ईश्वर का ध्यान करते हुए साधक को होने वाले कतिपय अनुभव

IMG-20200703-WA0011

ओ३म्
===========
मनुष्य का आत्मा चेतन सत्तस वा पदार्थ है। उसका कर्तव्य ज्ञान प्राप्ति व सद्कर्मों को करना है। ज्ञान ईश्वर व आत्मा संबंधी तथा संसार विषयक दो प्रकार का होता है। ईश्वर भी आत्मा की ही तरह से चेतन पदार्थ है जो सच्चिदानन्दस्वरूप, सर्वज्ञ, निराकार, सर्वव्यापक एवं सर्वान्तर्यामी सत्ता है। ईश्वर व आत्मा दोनों अनादि, नित्य, अविनाशी तथा अमर हैं। वेद सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर प्रदत्त ज्ञान है। यह ज्ञान सभी मनुष्यों की आत्मा का लक्ष्य मोक्ष बताते हैं। मोक्ष की प्राप्ति के उपाय भी वेद एवं वैदिक साहित्य सहित सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ के नवम समुल्लास में बताये गये हैं। आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति सद्ज्ञान एव सद्कर्मों को करने से होती है। सद्ज्ञान की प्राप्ति के लिये मनुष्य को वैदिक साहित्य के अध्ययन सहित योगाभ्यास, ध्यान व समाधि की अनिवार्यता है। ध्यान के विषय में साधकों में अनेक प्रकार की भ्रान्तियां होती हैं। ध्यान करते हुए साधकों को साधना में अनेक प्रकार की अनुभूतियां भी होती हैं। सभी साधकों के अपने अपने ज्ञान व सामथ्र्य तथा साधना की स्थिति के कारण ध्यान की स्थितियां व अनुभव पृथक-पृथक होते हैं। इन अनुभूतियों का वर्णन वर्तमान साहित्य व ग्रन्थों में बहुत ही कम पढ़ने व सुनने को मिलता है। साधक इस विषय में अधिक जानना चाहते हैं परन्तु हमारे योगी व विद्वान इन विषयों का उल्लेख करने से बचते हैं, ऐसा प्रतीत होता है।

वैदिक विद्वान डा. रघुवीर वेदालंकार देश-विदेश के वैदिक विद्वानों में शीर्ष स्थान पर हैं। आप भारत के राष्ट्रपति जी से भी सम्मानित हैं। आपने वैदिक साहित्य विषयक उच्च कोटि के अनेक ग्रन्थ लिखे हैं। आप आर्यसमाजों व गुरुकुलों मंभ व्याख्यान देते हैं तथा गुरुकुलों के बच्चों को पढ़ाते हैं। आप एक उच्च कोटि के साधक भी हैं। आपने योग साधना, मन व आत्मा आदि विषयों पर कुछ पुस्तकें लिखी हैं। उनकी एक पुस्तक ‘‘साधना-सूत्र” हैं। इस पुस्तक का प्रकाशन आर्ष ज्योतिर्मठ-गुरुकुल, पौन्धा-देहरादून द्वारा किया गया है। हमने इस पुस्तक को पढ़ा है तथा इसे साधकों के लिये महत्वपूर्ण पाया है। इसी पुस्तक से हम डा. रघुवीर वेदालंकार जी के ‘ध्यान काल के अनुभव’ शीर्षक से लिखे गये विचारों को प्रस्तुत कर रहे हैं। हम आशा करते हैं इससे हमारे पाठक लाभान्वित होंगे। यह गुह्य रहस्य की बातें हैं जिनका उल्लेख सिद्ध योगी भी नहीं करते। वर्तमान समाज में तो किसी साधक या योगी का समाधि प्राप्त योगी होना विदित ही नहीं होता। अतः पाठक डा. रघुवीर वेदालंकार जी के विचारों को जानकर योग में प्रवर्तित होकर आत्मा के लक्ष्य ईश्वर की प्राप्ति के मार्ग में बढ़ने की प्रेरणा ग्रहण कर सकते हैं। यदि ऐसा नहीं करेंगे तो हम सब जन्म-मरण वा आवागमन के चक्र में फंसे रहेंगे और जन्म-जन्मान्तर में दुःख व सुख पाते रहेंगे। दुःखों की सर्वथा मुक्ति का मार्ग तो एकमेव ‘‘योग, ध्यान व समाधि” तथा वैदिक साहित्य का अध्ययन, उसका आचरण, प्रचार एवं साधना ही है। डा. रघुवीर वेदालंकार जी के ध्यान काल के अनुभवों विषयक विचार निम्न हैं:

डा. रघुवीर वेदालंकार लिखते हैं कि ध्यानकाल में साधक को कुछ विचित्र अनुभव भी होने लगते हैं। प्रारम्भ में तो नहीं, अपितु ध्यान की स्थिरता के साथ-साथ इनकी अनुभूति होती है। प्रत्येक साधक की मानसिक अवस्था तथा प्रयत्न भिन्न-भिन्न होते हैं। अतः सभी साधकों के अनुभव भी एक समान नहीं होंगे। किसी को नेत्रों के आगे प्रकाश दिखलाई देता है तो किसी को मधुर स्वर सुनाई पड़ते हैं। प्रकाश भी कई प्रकार का होता है-लाल, हरा, काला, नीला, श्वेत, पीत आदि। नासिका में बहने वाले तत्व के अनुसार ही प्रकाश का रंग भी बदलता रहता है। अग्नितत्व की प्रधानता में लाल प्रकाश, आकाश तत्व की प्रधानता में नीला, जलतत्व की प्रधानता में श्वेत, पृथिवी तत्व में पीला तथा वायुतत्व में काला प्रकाश नेत्रों के सामने दिखलाई देता है। कभी-कभी ऐसा भी लगने लगता है कि आप हवा व आकाश में ऊपर को उठता हुआ अनुभव करते हैं। ये अनान्ददायक स्थितियां हैं।

यह ध्यान की अति प्रारम्भिक स्थितियां हैं। ये न तो योग का लक्ष्य है तथा न ही इनसे साधक को कुछ लाभ होता है। इनकी आकांक्षा भी नहीं करनी चाहिए। साधना करने पर हमें स्वतः उसी प्रकार की सुखद अनुभुतियां प्रादुर्भूत होंगी जिस प्रकार रोग दूर होने पर रोगी के मुख पर कान्ति आने लगती है। रोग दूर होना मुख्य था। कान्ति तो उसका प्रमाण मात्र है। वह तो स्वतः आ ही जायेगी।

इसके अतिरिक्त ऐसा भी अनुभव में आया है कि ध्यानकाल में अचानक ही कोई आदेश, कोई निर्देश, कोई सूत्र कोई सर्वथा नूतन अकल्पनीय विचार साधक की बुद्धि में आएगा। उस विचार को तुरन्त ही स्मरण कर लेना चाहिए। अच्छा तो यह होगा कि उसे तुरन्त ही लिख लिया जाए, क्योंकि ध्यान से उठने पर वह स्मरण नहीं भी रह सकता। यह तो मन रूपी अन्तरिक्ष में बिजली कौंधने जैसा प्रकाश है। जिसे तुरन्त ही ग्रहण कर लेना चाहिए। इसमें साधक के मार्गदर्शक सूत्र छिपे होंगे। गुरुवर दण्डी जी को भी ऋषिकेश में गंगा में जप करते समय यह प्रेरणा हुई थी कि जो कुछ तुम्हें मिलना था, वह मिल चुका। अब यहां से चले जाओ। इसके पश्चात् दण्डी जी वहां से हरिद्वार के निकट कन्खल आ गए थे। अन्य साधको के भी ऐसे अनुभव सुने जाते हैं। ध्यान में मन ऊध्र्वगति करता है। यह सब उसी का परिणाम है।

ऐसा निश्चित रूप में होता है कि ध्यानकाल में साधक के मन में बिल्कुल ही अचिन्तनीय, अकल्पनीय विचार उठें। ये उसके लिए मार्गदर्शक होंगे। अनेक साधकों का ऐसा अनुभव है। प्रश्न है कि ये विचार या प्रेरणाएं कहां से आती हैं? निश्चित रूप में यह साधक के अपने विचार नही होते, क्योंकि ये अचानक ही मस्तिष्क में उठते हैं तथा यदि उन्हें पकड़ा नहीं गया तो ध्यानकाल के बाद तिरोहित भी हो जाते हैं। अनुमान यही है कि यह विचार किसी अदृश्य शक्ति द्वारा दिये जाते हैं। वह शक्ति परमेश्वर भी हो सकता है क्योंकि ‘धियो यो नः प्रयोदयात्’ में यही कामना की गयी है कि सविता – प्रेरक देव हमारी बुद्धियों को सन्मार्ग में प्रेरित करता रहे। पवित्र तथा निर्मल बुद्धि होने पर ही हम परमेश्वरीय प्रेरणा को ग्र्रहण कर सकते हैं, सर्वदा नहीं। ध्यान काल में ऐसा सम्भव है। इसका एक अन्य समाधान यह है कि पतंजलि मुनि ने लिखा है–मूर्द्ध ज्योतिषि सिद्धदर्शनम् (यो.सू. 3/32) अर्थात् मूद्र्धा में ध्यान करने से सिद्धों का दर्शन होता है। व्यास जी तो इसकी व्याख्या में यह भी कहते हैं कि सिद्ध साधक के साथ बात करते हैं तथा उसके कार्यों में सहायक होते हैं। वे सिद्ध कौन हैं, यह गवेषणा का विषय है। मुक्तात्माओं में यह शक्ति मानी गयी है कि वे इच्छानुसार कहीं भी गमन कर सकते हैं। सम्भव है कि ऐसे मुक्तात्मा ही साधक का मार्गदर्शन करते हैं। यह मार्गदर्शन वाचिक नहीं होता अर्थात् साधना काल में आपको किसी की आवाज तो सुनायी नहीं देगी, केवल कोई नवीन विचार मन में एकदम आ जाएगा। यह वैचारिक मार्ग दर्शन है जिसमें कोई बाधा नहीं। सन् 1966 में मैंने (डा. रघुवीर वेदालंकार ने) गुरुकुल कांगड़ी में अध्ययन करते हुए आचार्य गौरी नाथ शास्त्री को स्वयं यह कहते सुना था कि उन्होंने सिद्धों के दर्शन किए हैं। आचार्य जी महाविद्यालय ज्वालापुर के स्नातक तथा साधक थे। उस समय वे राजस्थान के शिक्षा मंत्री थे। अपना (डा. रघुवीर वेदालंकार का) अनुभव भी कुछ ऐसा ही है।

हम आशा करते हैं पाठकों को यह विचार नये एवं लाभकारी लगेंगे। हम अपने जीवन में योगी बने तो यह बहुत अच्छी बात हैं। यदि न भी बने तो हमें वेद एवं योग विषयक साहित्य को अवश्यमेव पढ़ना ही चाहिये। यदि जीवन को ऐसे ही बिता दिया तो हमें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। सन्मार्ग दर्शन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्रन्थ ऋषि दयानन्द का ‘सत्यार्थप्रकाश’ है। इसका स्वाध्याय अपनी आत्मा व जीवन की उन्नति के इच्छुक प्रत्येक मनुष्य को करना चाहिये। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

Comment:

betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
betnano giriş
ultrabet giriş
yakabet
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
jojobet giriş
supertotobet
supertotobet giriş
bettilt giriş
supertotobet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
supertotobet giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
supertotobet
jojobet giriş
supertotobet giriş
realbahis giriş
realbahis giriş
supertotobet giriş
supertotobet giriş
bettilt giriş
supertotobet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
vdcasino giriş
bettilt giriş
roketbet
roketbet
bettilt giriş
bettilt giriş
hititbet giriş