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भारतीय संस्कृति

आगे आगे देखिए होता है क्या ?

जमाना नहीं मानव की सोच बदली है। सफलता और उन्नति के इस समय में जहां हमने बहुत कुछ पाया है वहीं वह कुछ खोया भी है ।हमने विकास के शिखरों को तो छू लिया लेकिन पतन के गर्त में भी गिरे हैं ।अपने पतन की पराकाष्ठा की ओर अभी हमने ध्यान नहीं दिया तो फिर शायद हम इंसान भी न रह पाएं और हैवान से भी बदतर होते चले जाएं।
वेद का स्पष्ट आदेश है कि संस्कारवान , गुणवान संतान के होने से पहले हम स्वयं मानव बनें और फिर उन मानवीय गुणों को द्विगुणित कर अपनी संतति में एक सुसंस्कार के रूप में प्रविष्ट करें। मानव का बच्चा जब जन्म से ज्ञानवान नहीं , उसे ज्ञानवान (दिव्य )तो बनाया जाता है । मानव बुद्धि को परिष्कार व परिमार्जन की आवश्यकता है ।

मानव पूर्ण ज्ञानी कैसे बने ? इसके लिए आवश्यक है कि वह ऐसी दिव्य सत्ता की उपासना करे जो अपने आप में पूर्ण हो, जिसमें कहीं से भी ऊनापन ना हो अर्थात कमी ना हो।
थोड़ा सा प्रमाद आते ही मानव मन अति भयंकर दुर्घटना करा देता है। इसलिए वेद कहता है कि तू अभी अपूर्ण है। इसलिए अपना परिष्करण कर अपना परिमार्जन कर। वह दिव्य सत्ता या शक्ति कौन सी है ? जो कहीं से भी अपूर्ण नहीं है , इस की ओर संकेत करते हुए वेद कहता है :-
ओ३म् अकामो धीरो अमृतः स्वयम्भू रसेन तृप्तो न कुतश्चनोन: ।
तमेव विद्वान न बिभाय मृत्योरात्मानं धीरमजरं युवानम् ।। (अथर्ववेद 10/08/44)
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वह प्रभु सारी कामनाओं से रहित है, उसे अपने लिए किसी भी वस्तु को प्राप्त नहीं करना है वह धीर है – संसार के किसी भी परिवर्तन से उसमें किसी प्रकार का विकार नहीं उत्पन्न होता, वह एक रस रहता है, अपनी समावस्था को नहीं खोता, वह मृत्यु से रहित है, वह अपनी सत्ता का हेतू स्वयं ही है – उसकी सत्ता में और कोई कारण नहीं, उसे किसी ने नहीं बनाया, वह सदा से आप ही चला आ रहा है, आनंद से तृप्त है, परिपूर्ण है, कहीं से भी कमी वाला वह नहीं है उस धीर अजर युवा परमेश्वर को जानने वाला ही मृत्यु से नहीं डरता है ।
. निष्काम, धीर, अमर, स्वयम्भू (स्वयं अपनी सत्ता से विराजमान ), रस से सदा तृप्त (परमात्मा ) जो कहीं से भी ऊन अर्थात् न्यून नहीं है ) उसी धीर, अजर (जरा-बुढ़ापे से रहित ) सदा युवा रहने वाले, अन्तर्यामी परमात्मा को जानने वाला ज्ञानी जन मृत्यु से नहीं डरता ।
कहने का अभिप्राय है कि हे मानव यदि तू अपना उद्धार चाहता है , कल्याण और परिष्कार चाहता है तो उस परमपिता परमेश्वर से नेह लगा जो अपने आप में पूर्ण है । किसी भी प्रकार की कमी उसमें नहीं है। जब तू ऐसी दिव्य शक्ति की उपासना करेगा तो तेरे भीतर भी उसके गुण आएंगे।
वेद पवित्रधर्म ग्रंथ है। मानव ने वेद का निर्देश भुला कर अपना परिष्कार और परिमार्जन छोड़ दिया है। परिवर्तन और परिवर्धन करना छोड़ दिया है ।आत्मावलोकन करना छोड़ दिया है। संस्कार आधारित शिक्षा से संस्कारित संतान और समाज का निर्माण करना छोड़ दिया है ।इसलिए चारों ओर पतन की अवस्था है। मानव स्वयं अपनी दुरावस्था पर किलकारी मारकर हंस रहा है, इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है।
मानव के पतित होने की पराकाष्ठा तब हो गई जब मामा भांजी का पवित्र रिश्ता अपवित्र होकर पति-पत्नी में परिवर्तित हो गया। मानव अधोगति को उस समय प्राप्त हो गया जब ससुर, पुत्र वधू के रिश्ते में दुष्कर्म छा गया। मानव उस समय अपनी पतित अवस्था को प्राप्त हो गया जब भाई-बहन के अटूट प्रेम बंधन काम की भेंट चढ गए।
मानव और न जाने कितना नीचे गिरेगा ? मानव के इस पतन को देखकर तो शैतान की रूह भी कांप उठे। यह इंसान का दुर्भाग्य है कि पिता पुत्री के पवित्र संबंध में भी कामाग्नि की लपटें छाई है।आज का मानव अपने पतन को लेकर कतई चिंतित नहीं हैं । यदि यह सब ऐसे ही चलता रहा तो एक दिन मानवता कराह उठेगी,मानव का अस्तित्व ही मिट जाएगा।
एक ओर मानव चांद पर पहुंच कर अपने उन्नत होने की प्रक्रिया दर्शाता है तो दूसरी ओर पतन का यह क्रम जारी है ।यह मानव तेरे ऐश्वर्य और भोग के ,झूठ के संसाधन ही तेरा नाश कर रहे हैं । तू इनके पीछे लगी अपनी मृगतृष्णा को अपनी उन्नति कहता है ।तुझे नहीं पता कि तू पिछड़ गया है। वास्तव में अधोगति की तरफ जा रहा है। अपने आचरण में, चरित्र में, मानव बनने में , दिव्य संतति उत्पन्न करने में ,उन्नत समाज के निर्माण में कोई सार्थक प्रयास नहीं है।
अभी तो यह कलयुग का प्रथम चरण मात्र 5122 वर्ष गुजरे हैं। इससे आगे की भविष्य की स्थिति बहुत ही भयावह होने वाली है जहां आपसी संबंध नहीं रहेंगे जहां केवल आसुरी शक्तियां , पशु प्रवृत्ति नंगा नाच करेंगे।
इब्तदा ए_इश्क है रोता है क्या ।
आगे आगे देखिए होता है क्या।।

वर्तमान समय में माता और पुत्र निर्मल संबंध भी कलंकित हो गया तो आगे की कल्पना और भी भयावह होगी।
वास्तव में आज के मानव को ज्ञात ही नहीं कि उच्च शिखर पर पहुंचने में दृढ़ संकल्प और प्रबल इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है ।इसके लिए मानवीय मूल्य और नैतिक सिद्धांत हमारी जीवन नैया की पतवार बनते हैं। साहस और लक्ष्य के प्रति निष्ठा हमारे नाविक बनते हैं। लेकिन यह संभव है केवल वैदिक शिक्षा पद्धति के अनुसार शिक्षा प्रदान करने से। लॉर्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति से यह लक्ष्य हम प्राप्त नहीं कर पाएंगे । इसलिए शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है।
पहाड़ों से नदियों का निकलना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है ।लेकिन लगातार बहती इस धारा के विपरीत बहने वाले ही इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अपना नाम अंकित करवाते हैं।
समाज के साथ न बहने वाले समाज को नई सोच, नया दर्शन, नई गति, नई ऊर्जा और नई दिशा देने वाले ही ऐतिहासिक पुरोधा बनते हैं ।मानव अक्सर अपनी कमजोरियों को यह कहकर ढकने की कोशिश करता है कि जमाना बदल गया है किंतु वास्तविकता यह है कि जमाना नहीं बदला है मानव की सोच बदल गई है । उसका चिंतन दूषित हो गया है, उसकी मन: स्थिति में भयंकर परिवर्तन आ गए हैं ,अन्यथा तो वही दिन हैं, वही रातें हैं, वही घड़ियां और वही पल है. सूरज भी वही, चांद भी वही ,धरती भी वही, ऋतु भी वही है ,किंतु यह मानव वह नहीं। जिसके लिए वेद ने आदर्श उपस्थित किया था कि तू मानव ही बने रहना ,कहीं फिसल मत जाना ,कहीं रास्ते से विमुख मत हो जाना ,और गिरकर भी इतना मत गिर जाना कि फिर उठ ही न पाए ।आज यह पानी के प्रवाह के साथ बहता जा रहा है । इस प्रवाह से धर्म गुरु धर्म के ठेकेदार भी बच नहीं पा रहे हैं , इसलिए उन पर आपराधिक मुकदमे विचाराधीन हैं ।फिर ऐसे धर्म गुरु किस धर्म की शिक्षा दे पाएंगे।
यह सनातन सत्य है कि जमाना हमसे बनता है। हम जमाने से नहीं बनते। हम इस संसार की ईकाई मात्र हैं। लेकिन इन्हीं ईकाइयों से संसार का निर्माण होता है। जैसे बूंद – बूंद से सागर बनता है ।इस अकेली ईकाई का बहुत महत्व है ,इसीलिए वेद ने इस ईकाई को ही सुंदर रखने का निर्देश दिया है। अतः हम इस बदले हुए मानव का अनुसरण करना छोड़ दें ।हम विकृति का अनुसरण क्यों करें ।जो वस्तु विकृत हो चुकी है। विकार ग्रस्त हो चुकी है, सड़ गल गई है ,और सारी व्यवस्था के लिए एक कोढ बन गई है वही तो रूढ़िवाद है ।हमें इस रूढ़िवाद को, परंपरावादी दृष्टिकोण को त्यागना होगा।
यह संसार व्यक्ति से बना और व्यक्ति का मूल है” मैं” अर्थात हर व्यक्ति अपने आप से भी बात करता है तो “मैं” “मैं “का संबोधन अपने लिए बार-बार करता है ,इसलिए हर व्यक्ति अपने आप में “मै”है , और मैं एक इकाई है समाज की।वह स्वयं जब आत्मावलोकन करता है ,जब वह स्वयं अपने आपसे पूछता है या “मैं “पुकारता है वही उसकी” मैं “सुधर गई तो सब सुधर जाएगा ,।इस मैं को हम(वयम) बनाने का प्रयास करना चाहिए ।इसको मिटा कर सर्वग्राही और सब मंगलकारी वयम में परिवर्तित करना है।
यही बात मानव के लिए नई दिशा और नई दशा देने वाली होगी। इसलिए नए उद्यम और नई समाज के निर्माण के भारी उद्योग का श्रीगणेश हमें मै से करना है।
निजता को पहचान कर अपनी अस्मिता को जानकर और अपने निज स्वरूप को समझ कर यह कार्य करना होगा।
इसलिए हे मानव ! तू निज स्वरूप को पहचान कि तू अमृत पुत्र है ।आत्मा के यथार्थ स्वरूप को पहचान अपने गंतव्य और मंतव्य को पहचान। तेरी निजता ही तेरी अक्षुण्ण धरोहर है। धरोहर को तू संरक्षण और सुरक्षा की आवश्यकता महसूस कर ।जो खोने की वस्तु नहीं है ,इसलिए हे मानव तू मानव बन।
तेरे मानव बनने की कसौटी है कि तू अपने व्यवहार को पहचानने की युक्ति इस प्रकार सोचकर कि यह कदाचार है ,यह दुराचार है, यह भ्रष्टाचार है, यह पापाचार है, यह अनाचार है, यह अत्याचार है, इन पर मनन कर और अपना चिंतन बदल। जब चिंतन बदल जाए तो इसके पश्चात सोचना आरंभ कर कि यही सुविचार है ,यही धर्म का आधार है, इसी से होता बेड़ा पार है ,भवसागर पार है ,परमेश्वर सुनता पुकार है। वही है नैय्या वही पतवार है। वही खिवैया और वही खेवनहार है,’ देव ‘फिर काहे का इंतजार है ।इसलिए मानव तू अभी से एक श्रेष्ठ मानव बनने के सद प्रयासों में जुट जा और वेद के आदेश का पालन कर। ध्यान रहे :–
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति ||

अर्थात् : मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है ।परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता ।
इसलिए अनावश्यक आलस्य को छोड़ो और अपने परिष्कार के महान पुरुषार्थ में जुट जाओ।

देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन : उगता भारत

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