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स्वर्णिम इतिहास

भारत में गणित के इतिहास से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण पहलू

डॉ. चंद्रकांत राजू एक योद्धा गणितज्ञ

लेखक :- रवि शंकर,
कार्यकारी संपादक, भारतीय धरोहर

गणित तो हम सभी ने पढ़ा होगा, परंतु क्या कभी गणित को औपनिवेशिक मानसिकता से स्वाधीनता दिलाने की लड़ाई भी हमने लड़ी है? गणित को स्वाधीन कराने की लड़ाई? क्या हमें कभी यह ध्यान में भी आया है कि गणित जैसा विषय भी औपनिवेशिक मानसिकता का शिकार हो सकता है? जी हाँ, न केवल गणित और विज्ञान औपनिवेशिक मानसिकता के शिकार हैं, बल्कि एक योद्धा गणितज्ञ गणित और विज्ञान को औपनिवेशिकता से मुक्त कराने की लड़ाई छेड़े हुए है, पूरी दुनिया घूम-घूम कर सभी महान और श्रेष्ठ माने जाने वाले गणितज्ञों को चुनौती दे रहा है। ये योद्धा गणितज्ञ हैं डॉ. चंद्रकांत राजू। धर्म विशेषकर ईसाइयत और विज्ञान में संघर्ष की बात अक्सर की जाती है, परंतु क्या कोई भी यह सोच सकता है कि ईसाइयत का विज्ञान और गणित के साथ कोई गठजोड़ भी है? क्या कोई सपने में भी सोच सकता है कि विज्ञान और गणित हमें ईसाइयत की शिक्षा देते हों? राजू ने इसी गंठजोड़ के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा है। वे न केवल इस गंठजोड़ को उजागर करते हैं, बल्कि उसे समाप्त करने के लिए भी प्रयत्नशील हैं।
डॉ. राजू एक महान गणितज्ञ तो हैं ही, वे एक महान भौतिकिविद् भी हैं और महान दार्शनिक भी। वास्तव में केवल गणितज्ञ होने से वे इन पहेलियों को शायद न तो समझ पाते और न ही सुलझा पाते। एक भौतिकिविद् और दार्शनिक होने के कारण वे वर्तमान गणित और विज्ञान में घुसाए गए ईसाई दर्शन को देख और समझ पाते हैं। काल यानी कि समय के दर्शन को लेकर उनकी समझ एकदम स्पष्ट और भारतीय दर्शन के अनुकूल है। उन्होंने आईंस्टीन की श्रेणी के विज्ञानी माने जाने वाले स्टीफन हॉकिंग्स द्वारा दी गई काल की व्याख्या को खारिज करते हुए पुस्तक लिखी है द इलेवन पिक्चर्स ऑफ टाइम। गणित के दर्शन में जो गड़बड़ी हुई है, उसे उजागर करने के लिए उन्होंने केवल गणित का इतिहास नहीं लिखा, उन्होंने कल्चरल फाउंडेशन ऑफ मैथेमेटिक्स (गणित का सांस्कृतिक स्थापनाएं) लिखी। यह पुस्तक केवल गणित का इतिहास नहीं बताती, उसके दर्शन को भी स्पष्ट करती है। इस कारण वे गणित के दर्शन में की गई गड़बड़ी की ओर भी संकेत करते हैं। अभी तक गणित के इतिहास पर लिखी गई पुस्तकों में यह एक अपने प्रकार की अकेली पुस्तक है।

डॉ. राजू बताते हैं कि कैल्कुलस का प्रयोग भारत में पहले हुआ था। भारत से ही यह पद्धति यूरोप पहुँची। वहाँ न्यूटन को यह समझ नहीं आई। इस पर जो उसे समझ नहीं आया, वहाँ अपनी बुद्धि से कुछ परिवर्तन किए। उन परिवर्तनों के साथ न्यूटन का कैल्कुलस अंग्रेजी राज में भारत आया। आज वही कैल्कुलस हम पढ़ते हैं। डॉ. राजू ने यह साबित किया है कि बड़े से बड़े गणितज्ञ को भी यह कैल्कुलस समझ में नहीं आता और वे केवल इसे रट जाते हैं। देश-विदेश के मुर्धन्य महाविद्यालयों में उन्होंने गणित के विद्यार्थियों के बीच उन्होंने इसे स्थापित किया है कि कैल्कुलस को उन्हें रटना ही पड़ता है। वे यह भी बताते हैं कि रॉकेट प्रक्षेपण से लेकर कम्प्यूटर-विज्ञान तक जितनी भी आधुनिक तकनीकें हैं, उनमें इसका उपयोग नहीं होता। वहाँ गणना के लिए एक साधारण से गणित का प्रयोग होता है, जो कि वास्तव में आर्यभट द्वारा विकसित कैल्कुलस में दिया हुआ है।
डॉ. राजू की यह संघर्ष यात्रा बचपन से ही प्रारंभ हो गई थी। ग्वालियर में जन्मे राजू जब उच्च माध्यमिक विद्यालय में पढ़ा रहे थे, तभी विज्ञान को लेकर उनके मन में प्रश्न घुमडऩे लगे थे और उनका विज्ञान के शिक्षकों से टकराव भी प्रारंभ हो गया था। वे बताते हैं, ‘एक बार मेरे शिक्षक इनकलाइंड प्लेन यानी झुकी हुई सतह के बारे में एक प्रयोग के बारे में पढ़ा रहे थे। उसमें उन्होंने बताया कि म्यू जोकि फ्रिक्शन का कोइफिशिएंट है वह टैन थीटा के बराबर होता है। इसे करवाते समय उन्होंने बताया कि भारी चीज जल्दी गिर जाएगी और हल्की चीज देर से गिरेगी इसलिए सतह को और अधिक झुकाना पड़ेगा। मैंने पूछा कि यदि म्यू नहीं बदल रहा है तो थीटा कैसे बदलेगा? इस पर बच्चे हंस पड़े और शिक्षक ने स्वयं को अपमानित महसूस किया। उन्होंने बाद में मुझे कहा कि मैं एक पुस्तक का नाम और उसका पृष्ठ संख्या भी बता दूंगा, उसमें ऐसा लिखा हुआ है। मेरा कहना था कि हम विज्ञान पढ़ रहे हैं, सच्चाई की खोज कर रहे हैं, इसलिए पुस्तक में लिखा है, फिर भी वह गलत हो सकता है। इस पर वह शिक्षक मुझसे बहुत नाराज हो गए।’ राजू बताते हैं कि इसका उन्हें खामियाजा भी भुगतना पड़ा। उस शिक्षक ने बाद में उन्हें प्रायोगिक परीक्षा में अंत:परीक्षा में शून्य दे दिया। हालांकि प्रायोगिक परीक्षा के परीक्षक ने उन्हें बाह्यपरीक्षा में 45 में से 44 अंक दिए और इस प्रकार राजू उत्तीर्ण हो गए हालांकि इससे उनका कक्षा में स्थान थोड़ा नीचे हो गया। विज्ञान के अधिनायकवाद का यह पहला अनुभव था। वे कहते हैं, ‘मुझे महसूस हुआ कि विज्ञान केवल सच की खोज के लिए नहीं है, यह अधिकार की बात है। मुझे यह भी लगा कि विज्ञान के विषय में शिक्षक विद्यार्थी को प्रायोगिक परीक्षा में परेशान कर सकते हैं। ऐसा ही अनुभव मुझे महाविद्यालय में स्नातक की पढ़ाई में आया। मैं मुम्बई विश्वविद्यालय से स्नातक कर रहा था। मैं स्टूडेंट काउंसिल में भी था। कई बार कक्षा से जल्दी भी चला जाता था। डिमॉन्सट्रेटर मुझे कुछ कहता नहीं था और उसे अन्य विद्यार्थी उलाहना दिया करते थे। उस बार भी प्रायोगिक परीक्षा में उन्होंने काफी अंक दिए जिससे मैं लिखित परीक्षा में तो सर्वोच्च स्थान पर आ गया, परंतु प्रायोगिक परीक्षा में काफी कम अंक आए।’ राजू इन घटनाओं के कारण विज्ञान की पढ़ाई से निराश हो गए। उनकी रूचि गणित में पहले से भी थी ही, इसलिए उन्होंने विज्ञान छोड़ कर गणित की पढ़ाई करने का निर्णय लिया। वे बताते हैं कि विश्वविद्यालय में गणित के एक शिक्षक थे एम एस हुजुर बाजार। वे एब्सट्रैक्ट एल्जेब्रा पढ़ाते थे जिसमें उन्हें काफी रूचि जग गई थी। वे मुम्बई की लोकल ट्रेनों में यात्रा करते हुए भी इसके प्रश्न हल करते रहते थे। उसी समय उन्होंने लॉजिक एवं इलेक्ट्रानिक सर्किट देख कर कम्प्यूटर भी बनाया। उस समय कम्प्यूटर काफी अनोखी चीज थी, लोगों को समझ नहीं आता था कि यह कैसे बनता है। मेरे उन प्रयोगों को देख कर एक सज्जन ने मुझे कहा कि पढ़ाई-वढ़ाई छोड़ो और मेरे साथ आकर काम करो। उन्हें मेरे प्रयोग काफी पसंद आए थे।
राजू बताते हैं कि बचपन से ही उनकी रूचि भौतिकी में भी काफी अधिक थी। इसीलिए उन्होंने आईआईटी में प्रवेश नहीं लिया जहाँ कि उनके एक भाई पहले से ही पढ़ रहे थे। उनकी माँ चाहती थीं कि दोनो ही भाई वहाँ पढ़ें। परंतु उनकी रूचि वहाँ नहीं थी। इस प्रकार राजू प्योर मैथेमेटिक्स यानी विशुद्ध गणित की ओर बढ़ गए। गणित में राजू की रूचि इतनी थी कि उन्होंने पाठ्यक्रम को कक्षा से पहले ही पूरा पढ़ रखा था। इसलिए वे अक्सर कक्षा में जाते ही नहीं थे। उस अनुभव को याद करते हुए वे बताते हैं, ‘पहले से सबकुछ पढ़ा होने के कारण मैं कक्षा में बोर होता था। हमारे एक शिक्षक थे एस एस शिखंडे। वे काफी सज्जन व्यक्ति थे। वे मुझे इसके लिए टोकते थे। हालांकि कक्षाओं में रहना हमारे लिए अनिवार्य नहीं था, केवल यूजीसी द्वारा दी जाने वाली राष्ट्रीय छात्रवृत्ति प्राप्त छात्रों के लिए यह आवश्यक था। उसके बिना छात्रवृत्ति नहीं मिलती और मुझे छात्रवृत्ति चाहिए थी।’ हालांकि परीक्षाओं में राजू को काफी अच्छे अंक आते रहे, परंतु वहाँ भी उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा।
एस एस शिखंडे के कहने पर राजू टाटा इंस्टीट्यूट में भी गए, परंतु वहाँ जिस प्रकार से गणित पढ़ाई जाती थी, वह उन्हें पसंद नहीं आया। इसके बाद वे फिर से विज्ञान की ओर मुड़े। उन्होंने पता किया कि गणितीय भौतिकी के एक विद्वान आईआईटी दिल्ली में हैं के आर पार्थसारथी। राजू दिल्ली आए। राजू उनसे मिले कि क्या वे उन्हें पीएचडी छात्र के रूप में राजू को स्वीकार करेंगे। पहली ही भेंट में पार्थसारथी ने राजू से पूछा कि क्या वे स्पेक्ट्रम मल्टीप्लिसिटी थ्योरम को प्रमाणित कर सकते हैं। राजू बताते हैं, ‘स्पेक्ट्रम मल्टीप्लिसिटी थ्योरम को स्थापित करने के लिए एक पूरी किताब है। ऐसे ही उसे स्थापित करना कठिन है। फिर भी मैं जब परीक्षा में बैठा तो मैं इसके लिए पूरी तरह तैयार था। यदि यह प्रश्न पूछा जाता तो मैं 4-5 घंटे में उसे वहीं पर हल कर देता। परंतु आईआईटी के शिक्षक मेरे उत्तरों से नि:शब्द हो जा रहे थे।’ मैं उस परीक्षा में सर्वोच्च स्थान पर था।
राजू पीएचडी के लिए दिल्ली आए, परंतु उनका रास्ता सरल नहीं था। आते ही उन्हें पार्थसारथी ने बताया कि वे आईआईटी दिल्ली छोड़ रहे हैं। राजू बहुत हैरान हुए। वे उनसे पहले मिल चुके थे। राजू अपनी यूजीसी की छात्रवृत्ति छोड़ कर यहाँ आए थे। परंता पार्थसारथी ने उन्हें साफ कह दिया कि वे अपने बाकी छात्रों को तो अपने साथ आईएसआई भारतीय सांख्यिकी संस्थान, दिल्ली में ले जाएंगे, परंतु उन्हें चूंकि वे ठीक से जानते नहीं, इसलिए राजू को उसकी प्रवेश परीक्षा देनी होगी। इस प्रकार डॉ. राजू ने पहले आईआईटी की परीक्षा दी और उसमें सर्वोच्च रहने के तुरंत बाद उन्हें आईएसआई की परीक्षा में बैठना पड़ा। उस परीक्षा में राजू ने केवल कठिन सवालों को हल किया, आसान सवालों को छोड़ दिया। राजू बताते हैं, ‘वह परीक्षा मैंने 44 डिग्री की तेज गर्मी में दिया था। मुझे लगा कि इतनी गर्मी में मैं इन आसान सवालों को हल करने में समय नहीं लगा सकता।’ हालांकि आईएसआई की परीक्षा में यह देखा जाता है कि परीक्षार्थी कैसे प्रश्नों को हल करने का प्रयास करता है। इसलिए राजू का चयन वहाँ भी हो गया।
आईएसआई में भी राजू को समस्याओं का सामना करना पड़ा। वहाँ उन्हें जिस विषय पर काम करने के लिए दिया गया, उस विषय पर पार्थसारथी के एक पुराने छात्र राजेंद्र भाटिया पहले ही काम कर रहे थे। एक ही विषय दो छात्रों को दिए जाने के अलावा राजू को एक समस्या यह भी लगी कि उस विषय को पहले से ही हल किया जा चुका था। फिर भी राजू ने उस विषय पर तीन व्याख्यान दिए। वह जब उन लोगों को समझ नहीं आया। उन्हें उस पर नोट लिख कर देने के लिए कहा गया। राजू ने नोट लिखकर दिया तो उसे खारिज कर दिया गया और फिर से लिखने के लिए कहा गया। कुछ दिनों बाद राजू को पता चला कि किसी ने उनके नोटों को ही अपनी थ्योरी के रूप में प्रकाशित करवा दिया था। उन्हें यह बुरा लगा कि कम से कम उन्हें यह बताया जाना चाहिए था।
इसके बाद पार्थसारथी ने उन्हें गाइड करने से मना कर दिया। राजू को नोटिस दे दिया गया कि नया गाइड ढूंढे या फिर इंस्टीट्यूट छोड़ कर चले जाएं। राजू बताते हैं कि आईएसआई में छात्र कम ही टिकते थे। एक महीने में छात्र तंग हो कर भाग जाया करते थे। ऐसे में राजू संकट में आ गए। उन्होंने अपनी थिसीस को कई लोगों को भेजा। इस पर अंतरराष्ट्रीय भौतिकीविद् पी ए एम डिरैक, आईआईटी के सी एस मेहता, दिल्ली विश्वविद्यालय के ए एन मित्रा, पॉल डेविस आदि की सकारात्मक टिप्पणियां आ गईं। इन टिप्पणियों के कारण आईएसआई ने राजू को नहीं निकाला। राजू बिना गाइड के ही काम करते रहे। उन्होंने अपनी थिसिस जमा की। उन्होंने जयंत नार्लीकर के एबजार्वर थ्योरी ऑफ रेडिएशन के खंडन में उन्होंने अपनी थिसिस लिख कर जमा की। उसे लौटा दिया गया कि इसमे स्टैटिस्टिक्स नहीं है। फिर राजू ने इस तरह के अनेक उदाहरणों को सामने रखते हुए अपनी थिसिस की सिनोपसिस नए प्रारूप में लिख कर जमा की। संस्थान के शिक्षक इस पर बहुत हैरान हुए और आईएसआई ने उन्हें एक गाइड दे दिया और उन्हें कोलकाता भेज दिया। आखिर पीएचडी की थिसिस को केवल तीन महीनों में फिर से लिख देना कोई छोटी-मोटी बात नहीं थी। उसी बीच उनकी पत्नी को भी आईआईएम अहमदाबाद में एक काम मिल गया था, इसलिए राजू ने भी दिल्ली छोड़ दिया।
वर्ष 1990 में राजू ने कोलकाता में ही पीएचडी पूरी की। परंतु उनकी पीएचडी को स्वीकृत करने में संस्थान ने पूरे तीन साल लगा दिए। दूसरी ओर उनके ही लेक्चर-नोट के आधार पर काम करने वाले राजेंद्र भाटिया को युवा विज्ञानी पुरस्कार दे दिया गया था। यह इस देश की शिक्षा व्यवस्था में आई गिरावट को ही दर्शाता है। परंतु राजू इससे घबड़ाए नहीं। वे एक और संघर्ष की तैयारी में जुट गए। आमतौर पर आईएसआई जैसे बड़े संस्थान से पीएचडी करने के बाद छात्र बड़े संस्थानों में जाते हैं या फिर विदेश चले जाते हैं। राजू के मन में एक उत्सुकता थी कि अपने देश में विज्ञान की अच्छी पढ़ाई और शोध क्यों नहीं होता। इसलिए उन्होंने एक राज्यस्तर के विश्वविद्यालय में जाकर काम करने का निश्चय किया। आमतौर पर आईएसआई या आईटीआई जैसे बड़े संस्थानों से निकले लोग राज्यस्तरीय विश्वविद्यालय में काम करने नहीं जाते। इनमें कोई चमकदार कैरियर तो होता नहीं है। परंतु राजू इस चमक-दमक का मोह छोड़ कर पूना विश्वविद्यालय में पहुँच गए। वहाँ वे गणित पढ़ाने लगे।
राजू बताते हैं कि उस समय वे यही आधुनिक गणित पढ़ाते थे जिसे कि आज वे पूरी तरह खारिज कर रहे हैं। वे कहते हैं, ‘विश्वविद्यालय स्तर पर पढ़ाए जाने वाले कैल्कुलस में खामियां हैं। यह मेरे पीएचडी की थिसिस में भी शामिल थी कि विश्वविद्यालय में पढ़ाए जाने वाले कैल्कुलस में कुछ खामियां हैं। यदि हम उसे भौतिकी में प्रयोग करते हैं तो उनका पता चलता है। यह खामी यह है कि आधुनिक कैल्कुलस में कन्टीन्यूअस और डिफ्रेंशियल फंक्शन होते हैं औऱ दोनों में संबंध होता है कि डिफ्रेंशियल फंक्शन अनिवार्य रूप से कन्टीन्यूअस यानी निरंतर होता है। अब यदि कोई डिसकन्टीन्यूअटी आ जाए यानी कि कोई शार्ट वेव आ जाए तो भौतिकी में उसे कैसे सुलझाया जाएगा। यह आधुनिक कैल्कुलस में खामी है। यह मैंने अपनी पीएचडी थीसिस में ही लिखा था। कई वर्षों तक लोगों को यह खामी समझ में नहीं आई थी। यह सब मैं एडवांस्ड फंक्शनल एनालिसिस में पढ़ाता भी था। कैल्कुलस के बाद एडवांस कैल्कुलस होता है, उसके बाद मैथेमेटिकल एनालिसिस, उसके ऊपर फंक्शनल एनालिसिस और उसके ऊपर एडवांस्ड फंक्शनल एनालिसिस होता है। यह बहुत ही एडवांस मैथेमेटिकल फिजिक्स है और दुनिया में इसे समझने वाले थोड़े ही लोग हैं।’
पूना विश्वविद्यालय में नई समस्या सामने आई। यह वह समय था जब देश में इंजीनियरिंग कॉलेजों की बाढ़ आ रही थी। गली कूचे में इंजीनियरिंग के कॉलेज खुल रहे थे। कॉलेज तो खुल रहे थे, परंतु उनके पास इंफ्रास्ट्रक्चर और सुविधाएं होती नहीं थी। ऐसे में वे विश्वविद्यालयों के साथ गंठजोड़ करते थे। पूना विश्वविद्यालय में भी यह खेल चल रहा था। राजू बताते हैं, ‘जब मैंने विश्वविद्यालय में काम शुरू किया था, उस समय गणित के विभागाध्यक्ष थे एस एस अभ्यंकर। वे गणित के बहुत अच्छे जानकार थे। उनके बाद एक ऐसे व्यक्ति को लाया गया जो इंजीनियरिंग कॉलेजों के साथ गंठजोड़ रखने वाले वहाँ के एक अधिकारी एन सी जोशी के अनुकूल था। इससे मुझे कोई समस्या नहीं थी, परंतु विवाद मेरे एक सहयोगी नरेश दाधीच के साथ हुआ। मैंने नरेश दाधीच का साथ दिया। इस पर वहाँ विवाद होने लगा। मुझे गणित विभाग से हटा कर स्टैटिस्टिक्स विभाग में भेज दिया गया। इन सब बातों से ऊब कर मैंने वहाँ इस्तीफा दे दिया।’
राजू जैसे प्रतिभाशाली व्यक्ति के लिए नौकरियों की तो कोई कमी थी नहीं। उन्हें कई सारी नौकरियों के प्रस्ताव मिल गए। राजू देश के अकादमिक संस्थाओं में चलने वाली राजनीति से ऊब चुके थे और इसलिए उन्होंने सीडैक में काम स्वीकार कर लिया। सीडैक में डॉ. राजू देश के पहले सुपर कम्प्यूटर परम बनाने में जुट गए। सीडैक भी पूना में ही था और इस प्रकार डा. राजू का वास्ता फिर उन लोगों से पडऩे लगा जिनसे विवाद के कारण वे पूना विश्वविद्यालय को छोड़ आए थे। दरअसल सीडैक में ढेर सारे प्रोजेक्ट थे जिसपर काम करने के लिए लोगों तथा संस्थाओं को वित्तीय सहायता दी जाती थी। उसके लिए उनके पास लोगों की भीड़ होने लगी।
सीडैक में काम करते हुए डॉ. राजू को कैल्कुलस की खामी का उपाय मिला। वे बताते हैं, ‘पार्शियल डिफ्रेंशियल इक्वेशन की जिस समस्या पर मैं काम कर रहा था, वह काफी कठिन विषय माना जाता है। लेकिन वहाँ मैंने देखा कि इसे बड़ी ही सरल विधि से हल करते हैं। मुझे लगा कि इतने बड़े सिद्धांतों का क्या लाभ यदि हमें इसका समाधान इतनी आसानी से मिल रहा है। हालांकि मैंने उस समय आधुनिक गणित को छोड़ नहीं था, लेकिन यह बात मुझे परेशान कर रही थी कि यदि इसे हल करना इतना आसान है तो इसकी थ्योरी यानी कि सिद्धांत इतना कठिन क्यों है।’
यहाँ काम करते हुए डॉ. राजू को लगा कि विश्वविद्यालय छोडऩे के पीछे उनका एक उद्देश्य था कि वे समय के सिद्धांत पर अपने विचारों को और पुष्ट करने के लिए काम करना चाहते थे जोकि वहाँ की राजनीति में हो नहीं पा रहा था। अकादमिक जगत को छोडऩे के बाद उन्हें लगा कि उनका शोध का काम रूक गया है और उन्हें इसे करना ही चाहिए। वे सीडैक में रहते हुए अपनी समय के सिद्धांत पर काम करते रहे और पुस्तक भी पूरी कर ली। सीडैक में काम करते हुए उन्हें तीन वर्ष हो चुके थे। इस बीच उनकी भेंट दिल्ली में जगदीश मेहरा से हुई। डॉ. राजू सीडैक की ओर से एक मंत्रालय के कम्प्यूटरीकरण के लिए गए थे। किसी और को ढूंढने के क्रम में वे एक कमरे में घुसे तो उनकी भेंट जगदीश मेहर से हो गई। जगदीश मेहरा उनकी क्षमता और योग्यता से परिचित थे।
जगदीश मेहरा उस समय रिचर्ड फाइनमेन की जीवनी लिख रहे थे और वे नोबल कमिटी के लिए भी काम करते थे। उन्हें राजू द्वारा जयंत नार्लीकर और रिचर्ड फाइनमेन की मतों पर किए गए कामों की कुछ जानकारी थी। उन्होंने डॉ. राजू से पूछा कि वे उस पर और क्या कर रहे हैं। सारी चर्चा के बाद उन्होंने डा. राजू से कहा कि जब वे भौतिकी में इतना गंभीर काम कर रहे हैं तो फिर कम्प्यूटर में क्यों चले गए। उन्होंने डॉ. राजू पर कटाक्ष करते हुए कहा कि भौतिकी का काम छोड़ कर वे कम्प्यूटर बेचने का काम क्यों कर रहे हैं। जगदीश मेहरा ने केवल कटाक्ष नहीं किया, बल्कि जब वे अगली बार दिल्ली आए तो उन्होंने डॉ. राजू को दिल्ली बुलाया और उनके सामने ही यूजीसी के अध्यक्ष प्रो. यशपाल को फोन करके कहा कि डॉ. राजू भारत के सर्वश्रेष्ठ भौतिकविद् हैं, उन्हें कुछ काम दिजीए। उन्हें कम्प्यूटर के काम में क्यों छोड़ रखा है? प्रो. यशपाल ने इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनोमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स (आयूका) में डॉ. राजू को काम करने का प्रस्ताव दिया। उस समय विख्यात विज्ञानी जयंत नार्लीकर उसके निदेशक थे। डॉ. राजू ने इससे पहले नार्लीकर के सिद्धांत को ही खारिज किया था। उन्होंने डॉ. राजू से पूछा कि वे क्या करने वाले हैं। डॉ. राजू ने उन्हें बताया कि वे समय के अपने सिद्धांत पर काम करने वाले हैं। इससे वे थोड़ असहज दिखे। अंतत: वह बात नहीं बनी। इस बीच प्रो. यशपाल सेवानिवृत्त हो गए और मनमोहन सिंह उसके अध्यक्ष हो गए। जगदीश मेहरा ने उन्हें भी पत्र लिखा। जगदीश मेहरा को लगता था कि यदि भारत को नोबल पुरस्कार के लिए प्रयास करना है तो डॉ. राजू जैसी प्रतिभाओं को सम्मान और कार्य देना चाहिए। परंतु कुछ हुआ नहीं।
इस बीच डॉ. राजू को शिमला इंस्टीट्यूट की फेलोशिप मिल गई। वे वहाँ चले गए और वहीं अपनी पुस्तक टाइम टुवाड्र्स एक कनसिस्टेंस थ्योरी को पूरा किया। उसमें डॉ. राजू ने समय के भारतीय और पाश्चात्य दोनों दर्शनों का गहन आड़ोलन किया। इसमें उन्हें काफी समस्याएं भी आईं। डॉ. राजू कहते हैं, ‘पाश्चात्य दर्शन में लोगों ने सर्वेक्षण करके तथा सरल करके रखा है। परंतु भारतीय दर्शन में सीधे मूल ग्रंथों को ही देखना पड़ता है। एक-एक चीज के लिए यदि मूल ग्रंथों को देखना पड़े तो यह काफी बड़ा शोध प्रबंध बनता है। फिर भी मैंने इसे अपनी पुस्तक के पहले अध्याय में संक्षेपण करके डाला। फिर भी सब करने के बाद भी समय का दर्शन मेरी समझ में नहीं आया। इसमें बहुत सी चीजें चर्च की घुसी हुई हैं। अगस्टीन और एक्वानॉस के सिद्धांत इसमें शामिल हैं। इसलिए मैंने एक और फेलोशिप निस्टैड की ली।’ निस्टैड सीएसआईआर की प्रयोगशाला थी।
डॉ. राजू ने इस दौरान अपने शोध को और बढ़ाया। चार-पाँच वर्ष इस पर निरंतर शोध के बाद उन्हें इसके रहस्य ता पता चला। वे कहते हैं, ‘निस्टैड में काम करते हुए मैंने अपनी पुस्तक इलेवन पिक्चर्स ऑफ टाइम लिखी। उसे लिखते-लिखते मुझे इसका भेद समझ आया। समय की संकल्पना में विज्ञान और रिलीजियन किस प्रकार टकराते हैं? साथ विज्ञान में रिलीजियन किस प्रकार घुस गया है? यह उसमें घुसा है गणित के माध्यम से। स्टीफन हॉकिंग ने यह काम किया है। यह सब जानकर मुझे काफी धक्का लगा। स्टीफन हॉकिंग ने अगस्टीन के सिद्धांतों को लेकर समय के सिद्धांत में घुसा दिया। मैंने अपनी पुस्तक में उजागर किया है।’
डॉ. राजू इसलिए व्यथित थे कि उन्हें विश्वास नहीं हो पा रहा था कि विज्ञान में भी इस तरह का खिलवाड़ किया जा सकता है। वे कैल्कुलस की खामियों को स्पष्ट करते हुए पहले भी साबित कर चुके थे कि उसमें समय को एकरैखिक बना दिया जाता है जो कि हमारे सभी आस्थाओं के विरुद्ध है। डॉ. राजू कहते हैं, ‘हो सकता है कि हमारी आस्था गलत हो। परंतु ऐसा क्यों है कि हम मेटाफिजिक्स के आधार सभी को खारिज कर रहे हैं? यदि वास्तव में दुनिया किसी और प्रकार की है तो हम मान भी लेंगे, परंतु किसी ने कह दिया है, केवल इसलिए हम क्यों मान लें?’
इन सभी रहस्योद्घाटनों ने आधुनिक गणित पर डॉ. राजू की आस्था को हिला दिया। इसके बाद वर्ष 1996 में शून्य पर एक सेमीनार में वे गए तो उन्होंने वहाँ प्रस्तुत विषयों पर टिप्पणियां की। वहाँ कहा जा रहा था कि शून्य से विभाजन करना ब्रह्मगुप्त की गलती थी। इस पर डॉ. राजू ने कहा कि केवल इसलिए कि आधुनिक पद्धति में शून्य से विभाजन करना एक गलती है, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि ब्रह्मगुप्त ने भी गलती की, हमें उसकी बात को समझना होगा। इस पर डॉ. राजू को इस पर एक पेपर प्रस्तुत करने के लिए कहा गया। उस सेमीनार में प्रख्यात गणितज्ञ और विज्ञान के इतिहासकार डेविड पिंगरी भी आए थे। वे इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कलाकेंद्र में संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ के तौर पर आए हुए थे। उन्होंने राजू को मिलने के लिए बुलाया। उनसे बातचीत में एक मतभेद पर चर्चा करते हुए डॉ. राजू ने अनायास कह दिया कि कैल्कुलस का आविष्कार भारत में हुआ था। इस पर पिंगरी कुछ मिनटों तक चुप रह गए। उन्हें चुप देख कर डॉ. राजू को लगा कि अनायास कही गई उनकी बात ठीक निशाने पर लगी है क्योंकि पिंगरी भारतीय पांडुलिपियों के अधिकृत विशेषज्ञ हैं और उन्हें इसकी जानकारी अवश्य होगी। पिंगरी ने इसका प्रमाण मांगा तो डॉ. राजू ने कहा कि वे छह महीने में इसका प्रमाण देते हैं। हालांकि उन्हें इस काम में पूरे दस साल लगे।
गणित और विज्ञान को लेकर डॉ. राजू का यह संघर्ष दिनोंदिन और प्रखर होता गया। उनकी वैचारिक स्पष्टता काफी बढ़ती गई और धीरे-धीरे उन्होंने यूरोप में विकसित वर्तमान गणित को पूरी तरह नकार दिया। कैल्कुलस जैसे महाविद्यालयीन और उच्च गणित ही नहीं, वरन् डॉ. राजू ने प्रारंभिक कक्षाओं के लिए गणित को भी सरल और उपयोगी बनाने पर काम किया नहीं। एक ओर जहाँ उन्होंने कैल्कुलस विदाउट लिमिट का पाठ्यक्रम तैयार किया, वहीं दूसरी ओर उन्होंने सूत्र रेखागणित का पाठ्यक्रम भी बनाया। डॉ. राजू का साफ कहना है कि केवल यह कहने से काम नहीं चलेगा कि प्राचीन भारत में गणित के आधुनिक सूत्र विद्यमान हैं, हमें यह बताना होगा कि उन प्राचीन सूत्रों की आज क्या उपयोगिता है।
इसी क्रम में पाइथागोरस प्रमेय के लिए शुल्ब सूत्रों को उद्धृत किए जाने पर उनका प्रश्न था कि यदि शुल्ब सूत्रों में वह प्रमेय हो भी तो क्या केवल नाम बदलने के लिए हम यह सारा श्रम कर रहे हैं? उन्होंने इसका उत्तर भी दिया। उन्होंने कहा कि केवल यह जानना पर्याप्त नहीं है कि हमारे यहाँ गणित की उच्चतम शाखाएं थीं, हमें यह जानना चाहिए कि हमारे पूर्वजों ने गणित को बेहतर ढंग से किया।
डॉ. राजू ने गणित और विज्ञान में चर्च के हस्तक्षेप को उजागर करने के लिए भी भारी परिश्रम किया है। उनका मानना है कि गणित और विज्ञान दोनों ही यदि आज कठिन माने जाते हैं, तो इसका बड़ा कारण है इनमें चर्च की थियोलोजी मेटाफिजिक्स के रूप में घुसेड़ा जाना। यदि चर्च की थियोलोजी को इसमें से निकाल दिया जाए और भारत की प्रत्यक्ष प्रमाण के तरीके को स्वीकार कर लिया जाए तो दोनों ही न केवल आसान हो जाएंगे, बल्कि आमजन के लिए अधिक उपयोगी होंगे। उन्होंने समय की उत्पत्ति के सिद्धांत और दर्शन को लेकर आईन्सटाइन और स्टीफन हॉकिंग दोनों को ही कठघड़े में खड़ा कर दिया है। उन्होंने पूरे गणितीय विश्व को चुनौती दी है कि यूरोप में गणित में अपनी श्रेष्ठता को स्थापित करने के लिए ग्रीक गणितज्ञों का इतिहास गढ़ा है। उन्होंने गणित के पिता माने जाने वाले यूक्लिड के अस्तित्व पर ही प्रश्न खड़ा कर दिया है। उन्होंने यूक्लिड की ऐतिहासिकता को साबित करने वाले को दो लाख रुपये का पुरस्कार देने की भी घोषणा कर रखी है। पिछले चार-पाँच वर्षों से वे यह चुनौती देते हुए पूरे विश्व में घूम रहे हैं। अभी तक कोई सामने नहीं आया है।
डॉ. राजू द्वारा बनाए गए पाठ्यक्रम मलेशिया विश्वविद्यालय और साउथ अफ्रीका के विश्वविद्यालय में पढ़ाए जाते रहे हैं। पिछले दिनों उन्होंने एसजीटी विश्वविद्यालय, गुरुग्राम, हरियाणा में भी कैल्कुलस विदाउट लिमिट का पाठ्यक्रम पढ़ाया। सत्तर वर्ष से अधिक के डॉ. राजू का उत्साह आज भी युवाओं को भी मात करता है। उनका प्रत्युतपन्नमतित्व और विनोदी स्वभाव उनकी विद्वता को आडम्बररहित और सरल बना देते हैं।
दुर्भाग्य यह है कि डॉ. राजू को भारत सरकार से जो सहयोग मिलना चाहिए था, वह नहीं मिल सका। वे गणित और विज्ञान में जो परिवर्तन चाहते हैं, वे परिवर्तन केवल अकादमिक प्रयत्नों से नहीं लाए जा सकते। वे रिलीजियन और विज्ञान के जिस गंठजोड़ की बात कर रहे हैं, उसके पीछे चर्च की वैश्विक राजनीति है। इसलिए इन परिवर्तनों को लाने के लिए और विज्ञान को रिलीजियन से मुक्त करने के लिए अकादमिक प्रयासों के साथ-साथ राजनीतिक दृढ़ता और नीतिगत निर्णयों की भी आवश्यकता है जो सरकार द्वारा ही किया जा सकता है।

..कल की पोस्ट इनके द्वारा किये गये कार्यों पर होगी।

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