Categories
हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

महर्षि दयानंद के अनमोल वचन

प्रस्तुति : आचार्य ज्ञान प्रकाश वैदिक

१. आर्य – जो श्रेष्ठ स्वभाव, धर्मात्मा, परोपकारी, सत्य विद्यादि गुणयुक्त और आर्यावर्त देश में सब दिन से रहने वाले हैं, उनको ‘आर्य’ कहते हैं। – आर्योद्देश्य रत्नमाला (४०)

टिप्पणी : आर्य शब्द दो भावों में प्रयोग होता है। एक, वे सब लोग जो श्रेष्ठ हैं, शुभ कर्म करते तथा शास्त्रों का अध्ययन करते, कराते तथा लोगों को सद्कर्मों की ओर प्रोत्साहित करते, वह आर्य कहाते हैं। दूसरे, वे सब लोग जो आर्यावर्त में रहते हैं, रहते आये हैं, वह आर्य कहाते हैं। दूसरे भाव का सम्बन्ध लोगों की आर्यावर्त में निवास तथा आवासीय व्यवस्था से है।

२. जैसे “आर्य” श्रेष्ठ और “दस्यु” दुष्ट मनुष्यों को कहते हैं, वैसे ही मैं भी मानता हूँ। – स्वमन्तव्यामन्तव्य प्रकाश (२९)

३. दस्यु – अनार्य अर्थात् जो अनाड़ी, आर्यों के स्वभाव और निवास से पृथक्, डाकू, चोर, हिंसक, कि जो दुष्ट मनुष्य हैं, वह दस्यु’ कहाता है। – आर्योद्देश्य रत्नमाला (४२)

४. जाति – जो जन्म से लेके मरणपर्यन्त बनी रहे, जो अनेक व्यक्तियों में एक रूप से प्राप्त हो। जो ईश्वरकृत अर्थात् मनुष्य, गाय, अश्व और वृक्षादि समूह है, वे ‘जाति’ शब्दार्थ से लिये जाते हैं। – आर्योद्देश्य रत्नमाला (३८)

५. मनुष्य – अर्थात् जो विचार के बिना किसी काम को न करे, उसका नाम ‘मनुष्य’ है। – आर्योद्देश्य रत्नमाला (३९)

६. मनुष्य उसी को कहना कि मननशील होकर स्वात्मवत् अन्यों के सुख-दुःख और हानि-लाभ को समझे। अन्यायकारी बलवान् से भी न डरे और धर्मात्मा निर्बल से भी डरता रहे। इतना ही नहीं, किन्तु अपने सर्व सामर्थ्य से धर्मात्माओं की, चाहे वे महा अनाथ, निर्बल और गुणरहित क्यों न हों, उनकी रक्षा, उन्नति, प्रियाचरण और अधर्मी चाहे चक्रवर्ती सनाथ, महाबलवान् और गुणवान् भी हो, तथापि उसका नाश, अवनति और अप्रियाचरण सदा किया करे। अर्थात् जहाँ तक हो सके, वहाँ तक अन्यायकारियों के बल की हानि और न्यायकारियों के बल की उन्नति सर्वथा किया करे। इस काम में चाहे उसको कितना ही दारुण दुःख प्राप्त हो, चाहे प्राण भी भले ही जावें, परन्तु इस मनुष्यपनरूप धर्म से पृथक् कभी न होवे। – स्वमन्तव्यामन्तव्य प्रकाश (प्रारम्भिक पाठ)

७. वर्ण – जो गुण और कर्मों के योग से ग्रहण किया जाता है, वह ‘वर्ण’ शब्दार्थ से लिया जाता है। – आर्योद्देश्य रत्नमाला (४३)

८. वर्ण के भेद :- जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शूद्रादि हैं, वे वर्ण’ कहाते हैं। — आर्योद्देश्य रत्नमाला (४४)

टिप्पणी : समाज की रक्षा और उन्नति के लिए आजीविका हेतु कर्मों के आधार पर यह चार वर्ण हमेशा रहेंगे – (i) बुद्धिजीवी, (ii) रक्षा व सुरक्षा कर्मी, (ii) व्यापारी, उद्योगी तथा व्यवसायी तथा (iv) श्रमजीवी वर्ग। अब चाहें इनको ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र कह लें या कुछ और।

९. “ईश्वर” कि जिसके ब्रह्म परमात्मादि नाम हैं, जो सच्चिदानन्दादि लक्षणयुक्त है, जिसके गुण, कर्म, स्वभाव पवित्र हैं, जो सर्वज्ञ, निराकार, सर्वव्यापक, अजन्मा, अनन्त, सर्वशक्तिमान्, दयालु, न्यायकारी, सब सृष्टि का कर्ता, धर्ता, हर्ता, सब जीवों को कर्म अनुसार सत्य न्याय से फल दाता आदि लक्षणयुक्त है, उसी को परमेश्वर मानता हूँ। – स्वमन्तव्यामन्तव्य प्रकाश (१)

१०. ईश्वर सर्वव्यापक है, क्योंकि यदि एकदेशीय होता, तो सर्वान्तर्यामी, सर्वज्ञ, सर्वनियन्ता, सबका स्रष्टा, सबका धर्ता और प्रलयकर्ता नहीं हो सकता। – सत्यार्थ प्रकाश (सप्तम समुल्लास)

११. ईश्वर सर्वशक्तिमान् है, परन्तु जैसा तुम सर्वशक्तिमान् शब्द का अर्थ जानते हो वैसा नहीं। सर्वशक्तिमान् शब्द का यही अर्थ है कि ईश्वर अपने काम अर्थात् उत्पत्ति, पालन, प्रलय आदि और सभी जीवों के पुण्य-पाप की यथायोग्य व्यवस्था करने में किंचित् भी किसी की सहायता नहीं लेता। अर्थात् अपने अनन्त सामर्थ्य से ही सब अपना काम पूर्ण कर लेता है। – सत्यार्थ प्रकाश (सप्तम समुल्लास)

११. जीव का स्वरूप – जो चेतन, अल्पज्ञ, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःख और ज्ञान गुण वाला तथा नित्य है, वह ‘जीव’ कहाता है। – आर्योद्देश्य रत्नामाला (७७)

टिप्पणी : स्वरूप लिंग या चिह्न का दूसरा नाम है। आत्मा के लिंग न्यायदर्शन के अनुसार हैं – ‘इच्छाद्वेष-प्रयत्न-सुखदुःख-ज्ञानान्यात्मनो लिङ्गमिति’ ।।

१२. जीव और ईश्वर दोनों चेतनस्वरूप हैं। स्वभाव दोनों का पवित्र, अविनाशी और धार्मिकता आदि है। परन्तु परमेश्वर के सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति प्रलय, सबको नियम में रखना, जीवों को पाप-पुण्यों के फल देना आदि धर्मयुक्त कर्म हैं। और जीव के सन्तानोत्पत्ति, उनका पालन, शिल्प विद्या, अच्छे-बुरे कर्म हैं। ईश्वर के नित्य, ज्ञान, आनन्द, अनन्त बल आदि गुण हैं। – सत्यार्थ प्रकाश (सप्तम समुल्लास)

१२. जीव शरीरों में परिच्छिन्न है, विभु नहीं। जो विभु होता, तो जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, मरण, जन्म, संयोग, वियोग, जाना, आना कभी नहीं हो सकता। इसलिए जीव का स्वरूप अल्पज्ञ, अल्प अर्थात् सूक्ष्म है, और परमेश्वर अतीव सूक्ष्मात्सूक्ष्मतर, अनन्त, सर्वज्ञ और सर्वव्यापक स्वरूप है। इसीलए जीव और परमेश्वर का व्याप्य-व्यापक सम्बन्ध है। जैसे यह व्याप्य-व्यापक सम्बन्ध जीव-ईश्वर का है, वैसे ही सेव्य-सेवक, आधार-आधेय, स्वामी-भृत्य, राजा-प्रजा और पिता-पुत्र आदि सम्बन्ध हैं। – सत्यार्थ प्रकाश (सप्तम समुल्लास)

१२. प्रकृति – (सत्त्व) शुद्ध (रजः) मध्य (तमः) जाड्य अर्थात् जड़ता तीन वस्तु मिल कर जो एक संघात है, उसका नाम प्रकृति है। उससे महतत्त्व बुद्धि, उससे अहंकार, उससे पाँच तन्मात्रा सूक्ष्म भूत और दस इन्द्रियाँ तथा ग्यारहवाँ मन, पाँच तन्मात्राओं से पृथिव्यादि पाँच भूत, ये चौबीस और पच्चीसवाँ पुरुष अर्थात् जीव ओर परमेश्वर है। इनमें से प्रकृति अविकारिणी ; और महतत्त्व, अहंकार तथा पाँच सूक्ष्मभूत प्रकृति का कार्य (रूप) और इन्द्रियाँ मन तथा स्थूलभूतों का कारण है। पुरुष न किसी की प्रकृति, न उपादान कारण और न किसी का कार्य है। – सत्यार्थप्रकाश (अष्टम समुल्लास)

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
kolaybet giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark güncel giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
vdcasino
betgaranti
betpark giriş
betpark güncel giriş
vdcasino
vdcasino
jojobet güncel
betgaranti giriş
betgaranti güncel giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
meritbet giriş
meritbet giriş
jojobet
jojobet
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
hititbet giriş
favorisen
betpark giriş
hitbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpas giriş
bettilt giriş