पहुंचे। शौनक मुनि ने उस ऋषि बालक का बड़ा ऊंचा सत्कार किया।
तो बेटा !जब तक उस ऋषि बालक के हृदय में कोई प्रेरणा नहीं हुई। वह बहते रहे और अंत में सोमभाव ऋषि के द्वार जा पहुंचे। वहां पहुंचकर प्रेरणा हुई कि जिस मंतव्य के लिए मै भ्रमण कर रहा हूं अभी तक पूर्ण नहीं हुआ ।मुझे ज्ञात ही नहीं रहा ।मुझे तो कोई गुरु धारण करना चाहिए। गुरु बना करके अपने जीवन को ऊंचा बनाना चाहिए।
उस समय देखो शंभू मुनि महाराज से कहा महाराज ! आप मार्ग में रहते हैं , आपका बड़ा ऊंचा स्थान है। यहां कोई ऐसा ऋषि है जो गुरु योग्य है जो हमें ऊंचा मार्ग दिखा देवे।

कुत्री मुनि द्वारा गुरु वरण एवं तप

उस समय उन्होंने कहा :-” ऐसा ऋषि तो है परंतु हमें ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे आप जिज्ञासु नहीं हैं।”
उस समय बालक ने कहा “महाराज मैं तो बड़ा जिज्ञासु हूं , आप मुझे निर्णय तो करें।”
उन्होंने कहा” यहां से चले जाओ। देखो वहाँ ब्रह्मा के शिष्य रहते हैं , जिनको श्रृंग्यादि कहते हैं। उनके स्थान पर चले जाओ ।वह तुम्हारा सत्कार करेंगे और वह तुम्हें ऊंचे पद पर पहुंचा देंगे।” उस समय ऋषि बालक ने कहा कि उनमें क्या विशेषता है ? वह इस योग्य क्यों हैं ?
उस समय कहा” हमने तो ऐसा सुना है कि आज 84 वर्ष हो गए हैं उन्होंने मिथ्या उच्चारण नहीं किया है, सत्यवादी हैं । द्वितीय वाक्य यह है कि उन्होंने अपनी आत्मा का परमात्मा से मेल करा दिया है ।वह गुरु के योग्य हैं उन्हें गुरु क्यों नहीं बनाते।”
बेटा !यह वार्ता उस बालक के आंगन में आ गई। वह वहां से बहता भया इस आत्मा के समक्ष जा पहुंचा। उसका बड़ा ऊंचा सत्कार हुआ,उपहार में बड़े पदार्थ दिए ।वह ब्रह्मचारी था। ब्रह्मचारी का सत्कार करना प्रत्येक मानव का कर्तव्य है। ऋषि ने बेटा ! उनका सत्कार किया ।सत्कार के पश्चात वह बालक प्रसन्न हो गया और मन में उन्हें गुरु चुन लिया।
इस आत्मा ने भी गुरु के नाते उस बालक को शिक्षा देनी प्रारंभ कर दी। शिक्षा देने लगे, योगाभ्यास की निधि पर निधि देने लगे ।यह तो नए प्रतीत मानव का कैसा तुच्छ समय आ करके मानव को नष्ट भ्रष्ट कर देता है ।उस समय वह बालक किसी कार्य में अधूरा था। बालक ने कहा हे भगवन! अब मुझे आज्ञा दीजिए मैं तपस्या करने के लिए तत्पर हो रहा हूं ।मैंने बहुत योगाभ्यास किया है आज मैं उस महानता को पाना चाहता हूं जिस महानता से हमारे आदि ऋषियों ने महान विज्ञान को पाया है , आज मैं वही जाना चाहता हूं।
उस समय देखो इस आत्मा ने कहा “अरे बालक !अभी तू इस योग्य नहीं हुआ है जो तू इतनी पूर्ण निधि पर पहुंच जाएगा।”
उस समय बेटा वह गुरु की आज्ञा को नष्ट करके बहते भये कदली बन में जाकर के समाधि में लय होंगे। योगाभ्यास के नाते केवल आयु (वायु) के अधीन रहकर ऐसा सुना है कि बेटा ! उन्होंने 250 वर्ष की समाधि की। बेटा गणना के अनुकूल वह 250 वर्ष की समाधि के पश्चात भी तपस्या करता रहा। करते-करते उसे 250 वर्ष से भी कुछ अधिक वर्ष हो गए। जब अधिक वर्ष हो चुके तो मुनिवरो !यहां यह निधि मानी जाती है। जब योग में महान इस प्रकार आरूढ़ हो जाता है , उस समय बेटा ! समाधि जागृत करने के लिए ऋषि वर नियुक्त रहते हैं ।वहां देखो आदि गुरु ब्रह्मा ने अपने पुत्र सृष्टू मुनि महाराज को नियुक्त किया कि जाओ वह बालक अपनी तपस्या में आरूढ़ हो रहा है। बेटा,!
उन्होंने अपने योग बल से उस बालक की तपस्या को जाना। बेटा !उसके अंतःकरण में वह जागृत थी , उसके योग की स्थिति शुद्ध हो गई।

गुरु श्रृंगी ऋषि जी के समक्ष वार्ता

उस समय क्या करें बेटा !उस बालक को अभिमान हो गया कि मैंने सभी पदार्थों को विजय कर लिया। वह वहां से बहते हुए सकेतू ऋषि महाराज के समक्ष पहुंचे ।सकेतु ऋषि ने कहा “कहिए आपकी तपस्या में क्या सफलता हुई ।आपने तो बड़ा ही योगरूढ़ किया है।”
उस समय उन्होंने कहा ‘देखा मेरे गुरु ने ऐसा कहा था कि तू पूर्ण निधि पर पहुंचने के योग्य नहीं , परंतु मुझे तो आज प्रतीत होता है जैसे मैंने अपने गुरु ब्रह्मा के पद को और अपने गुरु के पद को क्या मैंने तो तीनों लोकों को विजय कर लिया है ।’उस समय जब बालक को यह अभिमान हो गया तो अन्य ऋषियों के समक्ष पहुंचे।
बेटा ! सृष्टूं मुनि के समक्ष पहुंचे । सृष्टू मुनि ने कहा अरे बालक क्या रहा तुम्हारी तपस्या में ?
मुनिवरो !उस समय उसने पिता को पिता न जानकर अभिमान में कहा है :- ” पिता तूने क्या तपस्या की है, आज जो मैंने की है। आज मैंने तीनों लोकों को विजय कर लिया है। तीनों लोकों का स्वामी बन चुका हूं।’
तो मुनिवरों! जब बालक को यह अभिमान छा गया आगे चलते गए आदि आदि विषयों से संबंध किया। और सभी ऋषियों से यह अहंकारदायक वाक्य कहा और उन्हें ठुकरा देता था। मुनिवरो ! वह इतना महान तुच्छ बन गया ,उसका किया हुआ परिश्रम सब समाप्त हो गया। अंत में बहते हुए वह विभांडक ऋषि के द्वार जा पहुंचे। उनसे भी वही अहंकारदायक वाक्य कहे। उस समय बेटा! विभांडक ऋषि ने कहा अरे तुम्हारे गुरु कौन है ?
उन्होंने कहा ‘मेरे गुरु श्रृंगादि हैं ।मुझे उनकी शिक्षा है।’
उस समय कहा ‘अरे तुम्हारे गुरु तो बड़े ब्राह्मण हैं , वह तो सत्यवादी हैं। उनसे यह अहंकारमय वाक्य उच्चारण न कर देना। यदि तुमने उच्चारण किया तो हमें प्रतीत होता है जैसे तुम्हें मृत्युदंड प्राप्त हो जाएगा।’
उस समय उस बालक ने कहा’ – अरे नहीं क्या उच्चारण कर रहे हो ‘उन्हें अपने पदों से ठुकराने लगे।
अंत में मुनिवरो वह स्वयं ब्रह्मणात्मा के समक्ष आ पहुंचे ।उन्होंने प्रश्न किया “अरे कहो बालक !तुम्हारी तपस्या में क्या प्रबलता हुई ।”

उस समय कहा’ मैंने तो तीनों लोको को विजय कर लिया है। अंतरिक्ष , द्यूलोक , मृत्युलोक और अपने गुरु पद को प्राप्त कर लिया है ।आप तो यह ही कहते थे कि क्या तपस्या कर पाओगे ? भगवन! मैंने तीनों लोको को विजय कर लिया है।’
“अच्छा”
क्या करें बेटा !जब न पता कौन-कौन से कर्मों का जब भोग आता है तो मानव की बुद्धि उसी प्रकार हो जाती है ।बेटा! उस बालक की यह भावना पाकर और योग द्वारा उसके अंतःकरण को जानकर कि उसकी मृत्यु निकट आ गई है। उसी के अनुकूल उन्होंने अपने मुखारविंद से यह कहा कि “अरे तुच्छ ऋषि के बालक ! तुझे इतना बड़ा अभिमान, जा मृत्यु को प्राप्त हो जा।”
उस समय बेटा ! वह बालक मृत्यु को प्राप्त हो गया। बेटा ! तुम यह प्रश्न करोगे कि क्या परमात्मा के नियम के प्रतिकूल मृत्युदंड मिल जाता है ? इसका उत्तर यह है कि जब समय आता है तो समय के अनुकूल ही ऐसा वाक्य कहा जाता है।

आदि गुरु ब्रह्मा जी द्वारा शाप

जब मृत्युदंड प्राप्त हो गया तो ‘त्राहिमाम त्राहिमाम’ मच गई । ऋषियों में हाहाकार मच गया ।अरे !यह क्या हुआ ? ऋषि का बालक, ऐसा तपस्वी मृत्यु को प्राप्त हो गया। उस समय ब्रह्मा आचार्य ऋषि मंडल को ले करके क्रोध में छाए हुए वहां जा पहुंचे और कहा “अरे तुच्छ बालक! तूने एक ऋषि के बालक को नष्ट कर दिया। जब तुम इतने बुद्धिमान थे तो तुमने उसको यथार्थ शिक्षा क्यों न दी ?
शिक्षा देकर उसको ऊंचे मार्ग पर चलाते ।परंतु तुमने मृत्यु का दंड दे दिया। आज तुम्हें भी इन कर्मों का फल भोगना पड़ेगा ।जन्म जन्मांतर की वार्ता तो यह है कि तुम सूक्ष्म शरीर द्वारा जैसे और भी लोक़ हैं उन सब में जन्म पाते हुए सतयुग, त्रेता और द्वापर सब ही काल को देखो। परंतु जिस समय कलयुग के 5200 वर्ष व्यतीत हो जाएंगे उस समय तुम्हारा एक अज्ञान गृह में जन्म होगा। यह तुच्छ जन्म हो करके जितनी भी तुम्हारी ज्ञान निधि है, यह तुम्हारे समक्ष न रहेगी। वह समाप्त हो जाएगी ।शरीर में अज्ञानता छा जाएगी। आकृति बहुत ही तुच्छ बन जाएगी। परंतु एक महान अवस्था आकर के जिसको हमारी योगियों ने देखो समाधि अवस्था भी कहा है , जिसको बहकड़ी वाणी भी कहते हैं,जिसको प्राण अवस्था भी कहते हैं। शरीर की ऐसी गति बन करके उस शरीर में आत्मा का उत्थान हो करके अंतरिक्ष मंडल में जहां सूक्ष्म शरीर वाली महान आत्माओं के सत्संग के द्वारा उस शरीर द्वारा तुम्हारी आकाशवाणी मृत मंडल में पहुंचेगी ।
वह कार्य इतना तुच्छ होगा कि उस काल में कोई तुम्हें तुच्छ कहेगा, कोई पाखंडी कहेगा, कोई किसी प्रकार से पुकारेगा, तुम्हें यह कर्म भोगना पड़ेगा।
तो आज मुनिवरों ! तुम्हें प्रतीत हो गया होगा कि आज वह काल है जिस काल में हम लाखों वर्ष पूर्व किए गए कर्मों को भोग रहे हैं। बेटा ! तुम्हें ज्ञात हो गया होगा कि वह आज हमारा किया हुआ कर्म है जो बेटा ! एक ऋषि बालक को दंड देकर मृत्यु को प्राप्त कराकर आज हम अवस्था को पा रहे हैं।
बेटा !अब तुम यह प्रश्न करोगे कि महान आत्मा शाप नहीं देती, गुरु ब्रह्मा ने शाप दिया तो गुरु ब्रह्मा भी महान पाप के भागी बन गये।
मूनिवरो ! देखो इसका उत्तर यह है कि मानव का शाप क्या है ? वह तो कर्मों का वशीभूत होना है और कर्म में बंधना है किसी प्रकार की बन जाओ। ऐसा वेदों का वाक्य है , ऐसा हमारे आचार्यों ने कहा है ।शाप वह देता है जिसकी महान आत्मा होती है परंतु वह देता किसको है ? वह उसके अंतःकरण को जान लेता है। किसी अज्ञानी को शाप देता है तो उस ज्ञानी का आत्मिक बल सूक्ष्म बन जाता है । जो बेटा ! ज्ञानी सब कुछ जानता हुआ जिस कार्य को कर देता है उसको बेटा ! अच्छी प्रकार दंड देना चाहिए ।उसमें कोई हानि नहीं होती , क्योंकि वह तो दंड देना है। हमारे गुरु जी ने हमें दंड दिया।

पूज्य पाद गुरुदेव से निवेदन

उस समय गुरुजी ने यह भी कहा था कि उस काल में तुम्हें गुरु भी प्राप्त नहीं होगा। उस समय गुरु से निवेदन किया और कहा भगवन !हमारा कल्याण कैसे होगा ? जब हम अपने सूर्य मंडलों को त्याग कर मृत मंडल में जन्म पाएंगे और जन्म धारण करके हमें महान योगाभ्यासी अमृत गुरु प्राप्त न होगा तो जीवन कैसे बनेगा ?
तो उस समय गुरु ने प्रसन्न होकर कहा” जाओ! जब तुम्हारे उस शरीर की 50 वर्ष की अवस्था हो जाएगी उस समय तुम्हें कोई ब्राह्मणी आत्मा प्राप्त हो जाएगी।
बेटा ! कई समय से तुम्हारा प्रश्न चल रहा था आज तुम्हें उसका उत्तर मिल गया। आज हम लाखों वर्ष पूर्व किए हुए कर्मों को भोग रहे हैं ।और भोगते रहेंगे जब तक अवधि है।
यह है बेटा! आज का हमारा व्याख्यान।आज के व्याख्यान का अभिप्राय है कि मानव को शुभ कार्य करने चाहिए जिससे मानव ऊंचा बने और मानव का विकास हो।
मुनिवर देखो! क्या करें , हमने तो विचारा भी बहुत परंतु गुरु का अपमान न सह सके वह उल्टा ही पड़ गया ,हमें भोगना पड़ गया। समय की प्रबलता मानव पर जब समय कठिन आता है, तो शुभ कार्य भीअशुभ बन जाता है उसकी रूपरेखा ही अशुभ बन जाती है। क्या करें बेटा !संसार की गति को। गुरु का अपमान, कि गुरु को जीत लिया हम सह न सके और उसको मृत्युदंड दे दिया। उसकी उल्टी रूपरेखा बनकर के लाखों वर्षों का किया हुआ कर्म आज भोगा जा रहा है। यह परमात्मा की कैसी विचित्रता है ? जिसमें ऐसे – ऐसे कर्मों के फल भी मानव को भोगने पड़ते हैं।

देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन : उगता भारत

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking güncel giriş
betnano güncel giriş
betnano güncel giriş
betnano giriş
meritking giriş
meritbet giriş
meritbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
pokerklas
pokerklas
vdcasino
pokerklas
pokerklas
betnano giriş
betasus giriş
pokerklas
pokerklas giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
hititbet
hititbet
vdcasino giriş
pokerklas giriş
maritbet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
maritbet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betpas giriş
betpas giriş
favorisen giriş
favorisen giriş
norabahis giriş
norabahis
norabahis giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
betpark
betpark
betpark giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino
vdcasino
meybet
meybet
harbiwin giriş
betnano giriş
norabahis
favorisen giriş
favorisen giriş
favorisen giriş
meybet
norabahis giriş
norabahis giriş
favorisen giriş
favorisen giriş
hazbet giriş
hazbet giriş
maritbet giriş
maritbet
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
hititbet
hititbet
vdcasino
vdcasino
hititbet giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
hititbet giriş
hititbet
hititbet giriş
hititbet giriş
vdcasino
vdcasino
betnano giriş
betoffice giriş
betoffice giriş
hititbet
hititbet
betpark giriş
betpark
betpark
norabahis giriş
norabahis giriş
betpark giriş
hititbet giriş
kavbet giriş
kavbet
norabahis giriş
norabahis giriş
betpark giriş
vdcasino
vdcasino
timebet giriş
meybet giriş
timebet giriş
meybet giriş
bettilt
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
kavbet giriş
kavbet giriş
betpark giriş
bettilt
norabahis giriş
norabahis
betnano giriş
betnano giriş
bettilt
norabahis giriş
norabahis giriş
bettilt
norabahis giriş
bettilt
hitbet giriş
betbox giriş
betbox giriş
grandpashabet giriş
ganobet giriş
ganobet giriş
bettilt giriş
hitbet giriş
betoffice giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
extrabet giriş
extrabet giriş
betoffice giriş
betcio giriş
betcio giriş
meritbet giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş